परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (3)" | अंश 114

परमेश्वर केवल युग की अगुआई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए देह बनता है। तुम लोगों के लिए इस बिंदु को समझना आवश्यक है। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किए जाने योग्य नहीं हैं। कार्य करने के लिए उपयोग किए जा सकने से पूर्व मनुष्य को लंबी अवधि तक विकसित और पूर्ण किए जाने की आवश्यकता होती है, और इसके लिए एक विशेष रूप से उच्च स्तर की मानवता अपेक्षित होती है। मनुष्य को न केवल अपना सामान्य मानवता-बोध बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के साथ अपने व्यवहार के अनेक सिद्धांत और नियम भी समझने चाहिए, और इतना ही नहीं, उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिक ज्ञान का और अधिक अध्ययन करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। मनुष्य के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिए। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के मामले में ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही वह मनुष्य का कार्य है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है, जो उसे करना चाहिए। (स्वाभाविक रूप से उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, आकस्मिक या ऐच्छिक ढंग से नहीं, और वह तब शुरू होता है, जब उसकी सेवकाई पूरी करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता, अर्थात्, उसकी मानवता इनमें से किसी से युक्त नहीं होती (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता)। वह अपनी सेवकाई तभी पूरी करता है, जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी स्थिति कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है, जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता हो या उसके बारे में जो भी राय रखता हो, इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए, जब यीशु ने अपना काम किया था, तब कोई नहीं जानता था कि वह कौन है, परंतु वह अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उसे उस कार्य को करने में बाधा नहीं डाली, जो उसे करना था। इसलिए, उसने पहले अपनी पहचान को स्वीकार या घोषित नहीं किया, और बस लोगों को अपना अनुसरण करने दिया। स्वाभाविक रूप से यह केवल परमेश्वर की विनम्रता नहीं थी; बल्कि वह तरीका भी था, जिससे परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी तरीके से काम कर सकता था, क्योंकि मनुष्य के पास उसे खुली आँखों से पहचानने का कोई उपाय नहीं था। और यदि मनुष्य उसे पहचान भी लेता, तो भी वह उसके काम में सहायता कर पाने में सक्षम न होता। इसके अतिरिक्त, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसके देह को जान जाए; बल्कि अपना कार्य और अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए हुआ था। इस कारण से, उसने अपनी पहचान सार्वजनिक करने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने वह सारा कार्य पूरा कर लिया, जो उसे करना चाहिए था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत स्वभाविक रूप से मनुष्य पर स्पष्ट हो गई। देहधारी परमेश्वर मौन रहता है और कभी कोई घोषणाएँ नहीं करता। वह न तो मनुष्य पर, और न ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता है कि मनुष्य उसका अनुसरण किस तरह कर रहा है, वह बस अपनी सेवकाई पूरी करने और वह कार्य करने के लिए आगे बढ़ता जाता है, जो उसे करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता। जब उसके कार्य के समापन का समय आएगा, तब वह अवश्य ही पूरा और समाप्त किया जाएगा, और कोई भी अन्यथा आदेश नहीं दे सकता। अपने कार्य की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य से विदा होकर चला जाएगा, तभी मनुष्य उसके द्वारा किए गए कार्य को समझेगा, यद्यपि फिर भी पूरी तरह से स्पष्ट रूप में नहीं। और जिस इरादे से पहली बार उसने अपना कार्य किया, उसे समझने में मनुष्य को बहुत समय लगेगा। दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर के युग का कार्य दो भागों में विभाजित है। एक भाग में स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन शामिल हैं। एक बार जब उसके देह की सेवकाई पूरी तरह से संपन्न हो जाती है, तो कार्य का दूसरा भाग उन लोगों द्वारा किया जाना शेष रह जाता है, जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है। इस समय इंसान को अपना काम पूरा करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर पहले ही मार्ग प्रशस्त कर चुका है, और अब मनुष्य को उस पर स्वयं चलने की आवश्यकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि कार्य के एक भाग को देहधारी परमेश्वर करता है, और इसके बाद पवित्र आत्मा और उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग उस कार्य को आगे बढ़ाते हैं। अतः मनुष्य को पता होना चाहिए कि इस चरण में देहधारी परमेश्वर द्वारा प्राथमिक रूप से किए जाने वाले कार्य में क्या अपरिहार्य है, और उसे समझना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने के सही मायने क्या हैं और उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य क्या है, और परमेश्वर से वैसी माँगें नहीं करनी चाहिए, जैसी मनुष्य से की जाती हैं। इसी में मनुष्य की गलती, धारणा और अवज्ञा छिपी है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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