स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग दो

2. परमेश्वर मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है

उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे : और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है : मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजें बनाए जाने के बाद उसका अधिकार एक बार फिर इंद्रधनुष की वाचा में पुष्ट किया जाता और दिखाया जाता है

सृष्टिकर्ता का अधिकार सभी प्राणियों के बीच हमेशा दिखाया और प्रयुक्त किया जाता है, और सृष्टिकर्ता न केवल सभी चीजों की नियति पर शासन करता है, बल्कि मनुष्य पर भी शासन करता है, जो वह विशेष प्राणी है जिसे उसने अपने हाथों से सृजित किया और जिसकी एक अलग जीवन-संरचना है और जिसका जीवन के एक अलग रूप में अस्तित्व है। सभी चीजें बनाने के बाद सृष्टिकर्ता ने अपना अधिकार और सामर्थ्य व्यक्त करना बंद नहीं किया; उसके लिए वह अधिकार, जिसके द्वारा उसने सभी चीजों पर और संपूर्ण मानव-जाति की नियति पर संप्रभुता रखी, औपचारिक रूप से तभी शुरू हुआ, जब मानव-जाति ने वास्तव में उसके हाथों से जन्म लिया। उसका इरादा मानव-जाति का प्रबंधन करना और उस पर शासन करना था; उसका इरादा मानव-जाति को बचाना और उसे वास्तव में प्राप्त करना, ऐसी मानव-जाति को प्राप्त करना था जो सभी चीजों पर नियंत्रण कर सके; उसका इरादा ऐसी मानव-जाति को अपने अधिकार में रखने, उससे अपना अधिकार ज्ञात करवाकर उसका पालन करवाने का था। इसलिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल करके अपना अधिकार मनुष्यों के बीच आधिकारिक रूप से व्यक्त करना और अपने वचन साकार करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारंभ किया। बेशक, इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर का अधिकार सभी स्थानों पर दिखाया गया; मैंने केवल कुछ विशिष्ट, जाने-माने उदाहरण चुने हैं, जिनसे तुम लोग परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अद्वितीय अधिकार को समझ और जान सकते हो।

उत्पत्ति 9:11-13 में दिए गए अंश और ऊपर दिए गए अंशों में परमेश्वर द्वारा दुनिया के सृजन के अभिलेख के संबंध में एक समानता है, लेकिन एक अंतर भी है। समानता क्या है? समानता यहाँ है कि परमेश्वर ने जो करने का इरादा किया, उसे करने के लिए उसने अपने वचनों का उपयोग किया, और अंतर यह है कि यहाँ उद्धृत अंश परमेश्वर की मनुष्य के साथ बातचीत दर्शाते हैं, जिसमें उसने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधी और मनुष्य को वह बताया जो वाचा में निहित था। मनुष्य के साथ उसके संवाद के दौरान परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया गया, जिसका अर्थ है कि मानव-जाति के सृजन से पहले, परमेश्वर के वचन निर्देश और आदेश थे, जो उन प्राणियों को जारी किए गए थे जिन्हें वह सृजित करने का इरादा रखता था। लेकिन अब परमेश्वर के वचनों को सुनने वाला कोई था, इसलिए उसके वचन मनुष्य के साथ संवाद और मनुष्य के लिए उपदेश और चेतावनी दोनों थे। इसके अलावा, परमेश्वर के वचन वे आज्ञाएँ थीं, जो उसके अधिकार को धारण करती थीं और जो सभी चीजों को दी गई थीं।

इस अंश में परमेश्वर का कौन-सा कार्य दर्ज है? यह अंश उस वाचा को दर्ज करता है, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के साथ दुनिया को जलप्रलय से नष्ट करने के बाद बाँधा था; यह मनुष्य को बताती है कि परमेश्वर इस तरह का विनाश फिर से दुनिया पर नहीं ढाएगा, और इस उद्देश्य से परमेश्वर ने एक चिह्न बनाया। वह चिह्न क्या था? पवित्रशास्त्र में यह कहा गया है कि "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति से बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने ये वचन कहे, मनुष्य की आँखों के सामने एक इंद्रधनुष प्रकट हो गया, और वह आज तक वहीं बना हुआ है। वह इंद्रधनुष हर किसी ने देखा है, और जब तुम इसे देखते हो, तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसा दिखता है? विज्ञान इसे साबित करने या इसके स्रोत का पता लगाने या इसका अता-पता बताने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इंद्रधनुष सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच बाँधी गई वाचा का चिह्न है; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, इसे मनुष्य ने नहीं बनाया, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। यह सृष्टिकर्ता द्वारा अपने वचन बोलने के बाद उसके अधिकार की निरंतरता है। सृष्टिकर्ता ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा और अपने वादे का पालन करने के लिए अपने विशेष तरीके का उपयोग किया, और इसलिए उसके द्वारा बाँधी गई उस वाचा के चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग एक स्वर्गिक आदेश और व्यवस्था है, जो हमेशा अपरिवर्तित रहेगी, चाहे सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानव-जाति के संबंध में। कहना होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था सभी चीजों के सृजन के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार की एक और सच्ची अभिव्यक्ति है, और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्य असीमित हैं; उसके द्वारा एक चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरंतरता और उसका विस्तार है। यह परमेश्वर द्वारा अपने वचनों का उपयोग करके किया गया एक और कार्य था, और यह उस वाचा का चिह्न था जिसे परमेश्वर ने वचनों का उपयोग करके मनुष्य के साथ बाँधा था। उसने मनुष्य को उस बारे में बताया, जिसे करने का उसने संकल्प किया था, और यह भी कि उसे किस तरीके से पूरा और हासिल किया जाएगा। इस प्रकार परमेश्वर के मुख से निकले वचनों के अनुसार मामला पूरा हुआ। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्य है, और आज, उसके ये वचन कहे जाने के हजारों वर्ष बाद भी, मनुष्य परमेश्वर के मुख से उच्चरित इंद्रधनुष देख सकता है। परमेश्वर द्वारा कहे गए उन वचनों के कारण यह चीज आज तक अचल और अपरिवर्तित बनी हुई है। कोई इस इंद्रधनुष को हटा नहीं सकता, कोई इसकी व्यवस्थाएँ नहीं बदल सकता, और यह केवल परमेश्वर के वचनों के कारण मौजूद है। यही परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन का पक्का है, और उसका वचन पूरा होगा, और जो वह पूरा करता है वह हमेशा के लिए रहता है।" ये वचन यहाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का एक स्पष्ट चिह्न और विशेषता है। ऐसा चिह्न या विशेषता किसी भी सृजित प्राणी में मौजूद नहीं है या उसमें नजर नहीं आती और न ही किसी गैर-सृजित प्राणी में देखी जाती है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर में है, और केवल सृष्टिकर्ता में मौजूद पहचान और सार को प्राणियों की पहचान और सार से अलग करता है। साथ ही, यह एक चिह्न और विशेषता भी है जिसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा कभी लाँघा नहीं जा सकता।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के साथ अपनी वाचा बाँधना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य था, ऐसा कार्य जिसका उपयोग वह मनुष्य को एक तथ्य संप्रेषित करने और उसे अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए एक विशेष चिह्न का उपयोग करते हुए एक अनोखी विधि इस्तेमाल की, एक चिह्न जो उस वाचा का वादा था जिसे उसने मनुष्य के साथ बाँधा था। तो क्या यह वाचा बाँधना एक महान घटना थी? यह कितनी महान थी? इस वाचा की खास बात यह है : यह दो आदमियों, दो समूहों या दो देशों के बीच बाँधी गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और पूरी मानव-जाति के बीच बाँधी गई वाचा है, और यह उस दिन तक वैध रहेगी, जब तक कि सृष्टिकर्ता सभी चीजें समाप्त नहीं कर देता। इस वाचा को बाँधने वाला सृष्टिकर्ता है, और इसे कायम रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानव-जाति के साथ बाँधी गई इंद्रधनुष रूपी वाचा संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच हुए संवाद के अनुसार पूरी और हासिल की गई थी, जो आज तक बरकरार है। सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित होने, उसकी आज्ञा मानने, उस पर विश्वास करने, उसे सराहने, उसकी गवाही देने और उसकी स्तुति करने के अलावा प्राणी और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और में ऐसी वाचा बाँधने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना मानव-जाति के लिए एक घोषणा है और वह उसका ध्यान सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा की ओर आकर्षित करता है। सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा के निरंतर प्रकट होने से जो कुछ मानव-जाति को प्रदर्शित किया जाता है, वह स्वयं इंद्रधनुष या वाचा नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता का अपरिवर्तनीय अधिकार है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना, छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के जबरदस्त और चमत्कारपूर्ण कर्म प्रदर्शित करता है, और साथ ही, यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है जो कभी मिटेगा नहीं, और न कभी बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक दूसरे पहलू का प्रदर्शन नहीं है?

3. परमेश्वर के आशीष

उत्पत्ति 17:4-6 देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

उत्पत्ति 18:18-19 अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

उत्पत्ति 22:16-18 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

अय्यूब 42:12 यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

सृष्टिकर्ता के कथनों का अद्वितीय तरीका और विशेषताएँ सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान और उसके अधिकार की प्रतीक हैं

बहुत-से लोग परमेश्वर के आशीष खोजना और पाना चाहते हैं, लेकिन हर कोई ये आशीष प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर के अपने सिद्धांत हैं, और वह मनुष्य को अपने तरीके से आशीष देता है। परमेश्वर मनुष्य से जो वादे करता है, और वह जितना अनुग्रह मनुष्य को देता है, वह मनुष्य के विचारों और कार्यों के आधार पर आवंटित किया जाता है। तो, परमेश्वर के आशीषों से क्या दिखता है? लोग उनके भीतर क्या देख सकते हैं? इस समय, हम इस बात की चर्चा अलग रखते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को आशीष देता है, और मनुष्य को आशीष देने के परमेश्वर के क्या सिद्धांत हैं। इसके बजाय आओ, हम परमेश्वर के अधिकार को जानने के उद्देश्य से, परमेश्वर के अधिकार को जानने के दृष्टिकोण से, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आशीष दिए जाने को देखते हैं।

पवित्रशास्त्र के उपर्युक्त चारों अंश परमेश्वर के मनुष्य को आशीष देने के अभिलेख हैं। वे अब्राहम और अय्यूब जैसे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने वालों का विस्तृत विवरण प्रदान करते हैं, साथ ही उन कारणों के बारे में भी बताते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें आशीष क्यों दिए, और इस बारे में भी कि इन आशीषों में क्या शामिल था। परमेश्वर के कथनों का लहजा और तरीका, और वह परिप्रेक्ष्य और स्थिति जिससे वह बोला, लोगों को यह समझने देता है कि आशीष देने वाले और आशीष पाने वाले की पहचान, हैसियत और सार स्पष्ट रूप से अलग हैं। इन कथनों का लहजा और ढंग, और जिस स्थिति से वे बोले गए थे, वे अद्वितीय रूप से परमेश्वर के हैं, जिसकी पहचान सृष्टिकर्ता की है। उसके पास अधिकार और शक्ति है, साथ ही सृष्टिकर्ता का सम्मान और प्रताप भी है, जो किसी व्यक्ति द्वारा संदेह किया जाना बरदाश्त नहीं करता।

आओ पहले हम उत्पत्ति 17:4-6 देखें : "देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।" ये वचन वह वाचा थे, जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था, साथ ही यह अब्राहम को परमेश्वर का आशीष भी था : परमेश्वर अब्राहम को जातियों के समूह का मूलपिता बनाएगा, उसे अत्यंत फलवंत करेगा, और उसे जाति-जाति का मूल बनाएगा, और उसके वंश में राजा उत्पन्न होंगे। क्या तुम इन वचनों में परमेश्वर का अधिकार देखते हो? और तुम ऐसे अधिकार को कैसे देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार के सार का कौन-सा पहलू देखते हो? इन वचनों को ध्यान से पढ़ने से, यह पता लगाना कठिन नहीं है कि परमेश्वर का अधिकार और पहचान परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर कहता है "मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू ... हो जाएगा। ... मैं ने तुझे ठहरा दिया ... मैं तुझे बनाऊँगा...," तो "तू हो जाएगा" और "मैं बनाऊँगा" जैसे वाक्यांश, जिनके शब्दों में परमेश्वर की पहचान और अधिकार निहित है, एक दृष्टि से सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता का संकेत हैं; तो दूसरी दृष्टि से, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए विशेष वचन हैं, जिनमें सृष्टिकर्ता की पहचान है—साथ ही वे परंपरागत शब्दावली का हिस्सा हैं। अगर कोई कहता है कि वह आशा करता है कि दूसरा व्यक्ति अत्यंत फलवंत हो, उसे जाति-जाति का मूल बनाया जाए, और उसके वंश में राजा उत्पन्न हों, तो यह निस्संदेह एक तरह की इच्छा है, कोई वादा या आशीष नहीं। इसलिए, लोग यह कहने की हिम्मत नहीं करते कि "मैं तुम्हें फलाँ-फलाँ बनाऊँगा, तुम फलाँ-फलाँ होगे..." क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास ऐसा सामर्थ्य नहीं है; यह उन पर निर्भर नहीं है, और अगर वे ऐसी बातें कहते भी हैं, तो उनके शब्द उनकी इच्छा और महत्वाकांक्षा से प्रेरित कोरी बकवास होंगे। अगर किसी को लगता है कि वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, तो क्या वह इतने भव्य स्वर में बोलने की हिम्मत करता है? हर कोई अपने वंशजों के लिए शुभ कामना करता है, और आशा करता है कि वे उत्कृष्टता प्राप्त करें और बड़ी सफलता का आनंद लें। "उनमें से किसी का सम्राट बनना कितना बड़ा सौभाग्य होगा! अगर कोई राज्यपाल होता, तो वह भी अच्छा होता—बस वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हों!" ये सभी लोगों की इच्छाएँ हैं, लेकिन लोग केवल अपने वंशजों के लिए आशीषों की कामना ही कर सकते हैं, लेकिन अपने किसी भी वादे को पूरा या साकार नहीं कर सकते। अपने दिल में हर कोई स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके पास ऐसी चीजें हासिल करने का सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके बारे में हर चीज उसके नियंत्रण से बाहर है, इसलिए वे दूसरों के भाग्य को नियंत्रित कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर इस तरह के वचन इसलिए कह सकता है, क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है, और वह मनुष्य से किए गए सभी वादे पूरे और साकार करने और मनुष्य को दिए गए सभी आशीष साकार करने में सक्षम है। मनुष्य को परमेश्वर ने सृजित किया था, और परमेश्वर के लिए किसी मनुष्य को अत्यंत फलवंत बनाना बच्चों का खेल होगा; किसी के वंशजों को समृद्ध बनाने के लिए सिर्फ उसके एक वचन की आवश्यकता होगी। उसे खुद कभी ऐसी चीज के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ेगा, या अपने दिमाग को तकलीफ नहीं देनी पड़ेगी, या इसके लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा; यही है परमेश्वर का सामर्थ्य, यही है परमेश्वर का अधिकार।

उत्पत्ति 18:18 में "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी" पढ़ने के बाद क्या तुम लोग परमेश्वर का अधिकार महसूस कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की असाधारणता अनुभव कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता अनुभव कर सकते हो? परमेश्वर के वचन पक्के हैं। परमेश्वर ऐसे वचन सफलता में विश्वास होने के कारण या उसे दर्शाने के लिए नहीं कहता; बल्कि वे परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं, और एक आज्ञा हैं जो परमेश्वर के कथन पूरे करती है। यहाँ दो अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है, "अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी," तो क्या इन वचनों में अस्पष्टता का कोई तत्त्व है? क्या चिंता का कोई तत्त्व है? क्या डर का कोई तत्त्व है? परमेश्वर के कथनों में "निश्चय उपजेगी" और "आशीष पाएँगी" शब्दों के कारण ये तत्त्व, जो मनुष्य में विशेष रूप से होते हैं और अक्सर उसमें प्रदर्शित होते हैं, इनका सृष्टिकर्ता से कभी कोई संबंध नहीं रहा है। दूसरों के लिए शुभ कामना करते हुए कोई भी ऐसे शब्दों का उपयोग करने की हिम्मत नहीं करेगा, कोई भी दूसरे को ऐसी निश्चितता के साथ आशीष देने की हिम्मत नहीं करेगा कि उससे एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, या यह वादा नहीं करेगा कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने ज्यादा निश्चित होते हैं, उतना ही ज्यादा वे कुछ साबित करते हैं—और वह कुछ क्या है? वे साबित करते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है कि उसका अधिकार ये चीजें पूरी कर सकता है, और कि उनका पूरा होना अपरिहार्य है। परमेश्वर ने अब्राहम को जो आशीष दिए थे, उन सबके बारे में वह अपने हृदय में, बिना किसी झिझक के निश्चित था। इसके अलावा, यह उसके वचनों के अनुसार समग्र रूप से पूरा किया जाएगा, और कोई भी ताकत इसके पूरा होने को बदलने, बाधित करने, बिगाड़ने या अवरुद्ध करने में सक्षम नहीं होगी। चाहे और कुछ भी हो जाए, कुछ भी परमेश्वर के वचनों के पूरा और साकार होने को निरस्त या प्रभावित नहीं कर सकता। यह सृष्टिकर्ता के मुख से निकले वचनों का ही सामर्थ्य और सृष्टिकर्ता का अधिकार है, जो मनुष्य का इनकार सहन नहीं करता! इन वचनों को पढ़ने के बाद, क्या तुम्हें अभी भी संदेह है? ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले थे, और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार, और तथ्य के पूरा होने की अनिवार्यता, किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है, और कोई सृजित या गैर-सृजित प्राणी इससे आगे नहीं निकल सकता। केवल सृष्टिकर्ता ही मानव-जाति के साथ ऐसे लहजे और स्वर में बात कर सकता है, और तथ्यों ने यह साबित कर दिया है कि उसके वादे खोखले वचन या बेकार की डींग नहीं होते, बल्कि अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति होते हैं, जिससे श्रेष्ठ कोई भी व्यक्ति, घटना या चीज नहीं हो सकती।

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और मनुष्य द्वारा बोले गए वचनों में क्या अंतर है? जब तुम परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों को पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के अधिकार को महसूस करते हो। जब तुम लोगों को ऐसे वचन कहते सुनते हो, तो तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें नहीं लगता कि वे बेहद अहंकारी हैं और शेखी बघारते हैं, ऐसे लोग हैं जो दिखावा कर रहे हैं? क्योंकि उनके पास यह सामर्थ्य नहीं है, उनके पास ऐसा अधिकार नहीं है, इसलिए वे ऐसी चीजें हासिल करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। उनका अपने वादों को लेकर इतना आश्वस्त होना केवल उनकी टिप्पणियों की लापरवाही दर्शाता है। अगर कोई ऐसे वचन कहता है, तो वह निस्संदेह अहंकारी और अति-आत्मविश्वासी होगा, और खुद को प्रधान दूत के स्वभाव के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रकट करेगा। ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले थे; क्या तुम यहाँ अहंकार का कोई तत्त्व महसूस करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन केवल एक मजाक हैं? परमेश्वर के वचन अधिकार हैं, परमेश्वर के वचन तथ्य हैं, और उसके मुँह से वचन निकलने से पहले, यानी जब वह कुछ करने का फैसला कर रहा होता है, तो वह चीज पहले ही पूरी हो चुकी होती है। कहा जा सकता है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, वह परमेश्वर द्वारा अब्राहम के साथ बाँधी गई एक वाचा थी, परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किया गया एक वादा था। यह वादा एक स्थापित तथ्य था, साथ ही एक पूरा किया गया तथ्य भी था, और ये तथ्य परमेश्वर की योजना के अनुसार परमेश्वर के विचारों में धीरे-धीरे पूरे हुए। इसलिए, परमेश्वर द्वारा ऐसे वचन कहे जाने का यह अर्थ नहीं है कि उसका स्वभाव अहंकारी है, क्योंकि परमेश्वर ऐसी चीजें हासिल करने में सक्षम है। उसके पास यह सामर्थ्य और अधिकार है, और वह ये कार्य करने में पूरी तरह से सक्षम है, और उनका पूरा होना पूरी तरह से उसकी क्षमता के दायरे के भीतर है। जब इस तरह के वचन परमेश्वर के मुख से बोले जाते हैं, तो वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव का प्रकाशन और अभिव्यक्ति होते हैं, परमेश्वर के सार और अधिकार का एक पूर्ण प्रकाशन और अभिव्यक्ति, और सृष्टिकर्ता की पहचान के प्रमाण के रूप में इससे ज्यादा सही और उपयुक्त कुछ नहीं होता। इस तरह के कथनों का ढंग, लहजा और शब्द सटीक रूप से सृष्टिकर्ता की पहचान की निशानी हैं, और पूर्ण रूप से परमेश्वर की पहचान की अभिव्यक्ति के अनुरूप हैं; उनमें न तो ढोंग है, न अशुद्धता; वे पूरी तरह से और सरासर सृष्टिकर्ता के सार और अधिकार का पूर्ण प्रदर्शन हैं। जहाँ तक प्राणियों का संबंध है, उनके पास न तो यह अधिकार है, न ही यह सार, उनके पास परमेश्वर द्वारा दिया गया सामर्थ्य तो बिलकुल भी नहीं है। अगर मनुष्य इस तरह का व्यवहार प्रकट करता है, तो यह निश्चित रूप से उसके भ्रष्ट स्वभाव का विस्फोट होगा, और इसके मूल में मनुष्य के अहंकार और जंगली महत्वाकांक्षा का हस्तक्षेपकारी प्रभाव होगा, और वह किसी और के नहीं बल्कि उस शैतान के दुर्भावनापूर्ण इरादों का खुलासा होगा, जो लोगों को धोखा देना और उन्हें परमेश्वर को धोखा देने के लिए फुसलाना चाहता है। ऐसी भाषा से जो प्रकट होता है, उसे परमेश्वर कैसे देखता है? परमेश्वर कहेगा कि तुम उसका स्थान हड़पना चाहते हो और तुम उसका रूप धरना और उसकी जगह लेना चाहते हो। जब तुम परमेश्वर के कथनों के लहजे की नकल करते हो, तो तुम्हारा इरादा लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान लेने का होता है, उस मानव-जाति को हड़पने का होता है जो जायज तौर पर परमेश्वर की है। यह शुद्ध और स्पष्ट रूप से शैतान है; ये प्रधान दूत के वंशजों के कार्य हैं, जो स्वर्ग के लिए असहनीय हैं! क्या तुम लोगों में से कोई है, जिसने लोगों को गुमराह करने और धोखा देने के इरादे से कुछ शब्द बोलकर एक तरीके से परमेश्वर की नकल की है और उन्हें यह महसूस करवाया है कि इस व्यक्ति के वचनों और कार्यों में परमेश्वर का अधिकार और शक्ति है, इस व्यक्ति का सार और पहचान अद्वितीय है, यहाँ तक कि इस व्यक्ति के वचनों का स्वर परमेश्वर के समान है? क्या तुम लोगों ने कभी ऐसा कुछ किया है? क्या तुमने कभी अपनी बोलचाल में ऐसे हाव-भावों के साथ परमेश्वर के स्वर की नकल की है, जो कथित रूप से परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं और जिन्हें तुम पराक्रम और अधिकार मानते हो? क्या तुम लोगों में से ज्यादातर अक्सर इस तरह से कार्य करते या कार्य करने की योजना बनाते हैं? अब, जबकि तुम लोग वास्तव में सृष्टिकर्ता के अधिकार को देखते, समझते और जानते हो, और याद करते हो कि तुम लोग क्या किया करते थे, और अपने बारे में क्या प्रकट किया करते थे, तो क्या तुम्हें खुद से नफरत होती है? क्या तुम लोग अपनी नीचता और निर्लज्जता पहचानते हो? ऐसे लोगों के स्वभाव और सार का विश्लेषण करने के बाद, क्या यह कहा जा सकता है कि वे नरक की शापित संतान हैं? क्या यह कहा जा सकता है कि ऐसा करने वाला हर व्यक्ति अपना अपमान करवा रहा है? क्या तुम लोग इसकी प्रकृति की गंभीरता समझते हो? आखिर यह कितना गंभीर है? इस तरह से कार्य करने वाले लोगों का इरादा परमेश्वर की नकल करना होता है। वे परमेश्वर बनना चाहते हैं, लोगों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाना चाहते हैं। वे लोगों के दिलों से परमेश्वर का स्थान मिटाना चाहते हैं, और उस परमेश्वर से छुटकारा पाना चाहते हैं जो मनुष्यों के बीच कार्य करता है, और वे ऐसा लोगों को नियंत्रित करने, उन्हें निगलने और उन पर अधिकार करने का उद्देश्य हासिल करने के लिए करते हैं। हर किसी के अवचेतन में इस तरह की इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ होती हैं, और हर कोई इस तरह के भ्रष्ट शैतानी सार में जीता है, ऐसी शैतानी प्रकृति में, जिसमें वे परमेश्वर के साथ दुश्मनी रखते हैं, परमेश्वर को धोखा देते हैं, और परमेश्वर बनना चाहते हैं। परमेश्वर के अधिकार के विषय पर मेरी संगति के बाद, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर का रूप धरने या उसकी नकल करने की इच्छा या आकांक्षा रखते हो? क्या तुम अभी भी परमेश्वर बनने की इच्छा रखते हो? क्या तुम अभी भी परमेश्वर बनना चाहते हो? मनुष्य द्वारा परमेश्वर के अधिकार की नकल नहीं की जा सकती, और मनुष्य परमेश्वर की पहचान और हैसियत का रूप नहीं धर सकता। भले ही तुम परमेश्वर के स्वर की नकल करने में सक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर के सार की नकल नहीं कर सकते। भले ही तुम परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने और परमेश्वर का रूप धरने में सक्षम हो, लेकिन तुम कभी वह करने में सक्षम नहीं होगे जो करने का परमेश्वर इरादा रखता है, और कभी भी सभी चीजों पर शासन और नियंत्रण करने में सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर की नजर में तुम हमेशा एक छोटे-से प्राणी रहोगे, और तुम्हारे कौशल और क्षमता कितनी भी महान हों, चाहे तुममें कितने भी गुण हों, तुम संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन हो। भले ही तुम कुछ ढिठाई भरे वचन कहने में सक्षम हो, लेकिन यह न तो यह दिखा सकता है कि तुममें सृष्टिकर्ता का सार है, और न ही यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वयं परमेश्वर के सार हैं। वे बाहर से सीखे या जोड़े नहीं गए, बल्कि स्वयं परमेश्वर के निहित सार हैं। और इसलिए सृष्टिकर्ता और प्राणियों के बीच का संबंध कभी नहीं बदला जा सकता। एक प्राणी के रूप में, मनुष्य को अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए, और कर्तव्यनिष्ठा से व्यवहार करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है, उसकी कर्तव्यपरायणता से रक्षा करो। अनुचित कार्य मत करो, न ही ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान, अतिमानव या दूसरों से ऊँचा बनने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अतिमानव बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना तो और भी ज्यादा शर्मनाक है; यह घृणित और निंदनीय है। जो प्रशंसनीय है, और जो प्राणियों को किसी भी चीज से ज्यादा करना चाहिए, वह है एक सच्चा प्राणी बनना; यही एकमात्र लक्ष्य है जिसका सभी लोगों को अनुसरण करना चाहिए।

सृष्टिकर्ता का अधिकार समय, स्थान या भूगोल द्वारा सीमित नहीं है, और सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना से परे है

आओ, हम उत्पत्ति 22:17-18 देखें। यह यहोवा परमेश्वर द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दिया कि उसकी संतानों की संख्या बढ़ेगी—लेकिन वह किस हद तक बढ़ेगी? जिस हद तक पवित्रशास्त्र में कहा गया है : "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान।" कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर चाहता था कि अब्राहम को आकाश के तारों के समान असंख्य और समुद्र-तट की बालू के कणों के समान प्रचुर मात्रा में संतानें मिलें। परमेश्वर ने कल्पना का उपयोग करते हुए बात की, और इस कल्पना से यह देखना कठिन नहीं कि परमेश्वर अब्राहम को केवल एक, दो या केवल हजारों वंशज प्रदान नहीं करेगा, बल्कि एक बेशुमार संख्या में वंशज प्रदान करेगा, जो कि बहुत सारे जाति-समूह बन जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से वादा किया था कि वह कई जाति-समूहों का पिता होगा। अब, क्या यह संख्या मनुष्य द्वारा निर्धारित की गई थी या परमेश्वर द्वारा? क्या मनुष्य तय कर सकता है कि उसके कितने वंशज होंगे? क्या यह उस पर निर्भर है? मनुष्य पर तो यही निर्भर नहीं कि उसके कई वंशज होंगे भी या नहीं, "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" की तो बात ही छोड़ो। कौन नहीं चाहता कि उसकी संतान तारों के समान असंख्य हो? दुर्भाग्य से, चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी तुम चाहते हो। आदमी कितना भी कुशल या सक्षम क्यों न हो, यह उस पर निर्भर नहीं है; कोई भी उससे बाहर नहीं जा सकता, जो परमेश्वर द्वारा ठहराया गया है। वह तुम्हें जितना देता है, उतना ही तुम्हारे पास होगा : अगर परमेश्वर तुम्हें थोड़ा देता है, तो तुम्हारे पास ढेर सारा कभी नहीं होगा, और अगर परमेश्वर तुम्हें ढेर सारा देता है, तो इस बात से नाराज होने का कोई फायदा नहीं कि तुम्हारे पास कितना है। क्या बात ऐसी ही नहीं है? यह सब परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर नहीं! मनुष्य परमेश्वर द्वारा शासित है, और कोई भी इससे मुक्त नहीं है!

जब परमेश्वर ने कहा, "मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा," तो यह एक वाचा थी, जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था, और इंद्रधनुष की वाचा की तरह, यह अनंत काल तक पूरी की जाएगी, और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किया गया एक वादा भी था। केवल परमेश्वर ही इस वादे को पूरा करने के काबिल और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, और मनुष्य इसे जैसे चाहे देखे और समझे, यह सब परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार हूबहू पूरा किया जाएगा। परमेश्वर के वचन मनुष्य की इच्छा या धारणाओं में परिवर्तन के कारण बदले नहीं जाएँगे, और वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज में परिवर्तन के कारण भी नहीं बदले जाएँगे। सभी चीजें गायब हो सकती हैं, लेकिन परमेश्वर के वचन हमेशा रहेंगे। वास्तव में, जिस दिन सभी चीजें गायब होती हैं, ठीक वही दिन परमेश्वर के वचनों के पूरी तरह से साकार होने का दिन होता है, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार, सृष्टिकर्ता का सामर्थ्य है, और वह सभी चीजों और समस्त जीवन-शक्ति को नियंत्रित करता है; वह शून्य में से कोई चीज प्रकट करवा सकता है या किसी चीज को शून्य बना सकता है, और वह सभी चीजों के जीवित से मृत में रूपांतरण को नियंत्रित करता है; परमेश्वर के लिए वंशजों की वृद्धि करने से आसान कुछ भी नहीं हो सकता। यह मनुष्य को किसी परी-कथा की तरह काल्पनिक लगता है, लेकिन परमेश्वर के लिए, जो वह तय करता है और जो करने का वादा करता है, वह काल्पनिक नहीं है, न ही वह कोई परी-कथा है। बल्कि, वह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर पहले ही देख चुका है, और जो निश्चित रूप से पूरा होगा। क्या तुम लोग इसे समझते हो? क्या तथ्य साबित करते हैं कि अब्राहम के वंशज असंख्य थे? वे कितने असंख्य थे? क्या वे "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान" असंख्य थे, जैसा परमेश्वर ने कहा था? क्या वे सभी जाति-समूहों और क्षेत्रों में, दुनिया के हर स्थान पर फैल गए थे? यह तथ्य किसके माध्यम से पूरा हुआ? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा पूरा हुआ? परमेश्वर के वचनों के बोले जाने के बाद सैकड़ों-हजारों वर्षों तक परमेश्वर के वचन पूरे होते रहे और लगातार तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति है, और परमेश्वर के अधिकार का प्रमाण है। जब परमेश्वर ने शुरुआत में सभी चीजें बनाईं, तो परमेश्वर ने कहा "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्दी हो गया, बहुत कम समय में पूरा हो गया, और इसकी प्राप्ति और पूर्ति में कोई देरी नहीं हुई; परमेश्वर के वचनों का प्रभाव तत्काल हुआ। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, लेकिन जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार का दूसरा पक्ष दिखाया, और यह तथ्य भी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना से परे है, और इसके अलावा, उसने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक ज्यादा वास्तविक, ज्यादा उत्तम पक्ष दिखाया।

जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं, तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है, और परमेश्वर के मुख से किए गए वादे का तथ्य धीरे-धीरे एक वास्तविकता बनने लगता है। नतीजतन, सभी चीजों के बीच परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिल जाते हैं, पेड़ों से कलियाँ फूट जाती हैं, पक्षी गाने लगते हैं, हंस लौट आते हैं और खेत लोगों से भर जाते हैं।... बसंत के आगमन के साथ सभी चीजों का कायाकल्प हो जाता है, और यह सृष्टिकर्ता का चमत्कारपूर्ण कार्य है। जब परमेश्वर अपने वादे पूरे करता है, तो आकाश और पृथ्वी की सभी चीजें परमेश्वर के विचारों के अनुसार फिर से नई होकर बदल जाती हैं—कुछ भी नहीं छूटता। जब कोई प्रतिज्ञा या वादा परमेश्वर के मुख से उच्चरित होती है, तो सभी चीजें उसे पूरा करती और उसे पूरा करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं; सभी प्राणी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए और अपना-अपना कार्य करते हुए सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के तहत आयोजित और व्यवस्थित किए जाते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अभिव्यक्ति है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार की कोई सीमा है? क्या उसकी कोई समय-सीमा है? क्या उसे किसी निश्चित ऊँचाई या किसी निश्चित लंबाई का कहा जा सकता है? क्या उसे किसी निश्चित आकार या ताकत का कहा जा सकता है? क्या उसे मनुष्य के आयामों से मापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार जलता-बुझता नहीं, आता-जाता नहीं, और ऐसा कोई नहीं जो यह नाप सके कि उसका अधिकार कितना महान है। चाहे परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को आशीष दिए कितना भी समय बीत जाए, वह आशीष जारी रहेगा, और उसकी निरंतरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगी, और मानव-जाति को बार-बार सृष्टिकर्ता की अविनाशी जीवन-शक्ति का पुन: प्रकटन देखने देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रदर्शन उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है, जो सभी चीजों और मानव-जाति को दिखाया जाता है। इसके अलावा, उसके अधिकार द्वारा पूरी की गई हर चीज अतुलनीय रूप से उत्तम और पूरी तरह से निर्दोष होती है। कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार, और वह समस्त कार्य जो वह पूरा करता है, सब एक अतुलनीय रूप से सुंदर चित्र हैं, और प्राणियों के लिए, मानव-जाति की भाषा, प्राणियों के लिए उसका महत्व और मूल्य व्यक्त करने में असमर्थ है। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति से कोई वादा करता है, तो उसके बारे में हर चीज से परमेश्वर पूरी तरह से परिचित होता है, चाहे वह यह हो कि वह व्यक्ति कहाँ रहता है, क्या करता है, वादा किए जाने से पहले या बाद की उसकी पृष्ठभूमि, या उसके जीवन-परिवेश में कितनी बड़ी उथल-पुथल रही है। परमेश्वर के वचन बोले जाने के बाद चाहे कितना भी समय बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा होता है मानो वे अभी-अभी बोले गए हों। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के पास सामर्थ्य और ऐसा अधिकार है कि वह मानव-जाति से किए गए प्रत्येक वादे की जानकारी रख सकता है, उसे नियंत्रित कर सकता है और उसे पूरा कर सकता है, और चाहे वादा कुछ भी हो, उसे पूरी तरह से पूरा होने में कितना भी समय लगे, और, इसके अलावा, उसका पूरा होना कितने भी व्यापक दायरे को स्पर्श करता हो—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, नस्ल आदि—यह वादा मुकम्मल और पूरा किया जाएगा, और, इसके अलावा, इसे मुकम्मल और पूरा करने के लिए उसे थोड़ा-सा भी प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का विस्तार पूरे ब्रह्मांड और पूरी मानव-जाति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है। परमेश्वर ने प्रकाश बनाया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परमेश्वर केवल प्रकाश का ही प्रबंधन करता है, या वह केवल पानी का ही प्रबंधन करता है क्योंकि उसने पानी बनाया है, और बाकी सब-कुछ परमेश्वर से संबंधित नहीं है। क्या यह गलतफहमी नहीं होगी? हालाँकि परमेश्वर द्वारा अब्राहम को आशीष देने की स्मृति सैकड़ों वर्षों के बाद धीरे-धीरे मनुष्य की स्मृति से फीकी पड़ गई थी, फिर भी परमेश्वर के लिए यह वादा वैसा ही बना रहा। यह अभी भी पूरा होने की प्रक्रिया में था, और कभी रुका नहीं था। मनुष्य ने कभी नहीं जाना या सुना कि कैसे परमेश्वर ने अपने अधिकार का प्रयोग किया, कैसे सभी चीजें आयोजित और व्यवस्थित की गईं, और इस दौरान परमेश्वर की सृष्टि की सभी चीजों के बीच कितनी अद्भुत कहानियाँ घटित हुईं, लेकिन परमेश्वर के अधिकार के प्रदर्शन और उसके कर्मों के प्रकटन का हर अद्भुत अंश सभी चीजों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हुआ और ऊँचा उठाया गया, सभी चीजों ने सृष्टिकर्ता के चमत्कारी कर्म दर्शाए और उनके बारे में बात की, और सभी चीजों पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की बहुत बार सुनाई गई प्रत्येक कहानी सभी चीजों द्वारा हमेशा उद्घोषित की जाएगी। वह अधिकार, जिसके द्वारा परमेश्वर सभी चीजों पर शासन करता है, और परमेश्वर का सामर्थ्य सभी चीजों को दिखाता है कि परमेश्वर हर जगह और हर समय मौजूद है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की सर्वव्यापकता देख लोगे, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर हर जगह और हर समय मौजूद है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य समय, भूगोल, स्थान या किसी व्यक्ति, घटना या चीज से प्रतिबंधित नहीं है। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का विस्तार मनुष्य की कल्पना से बढ़कर है; वह मनुष्य के लिए अथाह है, मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से नहीं जान पाएगा।

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, लेकिन मनुष्य की कल्पना कहाँ तक पहुँच सकती है? क्या वह इस दुनिया से परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और उसकी कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने देने में सक्षम हैं? क्या वे मनुष्य को वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को समझने और उसके प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य का अनुमान और कल्पना केवल मनुष्य की बुद्धि की उपज हैं, और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने में थोड़ी-सी भी सहायता या लाभ प्रदान नहीं करते। विज्ञान-कथाएँ पढ़ने के बाद कुछ लोग चंद्रमा की कल्पना करने में सक्षम होते हैं, या इस बात की कि तारे कैसे होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना तो बस कल्पना ही है। इन चीजों के तथ्यों के बारे में, अर्थात् परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के बारे में, उसे बिलकुल भी समझ नहीं है। अगर तुम चाँद पर हो भी आए, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? क्या यह दर्शाता है कि तुम्हें परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ हैं, तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प अनुमान या कल्पना न करना होगा अर्थात जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आए, तो मनुष्य को कभी कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं यहाँ तुम लोगों से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के सामर्थ्य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार का ज्ञान अपनी कल्पना पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। चूँकि परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए तुम कल्पना पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम परमेश्वर के अधिकार का सच्चा ज्ञान किस तरह प्राप्त कर सकते हो? इसका तरीका है परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, संगति करना और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना। इस तरह तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और सत्यापन होगा और तुम उसकी एक क्रमिक समझ और वर्धमान ज्ञान प्राप्त करोगे। परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोगों से कल्पना न करने के लिए कहना तुम लोगों को विनाश की प्रतीक्षा करते हुए निष्क्रिय बैठने के लिए प्रेरित करने या तुम लोगों को कुछ भी करने से रोकने के समान नहीं है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का उपयोग न करने का अर्थ है अनुमान लगाने के लिए तर्क का उपयोग न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का उपयोग न करना, आधार के रूप में विज्ञान का उपयोग न करना, बल्कि इस बात को समझना, सत्यापित करना और पुष्टि करना कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, उसके पास अधिकार है, इस बात की पुष्टि करना कि वह तुम्हारे भाग्य पर संप्रभुता रखता है, और यह कि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, सत्य के माध्यम से, हर उस चीज के माध्यम से जिसका तुम जीवन में सामना करते हो, उसका सामर्थ्य हर समय उसे स्वयं सच्चा परमेश्वर साबित करता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे परमेश्वर की समझ प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई आसान तरीका खोजना चाहते हैं, लेकिन क्या तुम लोग ऐसा कोई तरीका सोच सकते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, सोचने की कोई जरूरत नहीं : कोई दूसरा तरीका नहीं है! उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक वचन और वह जो भी करता है, बस उसी के माध्यम से परमेश्वर के पास जो कुछ है और जो वह है, उसे कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ता से जाना और सत्यापित किया जा सकता है। परमेश्वर को जानने का यही एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर की हर चीज, खोखली और खाली नहीं, बल्कि वास्तविक है।

सभी चीजों और जीवित प्राणियों पर सृष्टिकर्ता के नियंत्रण और प्रभुत्व का तथ्य सृष्टिकर्ता के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बताता है

इसी तरह, यहोवा द्वारा अय्यूब को आशीष देना अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया? "यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के दृष्टिकोण से, वे कौन-सी चीजें थीं जो अय्यूब को दी गई थीं? क्या वे मानव-जाति की संपत्तियाँ थीं? इन संपत्तियों के साथ, क्या अय्यूब उस युग में बहुत धनी न हो गया होता? फिर, उसने ऐसी संपत्तियाँ कैसे हासिल कीं? उसे धन-दौलत किसने दी? कहने की आवश्यकता नहीं—परमेश्वर के आशीष की बदौलत ही वे संपत्तियाँ अय्यूब को मिलीं। अय्यूब ने इन संपत्तियों को कैसे देखा, और उसने परमेश्वर के आशीष को कैसे देखा, हम इस पर यहाँ चर्चा नहीं करेंगे। जब परमेश्वर के आशीषों की बात आती है, तो सभी लोग दिन-रात परमेश्वर से आशीष पाने के लिए लालायित रहते हैं, फिर भी मनुष्य का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है कि वह अपने जीवनकाल में कितनी संपत्तियाँ प्राप्त कर सकता है, या वह परमेश्वर से आशीष प्राप्त कर सकता है या नहीं—यह एक निर्विवाद तथ्य है! परमेश्वर के पास मनुष्य को कोई भी संपत्ति देने, मनुष्य को कोई भी आशीष प्राप्त करने देने का अधिकार और सामर्थ्य है, फिर भी परमेश्वर के आशीषों का एक सिद्धांत है। परमेश्वर किस तरह के लोगों को आशीष देता है? बेशक, वह उन लोगों को आशीष देता है, जिन्हें वह पसंद करता है! अब्राहम और अय्यूब दोनों को परमेश्वर ने आशीष दिया, फिर भी जो आशीष उन्हें मिले, वे एक-जैसे नहीं थे। परमेश्वर ने अब्राहम को बालू के कणों और तारों जितने असंख्य वंशज होने का आशीष दिया। जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, तो उसने एक ही व्यक्ति और एक जाति-समूह के वंशजों को सामर्थ्यवान और समृद्ध बना दिया। इसमें, परमेश्वर के अधिकार ने मानव-जाति पर शासन किया, जिसने सभी चीजों और जीवित प्राणियों के मध्य परमेश्वर की साँस फूँकी। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के तहत, यह मानव-जाति परमेश्वर द्वारा तय की गई गति से, और परमेश्वर द्वारा तय किए गए दायरे के भीतर, बढ़ी और अस्तित्व में रही। विशेष रूप से, इस जाति-समूह की जीवन-क्षमता, वृद्धि-दर और जीवन-प्रत्याशा सभी परमेश्वर की व्यवस्थाओं का हिस्सा थे, और इन सभी का सिद्धांत पूरी तरह से उस वादे पर आधारित था, जो परमेश्वर ने अब्राहम से किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, परमेश्वर के वादे बिना किसी बाधा के आगे बढ़ेंगे और परमेश्वर के अधिकार के विधि-विधान के तहत साकार होंगे। परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किए गए वादे में, चाहे दुनिया में कैसी भी उथल-पुथल हो, कोई भी युग हो, मानव-जाति द्वारा कैसी भी तबाही झेली जाए, अब्राहम के वंशजों को विनाश के जोखिम का सामना नहीं करना पड़ेगा, और उसका जाति-समूह मरेगा नहीं। किंतु परमेश्वर के आशीष ने अय्यूब को अत्यधिक धनवान बनाया। परमेश्वर ने उसे जीवित, साँस लेते जानवरों का एक समूह दिया, जिनकी विशेषताएँ—उनकी संख्या, उनकी वंश-वृद्धि की गति, जीवित रहने की दर, उनके शरीर में वसा की मात्रा, आदि—भी परमेश्वर द्वारा नियंत्रित थीं। हालाँकि इन जीवित प्राणियों में बोलने की क्षमता नहीं थी, फिर भी, वे भी सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं का हिस्सा थे, और उनके लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं के पीछे का सिद्धांत उन आशीषों के आधार पर बनाया गया था, जिनका परमेश्वर ने अय्यूब से वादा किया था। परमेश्वर द्वारा अब्राहम और अय्यूब को दिए गए आशीषों में, हालाँकि जिस चीज का वादा किया गया था वह अलग थी, लेकिन वह अधिकार, जिससे सृष्टिकर्ता सभी चीजों और जीवित प्राणियों पर शासन करता है, एक ही था। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का प्रत्येक विवरण अब्राहम और अय्यूब को दिए गए उसके विभिन्न वादों और आशीषों में व्यक्त होता है, और मानव-जाति को एक बार फिर से दिखाता है कि परमेश्वर का अधिकार मनुष्य की कल्पना से बहुत परे है। ये विवरण मनुष्य को एक बार फिर बताते हैं कि अगर वह परमेश्वर के अधिकार को जानना चाहता है, तो यह केवल परमेश्वर के वचनों के माध्यम से और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही हासिल किया जा सकता है।

सब चीजों पर संप्रभुता का परमेश्वर का अधिकार मनुष्य को एक तथ्य देखने देता है : परमेश्वर का अधिकार इन वचनों में ही सन्निहित नहीं है "और परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो, और उजियाला हो गया, और आकाश हो, और आकाश हो गया, और भूमि हो, और भूमि हो गई," बल्कि, इससे भी बढ़कर, उसका अधिकार इस बात में भी सन्निहित है कि कैसे उसने उजाले को जारी रखा, आकाश को गायब होने से रोका, और भूमि को हमेशा के लिए पानी से अलग किए रखा, साथ ही इस बात के विवरण में भी कि उसने कैसे स्वयं द्वारा बनाई गई चीजों : उजाले, आकाश और भूमि को शासित और प्रबंधित किया। परमेश्वर द्वारा मानव-जाति को आशीष दिए जाने में तुम लोग और क्या देखते हो? स्पष्ट रूप से, परमेश्वर द्वारा अब्राहम और अय्यूब को आशीष दिए जाने के बाद, परमेश्वर के कदम रुके नहीं, क्योंकि उसने अभी अपने अधिकार का प्रयोग करना शुरू ही किया था, और उसका इरादा अपने प्रत्येक वचन को वास्तविकता में बदलने, और अपनी कही बात के प्रत्येक विवरण को साकार करने का था, इसलिए, आगामी वर्षों में, उसने वह सब-कुछ करना जारी रखा, जिसका उसने इरादा किया था। चूँकि परमेश्वर के पास अधिकार है, इसलिए शायद मनुष्य को ऐसा लगता है कि परमेश्वर को केवल बोलने की जरूरत है, और बिना उँगली उठाए, सभी मामले और चीजें पूरी हो जाती हैं। ऐसी कल्पनाएँ बहुत ही हास्यास्पद हैं! अगर तुम परमेश्वर द्वारा वचनों का उपयोग करते हुए मनुष्य के साथ वाचा बाँधने और परमेश्वर द्वारा वचनों का उपयोग करते हुए हर चीज पूरी करने के बारे में केवल एकतरफा दृष्टिकोण अपनाते हो, और तुम इस बात के विभिन्न चिह्न और तथ्य देखने में असमर्थ हो कि परमेश्वर का अधिकार सभी चीजों के अस्तित्व पर प्रभुत्व रखता है, तो परमेश्वर के अधिकार के बारे में तुम्हारी समझ बहुत खोखली और हास्यास्पद है! अगर मनुष्य परमेश्वर के ऐसा होने की कल्पना करता है, तो कहना होगा कि परमेश्वर के बारे में मनुष्य का ज्ञान निराशाजनक स्थिति तक पहुँच गया है, वह एक अंधी गली में पहुँच गया है, क्योंकि जिस परमेश्वर की कल्पना मनुष्य करता है, वह केवल एक मशीन है जो आदेश जारी करती है, न कि परमेश्वर जिसके पास अधिकार है। तुमने अब्राहम और अय्यूब के उदाहरणों से क्या देखा है? क्या तुमने परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का वास्तविक पक्ष देखा है? अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद परमेश्वर वहीं नहीं रहा जहाँ वह था, न ही उसने अपने दूतों को काम पर लगाकर यह देखने का इंतजार किया कि परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों का उच्चारण किया, परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन में सभी चीजें उस कार्य का अनुपालन करने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था, और वे लोग, चीजें और पदार्थ तैयार हो गए, जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य यह है कि, जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन निकले, परमेश्वर का अधिकार पूरी पृथ्वी पर लागू होना शुरू हो गया, और उसने अब्राहम और अय्यूब से किए गए वादे पूरे करने के लिए एक क्रम निर्धारित कर दिया, और हर कदम और प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण, जिन्हें पूरा करने की उसने योजना बनाई थी, उनके लिए जो कुछ आवश्यक था, उस सबके लिए सभी उचित योजनाएँ भी बनाईं और तैयारियाँ भी कीं। इस दौरान परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों का, बल्कि उन सभी चीजों का भी इस्तेमाल किया, जो उसके द्वारा बनाई गई थीं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस दायरे में परमेश्वर के अधिकार का उपयोग किया गया था, उसमें न केवल दूत शामिल थे, बल्कि सृष्टि की सभी चीजें शामिल थीं, जिन्हें वह कार्य पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया गया था, जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशिष्ट तरीके थे, जिनसे परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया गया था। अपनी कल्पनाओं में कुछ लोगों की परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, और परमेश्वर के पास सामर्थ्य है, इसलिए परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में या किसी निश्चित स्थान पर रहने की आवश्यकता है, और उसे कोई विशेष कार्य करने की आवश्यकता नहीं है, और परमेश्वर का संपूर्ण कार्य उसके विचारों में पूरा होता है। कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि, हालाँकि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, लेकिन परमेश्वर को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसके लिए केवल अपने वचन बोलना ही पर्याप्त था। क्या सच में ऐसा ही हुआ? स्पष्ट रूप से नहीं! हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसके द्वारा सभी चीजों के सृजन में, सभी चीजों पर उसके नियंत्रण में, और उस प्रक्रिया में जिसके द्वारा वह मानव-जाति का नेतृत्व और प्रबंधन करता है, प्रकट और मूर्त होती हैं। मानव-जाति और सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता का हर तरीका, हर दृष्टिकोण और हर विवरण, और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीजों के बारे में उसकी समझ—ये सभी अक्षरशः साबित करते हैं कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्य लगातार और सभी चीजों में प्रदर्शित और प्रकट होता है। ये अभिव्यक्तियाँ और प्रकटन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बताते हैं, क्योंकि वह अपने अधिकार और सामर्थ्य का उपयोग अपना कार्य जारी रखने, सभी चीजों को नियंत्रित करने और हर क्षण सभी चीजों पर शासन करने के लिए कर रहा है; उसका सामर्थ्य और अधिकार न तो स्वर्गदूतों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, न ही परमेश्वर के दूतों द्वारा। परमेश्वर ने तय किया कि वह अब्राहम और अय्यूब को क्या आशीष देगा—यह परमेश्वर का निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूत व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब के पास गए थे, लेकिन उनके कार्य परमेश्वर की आज्ञाओं पर आधारित थे, और उनके कार्य परमेश्वर के अधिकार के तहत किए गए थे और इस तरह, दूत परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम के पास जाते देखता है, और बाइबल के अभिलेखों में यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से कुछ भी करते नहीं देखता, किंतु असल में, वह केवल स्वयं परमेश्वर ही है, जो वास्तव में सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग करता है, और वह किसी व्यक्ति की ओर से कोई संदेह बरदाश्त नहीं करता! हालाँकि तुमने देखा है कि स्वर्गदूतों और दूतों में बहुत सामर्थ्य है और उन्होंने चमत्कार किए हैं, या उन्होंने परमेश्वर द्वारा आदेशित कुछ काम किए हैं, लेकिन उनके कार्य केवल परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए हैं, और वे किसी भी तरह से परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या चीज के पास सभी चीजों की रचना करने और सभी चीजों पर शासन करने का सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है। इसलिए, कोई भी मनुष्य या चीज सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रयोग या प्रदर्शन नहीं कर सकता।

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जाने योग्य है

पवित्रशास्त्र के इन तीन भागों में तुमने क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा है कि एक सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर अपने अधिकार का प्रयोग करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए इंद्रधनुष का उपयोग किया—उसने मनुष्य को यह बताने के लिए बादलों में इंद्रधनुष रखा कि वह दुनिया को नष्ट करने के लिए फिर कभी जलप्रलय का उपयोग नहीं करेगा। क्या लोग जो इंद्रधनुष आज देखते हैं, वह अभी भी वही है जो परमेश्वर के मुख से बोला गया था? क्या उसका स्वरूप और अर्थ बदल गया है? बेशक, नहीं। परमेश्वर ने यह कार्य करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग किया, और जो वाचा उसने मनुष्य के साथ बाँधी थी, वह आज तक चलती आई है, और जिस समय इस वाचा को बदला जाएगा, वह निश्चित रूप से परमेश्वर का निर्णय होगा। परमेश्वर के यह कहने के बाद कि "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर ने आज तक हमेशा इस वाचा का पालन किया। तुम इसमें क्या देखते हो? हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन वह अपने कार्यों में बहुत कठोर और सिद्धांतवादी है, और अपने वचन पर अडिग रहता है। उसकी कठोरता और उसके कार्यों के सिद्धांत दर्शाते हैं कि सृष्टिकर्ता का अपमान नहीं किया जा सकता और सृष्टिकर्ता का अधिकार अलंघ्य है। हालाँकि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, और सभी चीजें उसके प्रभुत्व के अधीन हैं, और हालाँकि उसके पास सभी चीजों पर शासन करने का सामर्थ्य है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना क्षतिग्रस्त या बाधित नहीं की है, और हर बार जब वह अपने अधिकार का उपयोग करता है, तो यह कड़ाई से उसके सिद्धांतों के अनुसार ही होता है, और ठीक उसी का अनुसरण करता है जो उसके मुँह से बोला गया था, और उसकी योजना के चरणों और उद्देश्यों का पालन करता है। कहने की जरूरत नहीं कि परमेश्वर द्वारा शासित सभी चीजें उन सिद्धांतों का भी पालन करती हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया जाता है, और कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार की व्यवस्थाओं से मुक्त नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। परमेश्वर की दृष्टि में, जिन लोगों को आशीष दिया जाता है, वे उसके अधिकार द्वारा लाया गया सौभाग्य प्राप्त करते हैं, और जिन्हें शाप दिया जाता है, उन्हें परमेश्वर के अधिकार के कारण दंड मिलता है। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के तहत, कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार के प्रयोग से मुक्त नहीं है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। सृष्टिकर्ता का अधिकार किसी भी कारक में होने वाले परिवर्तन से नहीं बदलता, और इसी तरह, वे सिद्धांत, जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है, किसी भी कारण से नहीं बदलते। आसमान और धरती भारी उथल-पुथल से गुजर सकते हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीजें गायब हो सकती हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी गायब नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने योग्य अधिकार का सार है, और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

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