परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार" | अंश 103

चाहे इस चरण में देहधारी परमेश्वर कठिनाईयों को सह रहा हो या अपनी सेवकाई को कर रहा हो, वह इसे केवल देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए करता है, क्योंकि यह परमेश्वर का अंतिम देहधारण है। परमेश्वर केवल दो बार देहधारण कर सकता है। कोई तीसरी बार नहीं हो सकता है। पहला देहधारण पुरुष था; दूसरा स्त्री था, और इसलिए परमेश्वर की देह की छवि मनुष्य के मन में पूर्ण होती है; इसके अलावा, दो देहधारणों ने परमेश्वर के कार्य को देह में पहले ही समाप्त कर लिया है। देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए पहली बार परमेश्वर के देहधारण ने सामान्य मानवता को धारण किया। इस बार भी वह सामान्य मानवता को धारण करता है, किन्तु इस देहधारण का अर्थ भिन्न है: यह अधिक गहरा है, और उसका कार्य अधिक गहन महत्व का है। परमेश्वर के पुनः देहधारी होने का कारण देहधारण के अर्थ को पूरा करना है। जब परमेश्वर इस चरण के कार्य को पूरी तरह से समाप्त कर लेगा, तो देहधारण का सम्पूर्ण अर्थ, अर्थात्, देह में परमेश्वर का कार्य, पूर्ण हो जाएगा, और देह में करने के लिए अब और कार्य बाकी नहीं रह जाएगा। अर्थात्, अब से आगे परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए कभी भी पुनः देहधारण नहीं करेगा। केवल मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए परमेश्वर देहधारण का कार्य करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य के वास्ते को छोड़ कर, देह में आना परमेश्वर के लिए किसी भी तरह से सामान्य नहीं है। कार्य को करने के लिए देह में आ कर, वह शैतान को दिखाता है कि परमेश्वर एक देह, एक सामान्य व्यक्ति एक साधारण व्यक्ति है—और फिर भी वह संसार पर विजयी राज कर सकता है, शैतान को परास्त कर सकता है, मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है, मानवजाति को जीत सकता है! शैतान के कार्य का लक्ष्य मानवजाति को भ्रष्ट करना है, जबकि परमेश्वर का लक्ष्य मानवजाति को बचाना है। शैतान मनुष्य को अथाह खाई में फँसाता है, जबकि परमेश्वर उसे इससे बचाता है। शैतान सभी लोगों से अपनी आराधना करवाता है, जबकि परमेश्वर उन्हें अपने प्रभुत्व के अधीन करता है, क्योंकि वह सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है। यह समस्त कार्य परमेश्वर के दो देहधारणों के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उसका देह सार रूप में मानवता और दिव्यता का मिलाप है और सामान्य मानवता को धारण करता है। इसलिए देहधारी परमेश्वर की देह के बिना, परमेश्वर मानवजाति को बचाने के परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता है, और अपनी देह की सामान्य मानवता के बिना, देह में उसका कार्य सफल नहीं हो सकता है। परमेश्वर के देहधारण का सार यह है कि उसे सामान्य मानवता अवश्य धारण करनी चाहिए; क्योंकि अन्यथा होने पर यह देहधारण करने के परमेश्वर के मूल आशय के विपरीत चला जाएगा।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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