परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग दो

हमने अभी-अभी परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य, उसके द्वारा संपन्न की गई अभूतपूर्व कार्यों की शृंखला के बारे में बात की। इनमें से हर एक चीज़ परमेश्वर की प्रबंधन-योजना और परमेश्वर की इच्छा के लिए प्रासंगिक है। ये स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार के लिए भी प्रासंगिक हैं। यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को और अधिक समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग पर नहीं रुक सकते—हमें परमेश्वर द्वारा अपने कार्य में उठाए गए कदमों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इसलिए, जिस प्रकार परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अंत और अनुग्रह के युग का आरंभ किया था, उसी प्रकार हमारे अपने कदम भी उसी का अनुसरण करते हुए अनुग्रह के युग में आ जाएँ—एक ऐसा युग, जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में परमेश्वर ने पुन: एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया, जो पहले नहीं किया गया था। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मानवजाति दोनों के लिए एक नया प्रारंभिक बिंदु था—ऐसा प्रारंभिक बिंदु, जिसमें परमेश्वर द्वारा किया गया एक और नया कार्य शामिल था, जो पहले कभी नहीं किया गया था। यह नया कार्य अभूतपूर्व था, जो मनुष्यों और समस्त प्राणियों की कल्पना-शक्ति से परे था। यह ऐसा कार्य है, जिसे अब सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं—पहली बार परमेश्वर एक मनुष्य बना, और पहली बार उसने एक मनुष्य के रूप, मनुष्य की पहचान के साथ, नया कार्य आरंभ किया। इस नए कार्य ने प्रकट किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा कर लिया था, और कि वह व्यवस्था के अधीन अब और कुछ नहीं करेगा या बोलेगा। न ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के सिद्धांतों या नियमों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसका समस्त कार्य हमेशा के लिए रुक गया था और जारी नहीं रह गया था, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य आरंभ करना और नई चीज़ें करना चाहता था। उसकी योजना का एक बार फिर से एक नया प्रारंभिक बिंदु था, और इसलिए परमेश्वर को मानवजाति की एक नए युग में अगुआई करनी थी।

यह मनुष्य के लिए आनंददायक समाचार था या अशुभ, यह प्रत्येक व्यक्ति के सार पर निर्भर करता था। ऐसा कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह आनंददायक समाचार नहीं था, बल्कि अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो जिन लोगों ने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, जिन्होंने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था किंतु परमेश्वर का भय नहीं माना था, वे परमेश्वर के पुराने कार्य का उपयोग उसके नए कार्य पर दोष लगाने के लिए करने की ओर प्रवृत्त होने लगे। इन लोगों के लिए यह एक अशुभ समाचार था; परंतु हर उस व्यक्ति के लिए, जो निर्दोष और साफ़दिल था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके द्वारा छुटकारा पाने का इच्छुक था, परमेश्वर का पहला देहधारण बहुत आनंददायक समाचार था। क्योंकि जबसे मनुष्य अस्तित्व में लाए गए हैं, यह पहली बार था जब परमेश्वर एक ऐसे रूप में मानवजाति के बीच प्रकट हुआ और रहा था; जो पवित्रात्मा का रूप नहीं था; इस बार वह मनुष्य से जन्मा था और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच रहता था और काम करता था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला; यह सभी कल्पनाओं से परे था। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों को एक वास्तविक लाभ प्राप्त हुआ। परमेश्वर ने न केवल पुराने युग को समाप्त किया, बल्कि उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया। उसने अब अपने संदेशवाहकों को अपनी इच्छा संप्रेषित करने के लिए नहीं कहा, अब वह बादलों में छिपा हुआ नहीं रहा, और न ही अब वह गर्जना के माध्यम से आज्ञा देते हुए मनुष्यों के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला। पहले की किसी भी चीज़ के असदृश, एक ऐसी पद्धति के माध्यम से जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय थी और जिसे समझना और स्वीकार करना उनके लिए कठिन था—देह बनना—वह उस युग का कार्य शुरू करने के लिए मनुष्य का पुत्र बना। परमेश्वर के इस कार्य से मानवजाति हक्की-बक्की रह गई; इसने उन्हें शर्मिंदा कर दिया, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया, जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था। आज हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि परमेश्वर ने इस नए युग में कौन-सा नया कार्य शुरू किया, और हम इस पर विचार करेंगे कि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की दृष्टि से इस नए कार्य में हमारे लिए सीखने को क्या है?

बाइबल के नए नियम में निम्नलिखित वचन दर्ज़ हैं :

1. मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2. मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ, पहले इस अंश पर नज़र डालें : "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

मैंने यह अंश क्यों चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या संबंध है? इस पाठ में पहली चीज़ जो हम जानते हैं, वह है कि यह सब्त का दिन था, लेकिन प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को मकई के खेतों में ले गया। इससे भी ज्यादा "विश्वासघाती" बात यह रही कि वे मकई की "बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते—बहुत-सी चीज़ें थीं, जो सब्त के दिन नहीं की जा सकती थीं। प्रभु यीशु द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए पेचीदा था, जो एक लंबे समय से व्यवस्था के अधीन रहे थे, और इसने आलोचना भी भड़काई। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया, उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले इस बात की चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने सभी दिनों में से सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था, जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है, जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु आया, तो उसने लोगों को यह बताने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा कह दिया है और नया कार्य शुरू किया है, और इस नए कार्य में सब्त का पालन करना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर का सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आना उसके नए कार्य का बस एक पूर्वाभास था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना बाकी था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारंभ किया, तो उसने व्यवस्था के युग की बेड़ियों को पहले ही पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विनियम और सिद्धांत तोड़ दिए थे। उसमें व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का कोई निशान नहीं था; उसने उसे पूरी तरह से छोड़ दिया था और अब उसका पालन नहीं करता था, और उसने मानवजाति से आगे उसका पालन करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया; वह बाहर काम कर रहा था और आराम नहीं कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह अब व्यवस्था के अधीन नहीं रह रहा था, और उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया था और एक नई कार्यशैली के साथ वह मानवजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ था। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है, जो व्यवस्था के अधीन रहने से उभरने और सब्त से अलग होने से आरंभ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य किया, तो वह अतीत से चिपका नहीं रहा, और वह अब व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में चिंतित नहीं था, न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन भी उसी तरह से कार्य किया, जैसे वह दूसरे दिनों में करता था, और सब्त के दिन जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब परमेश्वर की निगाहों में बिलकुल सामान्य था। परमेश्वर अपना बहुत-सा नया कार्य करने के लिए, जिसे वह करना चाहता है, और नए वचन कहने के लिए, जिन्हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरुआत कर सकता है। जब वह एक नई शुरुआत करता है, तो वह न तो अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है, न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के अपने सिद्धांत हैं, जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानवजाति को अपने कार्य के एक नए चरण में ले जाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश करता है। यदि लोग पुरानी कहावतों या नियमों के अनुसार काम करते रहते हैं या उनसे चिपके रहते हैं, तो वह इसे याद नहीं रखेगा या इसका अनुमोदन नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह पहले ही एक नया कार्य ला चुका है, और अपने कार्य के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह नया कार्य आरंभ करता है, तो वह मानवजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है, ताकि लोग उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुरानी चीज़ों से चिपका नहीं रहता या पुराने मार्ग पर नहीं चलता; जब वह कार्य करता और बोलता है, तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता, जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में सब-कुछ स्वतंत्र और मुक्त है, और कोई निषेध नहीं है, कोई बाधा नहीं है—वह मानवजाति के लिए आज़ादी और मुक्ति लाता है। वह एक जीवित परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर, जो वास्तव में, सच में मौजूद है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिलकुल भिन्न है, जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवंत है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए संपूर्ण जीवन और ज्योति, संपूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति लेकर आते हैं, क्योंकि वह सत्य, जीवन और मार्ग धारण करता है—वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता। लोग चाहे कुछ भी कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से देखें या कैसे भी उसका आकलन करें, वह बिना किसी आशंका के अपना कार्य पूरा करेगा। अपने कार्य और वचनों के संबंध में वह किसी की भी धारणाओं या उस पर उठी उँगलियों की, यहाँ तक कि अपने नए कार्य के प्रति उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिंता नहीं करेगा। परमेश्वर जो करता है, उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, नष्ट-भ्रष्ट करने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें, कोई निषेध नहीं है, वह किसी मनुष्य, घटना या चीज़ द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, न ही उसे किसी विरोधी ताक़त द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और सभी विरोधी ताक़तें और मानवजाति के सभी पाखंड और भ्रांतियाँ उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिए जाते हैं। वह अपने कार्य का चाहे जो भी नया चरण संपन्न कर रहा हो, उसे निश्चित रूप से मानवजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, और उसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाध रूप से कार्यान्वित किया जाएगा, जब तक कि उसका महान कार्य पूरा नहीं हो जाता। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, उसका अधिकार और सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु सब्त के दिन खुले तौर पर बाहर जा सकता था और कार्य कर सकता था, क्योंकि उसके हृदय में मानवजाति से उत्पन्न कोई नियम, ज्ञान या सिद्धांत नहीं थे। उसके पास केवल परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था। उसका कार्य मानवजाति को स्वतंत्र करने, लोगों को मुक्त करने, उन्हें प्रकाश में रहने देने और उन्हें जीने देने का मार्ग था। इस बीच, जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं, वे सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बंधनों में जीते हैं—आज एक चीज़ निषिद्ध होती है, कल दूसरी—उनके जीवन में कोई स्वतंत्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं, जिनके जीवन में कहने को कोई खुशी नहीं है। "निषेध" क्या दर्शाता है? यह विवशता, बंधन और बुराई दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है, तो वह एक झूठे ईश्वर और बुरी आत्मा की आराधना कर रहा होता है। इस तरह की गतिविधियाँ शामिल होने पर निषेध साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते, आज तुम बाहर नहीं जा सकते, कल तुम अपना खाना नहीं बना सकते, परसों तुम नए घर में नहीं जा सकते, विवाह और अंत्येष्टि के लिए, यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिन ही चुनने होंगे। इसे क्या कहा जाता हैं? इसे निषेध कहा जाता है; यह मानवजाति का बंधन है, और ये शैतान और बुरी आत्माओं की जंज़ीरें लोगों को नियंत्रित कर रही हैं, और उनके हृदय और शरीर को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबंध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? परमेश्वर की पवित्रता की बात करते समय तुम्हें पहले यह सोचना चाहिए : परमेश्वर के साथ कोई निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में सिद्धांत हैं, किंतु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि स्वयं परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।

आओ, अब पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश देखें : "पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती 12:6-8)। यहाँ "मंदिर" किसे संदर्भित करता है? आसान शब्दों में कहें तो, यह एक भव्य, ऊँची इमारत को संदर्भित करता है, और व्यवस्था के युग में मंदिर याजकों के लिए परमेश्वर की आराधना करने का स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," तो "वह" किसे संदर्भित करता है? स्पष्ट रूप से "वह" देह में मौजूद प्रभु यीशु है, क्योंकि केवल वही मंदिर से बड़ा था। इन वचनों ने लोगों को क्या बताया? उन्होंने लोगों को मंदिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही मंदिर को छोड़ चुका है और अब उसमें कार्य नहीं कर रहा, इसलिए लोगों को मंदिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्न ढूँढ़ने चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तो उसके वचनों के पीछे एक आधार था और वह यह कि व्यवस्था के अधीन लोग मंदिर को स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा समझने लगे थे। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाय मंदिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि उनके बजाय परमेश्वर की आराधना करें, क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहा : "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।" यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकतर लोग अब यहोवा की आराधना नहीं करते थे, बल्कि बेमन से केवल बलिदान करते थे, और प्रभु यीशु ने तय किया कि यह मूर्ति-पूजा है। इन मूर्ति-पूजकों ने मंदिर को परमेश्वर से बड़ी और ऊँची चीज़ समझ लिया था। उनके हृदय में केवल मंदिर था, परमेश्वर नहीं, और यदि उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ता, तो उनका निवास-स्थान भी छूट जाता। मंदिर के अतिरिक्त उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी, और वे अपने बलिदान नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित "निवास-स्थान" वह था, जहाँ वे यहोवा परमेश्वर की आराधना करने का झूठा दिखावा करते थे, ताकि वे मंदिर में रह सकें और अपने खुद के क्रियाकलाप कर सकें। उनका तथाकथित "बलिदान" मंदिर में सेवा करने की आड़ में अपने खुद के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहार कार्यान्वित करना भर था। यही कारण था कि उस समय लोग मंदिर को परमेश्वर से भी बड़ा समझते थे। प्रभु यीशु ने ये वचन लोगों को चेतावनी देने के लिए बोले थे, क्योंकि वे मंदिर का उपयोग एक आड़ के रूप में, और बलिदानों का उपयोग लोगों और परमेश्वर को धोखा देने के एक आवरण के रूप में करते थे। यदि तुम इन वचनों को वर्तमान में लागू करो, तो ये अभी भी उतने ही वैध और प्रासंगिक हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों की तुलना में परमेश्वर के एक भिन्न कार्य का अनुभव किया है, किंतु उनकी प्रकृति और सार एक-समान हैं। आज के कार्य के संदर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ें करेंगे, जो इन वचनों में दर्शाई गई हैं, "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपना कर्तव्य निभाने को अपने कार्य के रूप में देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के लिए मानवाधिकारों की रक्षा हेतु किए जाने वाले राजनीतिक आंदोलनों के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को अपने कौशलों का उपयोग आजीविका में करने की ओर मोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं, बल्कि धार्मिक सिद्धांत के एक अंश के पालन के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या ये व्यवहार बिलकुल "मंदिर परमेश्वर से बड़ा है" के समान नहीं हैं? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय भौतिक मंदिरों में कर रहे थे, जबकि आज लोग अपना व्यक्तिगत व्यवसाय अमूर्त मंदिरों में करते हैं। जो लोग नियमों को महत्व देते हैं, वे नियमों को परमेश्वर से बड़ा समझते हैं; जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं, वे हैसियत को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं; जो लोग अपनी आजीविका से प्रेम करते हैं, वे आजीविका को परमेश्वर से बड़ी समझते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने के लिए बाध्य करती हैं : "लोग अपने वचनों से परमेश्वर को सबसे बड़ा कहकर उसकी स्तुति करते हैं, किंतु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बड़ी है।" ऐसा इसलिए है, क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने या अपना व्यवसाय या अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलता है, वे परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अपने आप को अपनी प्यारी आजीविका में झोंक देते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, उसे और उसकी इच्छा को बहुत पहले ही त्याग दिया गया है। इन लोगों की स्थिति और दो हज़ार वर्ष पहले मंदिर में अपना व्यवसाय करने वाले लोगों की स्थिति में क्या अंतर है?

आगे, आओ इस अंश के इस अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का कोई व्यावहारिक पक्ष है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पक्ष को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है, उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? हो सकता है, तुम लोग अब इस वाक्य का अर्थ समझ पाओ, लेकिन जब यह कहा गया था, तब बहुत लोग नही समझे थे, क्योंकि मानवजाति बस व्यवस्था के युग से बाहर निकली ही थी। उनके लिए सब्त से अलग होना बहुत कठिन बात थी, सच्चा सब्त क्या होता है, इसे समझने की तो बात ही छोड़ो।

"मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" वाक्य लोगों को बताता है कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ भौतिक प्रकृति की नहीं है, और यद्यपि परमेश्वर तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, लेकिन जब तुम्हारी सारी भौतिक आवश्यकताएँ पूरी कर दी जाती हैं, तो क्या इन चीज़ों से मिलने वाली संतुष्टि तुम्हारी सत्य की खोज का स्थान ले सकती है? यह स्पष्टत: संभव नहीं है! परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप, जिसके बारे में हमने संगति की है, दोनों सत्य हैं। इनका मूल्य भौतिक वस्तुओं से नहीं मापा जा सकता, चाहे वे कितनी भी मूल्यवान हों, न ही इनके मूल्य की गणना पैसों में की जा सकती है, क्योंकि ये कोई भौतिक वस्तुएँ नहीं हैं, और ये हर एक व्यक्ति के हृदय की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन अमूर्त सत्यों का मूल्य ऐसी किसी भी भौतिक चीज़ से बढ़कर होना चाहिए, जिसे तुम मूल्यवान समझते हो, या नहीं? यह कथन ऐसा है, जिस पर तुम लोगों को सोच-विचार करने की आवश्यकता है। जो कुछ मैंने कहा है, उसका मुख्य बिंदु यह है कि परमेश्वर का स्वरूप और उससे संबंधित हर चीज़ प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें हैं और उन्हें किसी भौतिक चीज़ से बदला नहीं जा सकता। मैं तुम्हें एक उदाहरण दूँगा : जब तुम भूखे होते हो, तो तुम्हें भोजन की आवश्यकता होती है। यह भोजन कमोबेश अच्छा हो सकता है, या कमोबेश असंतोषजनक हो सकता है, किंतु यदि उससे तुम्हारा पेट भर जाता है, तो भूखे होने का वह अप्रिय एहसास अब नहीं रहेगा—वह मिट जाएगा। तुम चैन से बैठ सकते हो, और तुम्हारा शरीर आराम महसूस करेगा। लोगों की भूख का भोजन से समाधान किया जा सकता है, किंतु जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, और तुम्हें यह एहसास होता है कि तुम्हें उसके बारे में कोई समझ नहीं है, तो तुम अपने हृदय के खालीपन का समाधान कैसे करोगे? क्या इसका समाधान भोजन से किया जा सकता है? या जब तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होते हो और उसकी इच्छा तुम्हारी समझ में नहीं आती, तो तुम अपने हृदय की उस भूख को मिटाने के लिए किस चीज़ का उपयोग कर सकते हो? परमेश्वर के माध्यम से उद्धार के अपने अनुभव की प्रक्रिया में, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश करने के दौरान, यदि तुम उसकी इच्छा को नहीं समझते हो या यह नहीं जानते कि सत्य क्या है, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो क्या तुम बहुत व्याकुल महसूस नहीं करोगे? क्या तुम अपने हृदय में ज़बरदस्त भूख और प्यास महसूस नहीं करोगे? क्या ये एहसास तुम्हें तुम्हारे हृदय में शांति महसूस करने से रोकेंगे नहीं? तो तुम अपने हृदय की उस भूख की भरपाई कैसे कर सकते हो—क्या इसके समाधान का कोई तरीका है? कुछ लोग खरीददारी करने चले जाते हैं, कुछ लोग मन की बात कहने के लिए मित्रों को खोजते हैं, कुछ लोग लंबी तानकर सो जाते हैं, अन्य लोग परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ते हैं, या वे अपने कर्तव्य निभाने के लिए और कड़ी मेहनत और प्रयास करते हैं। क्या ये चीज़ें तुम्हारी वास्तविक कठिनाइयों का समाधान कर सकती हैं? तुम सभी इस प्रकार के अभ्यासों को पूर्णत: समझते हो। जब तुम शक्तिहीन महसूस करते हो, जब तुम परमेश्वर से प्रबुद्धता पाने की दृढ़ इच्छा महसूस करते हो जो तुम्हें सत्य की वास्तविकता और उसकी इच्छा ज्ञात करा सके, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवश्यकता होती है? तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, वह भरपेट भोजन नहीं है, और वह कुछ उदार वचन नहीं हैं, देह का क्षणिक आराम और संतुष्टि का तो कहना ही क्या—तुम्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह यह है कि परमेश्वर तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताए कि तुम्हें क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, तुम्हें स्पष्ट रूप से बताए कि सत्य क्या है। जब तुम इसे समझ लेते हो, चाहे थोड़ा-सा ही क्यों न समझो, तो क्या तुम अपने हृदय में उससे अधिक संतुष्ट महसूस नहीं करोगे, जितना कि अच्छा भोजन करने पर महसूस करते हो? जब तुम्हारा हृदय संतुष्ट होता है, तो क्या तुम्हारा हृदय और तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व सच्ची शांति प्राप्त नहीं करता? इस उपमा और विश्लेषण के द्वारा, क्या तुम लोग अब समझे कि क्यों मैं तुम लोगों के साथ इस वाक्य को साझा करना चाहता था, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है"? इसका अर्थ है कि जो परमेश्वर से आता है, जो उसका स्वरूप है, और उसका सब-कुछ किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर है, जिसमें वह चीज़ या वह व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर तुम किसी समय विश्वास करते थे कि उसे तुमने सबसे अधिक सँजोया है। अर्थात्, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के मुँह से वचन प्राप्त नहीं कर सकता या उसकी इच्छा को नहीं समझता, तो वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता। अपने भविष्य के अनुभवों में तुम लोग समझोगे कि मैं क्यों चाहता था कि आज तुम लोग इस अंश को देखो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब सत्य और जीवन होता है। सत्य वह चीज़ है, जिसकी लोग अपने जीवन में कमी नहीं कर सकते, और यह वह चीज़ है, जिसके बिना उनका कभी काम नहीं चल सकता; तुम यह भी कह सकते हो कि यह सबसे बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; यही वह एकमात्र चीज़ है, जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

क्या तुम लोगों की सत्य की समझ तुम्हारी अपनी अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि कौन-से सत्य तुम्हारे सामने आए लोगों, घटनाओं और चीज़ों से संबंध रखते हैं; इन्हीं सत्यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा तलाश सकते हो और अपने सामने आने वाली चीज़ों को उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते कि सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे सामने आई चीज़ों से संबंध रखते हैं, और सीधे परमेश्वर की इच्छा खोजने चल देते हो, तो यह एक अंधा दृष्टिकोण है और परिणाम हासिल नहीं कर सकता। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा समझना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि तुम्हारे साथ किस प्रकार की चीज़ें घटित हुई हैं, वे सत्य के किन पहलुओ से संबंध रखती हैं, और परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को देखो, जो तुम्हारे अनुभव से संबंध रखता है। तब तुम उस सत्य में अभ्यास का वह मार्ग खोजो, जो तुम्हारे लिए सही है; इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

हम अभी जिस बारे में संवाद कर रहे हैं, वह सब बाइबल में दर्ज कहानियों के दायरे में है। इन कहानियों के माध्यम से, और घटित हुई इन चीज़ों के विश्लेषण के माध्यम से, लोग उसके स्वभाव और उसके स्वरूप को, जो उसने प्रकट किया है, समझ सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के हर पहलू को और अधिक व्यापकता से, अधिक गहराई से, अधिक विस्तार से और अधिक अच्छी तरह से समझने देता है। तो क्या परमेश्वर के स्वभाव के हर पहलू को जानने का एकमात्र तरीका इन कहानियों के माध्यम से जानना ही है? नहीं, यह एकमात्र तरीका नहीं है! क्योंकि राज्य के युग में परमेश्वर जो कहता है और जो कार्य वह करता है, वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में, और उसे पूरी तरह से जानने में लोगों की बेहतर सहायता कर सकते हैं। किंतु मुझे लगता है कि बाइबल में दर्ज कुछ उदाहरणों और कहानियों के माध्यम से, जिनसे लोग परिचित हैं, परमेश्वर के स्वभाव को जानना और उसके स्वरूप को समझना थोड़ा आसान है। यदि मैं तुम्हें परमेश्वर को जानने में सक्षम करने के लिए न्याय और ताड़ना के उन वचनों और सत्यों को, जिन्हें आज परमेश्वर प्रकट करता है, शब्दशः लेता हूँ, तो तुम इसे बहुत उबाऊ और थकाऊ महसूस करोगे, और कुछ लोग तो यहाँ तक महसूस करेंगे कि परमेश्वर के वचन सूत्रबद्ध प्रतीत होते हैं। परंतु यदि मैं बाइबल की इन कहानियों को उदाहरणों के रूप में लेता हूँ, ताकि परमेश्वर के स्वभाव को जानने में लोगों को मदद मिल सके, तो वे इसे उबाऊ नहीं पाएँगे। तुम कह सकते हो कि इन उदाहरणों की व्याख्या करने के दौरान, उस समय जो परमेश्वर के हृदय में था, उसका विवरण—उसकी मनोदशा या मनोभाव, या उसके विचार और मत—लोगों को मनुष्य की भाषा में बताए गए हैं, और इस सबका उद्देश्य उन्हें यह समझाना और महसूस कराना है कि परमेश्वर का स्वरूप सूत्रबद्ध नहीं है। यह कोई पौराणिक या कुछ ऐसा नहीं है, जिसे लोग देख और छू नहीं सकते। यह कुछ ऐसा है, जो सचमुच मौजूद है, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं और समझ सकते हैं। यह चरम लक्ष्य है। तुम कह सकते हो कि इस युग में रहने वाले लोग धन्य हैं। वे परमेश्वर के पिछले कार्य की विस्तृत समझ प्राप्त करने के लिए बाइबल की कहानियों का उपयोग कर सकते हैं; वे उसके द्वारा किए गए कार्य से उसके स्वभाव को देख सकते हैं; वे उसके द्वारा व्यक्त किए गए इन स्वभावों से मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हैं, और उसकी पवित्रता की ठोस अभिव्यक्तियों और मनुष्यों के लिए उसकी देखरेख को समझ सकते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर के स्वभाव के अधिक विस्तृत और गहरे ज्ञान तक पहुँच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि तुम सभी लोग अब इसे महसूस कर सकते हो!

प्रभु यीशु द्वारा अनुग्रह के युग में पूर्ण किए गए कार्य के दायरे में तुम परमेश्वर के स्वरूप का एक अन्य पहलू देख सकते हो। यह पहलू उसके देह के द्वारा व्यक्त किया गया था, और उसकी मानवता के कारण लोग उसे देखने और समझने में सक्षम थे। मनुष्य के पुत्र में लोगों ने देखा कि किस प्रकार देह में परमेश्वर ने अपनी मानवता को जीया, और उन्होंने देह के माध्यम से व्यक्त परमेश्वर की दिव्यता देखी। इन दो प्रकार की अभिव्यक्तियों ने लोगों को एक बिलकुल सच्चा परमेश्वर दिखाया, और इनसे वे परमेश्वर के बारे में एक भिन्न अवधारणा बना सके। किंतु संसार के सृजन और व्यवस्था के युग के अंत के बीच की समयावधि में, अर्थात् अनुग्रह के युग से पहले, लोगों द्वारा जो पहलू देखे, सुने और अनुभव किए गए, वे थे परमेश्वर की दिव्यता, परमेश्वर द्वारा अभौतिक क्षेत्र में की और कही गई चीज़ें, और वे चीज़ें, जो उसने अपने वास्तविक व्यक्तित्व से, जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता था, व्यक्त की थीं। प्रायः, ये चीजें लोगों को यह महसूस कराती थीं कि परमेश्वर अपनी महानता में इतना बुलंद है कि वे उसके नज़दीक नहीं जा सकते। परमेश्वर ने सामान्यतः लोगों पर जो प्रभाव छोड़ा, वह यह था कि वह स्वयं को समझने-बूझने की उनकी क्षमता के भीतर और बाहर झिलमिलाता था, और लोग यहाँ तक महसूस करते थे कि उसके हर एक विचार और मत इतने रहस्यमय और मायावी हैं कि उन तक पहुँचने का कोई तरीका नहीं है, यहाँ तक कि वे उन्हें समझने-बूझने का प्रयास भी नहीं करते थे। लोगों के लिए, परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ बहुत दूर थी, इतनी दूर कि लोग उसे देख नहीं सकते थे, उसे छू नहीं सकते थे। ऐसा लगता था कि वह ऊपर आकाश में है, और ऐसा प्रतीत होता था कि वह बिलकुल भी अस्तित्व में नहीं है। अत: लोगों के लिए परमेश्वर के हृदय और मन को या उसकी किसी सोच को समझना अलभ्य था, यहाँ तक कि उनकी पहुँच से बाहर था। भले ही परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में कुछ ठोस कार्य किए, और उसने कुछ विशेष वचन भी जारी किए और कुछ विशेष स्वभाव व्यक्त किए, ताकि लोग उसके बारे में कुछ सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकें और उसे समझ-बूझ सकें, फिर भी अंतत:, परमेश्वर के स्वरूप की ये अभिव्यक्तियाँ एक अभौतिक क्षेत्र से आई थीं, और लोगों ने जो समझा, जो उन्होंने जाना, वह फिर भी उसके स्वरूप का दिव्य पहलू ही था। इस अभिव्यक्ति से मानवजाति उसके स्वरूप की ठोस अवधारणा प्राप्त नहीं कर सकी, और परमेश्वर के बारे में उनकी धारणा अभी भी "एक आध्यात्मिक देह, जिसके करीब जाना कठिन है, जो अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है" के दायरे में ही अटकी हुई थी। चूँकि लोगों के सामने प्रकट होने के लिए परमेश्वर ने भौतिक क्षेत्र की किसी विशिष्ट वस्तु या छवि का उपयोग नहीं किया था, इसलिए वे अभी भी मानवीय भाषा का उपयोग करके उसे परिभाषित करने में असमर्थ थे। अपने हृदय और मस्तिष्क में लोग परमेश्वर के लिए एक मानक स्थापित करने, उसे मूर्त और मानवीय बनाने के लिए हमेशा अपनी भाषा का उपयोग करना चाहते थे, जैसे कि वह कितना ऊँचा है, वह कितना बड़ा है, वह कैसा दिखाई देता है, वह ठीक-ठीक क्या पसंद करता है और उसका व्यक्तित्व कैसा है। वास्तव में, अपने हृदय में परमेश्वर जानता था कि लोग इस तरह से सोचते हैं। वह लोगों की आवश्यकताओं के बारे में बहुत स्पष्ट था, और निस्संदेह वह यह भी जानता था कि उसे क्या करना चाहिए, इसलिए अनुग्रह के युग में उसने एक अलग तरीके से अपने कार्य को अंजाम दिया। यह नया तरीका दिव्य और मानवीय दोनों था। जिस समयावधि में प्रभु यीशु काम कर रहा था, उसमें लोग देख सकते थे कि परमेश्वर की अनेक मानवीय अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरण के लिए, वह नृत्य कर सकता था, वह विवाहों में शामिल हो सकता था, वह लोगों के साथ संगति कर सकता था, उनसे बात कर सकता था और उनके साथ विभिन्न मामलों में चर्चा कर सकता था। इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु ने बहुत-सा ऐसा कार्य भी पूरा किया, जो उसकी दिव्यता दर्शाता था, और निस्संदेह यह समस्त कार्य परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति और प्रकाशन था। इस दौरान, चूँकि परमेश्वर की दिव्यता एक साधारण देह में उस रूप में साकार हुई थी, जिसे लोग देख और छू सकते थे, इसलिए अब उन्होंने यह महसूस नहीं किया कि वह अनुभूति के भीतर और बाहर झिलमिलाता है, या वे उसके करीब नहीं जा सकते। इसके विपरीत, वे मनुष्य के पुत्र की हर गतिविधि, उसके वचनों और कार्य के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा या उसकी दिव्यता को समझने की कोशिश कर सकते थे। मनुष्य के देहधारी पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता व्यक्त की और परमेश्वर की इच्छा को मानवजाति तक पहुँचाया। और परमेश्वर की इच्छा और स्वभाव की अभिव्यक्ति के माध्यम से उसने लोगों के सामने उस परमेश्वर को भी प्रकट किया, जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता और जो आध्यात्मिक क्षेत्र में रहता है। लोगों ने स्वयं परमेश्वर को मूर्त रूप में, माँस और रक्त से निर्मित देखा। तो मनुष्य के देहधारी पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान, हैसियत, छवि, स्वभाव और उसके स्वरूप जैसी चीज़ों को ठोस और मानवीय बना दिया। भले ही परमेश्वर की छवि के संबंध में मनुष्य के पुत्र के बाहरी रूप-रंग की कुछ सीमाएँ थीं, किंतु उसका सार और स्वरूप स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाने में पूर्णतः समर्थ थे—केवल अभिव्यक्ति के रूप में कुछ भिन्नताएँ थीं। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता और दिव्यता, दोनों रूपों में स्वयं परमेश्वर की पहचान और हैसियत दर्शाई। हालाँकि इस दौरान परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की और मानवजाति के सामने मनुष्य के पुत्र की पहचान और हैसियत के साथ खड़ा हुआ, और इसने लोगों को मानवजाति के बीच परमेश्वर के सच्चे वचनों और कार्य को देखने-सुनने और अनुभव करने का अवसर दिया। इसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और महानता के संबंध में अंतर्दृष्टि और साथ ही परमेश्वर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की एक प्रारंभिक समझ और परिभाषा भी प्रदान की। भले ही प्रभु यीशु द्वारा पूर्ण किया गया कार्य, कार्य करने के उसके तरीके और उसके बोलने का परिप्रेक्ष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के वास्तविक व्यक्तित्व से भिन्न थे, फिर भी उसकी हर चीज़ वास्तव में स्वयं परमेश्वर को दर्शाती थी, जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था—इससे इनकार नहीं किया जा सकता! अर्थात्, परमेश्वर चाहे किसी भी रूप में प्रकट हो, वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में बात करे, या किसी भी छवि में वह मानवजाति के सामने आए, वह अपने सिवाय किसी को नहीं दर्शाता। वह न तो किसी मनुष्य को दर्शा सकता है, न ही भ्रष्ट मानवजाति को दर्शा सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा दिए गए एक दृष्टांत पर नज़र डालेंगे।

3. खोई हुई भेड़ का दृष्टांत

मत्ती 18:12-14 तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को न ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ कि वह उन निन्यानबे भेड़ों के लिये जो भटकी नहीं थीं, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिये करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।

यह अंश एक दृष्टांत है—यह लोगों को किस प्रकार की भावना देता है? यहाँ उपयोग किया गया अभिव्यक्ति का यह तरीका—दृष्टांत—मानवीय भाषा में एक अलंकार है, और इस प्रकार यह मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर आता है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा ही कुछ कहा होता, तो लोगों को लगता कि ये वचन वास्तव में परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं, लेकिन जब अनुग्रह के युग में मनुष्य के पुत्र ने ये वचन कहे, तब लोगों को ये सुकून देने वाले, गर्मजोशी से भरे और अंतरंग महसूस हुए। जब परमेश्वर देह बन गया, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने अपने हृदय की वाणी व्यक्त करने के लिए अपनी मानवता से आए एक बहुत ही उचित दृष्टांत का उपयोग किया। इस वाणी ने परमेश्वर की अपनी वाणी और उस कार्य का प्रतिनिधित्व किया, जो वह उस युग में करना चाहता था। इसने अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये को भी दर्शाया। लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के परिप्रेक्ष्य से देखें तो, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए वह जो कुछ भी कर सकता है, सो करेगा। इसने उस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को दर्शाया, जब वह देह में था। परमेश्वर ने उस कार्य में अपने संकल्प और रवैये को दर्शाने के लिए इस दृष्टांत का उपयोग किया। यह परमेश्वर के देह बनने का लाभ था : वह मानवजाति के ज्ञान का लाभ उठा सकता था और लोगों से बात करने और अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए मानवीय भाषा का उपयोग कर सकता था। उसने मनुष्य को अपनी गहन, दिव्य भाषा, जिसे समझने में लोगों को संघर्ष करना पड़ता था, मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से समझाई या "अनुवादित" की। इससे लोगों को उसकी इच्छा को समझने और यह जानने में सहायता मिली कि वह क्या करना चाहता है। वह मानवीय भाषा का प्रयोग करके मानवीय परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ वार्तालाप कर सकता था, और लोगों के साथ उस तरीके से बातचीत कर सकता था, जिसे वे समझ सकते थे। यहाँ तक कि वह मानवीय भाषा और ज्ञान का उपयोग करके बोल और कार्य कर सकता था, ताकि लोग परमेश्वर की दयालुता और घनिष्ठता महसूस कर सकें, ताकि वे उसके हृदय को देख सकें। तुम लोग इसमें क्या देखते हो? क्या परमेश्वर के वचनों और कार्यों में कोई निषेध है? लोग समझते हैं कि ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे परमेश्वर यह बताने के लिए कि स्वयं परमेश्वर क्या कहना चाहता है, कौन-सा कार्य करना चाहता है, या अपनी स्वयं की इच्छा व्यक्त करने के लिए वह मनुष्यों के ज्ञान, भाषा या बोलने के तरीकों का उपयोग कर सके। किंतु यह गलत सोच है। परमेश्वर ने इस प्रकार के दृष्टांत का उपयोग इसलिए किया, ताकि लोग परमेश्वर की वास्तविकता और ईमानदारी महसूस कर सकें, और उस समयावधि के दौरान लोगों के प्रति उसके रवैये को देख सकें। इस दृष्टांत ने लंबे समय से व्यवस्था के अधीन जी रहे लोगों को स्वप्न से जगा दिया, और इसने अनुग्रह के युग में रहने वाले लोगों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेरित किया। इस दृष्टांत वाले अंश को पढ़कर लोग मानवजाति को बचाने में परमेश्वर की ईमानदारी को जानते हैं और परमेश्वर के हृदय में मानवजाति को दिए गए वजन और महत्व को समझते हैं।

आओ, इस अंश के अंतिम वाक्य पर एक नज़र डालें : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" क्या ये प्रभु यीशु के अपने वचन थे या उसके स्वर्गिक पिता के वचन थे? सतही तौर पर ऐसा लगता है कि यह प्रभु यीशु है जो बोल रहा है, किंतु उसकी इच्छा स्वयं परमेश्वर की इच्छा को दर्शाती है, इसीलिए उसने कहा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो।" उस समय लोग केवल स्वर्गिक पिता को ही परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते थे, और यह मानते थे कि यह व्यक्ति, जिसे वे अपनी आँखों के सामने देखते हैं, बस उसके द्वारा भेजा हुआ है और यह स्वर्गिक पिता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इसीलिए प्रभु यीशु को इस दृष्टांत के अंत में यह वाक्य जोड़ना पड़ा, ताकि लोग वास्तव में मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा अनुभव कर सकें, और उसके कथन की प्रामाणिकता और सटीकता महसूस कर सकें। भले ही यह वाक्य कहना एक साधारण बात थी, किंतु यह बहुत परवाह और प्रेम के साथ बोला गया था और इसने प्रभु यीशु की विनम्रता और प्रच्छन्नता प्रकट की। चाहे परमेश्वर देह बना या उसने आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य किया, वह मनुष्य के हृदय को सर्वोत्तम ढंग से जानता था, और सर्वोत्तम ढंग से समझता था कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, और जानता था कि लोग किस बात से चिंतित हैं और क्या चीज़ उन्हें भ्रमित करती है, इसीलिए उसने यह वाक्य जोड़ा। इस वाक्य ने मानवजाति में छिपी एक समस्या उजागर कर दी : मनुष्य के पुत्र ने जो कुछ कहा, लोगों को उस पर संशय था, अर्थात्, जब प्रभु यीशु बोल रहा था, तो उसे यह जोड़ना पड़ा : "ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्‍ट हो," और केवल इस आधार पर ही उसके वचन लोगों को अपनी सटीकता का विश्वास दिलाने और उनकी विश्वसनीयता बढ़ाने में सफल हो सकते थे। यह दिखाता है कि जब परमेश्वर एक सामान्य मनुष्य का पुत्र बन गया, तब परमेश्वर और मानवजाति के बीच एक बड़ा असहज संबंध था, और कि मनुष्य के पुत्र की स्थिति बड़ी उलझन भरी थी। इससे यह भी पता चलता है कि उस समय मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की हैसियत कितनी मामूली थी। जब उसने यह कहा, तो यह वास्तव में लोगों को यह बताने के लिए था : तुम लोग निश्चिंत हो सकते हो—ये वचन मेरे अपने हृदय की बात नहीं दर्शाते, बल्कि ये उस परमेश्वर की इच्छा है, जो तुम लोगों के हृदय में है। मानवजाति के लिए, क्या यह एक विडंबना नहीं थी? भले ही देह में रहकर काम कर रहे परमेश्वर को अनेक ऐसे फायदे थे, जो उसके अपने व्यक्तित्व में नहीं थे, फिर भी उसे उनके संदेहों और अस्वीकृति को और साथ ही उनकी संवेदनशून्यता और मूढ़़ता को भी सहन करना पड़ा। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के कार्य की प्रक्रिया मनुष्य की अस्वीकृति और उसके द्वारा अपने साथ प्रतिस्पर्धा किए जाने का अनुभव करने की प्रक्रिया थी। इससे भी अधिक, यह मानवजाति के भरोसे को निरंतर जीतने और अपने स्वरूप और सार के माध्यम से मानवजाति पर विजय पाने के लिए कार्य करने की प्रक्रिया थी। यह इतना ही नहीं था कि देहधारी परमेश्वर शैतान के विरुद्ध जमीनी लड़ाई लड़ रहा था; इससे भी अधिक यह परमेश्वर का एक सामान्य मनुष्य बनकर अपने अनुयायियों के साथ संघर्ष शुरू करना था, और इस संघर्ष में मनुष्य के पुत्र ने अपनी विनम्रता के साथ, अपने स्वरूप के साथ और अपने प्रेम और बुद्धि के साथ अपना कार्य पूरा किया। उसने उन लोगों को प्राप्त किया जिन्हें वह चाहता था, वह पहचान और हैसियत प्राप्त की जिसका वह हकदार था, और अपने सिंहासन की ओर "लौट" गया।

आगे, आओ पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित दो अंश देखें।

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।"

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, "तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।"

इन दोनों अंशों में से एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में। ये दोनों विषय वास्तव में उस कार्य पर प्रकाश डालते हैं, जिसे प्रभु यीशु अनुग्रह के युग में करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह अपने साथ अपने कार्य का एक चरण, जो कि एक विशिष्ट कार्य था, और उस स्वभाव को लेकर आया, जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में जो कुछ भी मनुष्य के पुत्र ने किया, वह सब उस कार्य के चारों ओर घूमता था, जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न तो उससे कुछ ज़्यादा करता, न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया, वह सब इस युग से संबंधित था। चाहे उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से, और चाहे उसने ऐसा किसी भी तरह से या किसी भी परिप्रेक्ष्य से किया हो, उसका उद्देश्य लोगों को यह समझने में मदद करना था कि वह क्या करना चाहता है, उसकी क्या इच्छा है और लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं। वह अपनी इच्छा समझने और जानने, और मानवजाति को बचाने के अपने कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम प्रभु यीशु को यह व्यक्त करने के लिए कि वह मानवजाति को क्या बताना चाहता है, अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए देखते हैं। इससे भी अधिक्, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से लोगों के साथ बात करते हुए, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए और उनके अनुरोध के अनुसार उनकी सहायता करते हुए देखते हैं। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में नहीं देखा गया था, जो अनुग्रह के युग से पहले आया था। वह मानवजाति के साथ अधिक अंतरंग और उनके प्रति अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणाम प्राप्त करने में अधिक सक्षम हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने का रूपक इस बिंदु को वास्तव में स्पष्ट करता है। इस रूपक में प्रयुक्त संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा था, उस समय उसका क्या इरादा था। उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। "सात बार के सत्तर गुने तक" के विचार के भीतर किस प्रकार का विचार निहित है? वह विचार यह है कि लोग क्षमा को अपना खुद का उत्तरदायित्व बना लें, ऐसी चीज़ जो उन्हें अवश्य सीखनी चाहिए, और ऐसा मार्ग जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। हालाँकि यह मात्र एक रूपक था, किंतु इसने एक महत्त्वपूर्ण बिंदु को उजागर करने का काम किया। इसने उसका आशय गहराई से समझने और अभ्यास के उचित तरीके, सिद्धांत और मानक खोजने में लोगों की सहायता की। इस रूपक ने लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझने में सहायता की और उन्हें एक सही धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, किंतु दूसरों के प्रति सहनशीलता और समझदारी के रवैये के साथ। जब प्रभु यीशु ने यह कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में "सात बार के सत्तर गुने" की संख्या के बारे में सोच रहा था? नहीं, वह उसके बारे में नहीं सोच रहा था। क्या परमेश्वर दवारा मनुष्य को क्षमा किए जाने की कोई संख्या है? ऐसे बहुत-से लोग हैं, जो यहाँ उल्लिखित "बारियों की संख्या" में बहुत रुचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या का उद्गम और अर्थ समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। किंतु वास्तव में यह सिर्फ मानवीय भाषा के अलंकार थे, जिसका परमेश्वर ने उपयोग किया था। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मानवजाति से प्रभु यीशु की अपेक्षाओं के साथ लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब लोग उसके कथन को अधिक नहीं समझते थे, क्योंकि उसके वचन पूर्ण दिव्यता से आते थे। उसके कथन का परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मानवजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से व्यक्त होता था, जिसे लोग देख नहीं सकते थे। वे लोग जो देह में जीते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परंतु देह बनने के बाद परमेश्वर ने मानवजाति से मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उसे पार कर गया। वह अपना स्वभाव, अपनी इच्छा और अपना रवैया उन चीज़ों के माध्यम से, जिनकी मनुष्य कल्पना कर सकते थे, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा था और जो उनके सामने आई थीं, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, और ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा व्यक्त कर सका, जिसे वे ग्रहण कर सकते थे, ताकि मानवजाति अपनी क्षमता के दायरे के भीतर और अपनी योग्यता की सीमा तक परमेश्वर को समझ और जान सके, और उसके इरादे और अपेक्षित मानक समझ सके। यह मानवता में परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत था। यद्यपि देह में कार्य करने के परमेश्वर के तरीके और सिद्धांत मुख्यतः मानवता के द्वारा या उसके माध्यम से प्राप्त किए गए थे, फिर भी इसने सचमुच ऐसे परिणाम प्राप्त किए, जिन्हें सीधे दिव्यता में कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक और लक्ष्यित था, उसकी पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में वह व्यवस्था के युग से आगे निकल गया।

आगे, आओ प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह सीधे दिव्यता में व्यक्त की गई चीज़ है? नहीं, स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़ें थीं, जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल मनुष्य ही ऐसी बात कहेंगे, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से उसी तरह प्रेम कर, जिस तरह तू अपने जीवन को सँजोता है।" बोलने का यह तरीका केवल मनुष्य का है। परमेश्वर ने कभी इस तरह बात नहीं की। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं है, क्योंकि उसे मनुष्य के प्रति अपने प्रेम को विनियमित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती, "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर," क्योंकि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का स्वाभाविक प्रकाशन है। तुम लोगों ने कभी परमेश्वर को ऐसा कुछ कहते हुए सुना है : "मैं मनुष्य से उसी तरह प्रेम करता हूँ, जिस तरह मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ"? तुमने नहीं सुना होगा, क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार और स्वरूप में है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम, उसका रवैया और लोगों के साथ उसके व्यवहार का तरीका उसके स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और प्रकाशन हैं। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित पद्धति या किसी नैतिक संहिता का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हो? जब परमेश्वर ने मानवता में काम किया, तो उसकी बहुत-सी पद्धतियाँ, वचन और सत्य मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परंतु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, स्वरूप और उसकी इच्छा भी लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा, वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत दर्शाते हैं। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव सटीक तरीके से व्यक्त किया। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतःक्रिया में कोई व्यवधान या बाधा नहीं थी, बल्कि वास्तव में वह मानवजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। अब, इस बिंदु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण में अनेक समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण भी परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषा का उपयोग करता है, और यह स्वयं परमेश्वर की इच्छा व्यक्त करने के लिए मनुष्य के दैनिक जीवन और उसके ज्ञान में से ढेर सारी भाषा और पद्धतियों का प्रयोग करता है। जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से बात करे या दिव्य परिप्रेक्ष्य से, अभिव्यक्ति की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ मनुष्य की भाषा और पद्धतियों के माध्यम से आती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर होता है। जब परमेश्वर देह बना, तो मानवता में बड़े होते हुए उसने मानवजाति के ज्ञान, सामान्य ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर में ये चीज़ें उन मनुष्यों से आई थीं, जिन्हें उसने सृजित किया था। वे देहधारी परमेश्वर के लिए अपने स्वभाव और दिव्यता को व्यक्त करने के साधन बन गए, जिससे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा के उपयोग द्वारा मानवजाति के बीच कार्य करते हुए अपने कार्य को अधिक प्रासंगिक, अधिक प्रामाणिक और अधिक सटीक बना पाया। इससे उसका कार्य लोगों के लिए अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बन गया, और इस प्रकार उसने वे परिणाम प्राप्त किए, जो परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में सक्षम हुआ जिसे वह करना चाहता था, तो ऐसा तब हुआ जब वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त कर सकता था, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरुआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब कोई "पीढ़ी का अंतर" नहीं रहा था, कि परमेश्वर शीघ्र ही संदेशवाहकों के माध्यम से संवाद करने का अपना कार्य रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर देह में वे सभी वचन और कार्य व्यक्तिगत रूप से व्यक्त कर सकेगा, जिन्हें वह व्यक्त करना चाहता है। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है, वे उसके अधिक करीब थे, और उसके प्रबंधन-कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और संपूर्ण मानवजाति का सामना एक नए युग से होने वाला था।

जिस किसी ने भी बाइबल पढ़ी है, वह जानता है कि जब प्रभु यीशु का जन्म हुआ था, तो बहुत-सी चीज़ें घटित हुई थीं। उन घटनाओं में से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा द्वारा उसका शिकार किया जाना, जो इतनी चरम घटना थी कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उससे कम उम्र के सभी बच्चों की हत्या कर दी गई थी। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह धारण कर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम उठाया था; और मानवजाति को बचाने के अपने प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई, वह भी स्पष्ट है। परमेश्वर द्वारा देह में मानवजाति के बीच किए गए अपने कार्य से रखी गई बड़ी आशाएँ भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मानवजाति के बीच अपना कार्य करने में सक्षम हुआ, तो उसे कैसा लगा? लोगों को इसे थोड़ा-बहुत समझने में सक्षम होना चाहिए, है न? कम से कम, परमेश्वर प्रसन्न था, क्योंकि वह मानवजाति के बीच अपना नया कार्य आरंभ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई पूरी करने का अपना कार्य आरंभ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनंद से अभिभूत हो गया, क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद वह अंततः एक सामान्य मनुष्य की देह धारण कर सका था और मांस और रक्त से बने मनुष्य के रूप में, जिसे लोग देख और छू सकते थे, अपना नया कार्य आरंभ कर सका था। अंततः वह मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और दिल से बात कर सकता था। अंततः परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मानवजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानवजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठकर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को देख भी सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और हर चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं, और वह भी अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में अपने कार्य की उसकी पहली विजय थी। यह भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—निस्संदेह परमेश्वर इससे सबसे अधिक प्रसन्न था। तबसे परमेश्वर ने मानवजाति के बीच अपने कार्य में पहली बार एक प्रकार का सुकून महसूस किया। घटित होने वाली ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और स्वाभाविक थीं, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया, वह भी बहुत ही वास्तविक था। मानवजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्ट महसूस करता है, तो ऐसा तब होता है, जब मनुष्य परमेश्वर और उद्धार के निकट आ सकता है। परमेश्वर के लिए यह उसके नए कार्य की शुरुआत भी है, अपनी प्रबंधन-योजना में आगे बढ़ना भी है, और इसके अतिरिक्त, ये वे अवसर भी होते हैं, जब उसके इरादे पूर्णता की ओर अग्रसर होते हैं। मानवजाति के लिए, ऐसे अवसर का आगमन सौभाग्यशाली और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर के उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य का एक नया चरण कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरुआत करता है, और जब इस नए कार्य और नई शुरुआत का सूत्रपात और प्रस्तुति मानवजाति के बीच की जाती है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण का परिणाम पहले से ही निर्धारित और पूरा कर लिया जाता है, और उसका अंतिम परिणाम और फल परमेश्वर द्वारा पहले ही देख लिया गया होता है। साथ ही, ऐसा तब होता है, जब ये परिणाम परमेश्वर को संतुष्टि महसूस कराते हैं, और निस्संदेह ऐसा तब होता है, जब उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, क्योंकि अपनी नज़रों में उसने पहले ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर लिया है जिनकी उसे तलाश है, और वह पहले ही इस समूह को प्राप्त कर चुका है, ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने और उसे संतुष्टि प्रदान करने में सक्षम है। इस प्रकार, वह अपनी चिंताएँ एक ओर रख देता है और प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरंभ करने में समर्थ होता है, और वह उस कार्य को बिना किसी बाधा के करना आरंभ कर देता है जो उसे करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब-कुछ पूरा किया जा चुका है, तो अंत उसकी नज़र में पहले से ही होता है। इस कारण से वह संतुष्ट होता है और उसका हृदय प्रसन्न होता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग सोच सकते हो कि इसका क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रोए? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? यदि हाँ, तो वह कौन-सा गीत गाएगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुंदर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनंद और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता हो। वह उसे मनुष्य के लिए गा सकता है, अपने लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब सामान्य है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनंद और दुःख हैं, और उसकी विभिन्न भावनाएँ विभिन्न तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। यह उसका अधिकार है, और इससे अधिक कुछ भी सामान्य और उचित नहीं हो सकता। लोगों को इस बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, परमेश्वर पर "वशीकरण मंत्र"[क] का उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, और इस प्रकार उसकी खुशी या कोई भी अन्य भावना सीमित नहीं करनी चाहिए। लोगों के विचार में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता, आँसू नहीं बहा सकता, रो नहीं सकता—वह कोई मनोभाव व्यक्त नहीं कर सकता। इन दो संगतियों के दौरान हमने जो बातचीत की है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतंत्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग परमेश्वर की उदासी के बारे में सुनकर सचमुच उसकी उदासी महसूस कर पाओ, और उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनकर तुम लोग सचमुच उसकी प्रसन्नता महसूस कर पाओ, तो कम से कम तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ होगे कि परमेश्वर को क्या चीज़ प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उदास करती है। जब तुम परमेश्वर के उदास होने पर उदास महसूस कर पाओ और उसके प्रसन्न होने पर प्रसन्न महसूस कर पाओ, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और अब उसके और तुम्हारे बीच में कोई बाधा नहीं होगी। तुम परमेश्वर को अब मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं और ज्ञान से विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम लोगों की इस प्रकार की आकांक्षा है? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम इसे हासिल कर सकते हो?

फुटनोट :

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें