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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग तीन

(II) सच्चे पश्चाताप के जरिए मानवता परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता को प्राप्त करती है।

जो आगे दिया गया है वह "परमेश्वर द्वारा नीनवे का उद्धार" की बाइबल की कहानी है।

(योना 1:1-2) यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्टि में बढ़ गई है।"

(योना 3) "तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की, और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभी ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुंचा, और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवायाः राजा और उसके सरदारों के आदेश से, कहते हुए, "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाने पाए, वे न खाएं और न पानी पिएं।" मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला-चिल्ला कर दें, और अपने कुमार्ग से फिरें, और उस उपद्रव से, जो वे करते है, पश्चाताप करें। संभव है, परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल ले और उसका भड़का हुआ कोप शांत हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ। जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।"

(योना 4) "यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का। उसने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, "हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिए फुर्ती की, क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्वर है, और विलम्ब से कोप करने वाला करुणानिधान है, और दुख देने से प्रसन्न नहीं होता। इसलिए अब हे यहोवा, मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मेरे लिए जीवित रहने से मरना ही भला है।" यहोवा ने कहा "तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?" इस पर योना उस नगर से निकलकर, इसकी पूरब ओर बैठ गया, और वहां एक छप्पर बनाकर उसकी छाया में बैठा हुआ यह देखने लगा कि नगर का क्या होगा? तब यहोवा परमेश्वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दुख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनंदित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ के पेड़ को ऐसा काटा कि वह सूख गया। जब सूर्य उगा, तब परमेश्वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई, और धूप योना के सिर पर ऐसी लगी कि वह मूर्छित होने लगा, और उसने यह कहकर मृत्यु मांगी "मेरे लिए जीवित रहने से मरना ही अच्छा है।" परमेश्वर ने योना से कहा, "तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?" उसने कहा, "हां मेरा जो क्रोध भड़का है वह अच्छा ही है, वरन् क्रोध के मारे मरना भी अच्छा होता।" तब यहोवा ने कहा "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ, उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हजार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएं हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस खाऊं?"

नीनवे की कहानी का सारांश

यद्यपि "परमेश्वर द्वारा नीनवे का उद्धार" की कहानी लम्बाई में छोटी है, फिर भी यह किसी भी व्यक्ति को परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के अन्य पहलू की झलक देखने की अनुमति देती है। वह अन्य पहलू किस चीज़ से निर्मित है इसे सटीकता से समझने के लिए, हमें पवित्र शास्त्र में वापस लौटना होगा और परमेश्वर के कार्यों में से एक कार्य को देखना होगा।

आइए हम पहले इस कहानी की शुरुआत को देखें: "यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुंचा, "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्टि में बढ़ गई है" (योना 1:1-2)।" पवित्र शास्त्र के इस अंश में, हम जानते हैं कि यहोवा परमेश्वर ने योना को नीनवे शहर जाने का आदेश दिया था। उसने योना को इस नगर में जाने के लिए क्यों कहा था? बाइबल इसके विषय में बहुत स्पष्ट है: इस नगर के लोगों की दुष्टता यहोवा परमेश्वर की नज़रों में आ गई थी, और इसलिए जो कुछ उसने करने का इरादा किया था उसकी घोषणा करने के लिए उसने योना को उनके पास भेजा था। जबकि ऐसा कुछ भी लिखित रूप में दर्ज नहीं है जो हमें यह बताए कि योना कौन था, वास्तव में यह परमेश्वर को जानने से सम्बन्धित नहीं है। इस प्रकार, तुम लोगों को इस मनुष्य को समझने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम लोगों को केवल यह जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर ने योना को क्या करने का आदेश दिया था और उसने ऐसा काम क्यों किया था?

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी नीनवे के लोगों तक पहुंचती है

आइए हम दूसरे अंश की ओर आगे बढ़ें, योना की पुस्तक का तीसरा अध्यायः "योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" ये वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर ने नीनवे के लोगों को बताने के लिए सीधे योना को दिया था। वे स्वाभाविक रूप से वे वचन हैं जिन्हें यहोवा नीनवे के लोगों से कहना चाहता था। ये वचन हमें बताते हैं कि परमेश्वर ने नगर के लोगों से घृणा और नफरत करना शुरू कर दिया था क्योंकि उनकी दुष्टता परमेश्वर की नज़रों में आ गई थी, और इस प्रकार वह इस नगर का नाश करना चाहता था। फिर भी, इससे पहले कि परमेश्वर नगर को नष्ट करता, वह नीनवे के नागरिकों के लिए एक घोषणा करेगा, और इसके साथ-साथ वह उन्हें उनकी दुष्टता के लिए पश्चताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने का एक अवसर देगा। यह अवसर चालीस दिन तक रहेगा। दूसरे शब्दों में, यदि नगर के भीतर के लोग चालीस दिनों के भीतर यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप न करें, अपने पापों को न मानें या दंडवत न करें, तो परमेश्वर नगर को नष्ट करेगा जैसा उसने सदोम को नष्ट किया था। यह वह बात थी जिसे यहोवा परमेश्वर नीनवे के लोगों को बताना चाहता था। स्पष्ट रूप से, यह कोई सामान्य घोषणा नहीं थी। इसने न केवल यहोवा परमेश्वर के क्रोध को सूचित किया, बल्कि इसने नीनवे के लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्ति को भी सूचित किया था; उसी समय इस सामान्य घोषणा ने नगर के भीतर रहनेवाले लोगों के लिए एक गम्भीर चेतावनी के रूप में भी काम किया था। इस चेतावनी ने उन्हें बताया था कि उनके बुरे कार्य से उन्होंने यहोवा परमेश्वर की नफरत को अर्जित किया था, और इसने उन्हें बताया था कि उनके बुरे कार्य शीघ्र ही उन्हें उनके सम्पूर्ण विनाश के कगार पर पहुंचा देंगे; इसलिए, नीनवे में हर एक का जीवन विनाश के अति निकट था।

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी के प्रति नीनवे और सदोम की प्रतिक्रिया में सरासर अन्तर

उलट दिए जाने का क्या अर्थ है? बोलचाल की भाषा में, इसका अर्थ है लोप हो जाना। परन्तु किस प्रकार से? कौन एक नगर को पूर्ण रूप से उलट सकता है? किसी मनुष्य के लिए ऐसा काम करना असम्भव है, हाँ वास्तव में। ये लोग कोई मूर्ख नहीं थे; ज्यों ही उन्होंने इस घोषणा को सुना, त्यों ही उन्होंने उस उपाय को ग्रहण कर लिया। वे जानते थे कि यह परमेश्वर की ओर से आया था; वे जानते थे कि परमेश्वर अपना कार्य करने जा रहा था; वे जानते थे कि उनकी दुष्टता ने यहोवा परमेश्वर को क्रोधित किया और उसके क्रोध को नीचे अपने ऊपर उतारा था; जिससे वे शीघ्र ही अपने नगर के साथ नाश हो जाते। यहोवा परमेश्वर की चेतावनी को सुनने के पश्चात् नगर के लोगों ने किस प्रकार बर्ताव किया था? बाईबिल विशिष्ट विवरण के अंतर्गत वर्णन करती है कि इन लोगों ने, राजा से लेकर एक आम आदमी तक, कैसी प्रतिक्रिया की थी। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: "तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की, और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभी ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुंचा, और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: राजा और उसके सरदारों के आदेश से, कहते हुए, "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए, वे न खाएं और न पानी पिएं।" मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला-चिल्लाकर दें, और अपने कुमार्ग से फिरें, और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्चाताप करें।

यहोवा परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने एक ऐसी मनोवृत्ति का प्रदर्शन किया जो सदोम के लोगों से पूरी तरह विपरीत था -सदोम के लोगों ने खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध किया, और बुरे से बुरा करते चले गए, परन्तु इन वचन को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने इस विषय को नज़रअंदाज़ नहीं किया, न ही उन्होंने प्रतिरोध किया; उसके बजाए उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया और उपवास की घोषणा की। "विश्वास किया" क्या संकेत करता है? यह शब्द स्वतः ही विश्वास और समर्पण का सुझाव देता है। यदि हम इस शब्द का वर्णन करने के लिए नीनवे के नागरिकों के वास्तविक व्यवहार का उपयोग करते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि उन्होंने विश्वास किया कि परमेश्वर ने जैसा कहा था वैसा वह कर सकता है और करेगा, और यह कि वे पश्चाताप करने के लिए तैयार थे। क्या नीनवे के लोग सन्निकट विनाश के सामने भय महसूस करते थे? यह उनका विश्वास था जिसने उनके हृदयों में भय डाला था। ठीक है, तो नीनवे के लोगों के विश्वास और भय को प्रमाणित करने के लिए हम क्या उपयोग कर सकते है? यह ऐसा है जैसा बाईबिल कहती हैः "... और उन्होंने(क) उपवास का प्रचार किया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा।" कहने का तात्पर्य है कि नीनवे के लोगों ने सचमुच में विश्वास किया था, और यह कि इस विश्वास से भय उत्पन्न हुआ, जिसने उसके बाद उपवास करने और टाट ओढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इस प्रकार से उन्होंने अपने पश्चाताप की शुरूआत को दिखाया था। सदोम के लोगों के बिलकुल विपरीत, नीनवे के लोगों ने न केवल परमेश्वर का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने व्यवहार और कार्यों के जरिए स्पष्ट रुप से अपने पश्चाताप को दिखाया भी था। हाँ वास्तव में, यह केवल नीनवे के आम लोगों पर ही लागू नहीं होता था; उनका राजा कोई अपवाद नहीं था।

नीनवे के राजा का पश्चाताप यहोवा परमेश्वर की प्रशंसा पाता है

जब नीनवे के राजा ने यह सन्देश सुना, वह अपने सिंहासन से उठा खड़ा हुआ, अपने वस्त्र उतार डाले, टाट पहन लिया और राख में बैठ गया। तब उसने घोषणा की कि नगर में किसी को भी कुछ भी चखने की अनुमति नहीं दी जाएगी, और यह कि कोई मवेशी, भेड़-बकरी, और बैल घास नहीं चरेगा और पानी नहीं पिएगा। मनुष्य और पशु दोनों को एक समान टाट ओढ़ना था; लोग बड़ी लगन से परमेश्वर से विनती करेंगे। साथ ही राजा ने भी घोषणा की कि उनमें से हर एक अपने बुरे मार्गों से फिरे और अपने उपद्रव के कार्यों को छोड़ दे। पश्चाताप के कार्यों की इस श्रृंखला से आंकते हुए, नीनवे के राजा ने अपने हृदय से पश्चाताप का प्रदर्शन किया। कार्य की वह श्रृंखला जिसे उसने अंजाम दिया - अपने सिंहासन से उठा, अपने राजकीय वस्त्र को उतारा, टाट ओढ़ा और राख में बैठ गया – यह लोगों को बताती है कि नीनवे के राजा ने अपने शाही रुतबे को अलग रख दिया था और आम लोगों के साथ टाट ओढ़ लिया था। कहने का तात्पर्य है कि नीनवे के राजा ने यहोवा परमेश्वर से घोषणा को सुनने के पश्चात् अपने बुरे मार्ग या अपने उपद्रव के कार्यों को जारी रखने के लिए अपने शाही पद पर कब्ज़ा नहीं किया; उसके बजाए, उसने उस अधिकार को अलग रख दिया जो उसके पास था और यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप किया। इस समय नीनवे का राजा एक राजा के समान पश्चाताप नहीं कर रहा था; वह परमेश्वर की एक सामान्य प्रजा के रूप में अपने पापों का अंगीकार करने और पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आया था। उसके अलावा, उसने पूरे शहर से भी कहा कि वे उसके समान यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें; इसके अतिरिक्त, उसके पास एक विशिष्ट योजना थी कि ऐसा कैसे करना है, जैसा पवित्र शास्त्र में देखा जाता है: "क्या मनुष्य, क्या गाय बैल, क्या भेड़ बकरी क्या अन्य पशु कोई कुछ भी न खाए, वे न खाएं और न पानी पीएं। और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्ला कर दें और अपने कुमार्ग से फिरें, और उस उपद्रव से जो करते हैं।" जबकि नगर का शासक, नीनवे का राजा उच्चतम पद और सामर्थ धारण करता था और जो वह चाहता था कर सकता था। जब उसने यहोवा परमेश्वर की घोषणा का सामना किया, तो वह उस मामले को नज़रअंदाज़ कर सकता था या बस यों ही अकेले अपने पापों का पश्चाताप और अंगीकार कर सकता था; जहाँ तक यह बात है कि उस शहर के लोगों ने पश्चाताप करने का चयन किया था या नहीं, वह उस मामले की पूर्ण रूप से उपेक्षा कर सकता था। फिर भी, नीनवे के राजा ने ऐसा कतई नहीं किया। वह न केवल अपने सिंहासन पर से उठा, बल्कि टाट एवं राख को ओढ़ा और यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप किया, उसने अपने नगर के भीतर के सभी लोगों और पशुओं को भी ऐसा करने हेतु आदेश दिया। यहाँ तक कि उसने लोगों को आदेश दिया कि "परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दो।" कार्यों की इस श्रृंखला के जरिए, नीनवे के राजा ने सचमुच में उसे पूरा किया जिसे एक शासक को पूरा करना चाहिए; उसके कार्य की श्रृंखला एक ऐसी चीज़ है जिसे हासिल करना मानव इतिहास में किसी भी राजा के लिए कठिन था, और साथ ही यह एक ऐसी चीज़ भी है जिसे किसी ने भी हासिल नहीं किया था। इन कार्यों को मानव इतिहास में अभूतपूर्व उद्यम कहा जा सकता है; वे इस योग्य हैं कि मानवजाति के द्वारा उनका उत्सव मनाया और अनुसरण किया जाए। मनुष्य के अरुणोदय के समय से ही, प्रत्येक राजा ने परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करने में अपनी प्रजा की अगुवाई की थी। किसी ने भी अपनी दुष्टता के निमित्त छुटकारे की खोज करने के लिए, यहोवा परमेश्वर की क्षमा को प्राप्त करने के लिए और सन्निकट दण्ड से बचने के लिए परमेश्वर से विनती करने हेतु अपनी प्रजा की अगुवाई नहीं की थी। फिर भी, नीनवे का राजा अपनी प्रजा को परमेश्वर की ओर ले जाने में, अपने अपने बुरे मार्गों को छोड़ने में और उपद्रव के कार्यों को रोकने में समर्थ था। इससे बढ़कर, वह अपने सिंहासन को छोड़ने के लिए भी समर्थ था, और इसके बदले, यहोवा परमेश्वर फिर गया और उसने अपना मन बदल लिया और उसने अपना क्रोध त्याग दिया, और उस नगर के लोगों को जीवित रहने की अनुमति दी और उन्हें सर्वनाश से बचा लिया। इस राजा के कार्यों को मानव इतिहास में केवल एक दुर्लभ आश्चर्य कर्म ही कहा जा सकता है; यहाँ तक कि उन्हें भ्रष्ट मानवता का आदर्श भी कहा जा सकता है जो परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप करती है।

परमेश्वर नीनवे के नागरिकों के हृदय की गहराईयों में सच्चा पश्चाताप देखता है

परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के राजा और उसकी प्रजा ने कार्यों की एक श्रंखला को अंजाम दिया। उनके व्यवहार और कार्यों का स्वभाव क्या है? दूसरे शब्दों में, उनके सारे चाल चलन का सार-तत्व क्या है? जो कुछ उन्होंने किया था उसे क्यों किया गया था? परमेश्वर की नज़रों में उन्होंने सच्चाई से पश्चाताप किया था, न केवल इसलिए क्योंकि उन्होंने पूरी लगन से परमेश्वर से प्रार्थना की थी और उसके सम्मुख अपने पापों का अंगीकार किया था, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने बुरे व्यवहार का परित्याग कर दिया था। उन्होंने इस तरह से कार्य किया था क्योंकि परमेश्वर के वचनों को सुनने के पश्चात्, वे अविश्वसनीय रूप से भयभीत थे और यह विश्वास करते थे कि वह वही करेगा जैसा उसने कहा था। उपवास करने, टाट पहनने और राख में बैठने के द्वारा, वे अपने मार्गों का पुन:सुधार करना और दुष्टता से अलग रहने की अपनी तत्परता को प्रकट करना, उसके क्रोध को रोकने के लिए यहोवा परमेश्वर से प्रार्थना करना, और अपने निर्णय साथ ही साथ उस विपत्ति को वापस लेने के लिए यहोवा परमेश्वर से विनती करना चाहते थे जो उन पर आने ही वाला था। उनके सम्पूर्ण चालचलन का परिक्षण करने के जरिए हम देख सकते हैं कि वे पहले से ही समझ गए थे कि उनके पहले के बुरे काम परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे और यह कि वे उस कारण को समझ गए थे कि वह क्यों उन्हें शीघ्र नष्ट कर देगा। इन कारणों से, वे सभी पूर्ण रूप से पश्चाताप करना, अपने बुरे मार्गों से फिरना और उपद्रव के कार्यों का परित्याग करना चाहते थे। दूसरे शब्दों में, जब एक बार वे यहोवा परमेश्वर की घोषणा के विषय में जागृत हो गए थे, तब उनमें से हर एक ने अपने हृदय में भय महसूस किया था; उन्होंने आगे से अपने बुरे आचरण को निरन्तर जारी नहीं रखा और न ही उन कार्यों को निरन्तर किया जिनसे यहोवा परमेश्वर के द्वारा घृणा की जाती थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यहोवा परमेश्वर से अपने पिछले पापों को क्षमा करने के लिए और उनके पापों के अनुसार उनसे बर्ताव नहीं करने के लिए विनती की थी। वे दोबारा दुष्टता में कभी संलग्न न होने के लिए और यहोवा परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार थे, केवल तभी जब वे फिर कभी यहोवा परमेश्वर को क्रोध नहीं दिलाएँगे। उनका पश्चाताप सच्चा और सम्पूर्ण था। यह उनके हृदय की गहराईयों से आया था और यह बनावटी नहीं था, और न ही थोड़े समय का था।

जब एक बार नीनवे के लोग, सर्वोच्च्च राजा से लेकर उसकी प्रजा तक, यह जान गए कि यहोवा परमेश्वर उनसे क्रोधित था, तो उनका हर एक कार्य, उनका सम्पूर्ण व्यवहार, साथ ही साथ उनका हर एक निर्णय और चुनाव परमेश्वर की दृष्टि में स्पष्ट और साफ थे। परमेश्वर का हृदय उनके व्यवहार के अनुसार बदल गया था। ठीक उस समय परमेश्वर की मनःस्थिति क्या थी? बाइबल तुम्हारे लिए उस प्रश्न का उत्तर दे सकती है। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: "जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।" यद्यपि परमेश्वर ने अपना मन बदल लिया था, फिर भी उसकी मनःस्थिति के विषय में कुछ भी जटिलता नहीं थी। उसने बस अपने क्रोध को प्रकट करने से लेकर अपने क्रोध को शांत करने तक का सफर तय किया था, और फिर नीनवे शहर के ऊपर उस विपत्ति को न लाने का निर्णय लिया था। क्यों परमेश्वर का निर्णय – उस विपत्ति से नीनवे के नागरिकों को बख्श देना - इतना शीघ्र था उसका कारण यह है क्योंकि परमेश्वर ने नीनवे के हर एक व्यक्ति के हृदय का अवलोकन किया था। जो कुछ उन्होंने अपने हृदय की गहराईयों में धारण किया था उसने उसे देखा: अपने पापों के लिए उनका सच्चा अंगीकार और पश्चाताप, परमेश्वर में उनका सच्चा विश्वास, उनकी गहरी समझ कि कैसे उनके बुरे कार्यों ने उसके स्वभाव को क्रोधित किया, और यहोवा परमेश्वर के सन्निकट दण्ड के परिणाम स्वरूप उत्पन्न भय। उसी समय, यहोवा परमेश्वर ने उनके हृदय की गहराईयों से निकली उनकी प्रार्थनाओं को सुना जो उससे विनती कर रहे थे कि वह उन के विरुद्ध अपने क्रोध को रोक दे जिससे वे इस विपत्ति बच सकें। जब परमेश्वर इन सभी तथ्यों का अवलोकन कर रहा था, तो थोड़ा थोड़ा करके उसका क्रोध जाता रहा। इसके बावजूद कि उसका क्रोध पहले कितना विशाल था, जब उसने इन लोगों के हृदय की गहराईयों में सच्चा पश्चाताप देखा तो इसने उसके ह्रदय को छू लिया, और इस प्रकार वह उनके ऊपर विपत्ति नहीं डाल सकता था, और उसने उन पर क्रोध करना बंद कर दिया। इसके बजाए उसने लगातार उनके प्रति करुणा और सहनशीलता का विस्तार किया और लगातार उनका मार्गदर्शन और उनकी आपूर्ति की।

यदि परमेश्वर में तेरा विश्वास सच्चा है, तो तू अक्सर उसकी देखरेख को प्राप्त करेगा

नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के द्वारा अपने इरादों को बदलने में कोई संकोच या अस्पष्टता शामिल नहीं है। इसके बजाए, यह शुद्ध-क्रोध से शुद्ध-सहनशीलता में हुआ एक रूपान्तरण था। यह परमेश्वर की हस्ती का एक सच्चा प्रकाशन है। परमेश्वर अपने कार्यों में कभी अस्थिर या संकोची नहीं है; उसके कार्यों के पीछे के सिद्धान्त और उद्देश्य स्पष्ट, पारदर्शी, शुद्ध और दोषरहित हैं, जिसमें कोई धोखा या कुचक्र बिलकुल भी नहीं है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर की हस्ती में कोई अंधकार या बुराई शामिल नहीं है। परमेश्वर नीनवे के नागरिकों से क्रोधित हो गया था क्योंकि उनकी दुष्टता के कार्य उसकी नज़रों में आ गए थे; उस वक्त उसका क्रोध उसकी हस्ती से निकला था। फिर भी, जब परमेश्वर का क्रोध जाता रहा और उसने नीनवे के लोगों पर एक बार फिर से सहनशीलता दिखाई, तो वह सब कुछ जो उसने प्रकट किया था वह तब भी उसकी स्वयं की हस्ती थी। यह सम्पूर्ण परिवर्तन परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति में हुए बदलाव के कारण है। इस सम्पूर्ण अवधि के दौरान, परमेश्वर का उल्लंघन न किया जानेवाला स्वभाव नहीं बदला; परमेश्वर की सहनशील हस्ती नहीं बदली; परमेश्वर की प्रेमी और करुणामय हस्ती नहीं बदली। जब लोग दुष्टता के काम करते हैं और परमेश्वर को ठेस पहुंचाते हैं, तो वह अपना क्रोध उन पर लाता है। जब लोग सचमुच में पश्चाताप करते हैं, तो परमेश्वर का हृदय बदलेगा, और उसका क्रोध थम जाएगा। जब लोग हठी होकर निरन्तर परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो उसका क्रोध निरन्तर जारी रहेगा; उसका क्रोध थोड़ा थोड़ा करके उन्हें तब तक दबाता जाएगा जब तक वे नष्ट नहीं हो जाते हैं। यह परमेश्वर के स्वभाव की हस्ती है। इसके बावजूद कि परमेश्वर क्रोध प्रकट कर रहा है या दया एवं करुणा, मनुष्य के हृदय की गहराइयों में परमेश्वर के प्रति उसका आचरण, व्यवहार और मनोवृत्ति उस बात को बताते हैं जिसे परमेश्वर के स्वभाव के प्रकाशन के माध्यम से प्रकट किया गया है। यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को निरन्तर अपने क्रोध के अधीन रखता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति का हृदय परमेश्वर का विरोध करेगा। क्योंकि उसने कभी भी परमेश्वर के सम्मुख सचमुच में पश्चाताप नहीं किया है, अपना सिर नहीं झुकाया या परमेश्वर में सच्चा विश्वास धारण नहीं किया है, और उसने कभी भी परमेश्वर की दया और सहनशीलता को हासिल नहीं किया है। यदि कोई व्यक्ति अकसर परमेश्वर की देखरेख को प्राप्त करता है, और अकसर उसकी करुणा और सहनशीलता को हासिल करता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति के पास अपने हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा विश्वास है, और उसका हृदय परमेश्वर के विरुद्ध नहीं है। वह तो प्रायः परमेश्वर के सम्मुख पश्चाताप करता है; इसलिए, भले ही परमेश्वर का अनुशासन अकसर इस व्यक्ति के ऊपर आए, फिर भी उसका क्रोध नहीं आएगा।

यह संक्षिप्त उल्लेख, लोगों को परमेश्वर के हृदय को देखने, उसकी हस्ती की यथार्थता को देखने, और यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर का क्रोध और उसके हृदय के बदलाव बेवज़ह नहीं हैं। उस सरासर अन्तर के बावजूद जिसे परमेश्वर ने तब प्रदर्शित किया था जब वह क्रोधित था और जब उसने अपना हृदय बदल लिया था, जिसने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि परमेश्वर की हस्ती के इन दोनों पहलुओं के बीच एक बड़ा खाली स्थान और एक बड़ा अन्तर दिखाई देता है – उसका क्रोध और उसकी सहनशीलता – तो नीनवे के लोगों के पश्चाताप के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति एक बार फिर से लोगों को परमेश्वर के सच्चे स्वभाव के अन्य पहलू को देखने की अनुमति देता है। परमेश्वर के हृदय के बदलाव ने सचमुच में एक बार फिर से मानवता को परमेश्वर की दया और करुणा की सच्चाई को देखने और परमेश्वर की हस्ती के सच्चे प्रकाशन को देखने की अनुमति दी है। मानवता को बस यह जानने की आवश्यक है कि परमेश्वर की दया और करुणा पौराणिक कथाएं नहीं हैं, और न ही उन्हें मन से गढ़ा गया है। यह इसलिए है क्योंकि उस घड़ी परमेश्वर की भावनाएं सच्ची थीं; परमेश्वर के हृदय का बदलाव सच्चा था; परमेश्वर ने वास्तव में एक बार फिर से मानवता के ऊपर अपनी दया और करुणा को अर्पित किया था।

फुटनोट:

क. मूल पाठ ने "वे" शब्द को छोड़ दिया है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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