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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग चार

सृष्टिकर्ता के अधिकार को समय, स्थान, या भूगोल द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है, और न ही उसके अधिकारों का मूल्यांकन किया जा सकता है

आओ हम उत्पत्ति 22:17-18 को देखें। यह यहोवा परमेश्वर के द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के बालू के समान अनगिनत करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा। और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगीः क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दी कि उसके वंश के लोग बहुगुणित होंगे - और किस सीमा तक बहुगुणित होंगे? उस सीमा तक जितना पवित्र शास्त्र में लिखा हैः "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के बालू के समान।" कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर अब्राहम को आकाश के तारों के समान अनगिनित, और समुद्र के तीर के रेत के किनकों के समान ढेर सारा वंश देना चाहता था। परमेश्वर ने कल्पना का इस्तेमाल करते हुए कहा था, और इस कल्पना से यह देखना कठिन नहीं है कि परमेश्वर अब्राहम को मात्र एक, दो, या हज़ार वंश नहीं देगा, किन्तु गणना से बाहर, इतना कि वे जातियों का एक समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की थी कि वो बहुत सी जातियों का पिता होगा। और, क्या उस संख्या का निर्धारण मनुष्य द्वारा किया गया था, या परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया गया था? एक मनुष्य के पास जितने वंश होते हैं क्या वह उनको नियन्त्रित कर सकता है? क्या यह उसके बस की बात है? यह मनुष्य के बस की बात भी नहीं है कि वह इस बात का निर्धारण कर सके कि उसके पास अनेक वंश होंगे या उसका अकेले का वंश ही "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के किनकों के समान" होंगे। कौन अपनी संतानों के लिए ऐसी इच्छा न करेगा कि वे तारों के समान अनगिनित हो जाएँ? दुर्भाग्यवश, चीज़ें वैसी घटित नहीं होती हैं जैसा तुम चाहते हो। मनुष्य के कुशल और योग्य होने के बावजूद भी, यह उसके बस की बात नहीं है; कोई भी उस सीमा से बाहर खड़ा नहीं हो सकता है जिसे परमेश्वर द्वारा ठहरा दिया गया है। जितना वह तुम्हें अनुमति देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगाः यदि परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तब तुम्हारे पास कभी भी बहुत ज़्यादा नहीं होगा, और यदि परमेश्वर तुम्हें बहुत ज़्यादा देता है, तो इस में तुम्हें बुरा नहीं मानना चाहिए कि तुम्हारे पास कितना है। क्या ऐसा ही नहीं है? यह सब कुछ परमेश्वर के ऊपर है, मनुष्य के ऊपर नहीं! मनुष्य के ऊपर परमेश्वर द्वारा शासन किया जाता है, और कोई बच नहीं सकता है।

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को....अनगिनित करूँगा," तो यह वह वाचा थी जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधी थी, और "मेघधनुष की वाचा" के समान, इसे अनंतकाल के लिए पूरा किया जाएगा, और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा थी। केवल परमेश्वर ही ऐसी प्रतिज्ञा को पूरा करने में योग्य और सक्षम है। इसके बावजूद कि मनुष्य इस पर विश्वास करता है या नहीं, इसके बावजूद कि मनुष्य इसे स्वीकार करता है या नहीं, और इसके बावजूद कि मनुष्य इसे किस नज़रिए से देखता है, और इसे कितना महत्व देता है, यह सब कुछ परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार शब्दशः पूरा हो जाएगा। मनुष्य की इच्छा और विचारधारा में हुए परिवर्तन के कारण परमेश्वर के वचनों को बदला नहीं जाएगा, और न ही किसी व्यक्ति, और किसी वस्तु या तत्व में हुए बदलाव के द्वारा इसे पलटा जाएगा। सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन सर्वदा बने रहेंगे। इसके विपरीत, जिस दिन सभी चीज़ें विलुप्त हो जाएँगी यह बिलकुल वही दिन होगा जब परमेश्वर के वचन सम्पूर्ण रीति से पूरे हो जाएँगे, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, और उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है, और सृष्टिकर्ता की सामर्थ है, और वह सब वस्तुओं और सम्पूर्ण जीवन शक्ति को नियन्त्रित करता है; वह शून्य से कुछ भी बना सकता है, या कुछ भी को शून्य बना सकता है, और वह जीवितों से लेकर मुर्दों तक सभी चीज़ों के रूपान्तरण को नियन्त्रित करता है, और इस प्रकार परमेश्वर के लिए, किसी व्यक्ति के वंश को बहुगुणित करने से अधिक आसान कुछ भी नहीं हो सकता है। यह मनुष्य को परियों की कहानी के समान बहुत बढ़िया सुनाई देता है, परन्तु जब परमेश्वर किसी कार्य को करने का निर्णय ले लेता है, और उसे करने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह काल्पनिक नहीं है और न ही परियों की कहानी है। उसके बजाए यह एक सच्चाई है जिसे परमेश्वर ने पहले से ही देख लिया है, और वह निश्चय घटित होगा। क्या तुम लोग इसकी तारीफ करते हो? क्या ये तथ्य प्रमाणित करते हैं कि अब्राहम के वंश अनगिनित थे? और कितने अनगिनित? "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के बालू के समान" इतने अनगिनित जितना परमेश्वर के द्वारा कहा गया था? क्या वे सब जातियों और प्रदेशों में, या संसार में हर जगह फैल गए थे? और इस तथ्य को किसने पूरा किया था? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा पूरा किया गया था? परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद, सैकड़ों और हज़ारों सालों से परमेश्वर के वचन लगातार पूरे होते गए, और निरन्तर प्रमाणित तथ्य बन रहे हैं; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति, और परमेश्वर के अधिकार की पहचान है। जब परमेश्वर ने आदि में सब वस्तुओं की सृष्टि की, परमेश्वर ने कहा उजियाला हो, और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्द ही हो गया, और बहुत कम समय में ही पूरा हो गया, और उसकी प्राप्ति और सम्पूर्णता में कोई देरी नहीं हुई थी; परमेश्वर के वचन के प्रभाव त्वरित थे। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, परन्तु जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दी, तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार की हस्ती के दूसरे पहलू को देखने की मंजूरी दी, और उसने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार की बहुमूल्यता को देखने की अनुमति दी, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक अधिक वास्तविक, अति उत्तम पहलू देखने का अवसर प्रदान किया।

जब एक बार परमेश्वर के वचन बोल दिए जाते हैं, परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है, और वह तथ्य जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर के मुँह के द्वारा की गई थी धीर धीरे वास्तविक बनना प्रारम्भ हो जाता है। परिणामस्वरूप सभी चीज़ों में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिलने लग जाते हैं, पेड़ों में कोपलें फूटने लग जाती हैं, पक्षी गाना शुरू कर देते हैं, कालहँस लौट आते हैं, मैदान लोगों से भर जाता है....। बसंत के आगमन के साथ ही सभी चीज़ें नई हो जाती हैं, और यह सृष्टिकर्ता का आश्चर्यकर्म है। जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है, स्वर्ग और पृथ्वी में सब वस्तुएँ परमेश्वर के वचन के अनुसार नई हो जाती हैं और बदल जाते हैं - कोई भी इससे अछूता नहीं रहता है। जब परमेश्वर के मुँह से समर्पण और प्रतिज्ञा के वचनों को बोल दिया जाता है, सभी चीज़ें उसे पूरा करने के लिए कार्य करती हैं, और उसकी पूर्णता के लिए कुशलता से कार्य करते हैं, और सभी जीवधारियों को सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन सावधानी से प्रदर्शित और क्रमागत किया जाता है, और वे अपनी अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं, और अपने अपने कार्य को करते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रकटीकरण है। तुम इस में क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानोगे? क्या परमेश्वर के अधिकार का एक दायरा है? क्या कोई समय सीमा है? क्या इसे एक निश्चित ऊँचाई, या एक निश्चित लम्बाई तक कहा जा सकता है? क्या इसे किसी निश्चित आकार या बल के तहत कहा जा सकता है? क्या इसे मनुष्य के आयामों के द्वारा नापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार रूक रूककर जगमगाता नहीं है, आता जाता नहीं, और कोई नहीं है जो यह नाप सके कि उसका अधिकार कितना महान है। इसके बावजूद कि कितना समय बीत चुका है, जब परमेश्वर एक मनुष्य को आशीष देता है, तो यह आशीष बनी रहेगी, और इसकी निरन्तरता परमेश्वर के अधिकार की बहुमूल्यता की गवाही को धारण किए हुए है, और मानवजाति को परमेश्वर के पुनः प्रकट होने वाले और कभी न बुझनेवाली जीवन शक्ति को बार बार देखने की अनुमति देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रकटीकरण उसके मुँह के वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है, और इसे सब वस्तुओं और मानवजाति के सामने प्रदर्शित किया गया है। इससे अधिक क्या, उसके अधिकार के द्वारा प्राप्त सब कुछ तुलना से परे उत्कृष्ट है, और उस में कुछ भी दोष नहीं है। दूसरे शब्दों में उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार, और सभी कार्य जो उसने पूरा किया है वे अतुल्य रूप से एक सुन्दर तस्वीर हैं, जहाँ तक जीवधारियों की बात है, वह मानवजाति की भाषा उसके महत्व और मूल्य के स्पष्ट उच्चारण में असमर्थ है। जब परमेश्वर एक व्यक्ति से प्रतिज्ञा करता है, तो चाहे वे जहाँ भी रहते हों, या जो भी करते हों, प्रतिज्ञा को प्राप्त करने के पहले या उसके बाद की उनकी पृष्ठभूमि, या उनके रहने के वातावरण में चाहे जितने बड़े उतार चढ़ाव आए हों - यह सब कुछ परमेश्वर के लिए उतने ही चिरपरिचित हैं जितना उसके हाथ का पिछला भाग। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर के वचनों को कहने के बाद कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, उसके लिए यह ऐसा है मानो उन्हें अभी अभी बोला गया है। दूसरे शब्दों में परमेश्वर के पास सामर्थ है और उसके पास ऐसा अधिकार है, जिससे वह हर एक प्रतिज्ञा की जो वह मानवजाति के साथ करता है, लगातार सुधि ले सकता है, नियन्त्रण कर सकता है और उनका एहसास कर सकता है, इसके बावजूद कि प्रतिज्ञा क्या है, इसके बावजूद कि इसे सम्पूर्ण रीति से पूरा होने में कितना लम्बा समय लगता है, और, इसके अतिरिक्त, इसके बावजूद कि उसका दायरा कितना व्यापक है जिस पर उसकी परिपूर्णता असर डालती है - उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, जाति, इत्यादि - इस प्रतिज्ञा को पूरा किया जाएगा, और इसका एहसास किया जाएगा, और, इसके आगे, उसके पूर्ण होने या एहसास करने में उसे ज़रा सी भी कोशिश करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे क्या साबित होता है? यह कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ की व्यापकता सम्पूर्ण विश्व, और सम्पूर्ण मानवजाति को नियन्त्रित करने के लिए काफी है। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल उजियाले का ही प्रबन्ध करता है, या यह कि वह केवल जल का ही प्रबन्ध करता है क्योंकि उसने जल को सृजा, और बाकी सब कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह ग़लतफहमी नहीं है? यद्यपि सैकड़ों सालों बाद अब्राहम के लिए परमेश्वर की आशीषें धीरे धीरे मनुष्य की यादों में धूमिल हो चुकी थीं, फिर भी परमेश्वर के लिए वह प्रतिज्ञा जस की तस बनी रही। यह तब भी पूरा होने की प्रक्रिया में था, और कभी रूका नहीं था। मनुष्य ने न तो कभी जाना और न सुना कि परमेश्वर ने किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया था, और किस प्रकार सभी चीज़ों को प्रदर्शित और क्रमागत किया था, और इस समय के दौरान परमेश्वर द्वारा सब वस्तुओं की सृष्टि के बीच कितनी ढेर सारी कहानियाँ घटित हुईं थीं, किन्तु परमेश्वर के अधिकार के प्रकटीकरण और उसके कार्यों के प्रकाशन के प्रत्येक बेहतरीन अंश को सभी चीज़ों तक पहुँचाया गया और उनके बीच महिमावान्वित किया गया था, सब वस्तुएँ सृष्टिकर्ता के अद्भुत कार्यों को दिखाते और उनके बारे में बात करते थे, और सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की प्रत्येक लोकप्रिय कहानी को सभी चीज़ों के द्वारा सर्वदा घोषित किया जाएगा। वह अधिकार जिस के तहत परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, और परमेश्वर की सामर्थ, सभी चीज़ें को दिखाते हैं कि परमेश्वर सभी समयों में हर जगह उपस्थित है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ की सर्वउपस्थिति के साक्षी बन जाते हो, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर सभी समयों में हर जगह उपस्थित है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ समय, भूगोल, स्थान, या किसी व्यक्ति, तत्व या वस्तु की विवशता से अलग है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ की व्यापकता मनुष्य की कल्पनाओं से श्रेष्ठ हैः यह मनुष्य के लिए अथाह है, मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और इसे कभी भी मनुष्य के द्वारा पूरी तरह जाना नहीं जा सकता है।

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना चाहते हैं, परन्तु एक मनुष्य की कल्पनाएँ कहाँ तक पहुँच सकती हैं? क्या वह इस संसार के परे जा सकती हैं? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रमाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य के अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने की अनुमति दे सकते हैं? क्या वे मनुष्य से परमेश्वर के अधिकार की सचमुच में तारीफ और उसके प्रति समर्पण करवा सकते हैं? तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि मनुष्य के अनुमान और कल्पना मात्र मनुष्य की बुद्धिमत्ता का फल है, और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार को जानने में ज़रा सी भी मदद या लाभ नहीं पहुँचाते हैं। विज्ञान की कल्पनाओं को पढ़ने के बाद, कुछ लोग चन्द्रमा, और तारे किस प्रकार दिखते हैं उसकी कल्पना कर सकते हैं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य के पास परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना बस ऐसी ही हैः कोरी कल्पना। इन वस्तुओं के तथ्यों के विषय में, दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के विषय में, उसके पास बिलकुल भी समझ़ नहीं है। अतः क्या हुआ यदि तुम चन्द्रमा में गए हो? क्या इससे यह साबित हो जाता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दिखाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? जबकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने की मंजूरी देने में असमर्थ है, तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है, मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा, और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ, परमेश्वर की स्वयं की पहचान, और परमेश्वर की हस्ती को तुम्हारी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो। तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के द्वारा, संगति के द्वारा, और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों के द्वारा, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़नेवाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया जाए, या तुम सबको कुछ करने से रोका जाए। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, परन्तु इसके बजाए प्रशंसा करना, जाँच करना, और प्रमाणित करना है कि वह परमेश्वर जिसमें तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है, और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता करता है, और यह कि उसकी सामर्थ ने सभी समयों में यह साबित किया है परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सच्चाई के द्वारा, उन सब के द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही वह एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं हैः और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानें और प्रमाणित करें। क्या यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है? क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है - परन्तु वास्तविक है।

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परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
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