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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग एक

तुम सब परमेश्वर के अधिकार के बारे में पिछली सभा में सुन चुके हो, अब मैं आश्वस्त हूं कि तुम सब उस मुद्दे पर शब्दों की व्यूह रचना के साथ पूर्ण रूप से सुसज्जित हो गए हो। तुम सब कितना अधिक स्वीकार कर सकते हो, आभास कर सकते और समझ सकते हो यह इस पर निर्भर करता है कि तुम सब उसके लिए कितना प्रयास करोगे। यह मेरी आशा है कि तुम सब इस मुद्दे तक बड़े उत्साह से पहुंच सको; तुम लोगों को किसी भी कीमत पर इसके साथ अधूरे मन से व्यवहार नहीं करना चाहिए। अब, क्या परमेश्वर के अधिकार को जानना परमेश्वर की सम्पूर्णता को जानने के समान है? कोई कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानना स्वयं अद्वितीय परमेश्वर को जानने की शुरुआत है, और कोई यह भी कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानने का अर्थ है कि किसी ने स्वयं अद्वितीय परमेश्वर की हस्ती को जानने हेतु पहले से ही द्वार के भीतर कदम रख दिया है। यह समझ परमेश्वर को जानने का एक भाग है। दूसरा भाग क्या है? यह वह विषय है जिसके बारे मैं आज विचार विमर्श करना चाहूंगा - परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।

जिसके तहत आज के विषय के बारे में विचार विमर्श करने के लिए मैंने बाइबल से दो खण्डों का चयन किया है: पहला परमेश्वर द्वारा सदोम के विनाश से सम्बन्धित है, जिसे उत्पत्ति 19:1-11 और उत्पत्ति 19:24-25 में पाया जा सकता है; दूसरा परमेश्वर द्वारा नीनवे के छुटकारे से सम्बन्धित है, जिसे पुस्तक के तीसरे और चौथे अध्यायों के अतिरिक्त योना 1:1-2 में पाया जा सकता है। मैं सन्देह करता हूँ कि तुम सब सुनने के लिए इंतज़ार कर रहे हो कि मुझे इन दो खण्डों के बारे में क्या कहना है। जो कुछ मैं सहजता से कहता हूँ वह स्वयं परमेश्वर को जानने और उसकी हस्ती को जानने के मुख्य विषय से अलग नहीं हो सकता है, किन्तु आज की सहभागिता का केन्द्र क्या होगा? क्या तुम लोगों में से कोई जानता है? "परमेश्वर के अधिकार" के बारे में मेरे विचार विमर्श के किन भागों ने तुम सब का ध्यान खींचा था? मैंने क्यों कहा था कि केवल वही जो ऐसा अधिकार और सामर्थ धारण करता है स्वयं परमेश्वर है? ऐसा कहने के द्वारा मैं क्या समझाना चाहता हूँ? मैं तुम लोगों को क्या सूचित करना चाहता था? जिस प्रकार उसकी हस्ती को प्रदर्शित किया गया है क्या परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ एक पहलू है? क्या वे उसकी हस्ती के एक भाग हैं जो उसकी पहचान और पदस्थिति को प्रमाणित करती है? क्या इन प्रश्नों ने तुम लोगों को बता दिया है कि मैं क्या कहने जा रहा हूँ? मैं तुम लोगों को क्या समझाना चाहता हूँ? सावधानी से इस पर विचार करो।

(I) ढिठाई से परमेश्वर का विरोध करने से, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध के द्वारा नाश हो जाता है।

सर्वप्रथम, आओ हम पवित्र शास्त्र के अनेक अंशों को देखें जो "परमेश्वर के द्वारा सदोम के विनाश" की व्याख्या करते हैं।

(उत्पत्ति 19:1-11) सांझ को वे दो दूत सदोम के पास आए और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उनको देखकर वह उनसे भेंट करने के लिए उठा और मुंह के बल झुककर दण्डवत कर कहा "हे मेरे प्रभुओं, अपने दास के घर में पधारिये और रात भर विश्राम कीजिये और अपने पांव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइये।" उन्होंने कहा, "नहीं हम चौक ही में रात बिताएंगे।" पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया, इसलिए वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए और उसने उनके लिए भोजन तैयार किया और बिना खमीर की रोटियां बनाकर उनको खिलाई; उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया और लूत को पुकारकर कहने लगे, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहां हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया और किवाड़ को अपने पीछे बंद करके कहा "हे मेरे भाइयों ऐसे बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियां हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुंह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो, पर इन पुरुषों से कुछ न करो, क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" उन्होंने कहा "हट जा!" फिर वे कहने लगे, "तू एक परदेशी होकर यहां रहने के लिये आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है, इसलिये अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।" और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे और किवाड़ तोड़ने के लिये निकट आए।तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया और किवाड़ को बंद कर दिया और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरूषों को जो द्वार पर थे, अंधा कर दिया, अतः वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।

(उत्पत्ति 19:24-25) "तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्ट कर दिया।"

इन अंशों से, यह देखना कठिन नहीं है कि सदोम का अधर्म और भ्रष्टता पहले से ही उस मात्रा तक पहुँच चुका था जो परमेश्वर और मुनष्यों दोनों के लिए घृणास्पद था, और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में नगर नाश किए जाने के लायक था। परन्तु नगर के नाश किए जाने से पहले उसके भीतर क्या हुआ था? हम इन घटनाओं से क्या सीख सकते हैं? इन घटनाओं के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति उसके स्वभाव के विषय में हमें क्या दिखाती है? सम्पूर्ण कहानी को समझने के लिए, जो कुछ पवित्र शास्त्र में लिखा गया था आओ हम उसे सावधानीपूर्वक पढ़ें।

सदोम की भ्रष्टताः मुनष्यों को क्रोधित करने वाली, परमेश्वर के कोप को भड़काने वाली

उस रात, लूत ने परमेश्वर के दो दूतों का स्वागत किया और उनके लिए एक भोज तैयार किया। रात्रि के भोजन पश्चात्, उनके लेटने से पहले, नगर के चारों ओर से लोगों की भीड़ ने लूत के घर को घेर लिया और लूत को बाहर बुलाने लगे। पवित्र शास्त्र उन्हें दर्ज करता है यह कहते हुए, "जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहां हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।" इन शब्दों को किसने कहा था? इन्हें किन से कहा गया था? ये सदोम के लोगों के शब्द थे, जो लूत के घर के बाहर चिल्लाते थे और ये लूत के लिए थे। इन शब्दों को सुनकर कैसा महसूस होता है? क्या तुम क्रोधित हो? क्या इन शब्दों से तुम्हें घिन आती है? क्या तुम क्रोध के मारे आगबबूला हो रहे हो? क्या ये शब्द शैतान की तीखी दुर्गन्ध नहीं है? उनके जरिए, क्या तुम इस नगर की बुराई और अन्धकार का एहसास कर सकते हो? क्या तुम उनके शब्दों के जरिए इन लोगों के व्यवहार की क्रूरता और असभ्यता का एहसास कर सकते हो? क्या तुम उनके आचरण के जरिए उनकी भ्रष्टता की गहराई का एहसास कर सकते हो? उनकी बोली की विषयवस्तु के जरिए, यह देखना कठिन नहीं है कि उनकी बुरी प्रवृत्ति और हिंसक स्वभाव एक ऐसे स्तर तक पहुँच गया था जो उनके खुद के नियन्त्रण से परे था। लूत को छोड़कर, नगर का हर अंतिम व्यक्ति शैतान से अलग नहीं था; अन्य व्यक्तियों की मात्र झलक से ही ये लोग उन्हें नुकसान पहुंचना और निगल जाना चाहते थे…. ये चीज़ें न केवल एक व्यक्ति को नगर के भयंकर और डरावने स्वभाव, साथ ही साथ इस के चारों ओर मौत के घेरे का एहसास कराती हैं; बल्कि वे एक व्यक्ति को उसकी बुराई एवं खूनी प्रवृत्ति का भी एहसास कराती हैं।

जब उसने स्वयं को अमानवीय ठगों के गिरोह के आमने-सामने पाया, ऐसे लोग जो प्राणों को निगल जाने की लालसा से भरे हुए थे, तो लूत ने कैसा प्रत्युत्तर दिया था? पवित्र शास्त्र के अनुसार: "हे भाइयों ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियां है जिन्होंने अब तक पुरुष का मुंह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं और तुमको जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो, पर इन पुरुषों से कुछ न करो, क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।" लूत के शब्दों का अभिप्राय निम्नलिखित था: वह दूतों को बचाने के लिए अपनी दो बेटियों को त्यागने के लिए तैयार हो गया था। इस कारण से, इन लोगों को लूत की शर्तों से सहमत हो जाना चाहिए था और दोनों दूतों को अकेला छोड़ देना चाहिए था; बहरहाल, वे दूत उनके लिए पूरी तरह से अजनबी थे, ऐसे लोग जिनका उनके साथ कोई लेना देना नहीं था; इन दोनों दूतों ने उनके हितों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाया था। फिर भी, अपनी बुरी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर, उन्होंने उस मुद्दे को यहाँ पर नहीं छोड़ा। उसके बजाए, उन्होंने केवल अपने प्रयासों को और अधिक तेज कर दिया। यहां उनकी एक और अदला-बदली बिना किसी सन्देह के एक व्यक्ति को इन लोगों के असली पापपूर्ण स्वभाव की और अधिक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकती है; उसी समय यह किसी व्यक्ति को उस कारण को जानने और बूझने की अनुमति भी देती है कि क्यों परमेश्वर इस नगर को नाश करना चाहता था।

अत: उन्होंने आगे क्या कहा? जैसा बाइबल में पढ़ते है: "हट जा!" फिर वे कहने लगे, "तू एक परदेशी होकर यहां रहने के लिए आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा, इसलिए अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।" और वे उस पुरुष को बहुत दबाने लगे और किवाड़ तोड़ने के लिए निकट आए। वे किवाड़ को क्यों तोड़ना चाहते थे? वजह यह है कि वे उन दोनों दूतों को नुकसान पहुँचाने के लिए बहुत उत्सुक थे। वे दोनों दूत सदोम में क्या कर रहे थे? वहां आने का उनका उद्देश्य था लूत एवं उसके परिवार को बचाना; फिर भी, नगर के लोगों ने ग़लत रीति से सोचा कि वे आधिकारिक पदों पर हक़ जमाने के लिए आए थे। उनके उदेश्य को पूछे बिना, यह मात्र अनुमान ही था जिससे नगरवासियों ने असभ्यता से उन दोनों दूतों को नुकसान पहुंचाना चाहा; वे ऐसे दो जनों को चोट पहुंचाना चाहते थे जिनका उनके साथ किसी भी प्रकार का लेना देना नहीं था। यह स्पष्ट है कि नगर के लोगों ने पूरी तरह से अपनी मानवता और तर्कशक्ति को गंवा दिया था। उनके पागलपन और असभ्यता का स्तर पहले से ही मनुष्यों को नुकसान पहुँचाने वाले और निगल जानेवाले शैतान के दुष्ट स्वभाव से अलग नहीं था।

जब उन्होंने लूत से इन लोगों को मांगा, तब लूत ने क्या किया? पाठ से हमें ज्ञात होता है कि लूत ने उन्हें नहीं सौंपा। क्या लूत परमेश्वर के इन दोनों दूतों को जानता था? बिलकुल भी नहीं! परन्तु वह इन दोनों लोगों को बचाने में समर्थ क्यों था? क्या उसे मालूम था कि वे क्या करने आए थे? यद्यपि वह उनके आने के कारण से अनजान था, फिर भी वह जानता था कि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और इस प्रकार उसने उनका स्वागत किया। सदोम के भीतर के अन्य लोगों से अलग, वह परमेश्वर के इन दासों को स्वामी कहकर बुला सकता था जो यह दिखाता है कि लूत आम तौर पर परमेश्वर का एक अनुयायी था। इसलिए, जब परमेश्वर के दूत उसके पास आए, तो इन दोनों सेवकों का स्वागत करने के लिए उसने अपने स्वयं के जीवन को जोखिम में डाल दिया था, उससे बढ़कर, इन दोनों सेवकों की सुरक्षा करने के लिए उसने अपनी बेटियों की अदला-बदली भी की थी। यह लूत का धर्मी कार्य है; साथ ही यह लूत के स्वभाव और उसकी हस्ती का एक स्पृश्य प्रकटीकरण है, और साथ ही यह वह कारण भी है कि परमेश्वर ने लूत को बचाने के लिए अपने सेवकों को भेजा था। जोखिम का सामना करते समय, लूत ने किसी भी चीज़ की परवाह किए बगैर इन दोनों सेवकों की सुरक्षा की; यहाँ तक कि उसने सेवकों की सुरक्षा के बदले में अपनी दोनों बेटियों का सौदा करने का भी प्रयास किया था। लूत के अतिरिक्त, क्या नगर के भीतर कोई ऐसा था जो कुछ इस तरह का काम कर सकता था? जैसे कि तथ्य साबित करते हैं – नहीं ! इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं है कि लूत को छोड़कर सदोम के भीतर हर कोई विनाश का एक लक्ष्य था साथ ही साथ एक ऐसे लक्ष्य के समान था जो विनाश के योग्य था।

परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के कारण सदोम को तबाह कर दिया गया

जब सदोम के लोगों ने इन दो सेवकों को देखा, तो उन्होंने उनके आने का कारण नहीं पूछा, न ही किसी ने यह पूछा कि क्या वे परमेश्वर की इच्छा का प्रचार करने के लिए आए थे। इसके विपरीत, उन्होंने एक भीड़ इकट्ठा की और, स्पष्टीकरण का इंतज़ार किए बगैर, जंगली कुत्तों या दुष्ट भेड़ियों के समान उन दोनों सेवकों को पकड़ने के लिए आ गए। क्या परमेश्वर ने इन चीज़ों को देखा था जब वे घटित हुई थीं? इस प्रकार के मानवीय व्यवहार, और इस प्रकार की चीज़ को लेकर परमेश्वर अपने हृदय में क्या सोच रहा था? परमेश्वर ने इस नगर का नाश करने का निर्णय लिया; अब वह संकोच और इंतज़ार नहीं करेगा, न ही वह निरन्तर धीरज दिखाएगा। उसका दिन आ चुका था, अतः उसने उस कार्य को आरम्भ किया जिसे उसने करने की इच्छा की थी। इस प्रकार, उत्पत्ति 19:24-25 कहता है "तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्ट कर दिया।" ये दोनों पद लोगों को उस पद्धति के बारे में बताते हैं जिसके तहत परमेश्वर ने नगर को नष्ट किया था; और यह लोगों को यह भी बताता है कि परमेश्वर ने क्या नाश किया था। प्रथम, बाईबिल वर्णन करती है कि परमेश्वर ने उस नगर को आग से जला दिया, और यह कि आग की मात्रा समस्त लोगों और जो कुछ भूमि पर उगता था उसे नष्ट करने के लिए पर्याप्त थी। कहने का तात्पर्य है, वह आग जो स्वर्ग से गिरी उसने न केवल उस नगर को नष्ट किया; बल्कि उसने उसके भीतर समस्त लोगों और जीवित प्राणियों को भी नष्ट कर दिया, और बिना किसी नामोनिशान के सब कुछ नष्ट कर दिया। नगर के नष्ट होने के पश्चात्, वह भूमि जीवित प्राणियों से विहीन हो गई थी। वहां और कोई जीवन नहीं था, और न ही जीवन के निशान थे। नगर एक उजड़ी भूमि और एक खाली स्थान बन गया था जो मौत की ख़ामोशी से भरा हुआ था। इस स्थान पर परमेश्वर के विरुद्ध अब और कोई बुरा कार्य नहीं होगा; अब और कोई हत्या या ख़ून ख़राबा नहीं होगा।

परमेश्वर क्यों इस नगर को पूरी तरह से जलाना चाहता था? तुम यहां क्या देख सकते हो? क्या परमेश्वर मनुष्य और प्रकृति, एवं अपनी स्वयं की सृष्टि को इस तरह नाश होते हुए देख पाता? यदि तुम उस आग से यहोवा परमेश्वर के कोप को परख सकते हो जिसे स्वर्ग से नीचे गिराया गया था, तो उसकी विनाशलीला के लक्ष्य से साथ ही साथ जिस हद तक इस नगर को नष्ट किया गया था उस से उसके फैलाव के स्तर को देखना कठिन नहीं है। जब परमेश्वर किसी नगर को तुच्छ जानता है, तो वह अपने दण्ड को उसके ऊपर डालेगा। जब परमेश्वर किसी नगर से अप्रसन्न को जाता है, तो वह लोगों को अपने क्रोध के बारे में सूचित करते हुए बार बार चेतावनियां जारी करेगा। फिर भी, जब परमेश्वर एक नगर का खात्मा और विनाश करने का निर्णय लेता है – अर्थात्, उसके क्रोध और वैभव को ठेस पहुँचाया गया है – तो वह आगे से और दण्ड और चेतावनी नहीं देगा। इसके बजाय, वह सीधे उसे नष्ट कर देगा। वह उसे पूरी तरह से मिटा देगा। यह परमेश्वर का धर्मी स्वभाव है।

परमेश्वर के प्रति सदोम के लगातार प्रतिरोध और शत्रुता के पश्चात्, उसने उसे पूरी तरह से मिटा दिया है

जब एक बार हम में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सामान्य समझ आ जाती है, तो हम अपने ध्यान को सदोम के नगर की ओर मोड़ सकते हैं – जिसे परमेश्वर ने पाप की नगरी के रूप में देखा था। इस नगर की हस्ती को समझने के द्वारा, हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर इसे क्यों नष्ट करना चाहता था और उसने इसे क्यों पूरी तरह से नष्ट किया था। इससे, हम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जान सकते हैं।

मानवीय दृष्टिकोण से, सदोम ऐसा नगर था जो मनुष्य की इच्छा और मनुष्य की दुष्टता दोनों को पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता था। वह प्रलोभन देने वाला और मोहित करने वाला था, जहाँ हर रात संगीत और नृत्य के साथ, उसकी सम्पन्नता ने मनुष्यों को आकर्षण और उन्माद की और धकेल दिया। बुराई ने लोगों के हृदयों को कलुषित कर दिया और उन्हें मोहित करके पतित कर दिया। यह एक ऐसा नगर था जहां अशुद्ध आत्माएं और दुष्ट आत्माएं बेधड़क मण्डराया करते थे; यह पाप और हत्या से पूरी तरह भरा हुआ था और ख़ूनी एवं सड़े हुए दुर्गन्ध से भरपूर था। यह एक ऐसा नगर था जिसने लोगों की हड्डियों तक को सुन्न कर दिया, एवं एक ऐसा नगर था जिससे कोई भी अपने आपको पीछे खींच लेता। इस नगर में ऐसा कोई नहीं था - न पुरुष और न स्त्री, न जवान और न बुज़ुर्ग - जो सच्चे मार्ग को खोजता था; कोई भी प्रकाश की लालसा नहीं करता था या पाप से दूर जाने की इच्छा नहीं करता था। वे शैतान के नियन्त्रण, भ्रष्टता और धूर्तता में जीवन बिताते थे। उन्होंने अपनी मानवता को खो दिया था; उन्होंने अपनी संवेदनाओं को गवां दिया था, और उन्होंने मनुष्य के अस्तित्व के मूल उद्देश्य को खो दिया था। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध प्रतिरोध के अनगिनित पापों को अंजाम दिया था; उन्होंने उसके मार्गदर्शन को अस्वीकार किया और उसकी इच्छा का विरोध किया था। ये उनके बुरे कार्य थे जिसने इन लोगों को, नगर को, और उसके भीतर के हर एक जीवित प्राणी को कदम दर कदम विनाश के पथ पर नीचे पहुंचा दिया था।

यद्यपि ये दोनों अंश उन विवरणों को दर्ज नहीं करते हैं जो सदोम के लोगों की भ्रष्टता के विस्तार का वर्णन करते हैं, इसके बजाए वे नगर में उनके आगमन के बाद परमेश्वर के दोनों सेवकों के प्रति उनके व्यवहार को दर्ज करते हैं, और एक साधारण सा सत्य प्रकट कर सकता है कि किस हद तक सदोम के लोग भ्रष्ट एवं दुष्ट थे और परमेश्वर का प्रतिरोध करते थे। इसके साथ ही, नगर के लोगों के असली चेहरे और तत्व का भी खुलासा हो जाता है। उन्होंने न केवल परमेश्वर की चेतावनियों को स्वीकार नहीं किया था, बल्कि वे उसके दण्ड से भी नहीं डरते थे। इसके विपरीत, उन्होंने परमेश्वर के कोप का उपहास किया। उन्होंने आंख बंद करके परमेश्वर का प्रतिरोध किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने क्या किया था या उसने इसे कैसे किया था, क्योंकि उनका दुष्ट स्वभाव केवल तेजी से बढ़ता गया था, और उन्होंने लगातार परमेश्वर का विरोध किया था। सदोम के लोग परमेश्वर के अस्तित्व, उसके आगमन, उसके दण्ड, और उससे बढ़कर, उसकी चेतावनियों के विरुद्ध थे। उन्होंने उन सभी लोगों को निगल लिया और नुकसान पहुँचाया जिन्हें निगला और नुकसान पहुँचाया जा सकता था, और उन्होंने परमेश्वर के सेवकों से कोई अलग बर्ताव नहीं किया था। सदोम के लोगों के द्वारा की गई दुष्टता के तमाम कार्यों के लिहाज से, परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुंचना तो बस हिमशैल का ऊपरी छोर था, और इससे जो उनका दुष्ट स्वभाव प्रकट हुआ था वह वास्तव में विशाल समुद्र में पानी की एक बूंद से थोड़ा और बढ़ गया था। इसलिए, परमेश्वर ने उन्हें आग से नष्ट करने का चुनाव किया। परमेश्वर ने नगर को नष्ट करने के लिए बाढ़ का इस्तेमाल नहीं किया, न ही उसने चक्रवात, भूकम्प, सुनामी या किसी और तरीके का इस्तेमाल किया। इस नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल क्या सूचित करता है? इसका अर्थ नगर का सम्पूर्ण विनाश था, इसका अर्थ था कि नगर पूरी तरह से पृथ्वी से और अस्तित्व से लोप हो गया था। यहां, "विनाश" न केवल नगर के आकार और ढांचे या बाहरी रूप के लोप हो जाने की ओर संकेत करता है; बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि पूरी रीति से मिटा दिए जाने के बाद नगर के भीतर के लोगों की आत्माएं भी अस्तित्व में नहीं थे। साधारण रूप से कहें, तो नगर के साथ जुड़े सभी लोगों, घटनाओं और चीज़ों को नष्ट किया गया था। उनके लिए मृत्यु पश्चात् जीवन या पुन:देहधारण नहीं होगा; परमेश्वर ने उन्हें मानवता से, एवं अपनी सृष्टि से हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया था। "आग का इस्तेमाल" गुनाह के विराम को सूचित करता है, और इसका अर्थ है पाप का अंत; यह पाप अस्तित्व में नहीं रहेगा और नहीं फैलेगा; इसका अर्थ था कि शैतान की दुष्टता ने अपनी पोषण भूमि को साथ ही साथ उस कब्रिस्तान को भी खो दिया था जिसने इसे रहने और जीने के लिए एक स्थान प्रदान किया था। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में, परमेश्वर द्वारा आग का इस्तेमाल उसकी विजय की छाप है जिससे शैतान पर छाप की गई है। मनुष्यों को भ्रष्ट और बर्बाद करने के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने के लिए सदोम का विनाश शैतान की महत्वाकांक्षा में एक बहुत भारी चूक है, और उसी प्रकार यह मानवता के विकास के समय में एक अपमानजनक चिन्ह है जब मनुष्य ने परमेश्वर के मार्गदर्शन को ठुकरा दिया था और बुराई के लिए अपने आपका परित्याग किया था। इसके अतिरिक्त, यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के सच्चे प्रकाशन का एक लेख है।

जब उस आग ने जिसे परमेश्वर ने स्वर्ग से भेजा था सदोम को राख में तब्दील कर दिया, तो इसका अर्थ था कि "सदोम" नामक नगर, और उसी प्रकार उस नगर के भीतर की हर चीज़ भी अस्तित्व में नहीं रही। इसे परमेश्वर के क्रोध के द्वारा नष्ट किया गया, यह परमेश्वर के क्रोध और महाप्रताप के अधीन लोप हो गया। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण सदोम को उसका न्यायोचित दण्ड मिला; और परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण, उसे उसका न्यायोचित अंत मिला। सदोम के अस्तित्व का अन्त उसकी बुराई के कारण हुआ, और साथ ही यह इस कारण से भी था क्योंकि परमेश्वर दोबारा इस नगर को, साथ ही साथ किसी भी जन को जो इस नगर में रहता था या किसी भी जीवन को जो इस नगर में पनपा था देखना नहीं चाहता था। परमेश्वर की "इच्छा कि वह दोबारा इस नगर को कभी नहीं देखेगा," यह उसका क्रोध और साथ ही साथ उसका महाप्रताप है।" परमेश्वर ने नगर को जला दिया क्योंकि उसकी बुराई और पाप ने उसे उसके प्रति क्रोध, घृणा और द्वेष का एहसास कराया था और वह उसको या किसी भी इंसान को और जीवित प्राणियों को दोबारा कभी नहीं देखना चाहता था। जब एक बार नगर का जलना समाप्त हो गया, और केवल राख ही रह गया, तो यह सचमुच में परमेश्वर की नज़रों में अस्तित्व में नहीं रहा; यहाँ तक कि उसकी यादें भी चली गईं और मिट गईं। इसका अर्थ है कि वह आग जिसे स्वर्ग से भेजा गया था उसने न केवल सदोम नगर और अधर्म को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था – जो लोगों के भीतर भरा हुआ था, और न केवल उसने नगर के भीतर सभी चीज़ों को नष्ट कर दिया जिन्हें पाप के द्वारा कलंकित कर दिया गया था; बल्कि उससे भी बढ़कर, इस आग ने मानवता की दुष्टता की यादों को और परमेश्वर की प्रति उनके प्रतिरोध को नष्ट कर दिया था। उस नगर को जलाकर राख करने में परमेश्वर का उद्देश्य यही था।

मानवता चरम सीमा तक पतित हो चुकी थी। वे नहीं जानते थे कि परमेश्वर कौन था या वे कहाँ से आए थे। यदि तुम परमेश्वर का जिक्र करते, तो ये लोग हमला कर देते, कलंक लगाते और ईश्वर की निन्दा करते। यहाँ तक कि जब परमेश्वर के सेवक उसकी चेतावनी का प्रचार करने आए थे, तब इन दुष्ट लोगों ने न केवल पश्चाताप को कोई चिन्ह नहीं दिखाया; बल्कि उन्होंने अपने दुष्ट आचरण को भी नहीं त्यागा। इसके विपरीत, उन्होंने ढिठाई से परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुँचाया। जो कुछ उन्होंने उजागर और प्रकट किया था वह उनके स्वभाव और परमेश्वर के प्रति उनकी चरम शत्रुता का तत्व था। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के विरुद्ध इन भ्रष्ट लोगों का प्रतिरोध उनके भ्रष्ट स्वभाव के प्रकाशन से कहीं अधिक था, बिलकुल वैसे ही जैसे यह निंदा और उपहास करने के एक उदहारण से कहीं अधिक था जो सत्य की समझ की कमी से निकला था। न ही मूर्खता और न ही अज्ञानता ने उनके दुष्ट स्वभाव को उत्पन्न किया था; यह इसलिए नहीं था कि इन लोगों को धोखा दिया गया था, और यह तो बिलकुल भी नहीं था कि इन्हें भटकाया गया था। उनका चाल-चलन परमेश्वर के विरुद्ध खुले तौर पर निर्लज्ज शत्रुता, विरोध और उपद्रव के स्तर तक पहुंच चुका था। बिना किसी सन्देह के, इस प्रकार का मानवीय आचरण परमेश्वर को क्रोधित करेगा, और यह उसके स्वभाव को क्रोधित करेगा - एक ऐसा स्वभाव जिसे ठेस नहीं पहुंचना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर ने सीधे और खुले तौर पर अपने क्रोध और अपने प्रताप को जारी किया; यह उसके धर्मी स्वभाव का सच्चा प्रकाशन है। एक ऐसे नगर का सामना करते हुए जो पाप से उमड़ रहा था, परमेश्वर ने जहाँ तक संभव हो उसे अतिशीघ्र नाश करने की इच्छा की थी; वह उसके भीतर लोगों को और उनके सम्पूर्ण पापों को सबसे मुकम्मल रीति से मिटाना, और इस नगर के लोगों के अस्तित्व को समाप्त करना और इस स्थान के भीतर उस पाप को बहुगुणित होने से रोकना चाहता था। ऐसा करने का सबसे तेज और सबसे मुकम्मल तरीका था उसे आग से जलाकर नाश करना। सदोम के लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति एक प्रकार से परित्याग या उपेक्षा नहीं थी; उसके बजाए, उसने इन लोगों को दण्ड देने, मारकर नीचे गिराने और पूरी तरह से नाश करने लिए अपने क्रोध, प्रताप और अधिकार का प्रयोग किया था। उनके प्रति उसकी मनोवृत्ति एक प्रकार से न केवल शारीरिक विनाश की थी किन्तु साथ ही प्राण के विनाश की थी, एक अनंतकालिक विध्वंस। यह उनके "अस्तित्व की समाप्ति के लिए" परमेश्वर की इच्छा का असली आशय है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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