परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार" | अंश 100

पृथ्वी पर यीशु ने जो जीवन जीया वह देह में एक सामान्य जीवन था। उसने अपनी देह का सामान्य जीवन जीया। उसके अधिकार—परमेश्वर का कार्य करना और उसके वचन बोलना, या बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना, ऐसे असाधारण कार्य करना—ने ज़्यादातर स्वयं को तब तक प्रकट नहीं किया जब तक उसने अपनी सेवकाई आरम्भ नहीं की। उसका जीवन उनतीस वर्ष की उम्र से पहले, उसके अपनी सेवकाई आरम्भ करने से पहले, इस बात का पर्याप्त प्रमाण था कि वह एक सामान्य देह वाला था। इस कारण से और क्योंकि उसने अभी तक अपनी सेवकाई को करना आरम्भ नहीं किया था, लोगों को उसमें कुछ भी दिव्य नहीं दिखाई दिया, एक सामान्य मानव, एक सामान्य मनुष्य से अधिक कुछ नहीं दिखाई दिया—जैसे कि शुरू में कुछ लोग उसे यूसुफ के पुत्र के रूप में मानते थे। लोगों ने सोचा कि वह एक सामान्य मनुष्य का पुत्र है, उसके पास यह बताने का कोई तरीका नहीं था कि वह देहधारी परमेश्वर की देह है; यहाँ तक कि जब, अपनी सेवकाई को करने के दौरान, उसने कई अचम्भे किए, तब भी अधिकांश लोगों ने कहा कि वह यूसुफ का पुत्र है, क्योंकि सामान्य मानवता के बाह्य आवरण वाला वह मसीह था। उसकी सामान्य मानवता और कार्य दोनों, यह सिद्ध करते हुए कि परमेश्वर पूरी तरह से देह में आया है, जो कि एक बहुत ही साधारण मनुष्य बन गया है, पहले देहधारण के महत्व को पूर्ण करने के लिए अस्तित्व में थे। यह कि कार्य करने से पहले उसकी सामान्य मानवता थी यह इस बात का प्रमाण था कि वह एक साधारण देह था; और यह कि उसने बाद में भी कार्य किया इस बात ने भी यह प्रमाणित किया कि वह एक साधारण देह थी, क्योंकि उसने सामान्य मानवता, संकेत और चमत्कार किए, बीमार को चंगा किया और दुष्टात्माओं को देह में से निकाला। वह चमत्कारों को कर सका उसका कारण यह था कि उसकी देह ने परमेश्वर के अधिकार को धारण किया था, ऐसी देह थी जिसमें परमेश्वर का आत्मा आच्छादित था। वह परमेश्वर का आत्मा के कारण इस अधिकार से सम्पन्न था, और इसका अर्थ यह नहीं है कि वह देह नहीं था। बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना वह कार्य था जो उसे अपनी सेवकाई में करने की आवश्यकता थी, उसकी मानवता में छिपी दिव्यता की अभिव्यक्ति थी, और इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि उसने कौन से संकेत दिखाए या उसने अपने अधिकार को किस प्रकार से प्रदर्शित किया, वह तब भी सामान्य मानवता में रहा और तब भी एक सामान्य देह था। उस स्थिति तक कि वह सलीब पर मरने के बाद पुनर्जीवित हुआ था, तो वह एक सामान्य देह के भीतर रहा। अनुग्रह प्रदान करना, बीमार को चंगा करना, और दुष्टात्माओं को निकालना ये सब उसकी सेवकाई का हिस्सा थे, ऐसे कार्य थे जो उसकी सामान्य देह में किए गए थे। क्रूस पर जाने से पहले, इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या कर रहा है, वह कभी भी अपने सामान्य मानव देह से अलग नहीं हुआ। वह परमेश्वर स्वयं था, परमेश्वर का स्वयं का कार्य कर रहा था, फिर भी क्योंकि वह परमेश्वर की देहधारी देह था, उसने खाना खाया और कपड़े पहने, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ थी, उसमें सामान्य मानवीय तर्क-शक्ति और सामान्य मानवीय मन था। यह सब इस बात का प्रमाण था कि वह एक सामान्य मनुष्य था, न कि कोई अलौकिक। उसका कार्य परमेश्वर के पहले देहधारण के कार्य को पूर्ण करना, और पहले देहधारण की सेवकाई को पूरा करना था। देहधारण का महत्व यह है कि वह साधारण, सामान्य मनुष्य परमेश्वर स्वयं के कार्यों को करता है; अर्थात्, कि परमेश्वर अपने दिव्य कार्य को मानवता में करता है और उसके द्वारा शैतान को परास्त करता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; जो कार्य वह देह में करता है वह पवित्रात्मा का कार्य होता है, जो देह में प्राप्त होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर को छोड़कर कोई भी अन्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूर्ण नहीं कर सकता है; अर्थात्, केवल परमेश्वर की देहधारी देह, यह सामान्य मानवता—और कोई अन्य नहीं—दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। यदि, उसके पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले परमेश्वर में सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जैसे ही उसने जन्म लिया था वह अचम्भे कर सकता, यदि जैसे ही उसने बोलना आरम्भ किया वह स्वर्ग की भाषा बोल सकता, यदि जिस क्षण उसने सबसे पहले पृथ्वी पर कदम रखा वह सभी संसारिक मामलों को समझ सकता, हर व्यक्ति के विचारों और इरादों को समझ सकता—तो वह एक सामान्य मनुष्य नहीं कहलाया जा सकता था, और उसकी देह मानवीय देह नहीं कहलायी जा सकती थी। यदि ऐसा मामला मसीह के साथ होता, तो परमेश्वर के देहधारण का अर्थ और सार दोनों ही समाप्त हो गए होते। यह कि वह सामान्य मानवता से सम्पन्न था इससे सिद्ध होता है कि देह में देहधारी परमेश्वर था; यह तथ्य कि वह एक सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से होकर गुज़रा आगे प्रदर्शित करता है कि वह एक सामान्य देह था; और इसके अलावा, उसका कार्य इस बात का पर्याप्त सबूत हैं कि वह परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के आत्मा, का देह बनना था। कार्य की आवश्यकताओं की वजह से परमेश्वर देहधारी बनता है; दूसरे शब्दों में, कार्य का यह चरण देह में पूर्ण किए जाने, सामान्य मानवता में पूर्ण किए जाने की आवश्यकता थी। यही “वचन का देहधारी होना” के लिए, “वचन का देह में प्रकट होना” के लिए पूर्वापेक्षा है, और परमेश्वर के दो देहधारणों के पीछे की सच्ची कहानी है। लोगों का यह मानना हो सकता है कि यीशु का सम्पूर्ण जीवन चमत्कारों से भरा था, कि पृथ्वी पर अपने कार्य की समाप्ति तक उसने सामान्य मानवता को प्रकट नहीं किया, कि उसमें सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ या कमज़ोरियाँ या मानवीय भावनाएँ नहीं थीं, उसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओँ की या सामान्य मानवीय विचारों को ग्रहण करने की ज़रूरत नहीं थी। वे उसके पास एक अतिमानवीय मन, एक सर्वोत्त्कृष्ट मानवता होने की केवल कल्पना करते। वे मानते कि चूँकि वह परमेश्वर है, इसलिए उसे उस तरह से रहना और सोचना नहीं चाहिए जैसे सामान्य मानव रहते और सोचते हैं, कि केवल कोई सामान्य व्यक्ति, एक वास्तविक इंसान, ही सामान्य मानव विचारों को सोच सकता और एक सामान्य मानवीय जीवन जी सकता है। ये सभी मनुष्य के विचार, और मनुष्य की अवधारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के कार्य के वास्तविक इरादों के प्रतिकूल चलते हैं। सामान्य मानव सोच, सामान्य मानव सूझ-बूझ और साधारण मानवता को बनाए रखती है; सामान्य मानवता देह के सामान्य प्रकार्यों को बनाए रखती है; और देह के सामान्य प्रकार्य देह के सामान्य जीवन को इसकी समग्रता में बनाए रखते हैं। केवल ऐसी देह में कार्य करने के द्वारा ही परमेश्वर अपने देहधारण के उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है। यदि देहधारी परमेश्वर केवल देह के बाहरी आवरण को ही धारण किए रहता, किन्तु सामान्य मानव विचारों को नहीं सोचता, तो उसकी देह मानवीय सूझ-बूझ को धारण नहीं करती, वास्तविक मानवता को तो बिल्कुल भी धारण नहीं करती। कैसे, बिना मानवता वाली, इस प्रकार की देह, उस सेवकाई को पूर्ण कर सकती है जिसे देहधारी परमेश्वर को करना चाहिए? सामान्य मन मानव जीवन के सभी पहलुओं को बनाए रखता है; बिना सामान्य मन के, कोई व्यक्ति मानव नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जो सामान्य विचारों को नहीं सोचता है वह मानसिक रूप से बीमार है। एक मसीह जिसमें कोई भी मानवता नहीं बल्कि केवल दिव्यता है उसे परमेश्वर का देहधारी देह नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर के देहधारी देह में कैसे कोई सामान्य मानवता नहीं हो सकती है? क्या ऐसा कहना ईशनिंदा नहीं होगी कि मसीह में कोई मानवता नहीं है? सभी क्रियाकलाप जिसमें सामान्य मानव शामिल होते हैं एक सामान्य मानव मन की कार्यशीलता पर भरोसा करते हैं। इसके बिना, मानव पथभ्रष्ट की तरह का व्यवहार करते; वे यहाँ तक कि सफेद और काले, अच्छे और बुरे के मध्य अंतर बताने में भी असमर्थ होते, और उनमें कोई भी मानवीय आचारनीति और नैतिक सिद्धांत नहीं होते। इसी प्रकार से, यदि देहधारी परमेश्वर ने एक सामान्य मानव के रूप में नहीं सोचा होता, तो वह एक प्रमाणिक देह, एक सामान्य देह, नहीं होता। इस प्रकार की गैर-विचारशील देह दिव्य कार्य को धारण करने में समर्थ नहीं होती। वह देह की सामान्य गतिविधियों में शामिल होने में समर्थ नहीं होती, पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ-साथ रहने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं होती। और इसलिए परमेश्वर के देहधारण का महत्व, परमेश्वर का देह में आने का वास्तविक सार समाप्त हो गया होता। परमेश्वर के देहधारण की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को बनाए रखती है। कोई व्यक्ति कह सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि यह देह एक सामान्य मानव मन धारण नहीं करती, तो परमेश्वर देह में कार्य नहीं कर सकता था और जो उसे देह में करने की आवश्यकता थी वह कभी भी सम्पन्न नहीं हो सकती थी। यद्यपि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य मानवीय मन रखता है, किन्तु उसका कार्य मानव विचार के द्वारा अपमिश्रित नहीं होता है; वह इस पूर्वशर्त के अधीन सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य को अपने हाथ में लेता है, कि वह मानवता को मन के साथ धारण करता है, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाने के द्वारा। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसकी देह के विचार कितने उत्कृष्ट हैं, उसके कार्य पर तर्क या सोच का ठप्पा नहीं लगता है। दूसरे शब्दों में, उसका कार्य उसकी देह के मन के द्वारा कल्पना नहीं किया जाता है, बल्कि उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करने की आवश्यकता है, और इनमें से कोई भी उसके मस्तिष्क द्वारा कल्पना नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और सलीब पर चढ़ना उसके मानवीय मन के परिणाम नहीं थे, किसी मानवीय मन वाले किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते थे। इसी तरह, आज का जीतने का कार्य ऐसी सेवकाई है जो देहधारी परमेश्वर के द्वारा अवश्य की जानी चाहिए, किन्तु यह किसी मानवीय इच्छा का कार्य नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी दैहिक मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर को सामान्य मानव मन से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए, सामान्य मानवता से सम्पन्न अवश्य होना चाहिए, क्योंकि उसे एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य को अवश्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर के कार्य का वास्तविक सार है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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