स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग दो

जहाँ तक परमेश्वर की पवित्रता का संबंध है, भले ही यह एक परिचित विषय हो, किंतु यह एक ऐसा विषय है, जिसके बारे में बात करने पर कुछ लोगों के लिए यह थोड़ा अमूर्त हो सकता है, और कुछ गहन, और उनकी पहुँच से परे हो सकता है। लेकिन चिंता करने की ज़रूरत नहीं। मैं तुम लोगों की यह समझने में सहायता करूँगा कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है? यह समझने के लिए कि कोई किस तरह का व्यक्ति है, यह देखो कि वह क्या करता है और उसके कार्यों के परिणाम देखो, और फिर तुम उस व्यक्ति का सार देखने में समर्थ हो जाओगे। क्या इसे इस तरह से कहा जा सकता है? (हाँ।) तो फिर, आओ पहले हम इस परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पवित्रता पर संगति करें। यह कहा जा सकता है कि शैतान का सार दुष्टता है, और इसलिए मनुष्य के प्रति शैतान के कार्यकलाप उसे अनवरत रूप से भ्रष्ट करते रहे हैं। शैतान दुष्ट है, इसलिए जिन लोगों को उसने भ्रष्ट किया है, वे भी निश्चित रूप से दुष्ट हैं, है न? क्या कोई कहेगा, "शैतान दुष्ट है, लेकिन शायद वह, जिसे इसने भ्रष्ट किया है, पवित्र हो?" यह एक मज़ाक होगा, है न? क्या यह संभव है? (नहीं।) शैतान दुष्ट है, और उसकी दुष्टता के भीतर एक आवश्यक और एक व्यावहारिक दोनों पक्ष निहित हैं। यह कोई खोखली बात नहीं है। हम शैतान को बदनाम करने का प्रयत्न नहीं कर रहे; हम सत्य और वास्तविकता के बारे में संगति मात्र कर रहे हैं। इस विषय की वास्तविकता पर संगति करने से कुछ लोगों को या लोगों के किसी खास उप-वर्ग को ठेस पहुँच सकती है, परंतु इसमें कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं है; शायद तुम लोग इसे आज सुनोगे और थोड़ा असहज अनुभव करोगे, किंतु शीघ्र ही किसी दिन, जब तुम उसे पहचानने में समर्थ हो जाओगे, तो तुम लोग अपने आपसे घृणा करोगे, और महसूस करोगे कि आज मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ, वह तुम लोगों के लिए बहुत उपयोगी और बहुत मूल्यवान है। शैतान का सार दुष्टता है, इसलिए क्या हम यह कह सकते हैं कि शैतान के कार्यों के परिणाम भी अपरिहार्य रूप से दुष्ट होते हैं, या कम से कम, उसकी दुष्टता से जुड़े होते हैं? (हाँ।) तो शैतान लोगों को किस तरह भ्रष्ट करता है? दुनिया में और लोगों के बीच शैतान जो दुष्टता करता है, उसके कौन-से विशिष्ट पहलू लोगों को प्रत्यक्ष और दृष्टिगोचर होते हैं? क्या तुम लोगों ने पहले कभी इस बारे में सोचा है? शायद तुम लोगों ने इस पर ज्यादा विचार नहीं किया होगा, इसलिए मैं कुछ मुख्य बिंदुओं का उल्लेख कर देता हूँ। हर कोई शैतान द्वारा प्रस्तावित विकास के सिद्धांत को जानता है, है न? यह मनुष्य द्वारा अध्ययन किया गया ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? (हाँ, है।) इसलिए शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पहले ज्ञान का उपयोग करता है, और उन्हें ज्ञान प्रदान करने के लिए अपने खुद के शैतानी तरीकों का इस्तेमाल करता है। फिर वह उन्हें भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करता है और ज्ञान, विज्ञान, रहस्यमयी मामलों या उन मामलों में, जिनकी लोग खोज करना चाहते हैं, उनकी रुचि जगाता है। मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए शैतान द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अन्य चीज़ें हैं पारंपरिक संस्कृति और अंधविश्वास, और उसके बाद, सामाजिक प्रवृत्तियाँ। ये वे चीज़ें हैं, जिनसे लोगों का उनके दैनिक जीवन में सामना होता है, और ये सब लोगों के बिलकुल आसपास मौजूद हैं; ये सभी उन चीज़ों से जुड़ी हैं, जिन्हें वे देखते हैं, सुनते हैं, स्पर्श करते हैं और जिनका वे अनुभव करते हैं। कोई यह कह सकता है कि प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन इन्हीं चीज़ों से घिरा हुआ जीता है और चाहकर भी इनसे बच नहीं सकता या मुक्त नहीं हो सकता। इन चीज़ों के सामने मनुष्यजाति असहाय है, और मनुष्य सिर्फ उनसे प्रभावित, संक्रमित, नियंत्रित और बाध्य होने के सिवा कुछ नहीं कर सकता; मनुष्य के पास खुद को इनसे छुड़ाने की ताकत नहीं है।

1. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है

पहले हम ज्ञान के बारे में बात करेंगे। क्या ज्ञान ऐसी चीज़ है, जिसे हर कोई सकारात्मक चीज़ मानता है? लोग कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि "ज्ञान" शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक के बजाय सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी ज्ञान का ही एक भाग है, है न? (हाँ।) तो फिर ज्ञान क्यों उन चीज़ों में सूचीबद्ध है, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है? तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या ज्ञान में सत्य का लेश मात्र भी होता है? (नहीं।) तो ज्ञान का सार क्या है? मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने वाले समस्त ज्ञान का आधार क्या है? क्या यह विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या मनुष्य द्वारा खोज और संकलन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान नास्तिकता पर आधारित नहीं है? क्या ऐसे किसी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई संबंध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना करने के साथ जुड़ा है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा है? (नहीं।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है? मैंने अभी-अभी कहा कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना करने या सत्य के साथ नहीं जुड़ा है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं : "हो सकता है, ज्ञान का सत्य से कोई लेना-देना न हो, किंतु फिर भी, यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है? क्या तुम्हें ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि व्यक्ति की खुशी उसके अपने दो हाथों द्वारा सृजित होनी चाहिए? क्या ज्ञान ने तुम्हें यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है? (हाँ।) यह कैसी बात है? (यह शैतानी बात है।) बिलकुल सही! यह शैतानी बात है! ज्ञान चर्चा का एक जटिल विषय है। तुम बस यह कह सकते हो कि ज्ञान का क्षेत्र ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है। ज्ञान का यह क्षेत्र ऐसा है, जिसे परमेश्वर की उपासना न करने और परमेश्वर द्वारा सब चीज़ों का निर्माण किए जाने की बात न समझने के आधार पर सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो वे यह नहीं देखते कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व है; वे नहीं देखते कि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभारी है या सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है। इसके बजाय, वे जो कुछ भी करते हैं, वह है ज्ञान के क्षेत्र का अंतहीन अनुसंधान और खोज, और वे ज्ञान के आधार पर उत्तर खोजते हैं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि अगर लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेंगे और इसके बजाय केवल अनुसंधान करेंगे, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे? वह सब ज्ञान तुम्हें केवल जीविकोपार्जन, एक नौकरी, आमदनी दे सकता है, ताकि तुम भूखे न रहो; किंतु वह तुम्हें कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं करने देगा, और वह कभी भी तुम्हें बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना अधिक तुम ज्ञान का अध्ययन करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, परमेश्वर को अपने अध्ययन के अधीन करने, परमेश्वर को प्रलोभित करने और परमेश्वर का विरोध करने की इच्छा करोगे। तो अब हम क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखा रहा है? यह सब शैतान का फ़लसफ़ा है। क्या शैतान द्वारा भ्रष्ट मनुष्यों के बीच फैलाए गए फ़लसफ़ों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई संबंध है? उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के विपरीत हैं। लोग प्रायः कहते हैं, "जीवन गति है" और "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, अगर मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूख से बेज़ार महसूस करता है"; ये क्या कहावतें हैं? ये भुलावे हैं और इन्हें सुनने से घृणा की भावना पैदा होती है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन का फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, अपना फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने अपने दृष्टिकोण, धारणाएँ और विचार मनुष्य के मन में भर दिए हैं, तो क्या इस प्रक्रिया में मनुष्य भ्रष्ट नहीं होता? (हाँ।) अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित कर लेता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर जी रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोणों और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है, जो इस ज्ञान के भीतर छिपे हैं। यहीं पर शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का अनिवार्य अंश घटित होता है; यह शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि दोनों है।

हम ज्ञान के सबसे सतही पहलू पर चर्चा से शुरुआत करेंगे। क्या भाषाओं का व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? (नहीं।) शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते; वे एक उपकरण हैं, जिसका लोग बोलने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और वे वह उपकरण भी हैं, जिसका लोग परमेश्वर के साथ संवाद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और इतना ही नहीं, वर्तमान समय में भाषा और शब्द ही हैं, जिनसे परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है। वे उपकरण हैं, और वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, और दो गुणा दो चार होते हैं; क्या यह ज्ञान नहीं है? पर क्या यह तुम्हें भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्य ज्ञान है—यह एक निश्चित प्रतिमान है—और इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता। तो किस तरह का ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? भ्रष्ट करने वाला ज्ञान वह ज्ञान होता है, जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों की मिलावट होती है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी लेख में, लिखित शब्दों में अपने आप में कुछ ग़लत नहीं होता। जब लेखक लेख लिखता है तो समस्या उसके दृष्टिकोण और अभिप्राय के साथ ही उसके विचारों की विषयवस्तु में होती है। ये आत्मा की चीज़ें हैं, और ये लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, अगर तुम टेलीविज़न पर कोई कार्यक्रम देख रहे हो, तो उसमें किस प्रकार की चीज़ें लोगों का दृष्टिकोण बदल सकती हैं? क्या कलाकारों द्वारा कहे गए शब्द खुद लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम होंगे? (नहीं।) किस प्रकार की चीज़ें लोगों को भ्रष्ट करेंगी? ये कार्यक्रम के मुख्य विचार और विषय-वस्तु होंगे, जो निर्देशक के विचारों का प्रतिनिधित्व करेंगे। इन विचारों द्वारा वहन की गई सूचना लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकती है। क्या ऐसा नहीं है? अब तुम लोग जानते हो कि मैं अपनी चर्चा में शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करने के संदर्भ में क्या कह रहा हूँ। तुम ग़लत नहीं समझोगे, है न? तो अगली बार जब तुम कोई उपन्यास या लेख पढ़ोगे, तो क्या तुम आकलन कर सकोगे कि लिखित शब्दों में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को भ्रष्ट करते हैं या मानवजाति के लिए योगदान करते हैं? (हाँ, कुछ हद तक।) यह ऐसी चीज़ है, जिसे धीमी गति से पढ़ा और अनुभव किया जाना चाहिए, और यह ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे तुरंत आसानी से समझ लिया जाए। उदाहरण के लिए, ज्ञान के किसी क्षेत्र में शोध या अध्ययन करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उस क्षेत्र के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान पाने में सहायता कर सकते हैं, साथ ही यह जानने में भी सक्षम बना सकते हैं कि किन चीज़ों से लोगों को बचना चाहिए। उदाहरण के लिए "बिजली" को लो—यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? अगर तुम्हें यह पता न होता कि बिजली लोगों को झटका मार सकती है और चोट पहुँचा सकती है, तो क्या तुम अनभिज्ञ न होते? किंतु एक बार ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ लेने पर तुम बिजली के करेंट वाली चीज़ों को छूने में लापरवाही नहीं बरतोगे, और तुम जान जाओगे कि बिजली का उपयोग कैसे करना है। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब तुम लोगों को स्पष्ट हो गया है कि हम, ज्ञान लोगों को किस तरह भ्रष्ट करता है, इस बारे में क्या चर्चा कर रहे हैं? दुनिया में कई प्रकार के ज्ञान का अध्ययन किया जाता है और तुम लोगों को स्वयं उनमें अंतर करने के लिए समय देना चाहिए।

2. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के मन में बड़ी प्रतिष्ठा नहीं रखता और अगाध नहीं माना जाता? जब विज्ञान का उल्लेख किया जाता है, तो क्या लोग ऐसा महसूस नहीं करते : "यह एक ऐसी चीज़ है, जो सामान्य लोगों की पहुँच से परे है; यह ऐसा विषय है, जिसे केवल वैज्ञानिक शोधकर्ता या विशेषज्ञ ही स्पर्श कर सकते हैं; इसका हम जैसे आम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं है"? क्या इसका आम लोगों के साथ कोई संबंध है? (हाँ।) शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करता है? हम यहाँ अपनी चर्चा में केवल उन चीज़ों के बारे में बात करेंगे, जिनसे लोगों का अपने जीवन में बार-बार सामना होता है, और अन्य मामलों को नज़रअंदाज़ कर देंगे। एक शब्द है "जींस।" क्या तुमने यह शब्द सुना है? तुम सब इस शब्द से परिचित हो, है न? क्या जींस विज्ञान के माध्यम से नहीं खोजे गए थे? लोगों के लिए जींस ठीक-ठीक क्या मायने रखते हैं? क्या ये लोगों को यह महसूस नहीं कराते कि शरीर एक रहस्यमयी चीज़ है? लोगों को इस विषय से परिचित कराए जाने पर क्या कुछ लोग ऐसे नहीं होंगे—विशेषकर जिज्ञासु—जो और अधिक जानना चाहेंगे या और अधिक विवरण पाना चाहेंगे? ये जिज्ञासु लोग अपनी ऊर्जा इस विषय पर केंद्रित करेंगे और जब उनके पास कोई और चीज़ करने को नहीं होगी, तो वे इसके बारे में और अधिक विवरण पाने के लिए पुस्तकों में और इंटरनेट पर जानकारी खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट रूप से कहूँ तो, विज्ञान उन चीज़ों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिनके बारे में मनुष्य जिज्ञासु है, जो अज्ञात चीज़ें हैं, और जो उन्हें परमेश्वर द्वारा नहीं बताई गई हैं; विज्ञान उन रहस्यों से संबंधित विचार और सिद्धांत हैं, जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है। विज्ञान का दायरा क्या है? तुम कह सकते हो कि वह काफी व्यापक है और हर उस चीज़ का शोध और अध्ययन करता है, जिसमें उसकी रुचि होती है। विज्ञान में इन चीज़ों के विवरण और नियमों का शोध करना और फिर वे संभावित सिद्धांत सामने लाना शामिल है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं : "ये वैज्ञानिक सचमुच ज़बरदस्त हैं। वे इतना अधिक जानते हैं, इन चीज़ों को समझने के लिए इनमें बहुत ज्ञान है!" उनके मन में वैज्ञानिकों के लिए बहुत सराहना होती है, है न? जो लोग विज्ञान संबंधी शोध करते हैं, वे किस तरह के विचार रखते हैं? क्या वे ब्रहमांड का शोध नहीं करना चाहते, अपनी रुचि के क्षेत्र में रहस्यमयी चीज़ों पर शोध नहीं करना चाहते? इसका अंतिम परिणाम क्या होता है? कुछ विज्ञानों में लोग अनुमान के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालते हैं, और अन्य विज्ञानों में वे निष्कर्ष निकालने के लिए मानव-अनुभव पर भरोसा करते हैं। विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोग ऐतिहासिक और पृष्ठभूमिगत अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। क्या ऐसा नहीं है? तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान सिर्फ इतना करता है कि लोगों को भौतिक जगत में चीज़ों को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा शांत करता है, पर यह मनुष्य को उन नियमों को देखने में सक्षम नहीं बनाता, जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान में उत्तर पाता प्रतीत होता है, किंतु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि, जो मनुष्य के मन को केवल भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से उत्तर मिले हैं, इसलिए जो कोई भी मामला उठता है, वे उस मामले को साबित या स्वीकृत करने के लिए आधार के रूप में अपने वैज्ञानिक विचारों का ही इस्तेमाल करते हैं। मनुष्य का मन विज्ञान से आविष्ट हो जाता है और उससे इस हद तक बहक जाता है कि वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने और यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, और उत्तर पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? लोग जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतने ही अधिक बेतुके हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और वे यह विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण करने वाले कुछ लोग भी सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाते हैं या किसी मुद्दे के जवाब के लिए जानकारी खोजने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में वे समस्याओं का समाधान करने के लिए वैज्ञानिक विचारों या ज्ञान या वैज्ञानिक समाधानों पर भरोसा करना चाहते हैं; वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं, जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जो उस स्थान पर गए हैं, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद जहाज़ रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के प्रकटन में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में अधिक संशयात्मक नहीं बनाता? (हाँ।) तो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग कैसे करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता, और उनके हृदयों पर पकड़ बनाने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग नहीं करता, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें? (हाँ।) इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

3. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का उपयोग कैसे करता है

क्या ऐसी कई चीज़ें हैं या क्या ऐसी कई चीज़ें नहीं हैं, जो पारंपरिक संस्कृति का अंग मानी जाती हैं? (हाँ, हैं।) इस "पारंपरिक संस्कृति" का अर्थ क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि यह पूर्वजों से चली आती है—यह एक पहलू है। आरंभ से ही परिवारों, जातीय समूहों, यहाँ तक कि पूरी मानवजाति में जीवन के तरीके, रीति-रिवाज, कहावतें और नियम आगे बढ़ाए गए हैं, और वे लोगों के विचारों में बैठ गए हैं। लोग उन्हें अपने जीवन का अविभाज्य अंग समझते हैं और उन्हें नियमों की तरह मानते हैं, और उनका इस तरह पालन करते हैं, जैसे वे स्वयं जीवन हों। दरअसल, वे कभी भी इन चीज़ों को बदलना या इनका परित्याग करना नहीं चाहते, क्योंकि ये उनके पूर्वजों से आई हैं। पारंपरिक संस्कृति के अन्य पहलू भी हैं, जो लोगों की हड्डियों तक में जम गए हैं, जैसे कि वे चीज़ें, जो कन्फ्यूशियस या मेंसियस से आई हैं, और वे चीज़ें, जो चीनी ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई हैं। क्या यह सही नहीं हैं? पारंपरिक संस्कृति में क्या चीज़ें शामिल हैं? क्या इसमें वे त्योहार शामिल हैं, जिन्हें लोग मनाते हैं? उदाहरण के लिए : वसंत महोत्सव, दीप-महोत्सव, चिंगमिंग दिवस, ड्रैगन नौका महोत्सव, और साथ ही, भूत महोत्सव और मध्य-हेमंत महोत्सव। कुछ परिवार तब भी उत्सव मनाते हैं, जब वरिष्ठ लोग एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाते हैं, या जब बच्चे एक माह या सौ दिन की उम्र के हो जाते हैं। और इसी तरह चलता रहता है। ये सब पारंपरिक त्योहार हैं। क्या इन त्योहारों में पारंपरिक संस्कृति अंतर्निहित नहीं है? पारंपरिक संस्कृति का मूल क्या है? क्या इनका परमेश्वर की उपासना से कुछ लेना-देना है? क्या इनका लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए कहने से कुछ लेना-देना है? क्या परमेश्वर को भेंट चढ़ाने, परमेश्वर की वेदी पर जाने और उसकी शिक्षाएँ प्राप्त करने के लिए भी लोगों के कोई त्योहार हैं? क्या इस तरह के कोई त्योहार हैं? (नहीं।) इन सभी त्योहारों में लोग क्या करते हैं? आधुनिक युग में इन्हें खाने, पीने और मज़े करने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। पारंपरिक संस्कृति का अंतर्निहित स्रोत क्या है? पारंपरिक संस्कृति किससे आती है? (शैतान से।) यह शैतान से आती है। इन पारंपरिक त्योहारों के दृश्यों के पीछे शैतान मनुष्यों में कुछ खास चीजें भर देता है। वे चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें—क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंगमिंग महोत्सव के दौरान लोग कब्रों की सफ़ाई करते हैं और अपने पूर्वजों को भेंट चढ़ाते हैं, ताकि वे अपने पूर्वजों को भूलें नहीं। साथ ही, शैतान सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना याद रखें, जिसका एक उदाहरण ड्रैगन नौका महोत्सव है। मध्य-हेमंत उत्सव किसलिए मनाया जाता है? (पारिवारिक पुनर्मिलन के लिए।) पारिवारिक पुनर्मिलनों की पृष्ठभूमि क्या है? इसका क्या कारण है? यह भावनात्मक रूप से संवाद करने और जुड़ने के लिए है। निस्संदेह, चाहे वह चंद्र नववर्ष की पूर्व संध्या मनाना हो या दीप-महोत्सव, उन्हें मनाने के पीछे के कारणों का वर्णन करने के कई तरीके हैं। लेकिन कोई उन कारणों का वर्णन कैसे भी करे, उनमें से प्रत्येक कारण शैतान द्वारा लोगों में अपना फ़लसफ़ा और सोच भरने का तरीका है, ताकि वे परमेश्वर से भटक जाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर है, और वे भेंटें या तो अपने पूर्वजों को चढ़ाएँ या फिर शैतान को, या देह-सुख की इच्छाओं के वास्ते खाएँ, पीएँ और मज़ा करें। जब भी ये त्योहार मनाए जाते हैं, तो इनमें से हर त्योहार में लोगों के जाने बिना ही उनके मन में शैतान के विचार और दृष्टिकोण गहरे जम जाते हैं। जब लोग अपनी उम्र के चालीसवें, पचासवें दशक में या उससे भी बड़ी उम्र में पहुँचते हैं, तो शैतान के ये विचार और दृष्टिकोण पहले से ही उनके मन में गहरे जम चुके होते हैं। इतना ही नहीं, लोग इन विचारों को, चाहे वे सही हों या गलत, अविवेकपूर्ण ढंग से और बिना दुराव-छिपाव के, अगली पीढ़ी में संचारित करने का भरसक प्रयास करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? (है।) पारंपरिक संस्कृति और ये त्योहार लोगों को कैसे भ्रष्ट करते हैं? क्या तुम जानते हो? (लोग इन परंपराओं के नियमों से इतने विवश और बाध्य हो जाते हैं कि उनमें परमेश्वर को खोजने का समय और ऊर्जा नहीं बचती।) यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, चंद्र नव वर्ष के दौरान हर कोई उत्सव मनाता है—अगर तुमने नहीं मनाया, तो क्या तुम दुःखी महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने दिल में कोई अंधविश्वास रखते हो? शायद तुम ऐसा महसूस करो : "मैंने नववर्ष का उत्सव नहीं मनाया, और चूँकि चंद्र नव वर्ष का दिन एक खराब दिन था; तो कहीं बाकी पूरा वर्ष भी खराब ही न बीते"? क्या तुम बुरा और थोड़ा डरा हुआ महसूस नहीं करोगे? ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्होंने वर्षों से अपने पुरखों को भेंट नहीं चढ़ाई है और वे अचानक स्वप्न देखते हैं, जिसमें कोई मृत व्यक्ति उनसे धन माँगता है। वे कैसा महसूस करेंगे? "कितने दुःख की बात है कि इस मृत व्यक्ति को खर्च करने के लिए धन चाहिए! मैं उसके लिए कुछ कागज़ी मुद्रा जला दूँगा। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूँ, तो यह बिलकुल भी सही नहीं होगा। इससे हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं—कौन कह सकता है, दुर्भाग्य कब आ पड़ेगा?" उनके मन में डर और चिंता का यह छोटा-सा बादल हमेशा मँडराता रहेगा। उन्हें यह चिंता कौन देता है? (शैतान।) शैतान इस चिंता का स्रोत है। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने का एक तरीका नहीं है? वह तुम्हें भ्रष्ट करने, तुम्हें धमकाने और तुम्हें बाँधने के लिए विभिन्न तरीके और बहाने इस्तेमाल करता है, ताकि तुम स्तब्ध रह जाओ और झुक जाओ और उसके सामने समर्पण कर दो; शैतान इसी तरह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। प्रायः जब लोग कमज़ोर होते हैं या परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत नहीं होते, तब वे असावधानीवश, भ्रमित तरीके से कुछ कर सकते हैं; अर्थात्, वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और वे बेइरादा कुछ कर सकते हैं, कुछ ऐसी चीज़ें कर सकते हैं, जिनके बारे में वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। शैतान इसी तरह से मनुष्य को भ्रष्ट करता है। यहाँ तक कि अब कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो गहरे जड़ जमाई हुई पारंपरिक संस्कृति से अलग होने के अनिच्छुक हैं, और उसे नहीं छोड़ सकते। विशेष रूप से जब वे कमज़ोर और निष्क्रिय होते हैं, तब वे इस प्रकार के उत्सव मनाना चाहते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, ताकि उनके दिलों को सुकून मिल जाए। पारंपरिक संस्कृति की पृष्ठभूमि क्या है? क्या पर्दे के पीछे से शैतान का काला हाथ डोर खींच रहा है? क्या शैतान की दुष्ट प्रकृति जोड़-तोड़ और नियंत्रण कर रही है? क्या शैतान इन सभी चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है? (हाँ।) जब लोग इस पारंपरिक संस्कृति में जीते हैं और इस प्रकार के पारंपरिक त्योहार मनाते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा परिवेश है, जिसमें वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए और भ्रष्ट किए जा रहे हैं, और इतना ही नहीं, वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने और भ्रष्ट किए जाने से खुश हैं? (हाँ।) यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे तुम सब स्वीकार करते हो, जिसके बारे में तुम जानते हो।

4. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है

तुम "अंधविश्वास" शब्द से परिचित हो, है न? अंधविश्वास और पारंपरिक संस्कृति में संबंध हैं, किंतु आज हम उनके बारे में बात नहीं करेंगे। इसके बजाय मैं अंधविश्वास के सबसे ज्यादा सामने आने वाले रूपों की चर्चा करूँगा : भविष्य-कथन, ज्योतिष, धूप जलाना और बुद्ध की आराधना करना। कुछ लोग भविष्य-कथन करते हैं, दूसरे लोग बुद्ध की आराधना करते हैं और धूप जलाते हैं, जबकि अन्य लोग अपना भाग्य पढ़वाते हैं या किसी को अपना चेहरा दिखाकर अपना भाग्य ज्ञात करवाते हैं। तुम लोगों में से कितनों ने अपना भाग्य ज्ञात करवाया या चेहरा पढ़वाया है? यह चीज़ ऐसी है, जिसमें अधिकांश लोग रुचि रखते हैं, है न? (हाँ।) क्यों? भविष्य-कथन और ज्योतिष से लोगों को क्या फायदा होता है? इससे उन्हें किस प्रकार की संतुष्टि मिलती है? (जिज्ञासा।) क्या यह सिर्फ जिज्ञासा है? जहाँ तक मैं देखता हूँ, जरूरी नहीं कि यह सिर्फ जिज्ञासा हो। अटकल और भविष्य-कथन का क्या लक्ष्य है? यह क्यों किया जाता है? क्या यह भविष्य जानने के लिए नहीं है? कुछ लोग भविष्य का पूर्वानुमान लगाने के लिए अपना चेहरा पढ़वाते हैं, अन्य लोग ऐसा यह देखने के लिए करते हैं कि उनका भाग्य अच्छा होगा या नहीं। कुछ लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि उनकी शादी कैसी रहेगी, और कुछ अन्य लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि आने वाला वर्ष कैसा भाग्य लाएगा? कुछ लोग यह देखने के लिए अपना चेहरा पढ़वाते हैं कि उनका और उनके पुत्र-पुत्रियों का भविष्य कैसा रहेगा, और कुछ व्यापारी लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि वे कितना पैसा कमाएँगे और चेहरा पढ़ने वाले से मार्गदर्शन माँगते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए? तो क्या यह सिर्फ जिज्ञासा शांत करने के लिए है? जब लोग अपना चेहरा पढ़वाते हैं या इस प्रकार की चीज़ें करते हैं, तो यह केवल उनके अपने भविष्य के व्यक्तिगत लाभ के लिए होता है; वे विश्वास करते हैं कि यह सब उनके भाग्य के साथ निकटता से जुड़ा है। क्या इनमें से कुछ भी उपयोगी है? (नहीं।) यह उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या इन चीज़ों के माध्यम से कुछ जानकारी प्राप्त करना अच्छी बात नहीं है? ये प्रथाएँ तुम्हें यह जानने में सहायता कर सकती हैं कि मुसीबत कब आ सकती है, और अगर तुम मुसीबतों के बारे में उनके आने से पहले जान लो, तो क्या तुम उनसे बच नहीं सकते? अगर तुम अपना भविष्य पढ़वा लेते हो, तो वह तुम्हें यह दिखा सकता है कि भूलभुलैया से निकलने का सही मार्ग कैसे खोजा जाए, ताकि तुम आने वाले वर्ष में सौभाग्य प्राप्त कर सको और अपने व्यवसाय के माध्यम से खूब धन-दौलत प्राप्त कर सको। तो यह उपयोगी है या नहीं? लेकिन यह उपयोगी है या नहीं, इसका हमसे कोई संबंध नहीं है, और हमारी आज की संगति में यह मुद्दा शामिल नहीं होगा। शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग कैसे करता है? सभी लोग अपना भाग्य जानना चाहते हैं, इसलिए शैतान उनकी उत्सुकता का उन्हें लालच देने के लिए फायदा उठाता है। लोग अटकल, भविष्य-कथन, और चेहरा पढ़वाने में संलग्न हो जाते हैं, ताकि जान सकें कि भविष्य में उनके साथ क्या होगा और आगे किस प्रकार का मार्ग है। यद्यपि अंतत: वह भाग्य या संभावनाएँ किसके हाथ में हैं जिनसे लोग इतने चिंतित हैं? (परमेश्वर के हाथ में।) ये सभी चीज़ें परमेश्वर के हाथों में हैं। इन विधियों का उपयोग करके शैतान लोगों को क्या ज्ञात करवाना चाहता है? शैतान चेहरा पढ़ने और भविष्य-कथन का उपयोग लोगों को यह बताने के लिए करना चाहता है कि वह उनका भविष्य और भाग्य जानता है, और न केवल वह इन चीज़ों को जानता है, बल्कि ये उसके नियंत्रण में भी हैं। शैतान इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और इन विधियों का उपयोग लोगों को नियंत्रित करने के लिए करना चाहता है, ताकि लोग उस पर अंधे होकर विश्वास करें और उसके हर शब्द का पालन करें। उदाहरण के लिए, अगर तुम अपना चेहरा पढ़वाओ, और अगर भाग्य बताने वाला व्यक्ति अपनी आँखें बंद करके पूर्ण स्पष्टता के साथ तुम्हें बता दे कि पिछले कुछ दशकों में तुम्हारे साथ क्या-क्या घटित हुआ है, तो तुम भीतर कैसा महसूस करोगे? तुम तुरंत महसूस करोगे, "यह कितना सटीक है! मैंने अपना अतीत पहले कभी किसी को नहीं बताया, इसने उसके बारे में कैसे जाना? मैं सच में इस भविष्यवक्ता की सराहना करता हूँ!" क्या शैतान के लिए तुम्हारे अतीत के बारे में जानना बहुत आसान नहीं है? परमेश्वर तुम्हें वहाँ तक लेकर आया है, जहाँ आज तुम हो, और इस पूरे समय के दौरान शैतान लोगों को भ्रष्ट करता रहा है और तुम्हारा पीछा करता रहा है। तुम्हारे जीवन के दशकों का समय शैतान के लिए कुछ भी नहीं है और इन चीज़ों को जानना उसके लिए कठिन नहीं है। जब तुम जानते हो कि शैतान जो कहता है, वह सटीक है, तो क्या तुम अपना हृदय उसे नहीं दे देते? क्या तुम अपना भविष्य और भाग्य उसके नियंत्रण में नहीं छोड़ देते? एक पल में तुम्हारा हृदय उसके लिए कुछ आदर या श्रद्धा महसूस करेगा, और कुछ लोगों के लिए, इस बिंदु पर उनकी आत्माएँ उसके द्वारा पहले ही छीन ली गई होंगी। और तुम तुरंत भविष्यवक्ता से पूछोगे, "मैं आगे क्या करूँ? आने वाले साल में मुझे किससे बचना चाहिए? मुझे क्या नहीं करना चाहिए?" और फिर, वह कहेगा, "तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए, तुम्हें यह नहीं करना चाहिए, फ़लाँ रंग के कपड़े मत पहनो, तुम्हें अमुक-अमुक स्थानों पर नहीं जाना चाहिए, और तुम्हें फ़लाँ चीज़ें अधिक करनी चाहिए...।" क्या तुम उसकी हर बात तुरंत दिल से स्वीकार नहीं कर लोगे? तुम उसके वचन परमेश्वर के वचनों से भी अधिक तेजी से याद कर लोगे। तुम उन्हें इतनी शीघ्रता से क्यों याद कर लोगे? क्योंकि तुम अच्छे भाग्य के लिए शैतान पर भरोसा करना चाहोगे। क्या तभी वह तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा नहीं कर लेता? जब उसकी भविष्यवाणियाँ एक के बाद एक सच हो जाती हैं, तब क्या तुम यह जानने के लिए वापस उसके पास नहीं जाना चाहोगे, कि अगला साल कैसा भाग्य लेकर आएगा? (हाँ।) तुम वही करोगे, जो शैतान तुमसे करने के लिए कहेगा, और उन चीज़ों से बचोगे, जिनसे वह बचने के लिए कहेगा। इस तरह से, क्या तुम उसकी कही हर बात का पालन नहीं कर रहे होते? बहुत जल्दी तुम उसकी गोद में जा गिरोगे, धोखा खाओगे और उसके नियंत्रण में चले जाओगे। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि तुम विश्वास करते हो कि वह जो कहता है, वह सत्य है, और क्योंकि तुम मानते हो कि वह तुम्हारी पिछली ज़िंदगियों, तुम्हारी वर्तमान ज़िंदगी और तुम्हारे भविष्य में घटित होने वाली चीज़ों के बारे में जानता है। यही वह विधि है, जिससे शैतान लोगों को नियंत्रित करता है। किंतु वास्तव में कौन नियंत्रण करता है? स्वयं परमेश्वर नियंत्रण करता है, शैतान नहीं। शैतान इस मामले में अपनी चालाकियों का उपयोग केवल अज्ञानी लोगों को चकमा देने के लिए करता है, उन लोगों को बरगलाने के लिए करता है, जो उस पर विश्वास और भरोसा करने में केवल भौतिक जगत को देखते हैं। फिर वे शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और उसकी हर बात मानते हैं। किंतु क्या जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहते हैं, तब शैतान अपनी पकड़ ढीली करता है? शैतान अपनी पकड़ ढीली नहीं करता। इस स्थिति में, क्या लोग वास्तव में शैतान के चंगुल में फँस रहे हैं? (हाँ।) क्या हम कह सकते हैं कि इस संदर्भ में शैतान का व्यवहार सचमुच निर्लज्जतापूर्ण है? (हाँ।) हम ऐसा क्यों कहेंगे? क्योंकि ये धोखा देने वाली और छल से भरी हुई चालबाजियाँ हैं। शैतान बेशर्म है और लोगों को गुमराह करता है कि वह उनसे संबंधित सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और वह उनके भाग्य को भी नियंत्रित करता है। इससे अज्ञानी लोग उसे पूरी तरह से मानने लगते हैं। वे केवल कुछ शब्दों से मूर्ख बना दिए जाते हैं। हतप्रभ होकर लोग उसके आगे झुक जाते हैं। तो शैतान किस तरह के तरीके इस्तेमाल करता है, खुद पर विश्वास करवाने के लिए वह क्या कहता है? उदाहरण के लिए, तुमने शैतान को नहीं बताया होगा कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, किंतु शायद वह बता दे कि तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य हैं, और साथ ही तुम्हारे माता-पिता और बच्चों की उम्र भी बता दे। इससे पहले अगर तुम्हें शैतान पर कुछ शक या संदेह रहा भी हो, तो क्या ऐसी बातें सुनने के बाद तुम यह महसूस नहीं करोगे कि यह थोड़ा अधिक विश्वसनीय है? तब शैतान कह सकता है कि हाल ही में तुम्हारा कार्य कितना कठिन रहा है, कि तुम्हारे वरिष्ठ तुम्हें उतना महत्व नहीं देते, जितना तुम्हें मिलना चाहिए और वे हमेशा तुम्हारे विरुद्ध कार्य करते हैं, इत्यादि। यह सुनने के बाद तुम सोचोगे, "यह बिलकुल सही है! कार्यालय में सब चीज़ें सुचारु रूप से नहीं चल रही हैं।" तो तुम शैतान पर थोड़ा और विश्वास करोगे। फिर वह तुम्हें धोखा देने के लिए कुछ और कहेगा, जिससे तुम उस पर और भी अधिक विश्वास करोगे। थोड़ा-थोड़ा करके तुम अब खुद को उसका और प्रतिरोध करने या उस पर संदेह करने में असमर्थ पाओगे। शैतान सिर्फ कुछ मामूली चालाकियाँ, यहाँ तक कि छोटी-छोटी तुच्छ चालाकियाँ इस्तेमाल करता है और इस तरह तुम्हें भ्रमित कर देता है। जब तुम भ्रमित हो जाते हो, तो तुम अपना व्यवहार स्थिर नहीं रख पाते, तुम्हारी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ, और तुम वही करना आरंभ कर देते हो, जो शैतान कहता है। यह वह शानदार तरीका है, जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है, जिससे तुम अनजाने ही उसके जाल में फँस जाते हो और उसके द्वारा बहकाए जाते हो। शैतान तुमसे कुछ बातें कहता है, जिन्हें लोग अच्छी बातें मानते हैं, और तब वह तुम्हें कहता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना। इस तरह तुम अनजाने ही छले जाते हो। एक बार जब तुम इसमें पड़ जाते हो, तो तुम्हारे लिए चीज़ें परेशानी देने वाली हो जाती हैं; तुम लगातार इसी बारे में सोचते रहते हो कि शैतान ने क्या कहा और उसने तुमसे क्या करने को कहा, और तुम अनजाने ही उसके कब्ज़े में आ जाते हो। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मनुष्यों में सत्य का अभाव है और इसलिए वे शैतान के प्रलोभन और बहकावे के विरुद्ध मजबूती से खड़े होने और उसका विरोध करने में असमर्थ हैं। शैतान की दुष्टता और उसके धोखे, विश्वासघात और दुर्भावना का सामना करने में मानवजाति बहुत अज्ञानी, अपरिपक्व और कमज़ोर है, है न? क्या यह उन तरीकों में से एक नहीं है, जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है? (हाँ, है।) मनुष्य अनजाने में, थोड़ा-थोड़ा करके, शैतान के विभिन्न तरीकों द्वारा धोखा खाते और छले जाते हैं, क्योंकि उनमें सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर करने की योग्यता का अभाव है। शैतान पर विजय पाने के लिए उनमें इस आध्यात्मिक कद और योग्यता का अभाव है।

5. शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक रुझानों का उपयोग कैसे करता है

सामाजिक रुझान कब अस्तित्व में आए? क्या वे केवल वर्तमान समय में अस्तित्व में आए? कोई यह कह सकता है कि सामाजिक रुझान तब अस्तित्व में आए, जब शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करना आरंभ किया। सामाजिक रुझानों में क्या शामिल है? (कपड़े पहनने और शृंगार करने की शैलियाँ।) ये ऐसी चीजें हैं, जिनके संपर्क में लोग अकसर आते हैं। कपड़े पहनने की शैलियाँ, फैशन, रुझान—ये चीज़ें एक छोटा पहलू निर्मित करती हैं। क्या और भी कुछ है? क्या वे लोकप्रिय वाक्यांश भी इसमें शामिल हैं, जिन्हें लोग अकसर बोलते हैं? क्या वे जीवन-शैलियाँ इसमें शामिल हैं, जिनकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत के सितारे, मशहूर हस्तियाँ, पत्रिकाएँ और उपन्यास, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, इसमें शामिल होते हैं? (हाँ।) तुम लोगों के विचार में, सामाजिक रुझानों का कौन-सा पहलू मनुष्य को भ्रष्ट करने में सक्षम है? इनमें से कौन-सा रुझान तुम लोगों को सबसे लुभावना लगता है? कुछ लोग कहते हैं : "हम सब एक खास उम्र में पहुँच गए हैं, हम अपनी उम्र के पचासवें या साठवें, सत्तरवें या अस्सीवें दशक में हैं, और हम अब और इन रुझानों के अनुकूल नहीं हो सकते और वे वास्तव में हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करते।" क्या यह सही है? दूसरे कहते हैं : "हम मशहूर हस्तियों का अनुसरण नहीं करते, वह तो बीसेक साल के युवा लोग किया करते हैं; हम फैशन वाले कपड़े भी नहीं पहनते, वह तो अपनी छवि के बारे में सतर्क लोग किया करते हैं।" तो इनमें से क्या तुम लोगों को भ्रष्ट करने में सक्षम है? (लोकप्रिय कहावतें।) क्या ये कहावतें लोगों को भ्रष्ट कर सकती हैं? मैं एक उदाहरण दूँगा, और तुम लोग देख सकते हो कि वे लोगों को भ्रष्ट करती हैं या नहीं : "पैसा दुनिया को नचाता है"; क्या यह एक रुझान है? क्या यह तुम लोगों द्वारा उल्लिखित फैशन और स्वादिष्ट भोजन के रुझानों की तुलना में अधिक खराब नहीं है? "पैसा दुनिया को नचाता है" यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है। तुम कह सकते हो कि यह एक रुझान है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है। बिलकुल शुरू से ही, लोगों ने इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो उन्होंने इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोग इस कहावत को समान रूप से नहीं समझते, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना भी अनुभव हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक को शामिल करते हुए, दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इस तरह प्रकट होने वाली इस चीज़ की व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! तो शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस रुझान का उपयोग किए जाने के बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे की खोज में लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? इतना ही नहीं, क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है।) क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किंतु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिलकुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे तुम्हें इस बात का एहसास क्यों न हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर का प्रेम कितना गहरा और कितना महान है, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही तुम्हारे व्यवहार और तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सबको त्यागने के, तुम अपने भाग्य को इस कहावत से नियंत्रित करवाओगे। क्या यह तथ्य कि लोग ऐसा करते हैं, कि वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित और प्रभावित होते हैं, यह नहीं दर्शाता कि शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करना कारगर है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का तुम्हारे हृदय में जड़ जमाना नहीं है? अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ।) क्या तुम देखते हो कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? क्या तुम इसे महसूस कर सकते हो? (नहीं।) तुमने इसे न तो देखा है, न महसूस किया है। क्या तुम यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हो? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असंभव बना देता है और वह इसके सामने मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है, जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें इस बात का पता नहीं चलता कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को अपने साथ जोड़-तोड़ करने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।

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