परमेश्वर के दैनिक वचन | "परिचय" | अंश 279

बाइबल हज़ारों साल से इंसानी इतिहास का हिस्सा रही है। इतना ही नहीं, लोग इसे परमेश्वर की तरह मानते हैं। यहाँ तक कि अंत के दिनों में इसने परमेश्वर की जगह ले ली है, जिससे परमेश्वर अप्रसन्न है। इसलिए, जब समय मिला, परमेश्वर ने बाइबल की अंदरूनी कहानी और उसकी उत्पत्ति को स्पष्ट करना ज़रूरी समझा। अगर वह ऐसा न करता, तो बाइबल लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान बनाए रखती, और लोग परमेश्वर के कर्मों को मापने और उनका खंडन करने के लिए बाइबल के वचनों का इस्तेमाल करते रहते। बाइबल के सार, उसकी संरचना और उसकी कमियों की व्याख्या करके परमेश्वर किसी भी तरह से न तो बाइबल के अस्तित्व को नकार रहा था, न ही वह उसकी निंदा कर रहा था; बल्कि वह तो एक उपयुक्त और उचित विवरण मुहैया करा रहा था, जिससे बाइबल की मौलिक छवि बहाल हो सके। उसने बाइबल से संबंधित लोगों की गलतफहमियों को दूर किया और उनके सामने बाइबल की सही दृष्टि प्रस्तुत की, ताकि वे अब बाइबल की आराधना करके और भ्रमित न हों; जिसका तात्पर्य है कि, ताकि वे बाइबल में अपने अंधविश्वास को परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर की आराधना मानने की गलती न करें, और उसकी सच्ची पृष्ठभूमि और कमियों का सामना करने मात्र से भयभीत न हों। एक बार लोगों में बाइबल की विशुद्ध समझ पैदा हो जाए, तो वे बिना किसी खेद के इसे दरकिनार कर देंगे और परमेश्वर के नए वचनों को हिम्मत के साथ स्वीकार करेंगे। इन अनेक अध्यायों में परमेश्वर का यही लक्ष्य है। जो सत्य परमेश्वर लोगों को बताना चाहता है, वह यह है कि कोई भी सिद्धांत या तथ्य परमेश्वर के आज के कार्य और वचनों की जगह नहीं ले सकता, और कोई भी चीज़ परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकती। अगर लोग बाइबल के फंदे से नहीं निकल सके, तो वे कभी भी परमेश्वर के सामने नहीं आ पाएँगे। अगर वे परमेश्वर के सामने आना चाहते हैं, तो उन्हें अपने दिल से हर वो चीज़ साफ करनी होगी, जो परमेश्वर की जगह ले सकती हो; तभी वे परमेश्वर के लिए संतोषजनक होंगे। हालाँकि यहाँ परमेश्वर केवल बाइबल का उल्लेख करता है, लेकिन यह बात मत भूलो कि बाइबल के अलावा भी ऐसी बहुत-सी गलत चीज़ें हैं जिन्हें लोग दिल से पूजते हैं; बस उन्हीं चीज़ों को लोग नहीं पूजते जो सचमुच परमेश्वर से आती हैं। परमेश्वर बाइबल का इस्तेमाल केवल लोगों को यह याद दिलाने के लिए एक उदाहरण के रूप करता है कि वे कोई गलत रास्ता न अपनाएँ और परमेश्वर में विश्वास रखते हुए और उसके वचनों को स्वीकारते हुए फिर से चरम सीमाओं पर जाकर उलझन का शिकार न हो जाएँ।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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