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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (III)     भाग दो

हमने बस अभी अभी बात की है कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल करता है, अतः इसके आगे आइए हम इस विषय में बात करें कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करता है। पहली बात, मनुष्य को भ्रष्ट करने हेतु विज्ञान के उपयोग में, मनुष्य की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है, विज्ञान का अनुसंधान करने और रहस्यों की छान बीन के लिए मनुष्य की इच्छा[क] को संतुष्ट करता है। साथ ही विज्ञान के नाम में, मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता को निरन्तर बढ़ाने के लिए शैतान उसकी भौतिक आवश्यकताओं और उसकी माँगों को संतुष्ट करता है। इसलिए शैतान, इस नाम में, मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान के तरीके का इस्तेमाल करता है। क्या यह सिर्फ मनुष्य की सोच है या मनुष्य के मन में है जिसे शैतान विज्ञान के इस तरीके का इस्तेमाल करके भ्रष्ट करता है? हमारे आस पास के लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके सम्पर्क में हम आ सकते हैं, और ऐसा क्या है जिसे भ्रष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान का उपयोग करता है? (प्राकृतिक वातावरण।) तुम सब सही हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों को इसके द्वारा भारी नुकसान पहुँचाया गया है, और तुम भी इसके द्वारा बहुत अधिक प्रभावित हुए हो। मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करने, और मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान की सब प्रकार की विभिन्न खोजों एवं निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, साथ ही शैतान जीवन जीने के इस वातावरण के मनमाने विनाश एवं दोहन को क्रियान्वित करने के लिए विज्ञान को एक माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल करता है जिसे परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था। वह इसे इस बहाने के अंतर्गत करता है कि यदि मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रियान्वित करता है, तो मनुष्य का जीवन जीने का वातावरण और बेहतर होगा तथा मनुष्य के जीवन जीने के स्तर निरन्तर बढ़ेंगे, और इसके अतिरिक्त उस वैज्ञानिक विकास को मनुष्य की दैनिक रूप से बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताओं और नित्य ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए किया जाता है ताकि उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए। यदि कारण ये नहीं हैं, तो वह पूछता है कि विज्ञान का विकास करके तुम वास्तव में क्या कर रहे हो। यह विज्ञान के विषय में शैतान के विकास का सैद्धान्तिक आधार है। फिर भी विज्ञान के पास मानवजाति के लिए कौन कौन से नतीजे हैं? हमारा तात्कालिक वातावरण किन चीज़ों से मिलकर बना हुआ है? क्या उस वायु को जिसमें मानवजाति सांस लेती है दूषित नहीं किया गया है? क्या वह जल जिसे हम पीते हैं अभी भी सचमुच में शुद्ध है? (नहीं।) अतः उस भोजन के विषय में क्या कहें जिसे हम खाते हैं, क्या इसका अधिकांश भाग प्राकृतिक है? (नहीं।) अतः फिर यह क्या है? इसे उर्वरक का उपयोग करके उगाया जाता है और अनुवांशिक संशोधन का उपयोग करके इसकी खेती की जाती है, और साथ ही चीज़ों की अनुवांशिक किस्मों में परिवर्तन (म्यूटेशनस) भी हैं जिन्हें विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करके उत्पन्न किया जाता है, ताकि यहाँ तक कि वे सब्जियाँ और फल जिन्हें हम खाते हैं वे अब आगे से प्राकृतिक नहीं रहे। अब यह लोगों के लिए आसान नहीं है कि खाने के लिए असंशोधित (प्राकृतिक) खाद्य पदार्थों को पा सकें। पहले से ही शैतान के तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रक्रिया से होकर गुज़ारे जाने के बाद, यहाँ तक कि अंडे भी पहले के समान स्वादिष्ट नहीं रह गए हैं। बड़ी तस्वीर को देखने पर, समूचे वातावरण को नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़ें, झीलें, जंगल, नदियाँ, महासागर, एवं हर वह चीज़ जो भूमि के ऊपर एवं नीचे है उन सब को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों के द्वारा बर्बाद कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र, एवं जीवन जीने का सम्पूर्ण वातावरण जिसे परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को प्रदान किया गया था उसे उस तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है। हालाँकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने उसे प्राप्त किया है जिसकी अपेक्षा उन्होंने जीवन की गुणवत्ता के सन्दर्भ में की थी जिसे वे खोजते थे, और अपनी काम वासनाओं एवं अपने शरीर दोनों को संतुष्ट करते हैं, फिर भी वह वातावरण जिस में मनुष्य रहता है उसे मुख्य तौर पर उन विभिन्न "उपलब्धियों" के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है जिन्हें विज्ञान के द्वारा लाया गया था। यहाँ तक कि बाहर या हमारे घरों में भी अब आगे से हमें शुद्ध हवा में एक सांस लेने का भी अधिकार नहीं है। तुम मुझे बताओ, क्या यह मानवजाति का दुःख है? क्या अभी भी कोई खुशी है कि उसे मनुष्य के लिए बोला जाए कि वह जीवन जीने के ऐसे परिक्षेत्र में रहता है? मनुष्य जीवन जीने के इस परिक्षेत्र में रहता है और, बिलकुल शुरुआत से ही, जीवन जीने के इस वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए सृजा गया था। वह जल जिसे लोग पीते हैं, वह वायु जिसमें लोग सांस लेते हैं, वह भोजन जिसे लोग खाते हैं, पौधे, पेड़, और महासागर—जीवन जीने के इस समस्त वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, और प्राकृतिक नियम के अनुसार संचालित होता है जिसे परमेश्वर के द्वारा स्थापित किया गया था। यदि कोई विज्ञान नहीं होता, और लोग उसका आनन्द उठा सकते जिसे परमेश्वर के मार्ग के अनुसार मनुष्य को प्रदान किया गया था, तो वे खुश होते और उसके अति प्राचीन (मूल) रूप में हर चीज़ का आनन्द उठा सकते थे। फिर भी, अब यह सब कुछ शैतान के द्वारा नष्ट और बर्बाद कर दिया गया है; मनुष्य का जीवन जीने का मूल परिक्षेत्र अब आगे से अपने अति प्राचीन (मूल) रूप में नहीं है। परन्तु कोई भी यह पहचानने के योग्य नहीं है कि किसने इस प्रकार के परिणाम को उत्पन्न किया है या यह कैसे हुआ है, और इसके अतिरिक्त और भी अधिक लोग शैतान के द्वारा उनमें डाले गए उन विचारों का उपयोग करने के द्वारा, और सांसारिक आँखों से विज्ञान को देखने के द्वारा विज्ञान को समझते हैं और नज़दीक आते हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद एवं दयनीय नहीं है? शैतान के साथ अब उस परिक्षेत्र को जिसमें मानवजाति अस्तित्व में है और उसके जीवन जीने के वातावरण को लेने और उन्हें इस स्थिति तक भ्रष्ट करने, और मानवजाति के साथ निरन्तर इस रीति से विकसित होने के बाद, क्या परमेश्वर के हाथ से इस मानवजाति को पृथ्वी पर से मिटाने की कोई आवश्यकता है जो अत्यंत भ्रष्ट हो चुकी है और जो उसके प्रतिकूल हो गई है? क्या परमेश्वर के हाथ से मानवजाति को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? (नहीं।) यदि मानवजाति निरन्तर इस रीति से विकसित होती रहती, तो वह कौन सी दिशा लेगी? (बर्बादी।) मानवजाति को किस प्रकार बर्बाद किया जाएगा? प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए मनुष्य के लोभी खोज के साथ, वे निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण एवं गहरे अनुसंधान को क्रियान्वित करते रहते हैं, तो वे लगातार अपनी स्वयं की भौतिक आवश्यकताओं एवं काम वासना को संतुष्ट करते रहते हैं: फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे हैं? सबसे पहले अब आगे से कोई पर्यावरणीय संतुलन नहीं रहा और, इसके साथ ही साथ, इस प्रकार के वातावरण के द्वारा समस्त मानवजाति के शरीरों को दूषित एवं क्षतिग्रस्त कर दिया गया है, और विभिन्न संक्रमित रोग, विपदाएँ, एवं धुंध हर जगह फैल गई है। यह ऐसी स्थति है जिस पर अब मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है, क्या यह सही नहीं है? अब तुम लोग इसे समझते हो, यदि मानवजाति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करती है, परन्तु इस रीति से हमेशा शैतान का अनुसरण करती रहती है—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करती है, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करती है, निरन्तर जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करती है—तो क्या तुम लोग पहचानने में समर्थ हो कि मानवजाति का स्वाभाविक अन्त क्या होगा? स्वाभाविक अंतिम परिणाम क्या होगा? (बर्बादी।) यह बर्बादी होगीः एक समय में एक कदम बढ़ाकर बर्बादी की ओर पहुँचना! एक समय में एक कदम के लिए दृष्टिकोण! अब ऐसा दिखाई देता है मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई पेय हो या धीमे धीमे कार्य करनेवाला ज़हर हो जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम लोग चीज़ों को परखने की कोशिश करो तो तुम लोग इसे कोहरेदार धुंध में करो; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितने कठोर दिखाई देते हो, क्योंकि तुम लोग चीज़ों को साफ साफ नहीं देख सकते हो, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितनी कठोर कोशिश करते हो, क्योंकि तुम लोग उन्हें समझ नहीं सकते हो। फिर भी शैतान अभी भी विज्ञान के नाम का उपयोग करता है कि तुम्हारी भूख को बढ़ाए और एक कदम के बाद दूसरे कदम को रखते हुए नाक की सीध में अथाह कुण्ड की ओर एवं मृत्यु की ओर तुम्हारी अगुवाई करे। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) यह दूसरा मार्ग है।

वह मुद्दा कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारम्परिक संस्कृति का उपयोग करता है इसके विषय में भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास के बीच में अनेक समानताएँ हैं, केवल पारम्परिक संस्कृति में ही कई कहानियाँ, संकेत, एवं स्रोत हैं। शैतान ने कई लोक कहानियों या इतिहास की पुस्तकों में कहानियों को गढ़ा है एवं अविष्कार किया है, और लोगों पर पारम्परिक संस्कृति या अंधविश्वासी प्रसिद्ध व्यक्तियों के विषय में गहरे प्रभाव डाले हैं। उदाहरण के लिए चीन की आठ अमर हस्तियाँ जो समुद्र को पार करती हैं, जरनी टू द वेस्ट, जेड सम्राट, नेज़्हा कंकर्स दि ड्रेगन किंग है, और परमेश्वरों के प्रतिष्ठापन को ही लो। क्या ये मनुष्य के मनों में गहराई से जड़ नहीं पकड़ चुकी हैं? भले ही कुछ लोग इन सभी विवरणों को नहीं जानते हैं, फिर भी वे अब भी सामान्य कहानियों को तो जानते ही हैं, और यही वह सामान्य विषय सूची है जो तुम्हारे हृदय एवं तुम्हारे मनों में चिपकी हुई है, और तुम इसे भूल नहीं सकते हो। विभिन्न समयों पर इसके भिन्न भिन्न विचारों एवं जीवन दर्शनों को फैलाने के बाद, ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान ने बहुत लम्बे समय पहले से मनुष्य के लिए निर्धारित किया था। ये चीज़ें सीधे तौर पर हानि पहुँचाती हैं और लोगों की आत्माओं को नष्ट करती हैं और लोगों को एक सम्मोहन के बाद दूसरे सम्मोहन में डालती हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब एक बार तुमने इन चीज़ों को स्वीकार कर लिया है जो पारम्परिक संस्कृति, कहानियों या अंधविश्वास से उत्पन्न होती हैं, जब एक बार ये चीज़ें तुम्हारे मन में स्थापित हो जाती हैं, जब एक बार वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो यह बस एक सम्मोहन के समान है—तुम उलझ जाते हो और इन संस्कृतियों, इन विचारों एवं पारम्परिक कहानियों के द्वारा प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन, एवं जीवन पर तुम्हारे बाह्य दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं और साथ ही वे चीज़ों के विषय में तुम्हारे फैसले को भी प्रभावित करती हैं। इससे बढ़कर वे जीवन के सच्चे मार्ग के लिए तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं: यह वास्तव में एक सम्मोहन है! तुम कोशिश तो करते हो परन्तु तुम उन्हें झटक कर दूर नहीं कर सकते हो; तुम उन्हें चोट पहुँचाते तो हो किन्तु तुम उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते हो; तुम उन पर प्रहार तो करते हो किन्तु तुम उन पर प्रहार करने नीचे नहीं गिरा सकते हो। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ)। इसके अतिरिक्त, जब मनुष्य को इस प्रकार के सम्मोहन में अनजाने में डाल दिया जाता है, तो वे अनजाने में शैतान की आराधना करना प्रारम्भ कर देते हैं, अपने अपने हृदय में शैतान की छवि को बढ़ावा देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपनी मूर्ति के रूप में, और ऐसी वस्तु के रूप में स्थापित कर लेते हैं कि उसकी आराधना करें और उसकी ओर देंखें, यहाँ तक कि उस हद तक चले जाते हैं कि उसके साथ उसी रीति से व्यवहार करते हैं जैसे वे परमेश्वर के साथ करते। अनजाने में ही, ये चीज़ें लोगों के हृदय में हैं जो उनके वचनों एवं कार्यों को नियन्त्रित कर रही हैं। तुम अनजाने में इन कहानियों के अस्तित्व को मान लेते हो, उन्हें वास्तविक प्रसिद्ध व्यक्ति बना देते हो, और उन्हें वास्तव में मौजूद वस्तुओं में बदल देते हो। अनभिज्ञता में, तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीज़ों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। साथ ही तुम अवचेतन रूप से दुष्टों, शैतान एवं मूर्तियों को अपने स्वयं के घर में और अपने स्वयं के हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक सम्मोहन है! क्या तुम लोग ऐसा ही महसूस करते हो? (हाँ।) क्या तुम लोगों के बीच में कोई ऐसा है जिसने धूप जलायी हो और बुद्ध की आराधना की हो? (हाँ।) अतः धूप जलाने और बुद्ध की आराधना करने का उद्देश्य क्या था? (शान्ति के लिए प्रार्थना करना।) क्या शांति के लिए शैतान से प्रार्थना करना बेतुका है? क्या शैतान शान्ति लाता है? (नहीं।) इसके विषय में अब सोच रहे हो, क्या तुम लोग पहले अनजान थे? (हाँ।) उस प्रकार का आचरण बहुत ही बेतुका, अज्ञानी एवं नौसिखिया है, है कि नहीं? शैतान तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता है। क्यों? शैतान सिर्फ यही विचार करता है कि किस प्रकार तुम्हें भ्रष्ट करे और वह तुम्हें शान्ति नहीं दे सकता है; वह तुम्हें केवल एक अस्थायी राहत दे सकता है। परन्तु तुम्हें एक प्रतिज्ञा करनी होगी और यदि तुम अपने वादे को तोड़ते हो या उस प्रतिज्ञा को तोड़ते हो जिसे तुमने उसके लिए किया है, तो तुम देखोगे कि वह तुम्हें किस प्रकार कष्ट देता है। तुमसे एक प्रतिज्ञा करवाने में, वह वास्तव में तुम्हें नियन्त्रित करना चाहता है, क्या वह नहीं चाहता है? जब तुम लोगों ने शान्ति के लिए प्रार्थना की थी, तो क्या तुम लोगों ने शान्ति पाई थी? (नहीं।) तुम लोगों ने शान्ति नहीं पाई थी, परन्तु इसके विपरीत वह दुर्भाग्य, अंतहीन आपदाएँ और विपत्तियों के पूरे समूह को लेकर आया था—सही मायने में कड़वाहट का असीम महासागर। शान्ति शैतान के अधिकार क्षेत्र के भीतर नहीं है, और यही सत्य है। सामंती अन्धविश्वास एवं पारम्परिक संस्कृति के विषय में यह मानवजाति का परिणाम है।

शैतान के मामले में भी विशेष व्याख्या की आवश्यकता है जो मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का लाभ उठाता है। इन सामाजिक प्रवृत्तियों में अनेक बातें शामिल होती हैं। कुछ लोग कहते हैं: "क्या वे उन कपड़ों के विषय में हैं जिन्हें हम पहनते हैं? क्या वे नवीतनम फैशन, सौन्दर्य प्रसाधनों, बाल बनाने की शैली एवं स्वादिष्ट भोजन के विषय में हैं?" क्या वे इन चीज़ों के विषय में हैं? ये प्रवृतियों (प्रचलन) का एक भाग हैं, परन्तु हम यहाँ इन बातों के विषय में बात करना नहीं चाहते हैं। ऐसे विचार जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों के लिए ले कर आती हैं, जिस रीति से वे संसार में स्वयं को संचालित करने के लिए लोगों को प्रेरित करती हैं, और जीवन के लक्ष्य एवं बाह्य दृष्टिकोण जिन्हें वे लोगों के लिए लेकर आती हैं हम केवल उनके विषय में ही बात करने की इच्छा करते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; वे मनुष्य के मन की दशा को नियन्त्रित एवं प्रभावित कर सकते हैं। एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ एक दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करती रहती हैं, जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाती हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। अतः ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? तुम नग्न आँखों से इन प्रवृत्तियों को नहीं देख सकते हो। जब एक प्रवृत्ति (प्रचलन) की हवा आर पार बहती है, तो कदाचित् सिर्फ कम संख्या में ही लोग प्रवृत्ति के निर्माता बनेंगे। वे इस किस्म की चीज़ों को करते हुए शुरुआत करते हैं, इस किस्म के विचार या इस किस्म के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। फिर भी अधिकांश लोगों को उनकी अनभिज्ञता के मध्य इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित किया जाएगा, जब तक वे सब इसे अनजाने में एवं अनिच्छा से स्वीकार नहीं कर लेते हैं, और जब तक सभी को इस में डूबोया एवं इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता है। क्योंकि मनुष्य जो एक स्वस्थ्य शरीर एवं मन का नहीं है, जो कभी नहीं जानता है कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकता है, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभों को स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण, जीवन के दर्शन ज्ञान एवं मूल्यों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें "प्रदान" करता है। उनके सभी वह सामर्थ्य नहीं है, न ही उनके पास वह योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है। अतः पृथ्वी पर ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? मैंने एक साधारण सा उदाहरण चुना है कि तुम लोगों को समझ में आ सके। उदाहरण के लिए, अतीत में लोग अपने व्यवसाय को इस प्रकार से चलाते थे जो न तो किसी बूढ़े को धोखा देता था और न ही छोटे को, और जो सामानों को उसी दाम में बेचते थे इसकी परवाह किए बगैर कि कौन खरीद रहा है। क्या यहाँ पर विवेक एवं मानवता का एक संकेत नहीं दिया गया है? अपने व्यवसाय को संचालित करते समय जब लोग इस प्रकार की श्रद्धा का उपयोग करते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि उनके पास अभी भी कुछ विवेक है, और अभी भी उस समय कुछ मानवता है? (हाँ।) परन्तु धन की हमेशा बढ़ती हुई मात्रा के लिए मनुष्य की माँग के साथ, लोग अनजाने में और भी अधिक धन से प्रेम, लाभ से प्रेम और आनन्द से प्रेम करने लग जाते थे। अतः क्या लोग धन को अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ के रुप में देखने लगे थे? जब लोग धन को अत्यंत महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी प्रसिद्धि, अपनी प्रतिष्ठा, इज्ज़त, एवं ईमानदारी की उपेक्षा करते हैं; वे इन सभी चीज़ों की उपेक्षा करते हैं, क्या वे उपेक्षा नहीं करते हैं? जब तुम व्यवसाय में संलग्न होते हो, तो तुम किसी और को अलग रास्तों को लेते हुए और लोगों को ठगने के लिए विभिन्न माध्यमों का उपयोग करते हुए और धनी बनते हुए देखते हो। हालाँकि जो धन कमाया गया है वह बेईमानी से प्राप्त हुआ लाभ है, फिर भी वे और भी अधिक धनी बनते जाते हैं। तुम्हारे ही समान उनका पूरा परिवार उसी व्यवसाय में लग जाता है, परन्तु जितना तुम आनन्द उठाते हो उसकी अपेक्षा वे कहीं अधिक जीवन का आनन्द उठाते हैं, और तुम यह कहते हुए बुरा महसूस करते हो: "मैं वैसा क्यों नहीं कर सकता हूँ? मैं उतना क्यों नहीं कमा सकता हूँ जितना वे कमाते हैं? मुझे और अधिक धन प्राप्त करने के लिए, एवं मेरे व्यवसाय की उन्नति के लिए किसी मार्ग के विषय में सोचना होगा।" तब तुम इस पर पूरी तरह से विचार करते हो। धन कमाने के सामान्य तरीके के अनुसार, न तो बूढ़े को और न ही छोटे को ठगते हो और सभों को एक ही कीमत पर सामानों को बेचते हो, तो वह धन जो तुम कमाते हैं वह अच्छे विवेक से है, परन्तु यह तुम्हें जल्दी से अमीर नहीं बना सकता है। फिर भी, लाभ कमाने के आवेग के अंतर्गत, तुम्हारी सोच क्रमिक रूपान्तरण से होकर गुज़रती है। इस रुपान्तरण के दौरान, तुम्हारे आचरण के सिद्धान्त भी बदलना शुरू हो जाते हैं। जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो, जब तुम पहली बार किसी को ठगते हो, तो तुम्हारे पास अपने कारण होते हैं, यह कहते हुए, "यह आखिरी बार है कि मैं ने किसी को धोखा दिया है और मैं इसे दोबारा नहीं करूँगा। मैं लोगों को धोखा नहीं दे सकता हूँ। लोगों को धोखा देना केवल प्रतिशोध कमाएगा और मेरे ऊपर विनाश लेकर आएगा! यह आखिरी बार है कि मैं ने किसी को धोखा दिया है और मैं इसे दोबारा नहीं करूंगा।" जब तुम पहली बार किसी को धोखा देते हो तो तुम्हारे हृदय में कुछ सन्देह होते हैं; यह मनुष्य के विवेक का कार्य है—सन्देहों का होना और तुम्हारी निन्दा करना, ताकि जब तुम किसी को धोखा देते हो तो असहज महसूस होता है। परन्तु जब तुम किसी को सफलतापूर्वक धोखा दे देते हो उसके पश्चात् तुम देखोगे कि अब तुम्हारे पास पहले की अपेक्षा अधिक धन है, और तुम सोचते हो कि यह तरीका तुम्हारे लिए अत्यंत फायदेमंद हो सकता है। तुम्हारे हृदय में हल्का सा दर्द होने के बावजूद, तुम अभी भी ऐसा महसूस करते हो कि अपनी "सफलता" पर स्वयं को बधाई दें, और तुम्हें स्वयं से थोड़ी बहुत प्रसन्नता का एहसास होता है। क्योंकि पहली बार, तुमने अपने स्वयं के व्यवहार के विषय में मंजूरी दी है और अपने स्वयं के धोखे के विषय में मंजूरी दी है। इसके बाद, जब एक बार मनुष्य को ऐसे धोखे से दूषित कर दिया जाता है, तो वह उस व्यक्ति के समान होता है जो जुए में शामिल होता है और फिर एक जुआरी बन जाता है। अनभिज्ञता में, वह अपने धोखाधड़ी के व्यवहार को मंजूरी देता है और उसे स्वीकार कर लेता है। अनभिज्ञता में, वह धोखाधड़ी को जायज़ व्यावसायिक व्यवहार मान लेता है, और धोखाधड़ी को अपने ज़िन्दा बचे रहने के लिए और अपने जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी माध्यम मान लेता है; वह सोचता है कि ऐसा करने के द्वारा वह जल्दी से धनी बन सकता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत में लोग इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं करते हैं, जब तक वे व्यक्तिगत रीति से एवं प्रत्यक्ष रूप से इसकी कोशिश नहीं करते हैं और अपने स्वयं के तरीके से इसके साथ प्रयोग नहीं कर लेते हैं, वे इस व्यवहार को और इस रीति से कार्यों को अंजाम देने को नीची दृष्टि से देखते हैं, और तब उनका हृदय धीरे धीरे रूपान्तरित होना शुरू होता है। अतः यह रूपान्तरण क्या है? यह इस प्रवृत्ति (प्रचलन) की मंजूरी एवं स्वीकृति है, इस प्रकार के विचार की स्वीकृति एवं मंजूरी जिसे तुम्हारी सामाजिक प्रवृत्ति के द्वारा तुम्हारे भीतर डाला गया है। अनभिज्ञता में, तुम महसूस करते हो कि यदि तुम व्यवसाय में धोखा नहीं देते हो तो तुम हानि उठाओगे, यह कि यदि तुम धोखा नहीं देते हो तो तुम किसी चीज़ को खो चुके होगे। अनजाने में, यह धोखाधड़ी तुम्हारी आत्मा, तुम्हारा मुख्य आधार बन जाती है, और साथ ही एक प्रकार का व्यवहार भी बन जाती है जो तुम्हारे जीवन के लिए एक ज़रूरी नियम है। जब मनुष्य इस प्रकार के व्यवहार एवं ऐसी सोच को स्वीकार कर लेता है उसके बाद, क्या मनुष्य का हृदय किसी परिवर्तन से होकर गुज़रता है? तुम्हारा हृदय बदल गया है, अतः क्या तुम्हारी ईमानदारी बदल गई है? क्या तुम्हारी मानवता बदल गई है? (हाँ।) अतः क्या तुम्हारा विवेक बदल गया है? (हाँ।) मनुष्य की सम्पूर्णता एक गुणात्मक परिवर्तन से होकर गुज़रती है, उनके हृदय से लेकर उनके विचारों तक, उस हद तक कि वे भीतर से लेकर बाहर तक बदल जाते हैं। यह परिवर्तन तुम्हें परमेश्वर से दूर और दूर रखता है, तथा तुम और भी अधिक शैतान के अनुरूप, तथा और भी अधिक उसके समान होते जाते हो।

अब इन सामाजिक प्रवृत्तियों को समझना तुम्हारे लिए आसान है। मैंने बस एक सरल उदाहरण को चुना था, साधारण रूप में देखा जानेवाला उदाहरण जिससे लोग परिचित से होंगे। क्या इन सामाजिक प्रवृत्तियों का लोगों पर बड़ा प्रभाव होता है? (हाँ!) अतः क्या इन सामाजिक प्रवृत्तियों का लोगों पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव होता है? (हाँ!) लोगों पर बहुत ही गहरा हानिकारक प्रभाव होता है। शैतान मनुष्य की किस चीज़ को भ्रष्ट करने के लिए इन सामाजिक प्रवृत्तियों को एक के बाद एक इस्तेमाल करता है? (विवेक, तर्क, मानवता, नैतिकता।) और क्या? (जीवन के प्रति मनुष्य का दृष्टिकोण।) क्या ये मनुष्य में क्रमिक पतन को अंजाम देते हैं? (हाँ।) शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का इस्तेमाल करता है ताकि एक समय में एक कदम उठाकर लोगों को दुष्ट आत्माओं के घोंसले में आने के लिए लुभा सके, ताकि ऐसे लोग जो सामाजिक प्रवृत्तियों में फँस जाते हैं वे अनजाने में ही धन एवं भौतिक इच्छाओं की तरफदारी करें, साथ ही साथ दुष्टता एवं हिंसा की तरफदारी करें। जब एक बार ये चीज़ें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य दुष्ट शैतान बन जाता है! यह मनुष्य के हृदय में मनोवैज्ञानिक ज्ञान के अर्जन के कारण है? मनुष्य किस बात की तरफदारी करता है? मनुष्य दुष्टता एवं हिंसा को पसन्द करना शुरू कर देता है। वे खूबसूरती या अच्छाई को पसन्द नहीं करते हैं, और शांति को तो बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। लोग सामान्य मानवता के साधारण जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, परन्तु इसके बजाए ऊँचे रुतबे एवं अपार धन समृद्धि का आनन्द उठाने की, एवं देह के सुखविलासों में मौज करने की इच्छा करते हैं, और उन्हें रोकने के लिए प्रतिबंधों के बिना और बन्धनों के बिना अपनी स्वयं की देह को संतुष्ट करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। अतः जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो वह ज्ञान जो तुमने सीखा है क्या वह तुम्हें स्वतन्त्र करने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? पारम्परिक संस्कृति एवं अंधविश्वास जिन्हें तुम जानते हो क्या वे इस भीषण परिस्थिति को दूर करने में तुम्हारी सहायता कर सकते हैं? पारम्परिक आचार व्यवहार एवं पारम्परिक धार्मिक विधि विधान जिन्हें मनुष्य समझता है क्या वे उन्हें संयम बरतने में सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए तीन उत्कृष्ट चरित्र के उदाहरण को लो। क्या यह इन प्रवृत्तियों के रेतीले दलदल[ख] से अपने पावों को बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकता है? (नहीं, यह नहीं कर सकता।) इस रीति से, मनुष्य और भी अधिक क्या बनता जाता है? और भी अधिक दुष्ट, अभिमानी, अपने को ऊँचा दिखाने वाला, स्वार्थी एवं दुर्भावनापूर्ण। लोगों के बीच में अब और कोई स्नेह नहीं रह गया है, परिवार के सदस्यों के बीच अब और कोई प्रेम नहीं रह गया है, रिश्तेदारों एवं मित्रों के बीच में अब और कोई समझदारी नहीं रह गई है; मानवीय रिश्ते धोखेबाज़ी से भर गए हैं, और हिंसा से भरपूर हो गए हैं। हर एक व्यक्ति अपने साथी मनुष्य के मध्य रहने के लिए धोखा देने के माध्यमों एवं हिंसक तरीकों का उपयोग करना चाहता है; वे झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं और हिंसक हो जाते हैं जिससे अपनी स्वयं की आजीविका पर कब्ज़ा कर सकें; वे हिंसा का इस्तेमाल करके अपने पद स्थान को जीत लेते हैं और स्वयं के लाभों को अर्जित करते हैं और वे हिंसा एवं बुरे तरीकों का उपयोग करके जो कुछ चाहते हैं वह करते हैं। क्या ऐसी मानवता भयावह नहीं है? (हाँ।) अभी अभी मुझे इन चीज़ों के विषय में बात करते हुए सुनने के बाद, क्या तुम लोग नहीं सोचते हो कि इस प्रकार की भीड़ के बीच में रहना, इस संसार में एवं इस पर्यावरण में रहना भयावह है जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है? (हाँ।) अतः क्या तुम लोगों ने कभी अपने आपको अभागा महसूस किया है? अब तुम सब थोड़ा बहुत ऐसा महसूस करते होगे। (हाँ।) तुम लोगों के स्वर को सुनकर, ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम लोग सोच रहे हो कि "शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कितने सारे भिन्न-भिन्न तरीकों का इस्तेमाल करता है। वह प्रत्येक अवसर को झपट लेता है और जहाँ कहीं हम जाते हैं वह वहाँ है। क्या मनुष्य को अभी भी बचाया जा सकता है?" क्या अभी भी मानवजाति के लिए कोई आशा है? क्या मनुष्य अपने आपको बचा सकता है? (नहीं।) क्या जेड सम्राट मनुष्य को बचा सकता है? क्या कन्फयूशियस (चीनी दर्शनशास्त्री) मनुष्य को बचा सकता है? क्या गुआन्यिन बोधिसत्व मनुष्य को बचा सकता है? (नहीं।) अतः मनुष्य को कौन बचा सकता है? (परमेश्वर।) फिर भी, कुछ लोग अपने अपने हृदय में ऐसे प्रश्नों को उठाएँगेः "शैतान हमें इतनी बुरी तरह से हानि पहुँचाता है, इतने पागलपन से कि हमारे पास जीने की कोई उम्मीद नहीं होती है, न ही जीवन में कोई दृढ़ विश्वास होता है। हम सभी भ्रष्टता के बीच में जीते हैं और हर एक व्यक्ति किसी न किसी तरीके से परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, जिससे अब हमारा हृदय पूरी तरह से सुन्न हो गया है। अतः जब शैतान हमें भ्रष्ट कर रहा है, तो परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर क्या कर रहा है? जो कुछ भी परमेश्वर हमारे लिए कर रहा है हम उसे कभी महसूस नहीं करते हैं!" कुछ लोग अनिवार्य रूप से कुछ हानि उठाते हैं और अनिवार्य रूप से कुछ निराशा का अनुभव करते हैं। तुम लोगों के लिए, यह अनुभूति एवं यह एहसास बहुत ही गहरा है क्योंकि वह सब जो मैं कहता रहा हूँ वह इसलिए है कि लोगों को धीरे धीरे समझ में आ जाए, कि वे और भी अधिक यह महसूस करें कि वे आशारहित हैं, कि वे और भी अधिक यह महसूस करें कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया है। परन्तु चिंता न करें। आज हमारी संगति का विषय, "शैतान की दुष्टता," हमारी वास्तविक विषय वस्तु नहीं है। फिर भी, परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में बातचीत करने के लिए, किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है और शैतान की दुष्टता के विषय में हमें पहले बात करना होगा ताकि इसे लोगों के लिए और अधिक स्पष्ट किया जाए कि मानवजाति इस समय किस प्रकार की स्थिति में है और वास्तव में किस हद तक मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया गया है। इसके विषय में बात करने का एक लक्ष्य यह है कि लोगों को शैतान की दुष्टता के बारे में जानने की अनुमति दी जाए, जबकि अन्य लक्ष्य यह है कि लोगों को यह समझने की अनुमति दी जाए कि सच्ची पवित्रता क्या है। अब तुम लोग समझ गए हो, क्या तुम लोग नहीं समझे हो?

ये चीज़ें जिनके विषय में मैं ने अभी अभी बात की है क्या वे पिछली बार की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत हैं? (हाँ।) अतः तो क्या अब तुम लोगों की समझ थोड़ी गहरी हुई है? (हाँ।)

फुटनोट:

क. मूलपाठ में पढ़ा जाता है "विज्ञान के विषय में मनुष्य के अनुसन्धान को संतुष्ट करना और रहस्यों की छानबीन करना।"

ख. मूलपाठ "के रेतीले दलदल" को छोड़ देता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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