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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (III)     भाग एक

अपनी प्रार्थनाओं को कहने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? (बहुत अधिक रोमांचित एवं द्रवित।) आइए हम अपनी संगति को प्रारम्भ करें। हमने पिछली बार किस विषय पर संगति की थी? (परमेश्वर की पवित्रता।) स्वयं परमेश्वर के किस पहलू से परमेश्वर की पवित्रता सम्बन्धित होती है? क्या यह परमेश्वर के सार से सम्बन्धित होती है? (हाँ।) अतः वास्तव में वह विषय क्या है जो परमेश्वर के सार से सम्बन्धित होता है? क्या यह परमेश्वर की पवित्रता है? (हाँ।) परमेश्वर की पवित्रताः यह परमेश्वर का अद्वितीय सार है। वह मुख्य विषय क्या था जिस पर हमने पिछली बार संगति की थी? (शैतान की दुष्टता को परखना।) और हमने शैतान की दुष्टता के सम्बन्ध में पिछली बार क्या संगति की थी? क्या तुम लोग याद कर सकते हो? (शैतान मानवजाति को किस प्रकार भ्रष्ट करता है। वह हमें भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान, विज्ञान, पारम्परिक संस्कृति, अंधविश्वास एवं सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है।) सही है, यह वह मुख्य विषय था जिस पर हमने पिछली बार चर्चा की थी। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान, विज्ञान, अंधविश्वास, पारम्परिक संस्कृति एवं" सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है; ये वे तरीके हैं जिनके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। ये कुल मिलाकर कितने तरीके हैं? (पाँच।) कौन से पाँच तरीके? (विज्ञान, ज्ञान, पारम्परिक संस्कृति, अंधविश्वास एवं सामाजिक प्रवृत्तियाँ।) तुम लोगों की सोच में वह क्या है जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सबसे ज़्यादा उपयोग में लाता है, वह चीज़ जो उन्हें अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करती है? (पारम्परिक संस्कृति।) कुछ भाई एवं बहन सोचते हैं कि यह पारम्परिक संस्कृति है। कोई और? (ज्ञान।) ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के पास उच्च स्तर का ज्ञान है। कोई दूसरा? (ज्ञान।) तुम लोग उसी दृष्टिकोण को साझा करते हो। जिन भाइयों एवं बहनों ने पारम्परिक संस्कृति कहा था, क्या तुम लोग हमें बता सकते हो कि तुम लोग ऐसा क्यों सोचते हो? क्या तुम लोगों के पास इसकी कोई समझ है? क्या तुम लोग अपनी समझ का वर्णन नहीं करना चाहते हो? (शैतान के दर्शनज्ञान और कन्फ्युशियस (चीनी दर्शनशास्त्री) और मेन्च्युस (कन्फ्युशियस का अनुयायी) के सिद्धान्त हमारे मन में गहराई से बसे हुए हैं, अतः हम सोचते हैं कि ये हमें बहुत गहराई से भ्रष्ट करते हैं।) तुम लोगों में से जो यह सोचते हैं कि यह ज्ञान है, तो क्या तुम लोग समझा सकते हो कि यह ज्ञान क्यों है? अपने अपने कारणों को बताओ। (ज्ञान हमें कभी परमेश्वर की आराधना करने नहीं दे सकता है। यह परमेश्वर के अस्तित्व का इंकार करता है, और परमेश्वर के शासन को नकारता है। अर्थात्, ज्ञान हमें बताता है कि हमें कम उम्र से ही अध्ययन करना है, और केवल अध्ययन करने और ज्ञान अर्जित करने के माध्यम से ही हमारा भविष्य एवं हमारी नियति सुनिश्चित होती है। इस रीति से यह हमें भ्रष्ट करता है।) अतः शैतान तुम्हारे भविष्य एवं तुम्हारी नियति को नियन्त्रित करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल करता है, फिर यह तुम्हें अपनी नाक की सीध में ले चलता है, तुम इसी प्रकार से सोचते हो कि शैतान अत्यंत गहराई से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। अतः तुम लोगों में अधिकांश यह सोचते हो कि शैतान मनुष्य को अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। क्या कोई दूसरी चीज़ें हैं? उदाहरण के लिए, विज्ञान या सामाजिक प्रवृत्तियों के बारे में क्या विचार है? क्या कोई इन बातों से सहमत है? (हाँ।) आज मैं फिर से उन पाँच तरीकों के बारे में संगति करूंगा जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है और, जब एक बार मैं समाप्त कर दूँ, मैं यह देखने के लिए अभी भी तुम लोगों से कुछ प्रश्न पूछूँगा कि शैतान का कौन सा पहलू मनुष्य को अत्यंत गहराई से भ्रष्ट करता है। तुम लोग इस विषय को समझ गए, क्या तुम लोग नहीं समझे?

मनुष्य के विषय में शैतान की भ्रष्टता मुख्य रूप से पाँच पहलुओं में प्रदर्शित होती है; ये पाँच पहलू पाँच तरीके हैं जिनके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। इन पाँच तरीकों में से पहला ज्ञान है जिसका हमने जिक्र किया था, अतः आइए हम पहले ज्ञान को अपनी संगति के लिए एक विषय के तौर पर लें। शैतान ज्ञान को एक चारे के तौर पर इस्तेमाल करता है। ध्यान से सुनें: यह बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि "कठिन अध्ययन करें और प्रति दिन बेहतर बनें," किसी हथियार के रूप में, ज्ञान के साथ स्वयं को सुसज्जित करें, फिर विज्ञान के द्वार को खोलने के लिए ज्ञान का उपयोग करें; दूसरे शब्दों में, जितना अधिक ज्ञान तुम अर्जित करते हो, उतना ही अधिक तुम समझोगे। शैतान लोगों को यह सब कुछ बताता है। शैतान मनुष्य को साथ ही साथ ऊँचे आदर्शों को बढ़ावा देने के लिए भी कहता है, ठीक उसी समय जब वे ज्ञान सीख रहे हैं, वह उन्हें बताता है कि उनके पास महत्वाकांक्षाएँ एवं आदर्श हों। लोगों की जानकारी के बिना, शैतान इस प्रकार के अनेक सन्देश देता है, लोगों को अवचेतन रूप से यह महसूस कराता है कि ये चीज़ें सही हैं, या लाभप्रद हैं। अनजाने में, लोग इस प्रकार के मार्ग पर चलते हैं, अनजाने में ही उनके स्वयं के आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा आगे की ओर उनकी आगुवाई की जाती है। कदम दर कदम, लोग अनजाने में ही उस ज्ञान से सीखते हैं जिसे शैतान के द्वारा दिया गया है जो महान या प्रसिद्ध लोगों की सोच है, और इन विचारों को स्वीकार करते हैं। वे साथ ही कुछ ऐसे लोगों से एक चीज़ के बाद दूसरी चीज़ सीखते हैं जिन्हें लोग नायक मानते हैं। तुम लोग उन में से कुछ को जान सकते हो जिसका समर्थन शैतान इन नायकों के कार्यों के सन्दर्भ में मनुष्य के लिए कर रहा है, या जो कुछ वह मनुष्य के मन के भीतर डालना चाहता है? शैतान मनुष्य के मन के भीतर क्या डालता है? मनुष्य को देशभक्त होना चाहिए, उसके पास राष्ट्रीय अखण्डता होनी चाहिए, और उसे वीर होना चाहिए। मनुष्य कुछ ऐतिहासिक कहानियों से या प्रसिद्ध वीरों की कुछ जीवनी से क्या सीखता है? अपने साथी के लिए या किसी मित्र के लिए व्यक्तिगत वफादारी के एहसास का होना, या उसके लिए कुछ भी करना। शैतान के इस ज्ञान के अंतर्गत, मनुष्य अनजाने में कई चीज़ों को सीखता है, और कई गैर सकारात्मक चीज़ों को सीखता है। अनभिज्ञता के मध्य, शैतान के द्वारा उनके लिए बीजों को तैयार किया जाता है और उन्हें उनके अपरिपक्व मनों में बो दिया जाता है। ये बीज उन्हें यह महसूस कराते हैं कि उन्हें महान मनुष्य होना चाहिए, प्रसिद्ध होना चाहिए, नायक होना चहिए, देशभक्त होना चाहिए, ऐसे लोग होना चाहिए जो अपने परिवार से प्रेम करते हैं, ऐसे लोग होना चाहिए जो एक मित्र के लिए कुछ भी करेगा और उनके पास व्यक्तिगत वफादारी का एहसास होना चाहिए। शैतान के द्वारा बहकाए जाने के द्वारा, वे अनजाने में ही उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसे उसने उनके लिए तैयार किया था। जब वे इस रास्ते पर चलते हैं, तो उन्हें शैतान के जीवन जीने के नियमों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। अनजाने में और अपने आप में पूरी तरह से बेखबर, वे जीवन जीने के स्वयं के नियमों को विकसित कर लेते हैं, जबकि ये नियम शैतान के उन नियमों से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं जिन्हें जबरदस्ती उनके भीतर डाला गया है। सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान उन्हें उकसाता है कि वे अपने स्वयं के लक्ष्यों को बढ़ावा दें, कि अपने स्वयं के जीवन के लक्ष्यों को, जीवन जीने के सिद्धान्तों को, और जीवन की दिशा को निर्धारित करें, इसी बीच कहानियों का उपयोग करते हुए, जीवनी का उपयोग करते हुए, और सभी संभावित माध्यमों का उपयोग करते हुए शैतान उनमें इन चीज़ों को भरता है, ताकि लोग थोड़ा थोड़ा करके उसके चारे (प्रलोभन) को ले सकें। इस रीति से, लोग अपने सीखने के पथक्रम के दौरान अपने स्वयं के शौक एवं उद्यमों (अनुसरण) को विकसित कर लेते हैं: कुछ लोग साहित्य, कुछ लोग अर्थशास्त्र, कुछ लोग खगोल विज्ञान या भूगोल पसन्द करने लगते हैं। फिर यहाँ पर कुछ लोग हैं जो राजनीति को पसन्द करने लगते हैं, कुछ लोग हैं जो भौतिक विज्ञान, कुछ रसायन विज्ञान, और यहाँ तक कि कुछ लोग अध्यात्म विज्ञान को पसन्द करते हैं। ये सब ज्ञान का एक भाग है और तुम लोग इन के सम्पर्क में आ गए हो। अपने अपने हृदयों में, तुम लोगों में से प्रत्येक जानता है कि इन चीज़ों के साथ क्या होता है, हर कोई पहले से ही उनके साथ सम्पर्क में है। इस किस्म के ज्ञान के सम्बन्ध में, उनमें से किसी एक के विषय में कोई भी निरन्तर बिना रुके बात कर सकता है। और इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह ज्ञान मनुष्य के मन में कितनी गहराई से प्रवेश कर चुका है, यह उस स्थिति को दिखाता है जिस पर इस ज्ञान के द्वारा मनुष्य के मन में कब्ज़ा किया गया है और इसका मनुष्य पर कितना गहरा प्रभाव है। जब एक बार कोई व्यक्ति ज्ञान के किसी पहलू को पसन्द करता है, जब कोई व्यक्ति अपने हृदय में किसी एक के साथ गहराई से प्रेम करने लगता है, तब वे अनजाने में ही आदर्शों को विकसित कर लेते हैं: कुछ लोग ग्रंथकार बनना चाहते हैं, कुछ लोग लेखक बनना चाहते हैं, कुछ लोग राजनीति में अपनी जीवन वृत्ति (कैरियर) बनाना चाहते हैं, और कुछ अर्थशास्त्र में संलग्न होना और व्यवसायी बनना चाहते हैं। फिर लोगों का ऐसा समूह है जो नायक बनना चाहते हैं, महान या प्रसिद्ध बनना चाहते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि कोई किस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहता है, उनका लक्ष्य यह है कि ज्ञान को सीखने के इस तरीके को लिया जाए और इसका उपयोग अपने उद्देश्य के लिए और अपनी इच्छाओं और आदर्शों को साकार करने के लिए किया जाए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कितना अच्छा सुनाई देता है—वे अपने स्वप्नों को हासिल करना चाहते हैं, वे इस जीवन को बेकार में जीना नहीं चाहते हैं, या वे अपनी जीवन वृत्ति (कैरियर) में लगे रहना चाहते हैं—वे अपने ऊँचे आदर्शों एवं महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देते हैं परन्तु, मुख्य तौर पर, यह सब किस लिए है? क्या तुम लोगों ने इसके बारे में पहले कभी सोचा है? शैतान यह सब क्यों करना चाहता है? इन चीज़ों को मनुष्य के भीतर डालने में शैतान का क्या उद्देश्य है? तुम लोगों के हृदय इस प्रश्न के प्रति स्पष्ट होने चाहिए।

आओ अब हम इस विषय में बात करते हैं कि किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। अब तक हमने जिस विषय पर बात की है उससे, क्या तुम लोगों ने शैतान के भयावह इरादों को पहचानना प्रारम्भ कर दिया है? (थोड़ा बहुत।) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग क्यों करता है? वह ज्ञान का उपयोग करके मनुष्य के साथ क्या करना चाहता है? वह किस मार्ग पर ले जाने के लिए मनुष्य की अगुवाई करता है? (परमेश्वर का विरोध करने के लिए।) वह निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करने के लिए ही है। यह वह प्रभाव है जिसे तुम उन लोगों के विषय में देख सकते हो जो ज्ञान को सीखते हैं, और यह वह परिणाम है जिसे तुम ज्ञान को सीखने के बाद देखते हो—अर्थात् परमेश्वर का प्रतिरोध। अतः शैतान की भयावह मंशाएँ क्या हैं? तुम स्पष्ट नहीं हो, क्या तुम स्पष्ट हो? मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है जिससे लोग अपनी स्वयं की वासनाओं को संतुष्ट कर सकें और अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें। क्या तुम स्पष्ट हो कि शैतान तुमको वास्तव में किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? इसे नम्रतापूर्वक कहें, तो लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी गलत नहीं है, यह तो सामान्य बात है। वे सोचते हैं कि ऊँचे विचारों को बढ़ावा देने और महत्वाकांक्षाओं के होने को महज आकांक्षाओं को रखना ही कहा जाता है, और यह कि लोगों के लिए इसे ही सही मार्ग होना चाहिए कि वे उसका अनुसरण करें। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकते, या जीवन में कोई जीवन वृत्ति (कैरियर) बना लेते—तो क्या उस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं होता? उस प्रकार से न केवल किसी व्यक्ति के पूर्वजों का सम्मान करना बल्कि इतिहास पर उसकी छाप छोड़ देना—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी एवं उचित बात है। फिर भी, क्या शैतान अपने भयावह इरादों के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और तब निर्णय लेता है कि यह पूरा हो गया है? कदापि नहीं। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के आदर्श कितने ऊँचे हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य की इच्छाएँ कितनी वास्तविक हैं या वे कितनी उचित हो सकती हैं, क्योंकि वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह गहन रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। दो शब्द प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? एक "प्रसिद्धी" है और दूसरा "लाभ" है: ये प्रसिद्धि और लाभ हैं। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का मार्ग चुनता है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य की धारणाओं के साथ बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का चरम मार्ग नहीं है। अनभिज्ञता के मध्य, लोग शैतान के जीवन जीने के तरीके, जीवन जीने के उसके नियमों को स्वीकार करने लगते हैं, जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करते हैं, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में आदर्शों को प्राप्त करने लगते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जीवन में ये आदर्श कितने ऊँचे प्रतीत होते हैं, क्योंकि वह केवल एक बहाना है जो प्रसिद्धि और लाभ से गहन रूप से जुड़ा हुआ है। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, और वास्तव में सभी लोग, जिस किसी चीज़ का वे जीवन में अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता है: "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए उनका लाभ उठा सकते हैं। जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे देह के सुख विलास की अपनी खोज में और अनैतिक आनन्द में उनका लाभ उठा सकते हैं। लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियति को शैतान के हाथों में दे देते हैं जिससे उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्होंने लालसा की है। लोग इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और उस आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं कि उन्हें सब कुछ पुनः प्राप्त करना है। क्या लोगों के पास अभी भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे शैतान की ओर इस प्रकार से चले जाते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं। कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से अपने आप को उस दलदल से आज़ाद कराने में असमर्थ हो जिसके भीतर वे धँस गए हैं। जब एक बार कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में फँस जाता है, तो वे आगे से उसकी खोज नहीं करते हैं जो उजला है, जो धर्मी है या उन चीज़ों को जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह मोहक शक्ति जो प्रसिद्धि एवं लाभ लोगों के ऊपर रखता है वह बहुत बड़ा है, और वे लोगों के लिए ऐसी चीज़ें बन जाती हैं कि शुरूआत से लेकर अन्त तक और यहाँ तक कि बिना रुके पूरे अनंतकाल तक उनका अनुसरण किया जाता है। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना तो कुछ पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से बढ़कर और कुछ भी नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, यह कहते हैं कि वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि समय से पीछे न हों जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। वे कहेंगे कि ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं के लिए मेज़ पर भोजन रख सकें। अब क्या तुम मुझे बता सकते हो कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? (नहीं, ऐसा नहीं है।) इस प्रकार के कोई लोग नहीं हैं! अतः वह क्या है कि उसके लिए उसने इन सारे वर्षों में इन कठिनाईयों एवं कष्टों को सहन किया है? यह प्रसिद्धि और लाभ के लिए है: प्रसिद्धि एवं लाभ उसके आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे बुला रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाईयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाईयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर इस तथाकथित ज्ञान को क्या कहा जाता है? क्या यह जीवन जीने के नियम और जीवन के आर पार एक मार्ग नहीं है जिसे शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिसे उनके ज्ञान सीखने के पथक्रम में शैतान के द्वारा सिखाया गया है? क्या यह जीवन के ऊँचे आदर्श नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के आदर्शों, प्रसिद्ध लोगों की खराई या प्रख्यात लोगों की बहादुरी के जज़्बे को लीजिए, या नायकों के शौर्य एवं उदारता और युद्ध कला के उपन्यासों में तलवारबाज़ों को लीजिए; ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी को लाया जाता है ताकि इन विचारों को स्वीकार करे, इन विचारों के लिए जीए और बिना रुके इनका अनुसरण करे। यह वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। अतः जब शैतान ने प्रसिद्धि एवं लाभ के मार्ग पर लोगों को अगुवाई की उसके पश्चात्, क्या तब भी उनके लिए परमेश्वर पर विश्वास करना, एवं उसकी आराधना करना सम्भव है? (नहीं, यह सम्भव नहीं है।) क्या जीवन जीने के ज्ञान एवं नियम जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया उनमें परमेश्वर की आराधना का कोई विचार है? क्या वे कोई विचार रखते हैं जो सत्य से सम्बन्धित है? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) क्या वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से कोई वास्तविकता रखते हैं? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) तुम लोग थोड़ी अनिश्चितता की बातें करते हुए प्रतीत होते हो, परन्तु कोई फर्क नहीं पड़ता है। सभी बातों में सत्य को खोजो और तुम सब सही उत्तरों को प्राप्त करोगे; सिर्फ सही उत्तरों से तुम लोग सही मार्ग पर चल सकते हो।

आइए हम संक्षेप में फिर से दोहराएँ: शैतान मनुष्य को घेरे रखने और नियन्त्रण में रखने के लिए किस का इस्तेमाल करता है? (प्रसिद्धि एवं लाभ।) अतः शैतान तब तक मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का इस्तेमाल करता है जब तक वे पूरी तरह से यह नहीं सोच सकते हैं कि यह प्रसिद्धि एवं लाभ है। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाईयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ दोनों को बरकरार रखने एवं अर्जित करने के लिए वे किसी भी प्रकार का आंकलन करेंगे या कोई भी निर्णय लेंगे। इस रीति से, शैतान मनुष्य को अदृश्य बन्धनों से बाँध देता है। इन बन्धनों को लोगों की देहों पर डाला जाता है, और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ होती है न ही साहस होता है। अतः लोग अनजाने में ही इन बन्धनों को सहते हुए बड़ी कठिनाई में भारी कदमों से नित्य आगे बढ़ते रहते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ की खातिर, मनुष्य परमेश्वर से दूर हो जाता है और उसे धोखा देता है। हर गुज़रती हुई पीढ़ी के साथ, मानवजाति और भी अधिक दुष्ट बनती जाती है, और भी अधिक अंधकार में पड़ती जाती है, और इस रीति से एक के बाद दूसरी पीढ़ी को शैतान के द्धारा नष्ट कर दिया जाता है। अब शैतान के कार्यों को देखने पर, उसके भयानक इरादे वास्तव में क्या हैं? अब यह स्पष्ट है, है कि नहीं? क्या शैतान घृणित नहीं है? (हाँ!) हो सकता है कि आज तुम लोग शैतान के भयानक इरादों के आर पार नहीं देख सकते हो क्योंकि तुम सब सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बगैर कोई जीवन नहीं है। तुम लोग सोचते हो कि, यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे से सामने के मार्ग को देखने में सक्षम नहीं होंगे, आगे से अपने लक्ष्यों को देखने में सक्षम नहीं होंगे, उनका भविष्य अंधकार, धुंधला एवं उदास हो जाता है। परन्तु, धीरे धीरे तुम सभी यह पहचानोगे कि प्रसिद्धि एवं लाभ ऐसे भयानक बन्धन हैं जिनका इस्तेमाल शैतान मनुष्य को बाँधने के लिए करता है। उस दिन तक जब तुम इस पहचान जाते हो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के नियन्त्रण का विरोध करोगे और उन बन्धनों का पूरी तरह से विरोध करोगे जिन्हें शैतान तुम्हें बाँधने के लिए लाता है। जब तुम्हारे लिए वह समय आता कि तुम इन सभी चीज़ों को फेंकने की इच्छा करते हो जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर डाला है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और साथ ही सचमुच में उन सब से घृणा करोगे जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लेकर आता है। केवल तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम एवं लालसा होगी; केवल तभी तुम सत्य के अनुसरण (खोज) में जीवन के सही मार्ग पर चल सकते हो।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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