परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" | अंश 107

मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होती है। यद्यपि वह देह में हैं, किन्तु उसकी मानवता पूर्ण रूप से देह वाले एक मनुष्य के समान नहीं है। उसका अपना एक अनूठा चरित्र है, और यह भी उसकी दिव्यता द्वारा संचालित होता है। उसकी दिव्यता में कोई निर्बलता नहीं है; मसीह की निर्बलता उसकी मानवता की निर्बलता की ओर संदर्भित करता है। एक निश्चित सीमा तक, यह निर्बलता उसकी दिव्यता को विवश करती है, किन्तु इस प्रकार की सीमाएँ एक निश्चित दायरे और समय के भीतर हैं, तथा असीम नहीं है। जब उसकी दिव्यता का कार्य करने का समय आता है, तो वह उसकी मानवता की परवाह किए बिना किया जाता है। मसीह की मानवता पूर्णतः उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है। उसके मानवता के साधारण जीवन से अलग, उसकी मानवता की अन्य सभी क्रियाओं पर उसकी दिव्यता का असर होता है, सभी क्रियाएँ दिव्यता द्वारा प्रभावित और निर्देशित होती हैं। यद्यपि मसीह में मानवता है, किन्तु यह उसके दिव्यता के कार्य को बाधित नहीं करती है। ऐसा निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा निर्देशित होती है; यद्यपि दूसरों के सामने उसके आचरण में उसकी मानवता परिपक्व नहीं है, किन्तु यह उसके दिव्यता के सामान्य कार्य को प्रभावित नहीं करती है। जब मैं यह कहता हूँ कि उसकी मानवता भ्रष्ट नहीं हुई है, तब मेरा अभिप्राय यह है कि मसीह की मानवता उसकी दिव्यता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्देशित की जा सकती है, और यह कि वह साधारण मनुष्य की तुलना में उच्चतर समझ से सम्पन्न है। उसकी मानवता उसके कार्य में दिव्यता द्वारा निर्देशित होने के लिए सबसे अनुकूल है; उसकी मानवता दिव्यता के कार्य को अभिव्यक्त करने, और साथ ही ऐसे कार्य के प्रति समर्पण करने के योग्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य करता है, वह कभी उस कर्तव्य से आँख नहीं हटाता है जिसे मनुष्य को देह में होते हुए पूरा अवश्य करना चाहिए; वह सच्चे हृदय के साथ स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। उसके पास परमेश्वर का सार है, और उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर की पहचान है। केवल इतना ही है कि वह पृथ्वी पर आया तथा एक सृजित किया हुआ प्राणी बन गया, जिसका बाहरी आवरण सृजन किए हुए प्राणी का है, और अब ऐसी मानवता से सम्पन्न है जैसी उसके पास पहले नहीं थी; वह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है। यह परमेश्वर स्वयं का अस्तित्व है तथा मनुष्य के लिए अननुकरणीय है। उसकी पहचान स्वयं परमेश्वर है। यह उसके देह के परिप्रेक्ष्य से है कि वह परमेश्वर की आराधना करता है; इसलिए, ये वचन "मसीह स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करता है" त्रुटिपूर्ण नहीं हैं। वह मनुष्य से जो माँगता है वह निश्चत रूप से उसका स्वयं का अस्तित्व है; जो कुछ भी वह मनुष्य से माँगता है वह उसे उनसे ऐसा माँगने से पहले ही प्राप्त कर चुका है। वह कभी भी दूसरों से माँग नहीं करता है जब वह स्वयं उनसे मुक्त हो जाता है, क्योंकि यह सब उसका अस्तित्व गठित करते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि वह कैसे अपना कार्य संचालित करता है, वह इस प्रकार कार्य नहीं करेगा जो परमेश्वर की अवज्ञा करता हो। चाहे वह मनुष्य से कुछ भी माँगे, कोई भी माँग मनुष्य द्वारा प्राप्य से बढ़कर नहीं होती है। वह जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर की इच्छा पर चलता है तथा उसकी प्रबंधन व्यवस्था के वास्ते है। मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है, इसलिए सभी सृजन किए गए प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता, अर्थात्, परमेश्वर स्वयं का स्वभाव तथा अस्तित्व है, जो उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही साधारण हो, यह बात अखंडनीय है कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले तथा वह किसी भी प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करें, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है, मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह कैसे भी अपनी दिव्यता के अस्तित्व को प्रकट करे, मनुष्य यह स्वीकार करने में असमर्थ है कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपनी आज्ञाकारिता और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख लोग उतना ही हल्के ढंग से मसीह का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी है जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपनाते हैं, मगर उन "महान लोगों" की ऊँची प्रतिमाओं को आराधना करने के लिए मेज पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा परमेश्वर की अवज्ञा इस तथ्य से आते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा के प्रति और साथ ही मसीह की सामान्य मानवता से समर्पण करता है; इसमें परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा उसकी अवज्ञा का स्रोत निहित है। यदि मसीह के पास न तो उसकी मानवता का भेष होता और न ही सृजन किए गए प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज की होती, बल्कि इसके बजाए अति मानवता से सम्पन्न होता, तब किसी भी मनुष्य में अवज्ञा न होने संभावना होती। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अद्श्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण इस वजह से है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है तथा उसके पास सृजन किए गए प्राणी की कोई भी विशेषता नहीं है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किन्तु मसीह के प्रति अपमान करने की प्रवृत्ति बनाए रखता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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