परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग एक

हमारी पिछली सभा के दौरान हमने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को आपस में साझा किया था। क्या तुम लोगों को स्मरण है कि वह क्या था? मुझे इसे दोहराने दो। हमारी पिछली सहभागिता का विषय था: परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर। क्या यह तुम लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है? इसका कौन सा भाग तुम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है? परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव या स्वयं परमेश्वर? तुम लोगों को किस में सबसे ज्यादा रूचि है? तुम लोग किस भाग के विषय में सबसे अधिक सुनना चाहते हो? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव को उसके कार्य के हर एक पहलु में देखा जा सकता है, और उसके स्वभाव को हमेशा उसके कार्य और सभी स्थानों में प्रकट होता है, और वास्तव में यह स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधकीय योजना में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते हैं।

परमेश्वर के कार्य के विषय में हमारी पिछली सभा की विषय-वस्तु बाइबिल में दर्ज है जो बहुत पहले घटित हुई थी। वे सब के सब परमेश्वर एवं मनुष्य की कहानियां थीं, और वे मनुष्य के साथ घटित हुईं और उसी समय उन्होंने परमेश्वर की भागीदारी एवं अभिव्यक्ति को शामिल किया, अतः ये कहानियाँ परमेश्वर को जानने के लिए विशेष मूल्य एवं महत्व रखती हैं। मनुष्य की सृष्टि करने के तुरन्त बाद, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ संलग्न होना और मनुष्य से बात करना शुरू कर किया था, और उसका स्वभाव मनुष्य पर प्रकट होना आरम्भ हो गया था। दूसरे शब्दों में, जब पहली बार परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न हुआ तब से वह बिना रुके वह अपने सार और स्वरूप को मनुष्य पर सार्वजनिक करने लगा था। इसके बावजूद कि प्रारम्भिक लोग या वर्तमान लोग इसे देखने या समझने के योग्य हैं या नहीं, संक्षेप में परमेश्वर मनुष्य से बात करता है और मनुष्य के बीच कार्य करता है, अपने स्वभाव को प्रकट करता है और अपने सारको अभिव्यक्त करता है—जो एक तथ्य है, और किसी भी व्यक्ति के द्वारा इसे नकारा नहीं जा सकता है। इसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर सार, और स्वरूप सारवह निरन्तर जारी रहता है और प्रकट होता है जब वह मनुष्य के साथ कार्य करता है और संलग्न होता है। उसने किसी भी चीज़ को मनुष्य से कभी नहीं छिपाया है या कभी गुप्त नहीं रखा है, परन्तु इसके बदले उसे सार्वजनिक किया है और बिना कुछ छिपाए अपने स्वयं के स्वभाव को सार्वजानिक किया है। इस प्रकार, परमेश्वर आशा करता है कि मनुष्य उसे जान सकता है और उसके स्वभाव एवं सार को समझ सकता है। वह नहीं चाहता है कि मनुष्य उसके स्वभाव एवं सार से ऐसा व्यवहार करे जैसे कि वे अनन्त रहस्य हों, न ही वह यह चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर को ऐसा समझे कि वह एक पहेली हो जिसको कभी भी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब मानवजाति परमेश्वर को जान जाती है केवल तभी मनुष्य आगे का मार्ग जान सकता है और परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकार करने के योग्य हो सकता है, और केवल ऐसी ही मानवजाति सचमुच में परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिता सकती है, और ज्योति में जीवन बिता सकती है, और परमेश्वर की आशीषों के मध्य जीवन बिता सकती है।

वे वचन एवं वह स्वभाव जिन्हें परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रकट किया गया था वे उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उस के सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न होता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह क्या कहता है या करता है, या वह कौन सा स्वभाव प्रकट करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के विषय में क्या देखता है, क्योंकि वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य कितना कुछ एहसास करने, बूझने या समझने के योग्य है, यह सब कुछ परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है—मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा! यह सन्देह से परे है! मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि जिस प्रकार वह लोगों से अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार हों, कि जो वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसे करें, कि जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार जीवन जीएं, और जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार परमेश्वर की इच्छा की सम्पूर्णता को पूरा करने के योग्य बनें। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अविभाज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने स्वभाव और स्वरूप को जारी करता है और उसी समय वह मनुष्य से मांग कर रहा है। इसमें कुछ असत्य नहीं है, कोई बहाना नहीं है, कोई गोपनीयता नहीं है, और कोई सजावट नहीं है। फिर भी मनुष्य जानने में क्यों असमर्थ है, और क्यों वह परमेश्वर के स्वभाव को कभी स्पष्ट रूप से एहसास करने के योग्य नहीं हो पाया है? और क्यों उसने कभी परमेश्वर की इच्छा का एहसास नहीं किया है? जिसे परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रदर्शित किया गया है यह वही है जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है, और उसके सच्चे स्वभाव का हर एक छोटा सा भाग एवं विशेष पहलू है—अतः मनुष्य क्यों नहीं देख सकता है? मनुष्य क्यों ज्ञान को पूरी तरह से समझने में असमर्थ है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। और यह कारण क्या है? सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही, मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं किया है। प्राचीन समयों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के सम्बन्ध में क्या किया था, वह मनुष्य जिसे बस अभी अभी सृजा गया था, उस मनुष्य ने उससे एक साथी से बढ़कर व्यवहार नहीं किया था, कोई ऐसा जिस पर भरोसा किया जा सके, और उसके पास परमेश्वर का कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। दूसरे शब्दों में, वह नहीं जानता था कि इस अस्तित्व के द्वारा क्या जारी किया गया था—यह अस्तित्व जिस पर वह भरोसा रखता था और उसे अपने साथी के रूप में देखता है—वह परमेश्वर का सार था, न ही वह जानता था कि यह प्रभावशाली अस्तित्व वह परमेश्वर है जो सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है। सरल रूप से कहें, उस समय के लोगों के पास परमेश्वर की ज़रा सी भी जानकारी नहीं थी। वे नहीं जानते थे कि स्वर्ग एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों को उसी के द्वारा बनाया गया है, और वे इस बात से अनजान थे कि वह कहाँ से आया था, और इसके अतिरिक्त, कि वह कौन था। वास्तव में, उस बीते समय में परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा नहीं करता था कि वह उसे जाने, या उसे समझे, या वह सब कुछ जो उसने किया था उसे समझे, या उसकी इच्छा के विषय में जानकारी प्राप्त करे, क्योंकि ये मानवजाति की सृष्टि के बाद के अति प्राचीन समय थे। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के कार्य के लिए तैयारियाँ प्रारम्भ की, तब परमेश्वर ने मनुष्य के लिए कुछ किया और साथ ही मनुष्य से कुछ मांग करना शुरू किया, यह बताते हुए कि किस प्रकार परमेश्वर को भेंट चढ़ाएं और आराधना करें। केवल तभी मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में कुछ साधारण विचारों को अर्जित किया था, केवल तभी उसने मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच के अन्तर को जाना था, और यह कि वह परमेश्वर ही है जिसने मानवजाति की सृष्टि की थी। जब मनुष्य जान गया कि परमेश्वर परमेश्वर था और मनुष्य मनुष्य था, तो उसके एवं परमेश्वर के बीच में एक निश्चित दूरी बन गई, तब भी परमेश्वर ने अपेक्षा नहीं की कि मनुष्य के पास उसके विषय में अत्याधिक ज्ञान या गहरी समझ हो। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने कार्य के चरणों एवं परिस्थितियों के आधार पर मनुष्य से अलग अलग अपेक्षाएं कीं। इसमें तुम लोग क्या देखते हो? तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव के किस पहलू का एहसास करते हो? क्या परमेश्वर वास्तविक है? क्या परमेश्वर की अपेक्षाएं मनुष्य के लिए उचित हैं? परमेश्वर के द्वारा मानवजाति की सृष्टि के बाद अति प्राचीन समयों के दौरान, जब परमेश्वर ने मनुष्य पर विजय एवं सिद्धता का कार्य अभी तक नहीं किया था, और उससे बहुत सारे वचन नहीं कहे थे, तब उसने मनुष्य से थोड़ी सी ही मांग की थी। इसकी परवाह न करते हुए कि मनुष्य ने क्या किया और उसने किस प्रकार व्यवहार किया—भले ही उसने कुछ ऐसे कार्यों को किया जिनसे परमेश्वर को ठेस लगी—फिर भी परमेश्वर ने सब को क्षमा किया और सभी बातों को अनदेखा किया। क्योंकि परमेश्वर जानता था कि उसने मनुष्य को क्या दिया था, और जानता था कि मनुष्य के भीतर क्या था, इस प्रकार वह अपेक्षाओं के स्तर को जानता था जिन्हें उसे मनुष्य से करनी चाहिए। यद्यपि उस समय उसकी अपेक्षाओं का स्तर बहुत ही नीचे था, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका स्वभाव महान नहीं था, या यह कि उसकी बुद्धिमत्ता एवं सर्वसामर्थता सिर्फ खोखले वचन थे। क्योंकि मनुष्य के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और स्वयं परमेश्वर को जानने का केवल एक ही मार्ग है: परमेश्वर के प्रबंधन एवं मानवजाति के उद्धार के कार्य के चरण का अनुसरण करने के द्वारा, और उन वचनों को स्वीकार करने के द्वारा जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति से कहा है। परमेश्वर के स्वरूप और परमेश्वर के स्वभाव को जानने से, क्या मनुष्य परमेश्वर से अब भी कहेगा कि उसे अपने वास्तविक व्यक्तित्व को दिखाए? मनुष्य ऐसा नहीं कहेगा, और ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझने के बाद, मनुष्य पहले ही स्वयं सच्चे परमेश्वर को देख चुका होगा, और पहले ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख चुका होगा। यह अवश्य घटित होनेवाला परिणाम है।

जब परमेश्वर का कार्य एवं योजना बिना रुके निरन्तर आगे बढ़ती जाती थी, और जब परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक चिन्ह के रूप में मेघधनुष की वाचा को स्थापित किया कि वह जलप्रलय का इस्तेमाल करके दोबारा कभी संसार का अन्त नहीं करेगा उसके पश्चात्, परमेश्वर के पास ऐसे लोगों को हासिल करने की अत्याधिक तीव्र इच्छा थी जो उसके साथ एक मन के हो सकते थे। इसी प्रकार परमेश्वर के पास भी बहुत ही प्रबल अभिलाषा थी कि ऐसे लोगों को हासिल करे जो पृथ्वी पर उसकी इच्छा पर चलने में समर्थ हैं, और इसके अतिरिक्त, लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो अंधकार की शक्तियों को तोड़कर आज़ाद होने में समर्थ हैं, और जो शैतान के द्वारा बांधे न जाएं, और पृथ्वी पर उसकी गवाही देने में समर्थ हैं। लोगों के ऐसे समूह को हासिल करना परमेश्वर की लम्बे समय की इच्छा थी, जिस का वह सृष्टि की रचना के समय से ही इंतज़ार कर रहा था। इस प्रकार, संसार का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा जलप्रलय का उपयोग करने के बावजूद, या मनुष्य के साथ उसकी वाचा के बावजूद, परमेश्वर की इच्छा, मन का प्रारुप, योजना, और आशाएं एक समान बनी रहीं। जो वह करना चाहता था, जिसकी उसने सृष्टि की रचना के समय के बहुत पहले से लालसा की थी, वह यह था कि मानवजाति के मध्य से उन लोगों को हासिल करे जिन्हें उसने हासिल करने की इच्छा की थी—कि लोगों के ऐसे समूह को हासिल करे जो उसके स्वभाव को बूझने एवं जानने, और उसकी इच्छा को समझने में समर्थ थे, एक ऐसा समूह जो उसकी आराधना करने में समर्थ थे। लोगों का ऐसा समूह सचमुच में उसके लिए गवाही देने में सक्षम है, और ऐसा कहा जा सकता है कि वे उसके विश्वासपात्र हैं।

आज, आओ हम परमेश्वर के कदमों के निशानों को निरन्तर याद करें और उसके कार्य के चरणों का निरन्तर अनुसरण करें, ताकि हम परमेश्वर के विचारों एवं युक्तियों को, और प्रत्येक चीज़ को उजागर कर सकें जिसका परमेश्वर से सम्बन्ध है, वे सभी चीज़ें इतने लम्बे से "भण्डार में रखी" हुई हैं। इन चीज़ों के माध्यम से हम परमेश्वर के स्वभाव को जान जाएंगे, परमेश्वर के सार को समझ पाएंगे, हम परमेश्वर को अपने हृदयों में आने की अनुमति देंगे, और हम में से प्रत्येक परमेश्वर से अपनी दूरीयों को कम करते हुए धीरे-धीरे परमेश्वर के और करीब आएगा।

हमने पिछले समय जो बातचीत की थी उसका एक भाग इस बात से सम्बन्धित है कि परमेश्वर ने मनुष्य के साथ ऐसी वाचा क्यों बांधी। इस समय, हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंशों के विषय में विचार विमर्श करेंगे। आओ हम पवित्र शास्त्र को पढ़ने के द्वारा प्रारम्भ करें।

क. अब्राहम

1. परमेश्वर अब्राहम से एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

(उत्पत्ति 17:15-17) फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

(उत्पत्ति 17:21-22) परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

2. अब्राहम इसहाक को बलिदान करता है

(उत्पत्ति 22:2-3) उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" "अतः अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।"

(उत्पत्ति 22:9-10) जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता है जिसे करने का परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय करता है

तो, तुम लोगों ने अभी अभी अब्राहम की कहानी को सुना है। जब बाढ़ ने संसार को नष्ट कर दिया उसके पश्चात् परमेश्वर के द्वारा उसे चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, और जब वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसे मिली। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की जिसका संकेत हमें पवित्र शास्त्र में मिलता हैः "मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर के द्वारा उसे पुत्र दिए जाने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्र शास्त्र निम्नलिखित लेख प्रदान करता हैः "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, 'क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?'" दूसरे शब्दों में, ये दम्पत्ति इतने बूढ़े थे कि सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने अब्राहम से अपनी प्रतिज्ञा की उसके पश्चात् उसने क्या किया? वह हँसता हुआ अपने मुंह के बल गिरा, और अपने आप से कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम ने विश्वास किया कि यह असम्भव था—जिसका अर्थ है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा उसके लिए एक मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं थी। मनुष्य के दृष्टिकोण से, इसे मनुष्य के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है, और उसी तरह परमेश्वर के द्वारा भी हासिल नहीं किया जा सकता था और यह परमेश्वर के लिए असम्भव था। कदाचित्, अब्राहम के लिए यह हास्यास्पद बात थी: परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी ऐसा लगता है कि वह यह नहीं जानता है कि कोई व्यक्ति जो इतना वृद्ध है वह सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ है; वह सोचता है कि वह मुझे सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति देगा, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—वास्तव में यह असम्भव है! और इस प्रकार, अब्राहम मुँह के बल गिरा और हँसने लगा, और अपने आप में सोचने लगा: असम्भव—परमेश्वर मुझ से मज़ाक कर रहा है, यह सही नहीं हो सकता है! उसने परमेश्वर के वचनों को गम्भीरता से नहीं लिया था। अतः, परमेश्वर की दृष्टि में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धर्मी।) कहाँ यह कहा गया था कि वह एक धर्मी मनुष्य था? तुम लोग सोचते हो कि वे सभी जिन्हें परमेश्वर बुलाता है वे धर्मी, एवं पूर्ण, और ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम लोग सिद्धान्तों में बने रहते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना होगा कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम एक धर्मी मनुष्य है। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए एक मानक होता है। हालाँकि परमेश्वर यह नहीं कहता है कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था, फिर भी अपने आचरण के लिहाज से, अब्राहम के पास परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह एक छोटा सी कल्पना थी? या वह एक बड़े विश्वास वाला व्यक्ति था? नहीं, वह नहीं था! उसकी हँसी एवं विचारों ने यह प्रकट किया कि वह कौन था, अतः तुम लोगों का विश्वास कि वह एक धर्मी व्यक्ति था यह सिर्फ तुम लोगों की कल्पना की उपज है, यह सिद्धान्तों का आँख बन्द कर के पालन करना है, यह एक गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसकी भावभंगिमाओं[क] को देखा था, क्या वह उसके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परन्तु क्या परमेश्वर उस कार्य को बदल देता जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया था? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और दृढ़ निश्चय किया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो उस मामले को पहले से ही पूर्ण किया जा चुका था। न तो मनुष्य के विचार और न ही उसका व्यवहार परमेश्वर को जरा सा भी प्रभावित करेंगे, या परमेश्वर के साथ हस्तक्षेप करेंगे; परमेश्वर अपनी योजना को मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, न ही वह बदलेगा या मनुष्य के बर्ताव के कारण अपनी योजना में उलट-फेर करेगा, जो मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है। तो उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" जो कुछ अब्राहम ने सोचा या कहा था परमेश्वर ने उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। और उसकी उपेक्षा का कारण क्या था? यह इसलिए था क्योंकि उस समय परमेश्वर ने यह मांग नहीं की थी कि मनुष्य को बड़ा विश्वास रखना है, या वह परमेश्वर के अत्याधिक ज्ञान को रखने के योग्य हो, या इसके अतिरिक्त, जो कुछ परमेश्वर के द्वारा किया गया और कहा गया वह उसे पूरी तरह से समझने के योग्य हो। इस प्रकार, उसने यह मांग नहीं की थी कि जो कुछ उसने करने का दृढ़ निश्चय किया था, या वे लोग जिन्हें उसने चुनने का निर्णय किया था, या उसके कार्यों के सिद्धान्तों को मनुष्य पूरी तरह से समझे, क्योंकि मनुष्य का डीलडौल साधारणतः पर्याप्त नहीं था। परमेश्वर ने उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जिस प्रकार उसने अपने आप में व्यवहार किया उसे सामान्य माना। उसने उसकी निंदा नहीं की, या उसे फटकार नहीं लगाई, परन्तु सिर्फ़ यह कहाः "सारा से अगले वर्ष इसी नियुक्त समय में इसहाक उत्पन्न होगा।" जब उसने इन वचनों की घोषणा की उसके पश्चात्, परमेश्वर के लिए यह मामला कदम दर कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, जिसे उसकी योजना के द्वारा पूरा किया जाना था उसे पहले से ही हासिल कर लिया गया था। और इसके लिए प्रबंधों को पूरा करने के बाद, परमेश्वर वहाँ से चला गया। जो कुछ मनुष्य करता या सोचता है, जो कुछ मनुष्य समझता है, मनुष्य की योजनाएं—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई रिश्ता नहीं है। हर एक चीज़ परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार आगे बढ़ती है, उन समयों एवं चरणों के साथ साथ जिन्हें परमेश्वर के द्वारा तय किया गया है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या जानता है परमेश्वर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता है, फिर भी न तो वह अपनी योजनाओं को यों ही जाने देता है, या न ही अपने कार्यों को त्यागता है, क्योंकि मनुष्य विश्वास नहीं करता है या समझता नहीं है। तथ्य इस प्रकार से परमेश्वर की योजना एवं विचारों के अनुसार पूरे होते हैं। यह बिलकुल वही है जिसे हम बाइबल में देखते हैं; परमेश्वर ने इसहाक को ऐसे समय में जन्म लेने दिया जिसे उसने निर्धारित किया था। क्या ये तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य के व्यवहार एवं आचरण ने परमेश्वर के कार्य में बाधा डाला था? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डाला था! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े से विश्वास ने, और परमेश्वर के विषय में उसकी अवधारणाओं एवं कल्पनाओं ने परमेश्वर के कार्य पर असर डाला था? नहीं, उन्होंने कोई असर नहीं डाला था! थोड़ा सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना किसी भी मनुष्य, मामले, या पर्यावरण के द्वारा अप्रभावित है। वह सब कुछ जिसे करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय किया है वह समय पर एवं उसकी योजना के अनुसार खत्म एवं पूर्ण होगा, और उसके कार्य के साथ किसी भी मनुष्य के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर मनुष्य की कुछ मूर्खताओं एवं अज्ञानताओं पर ध्यान नहीं देता है, और यहाँ तक उसके प्रति मनुष्य के कुछ प्रतिरोध एवं अवधारणाओं को भी नज़रअंदाज़ करता है; इसके बदले, वह बिना किसी संकोच के उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए। यह परमेश्वर का स्वभावहै, और उसकी सर्वसामर्थता का प्रतिबिम्ब है।

परमेश्वर के प्रबन्ध का कार्य एवं मानवजाति का उद्धार अब्राहम द्वारा इसहाक के बलिदान के साथ प्रारम्भ होता है

अब्राहम को एक पुत्र देने के बाद, वे वचन जिन्हें परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था वे पूरे हो गए थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर की योजना यहाँ पर रूक जाती है; इसके विपरीत, मानवजाति के प्रबन्धन एवं उद्धार के लिए परमेश्वर की बहुत ही शोभायमान योजना का बस प्रारम्भ ही हुआ था, और अब्राहम के लिए सन्तान की उसकी आशीष उसकी सम्पूर्ण प्रबन्धकीय योजना की मात्र एक प्रस्तावना थी। उस घड़ी, कौन जानता था कि शैतान के साथ परमेश्वर का युद्ध ख़ामोशी से प्रारम्भ हो चुका था जब अब्राहम ने इसहाक का बलिदान किया था।

परमेश्वर परवाह नहीं करता है यदि मनुष्य मूर्ख है—वह केवल यह मांग करता है कि मनुष्य सच्चा हो

आगे, आओ देखें कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ क्या किया था। उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को निम्नलिखित आज्ञा दी: "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" परमेश्वर का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट था: परमेश्वर अब्राहम से अपने एकलौते पुत्र को जिससे वह प्रेम करता था होमबलि के रूप में देने के लिए कह रहा था। आज के परिप्रेक्ष्य में देखें, क्या परमेश्वर की आज्ञा अभी भी मनुष्य की धारणाओं से भिन्न है? हाँ! वह सब जिसे परमेश्वर ने उस समय किया था वह मनुष्य की धारणाओं के बिलकुल विपरीत और मनुष्य की समझ से बाहर था। उनकी धारणाओं में, लोग निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: जब किस मनुष्य ने विश्वास नहीं किया था, और सोचा था कि यह असम्भव है, तब परमेश्वर ने उसे एक पुत्र दिया, और जब उसे पुत्र प्राप्त हो गया उसके बाद, परमेश्वर ने उससे अपने पुत्र को बलिदान करने के लिए कहा—कितना अविश्वसनीय है! परमेश्वर ने वास्तव में क्या करने का इरादा किया था? परमेश्वर का वास्तविक उद्देश्य क्या था? उसने अब्राहम को बिना शर्त एक पुत्र प्रदान किया था, फिर उसने कहा कि अब्राहम बिना किसी शर्त के बलिदान करे। क्या यह बहुत अधिक था? तीसरे समूह के दृष्टिकोण से, यह न केवल बहुत अधिक था बल्कि कुछ कुछ "बिना किसी बात के मुसीबत खड़ा करने" का मामला था। परन्तु अब्राहम ने स्वयं यह नहीं सोचा कि परमेश्वर बहुत ज़्यादा मांग रहा है। हालाँकि उसमें कुछ ग़लतफहमियां थीं, और वह परमेश्वर के विषय में थोड़ा सन्देहास्पद था, फिर भी वह बलिदान करने के लिए अभी भी तैयार था। इस मुकाम पर, तू क्या देखता है जो यह साबित करता है कि अब्राहम अपने पुत्र का बलिदान करने के लिए तैयार था? इन वाक्यों में क्या कहा जा रहा है? मूल पाठ निम्नलिखित लेख प्रदान करता है: "अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी" (उत्पत्ति 22:3)। "जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।" (उत्पत्ति 22:9-10)। जब अब्राहम ने अपने हाथ को आगे बढ़ाया, और अपने बेटे को मारने के लिए छुरा लिया, तो क्या उसके कार्यों को परमेश्वर के द्वारा देखा गया था? परमेश्वर के द्वारा उन्हें देखा गया था। सम्पूर्ण प्रक्रिया से—आरम्भ से लेकर, जब परमेश्वर ने कहा कि अब्राहम इसहाक का बलिदान करे, उस समय तक जब अब्राहम ने अपने पुत्र का वध करने के लिए वास्तव में छुरा उठा लिया था—परमेश्वर ने अब्राहम के हृदय को देखा था, और उसकी पहले की मूर्खता, अज्ञानता एवं परमेश्वर को ग़लत समझने के बावजूद भी, उस समय अब्राहम का हृदय परमेश्वर के प्रति सच्चा, और ईमानदार था, और वह सचमुच में इसहाक को परमेश्वर को वापस करने वाला था, जो पुत्र परमेश्वर के द्वारा उसे दिया गया था, वापस परमेश्वर को। परमेश्वर ने उस में आज्ञाकारिता को देखा—वही आज्ञाकारिता जिसकी उसने इच्छा की थी।

मनुष्य के लिए, परमेश्वर बहुत कुछ करता है जो समझ से बाहर है और यहाँ तक कि अविश्वसनीय भी है। जब परमेश्वर किसी को आयोजित करने की इच्छा करता है, तो ये आयोजन प्रायः मनुष्य की धारणाओं से भिन्न होते हैं, और उसकी समझ से परे होते हैं, फिर भी बिलकुल यही असहमति एवं अबोधगम्यता ही है जो परमेश्वर का परिक्षण एवं मनुष्य की परीक्षाएं हैं। इसी बीच, अब्राहम अपने आप में ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्रदर्शित करने के योग्य हो गया, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को संतुष्ट करने के योग्य होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी। जब अब्राहम परमेश्वर की मांग को मानने के योग्य हुआ, जब उसने इसहाक का बलिदान किया, केवल तभी परमेश्वर को सचमुच में मानवजाति के प्रति—अब्राहम के प्रति—पुनःआश्वासन एवं स्वीकृति का एहसास हुआ, जिसे उसने चुना था। केवल तभी परमेश्वर को निश्चय हुआ कि यह व्यक्ति जिसे उसने चुना था वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अगुवा था जो उसकी प्रतिज्ञा एवं आगामी प्रबंधकीय योजना को आरम्भ कर सकता था। हालाँकि यह सिर्फ एक परीक्षण एवं परीक्षा थी, परमेश्वर को प्रसन्नता का एहसास हुआ, उसने अपने लिए मनुष्य के प्रेम को महसूस किया, और उसे मनुष्य के द्वारा ऐसा सुकून मिला जैसा उसे पहले कभी नहीं मिला था। जिस घड़ी अब्राहम ने इसहाक को मारने के लिए अपना छूरा उठाया था, क्या परमेश्वर ने उसे रोका? परमेश्वर ने अब्राहम को इसहाक का बलिदान करने नहीं दिया, क्योंकि परमेश्वर की इसहाक का जीवन लेने की कोई मनसा नहीं थी। इस प्रकार, परमेश्वर ने अब्राहम को बिलकुल सही समय पर रोक दिया था। परमेश्वर के लिए, अब्राहम की आज्ञाकारिता ने पहले ही उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था, जो कुछ उसने किया वह पर्याप्त था, और परमेश्वर ने उस परिणाम को पहले ही देख लिया था जिसका उसने इरादा किया था। क्या यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था? ऐसा कहा जा सकता है कि यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, कि यह वह परिणाम था जो परमेश्वर चाहता था, और जिसे परमेश्वर ने देखने की लालसा की थी। क्या यह सही है? हालाँकि, अलग-अलग संदर्भों में, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को परखने के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों का उपयोग करता है, अब्राहम में परमेश्वर ने वह देखा जो वह चाहता था, उसने देखा कि अब्राहम का हृदय सच्चा था, और यह कि उसकी आज्ञाकारिता बिना किसी शर्त के थी, और यह बिलकुल वही "बिना किसी शर्त" की आज्ञाकारिता थी जिसकी परमेश्वर ने इच्छा की थी। लोग अकसर कहते हैं, मैंने पहले ही इसका अर्पण कर दिया है, मैंने पहले ही उसका परित्याग किया है—फिर भी परमेश्वर मुझ से अब भी संतुष्ट क्यों नहीं है? वह मुझे लगातार परीक्षाओं के अधीन क्यों कर रहा है? वह मुझे लगातार क्यों परख रहा है? यह एक तथ्य को प्रदर्शित करता हैः परमेश्वर ने तेरे हृदय को नहीं देखा है, और उसने तेरे हृदय को हासिल नहीं किया है। कहने का तात्पर्य है, उसने ऐसी सत्यनिष्ठा नहीं देखी जैसा तब देखा था जब अब्राहम अपने हाथ से अपने पुत्र को मारने के लिए छुरा उठाने, और उसे परमेश्वर को बलिदान करने के योग्य हो गया था। उसने तेरी बिना शर्त की आज्ञाकारिता को नहीं देखा है, और उसे तेरे द्वारा सुकून नहीं मिला है। तो यह स्वाभाविक है कि परमेश्वर निरन्तर तुझे परख रहा है। क्या यह सही नहीं है? हम इस विषय को यहीं पर छोड़ देंगे। इसके आगे, हम "अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं" के विषय में पढ़ेंगे।

3. अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं

(उत्पत्ति 22:16-18) "यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।"

यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी हुई आशीषों का बिना कांट-छांट किया हुआ लेख है। यह हालाँकि संक्षेप में है, फिर भी इसकी विषय-वस्तु समृद्ध हैः यह परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी हुई भेंट के कारण को और उसकी पृष्ठभूमि को, और वह क्या था जो उसने अब्राहम को दिया था उसे सम्मिलित करता है। यह आनन्द एवं उत्साह से तर-बतर है जिसके तहत परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, साथ ही साथ यह उन लोगों को हासिल करने के लिए उसकी लालसा की शीघ्रता से भी तर-बतर है जो उसके वचनों को ध्यान से सुनने के योग्य हैं। इस में, हम उन लोगों के प्रति परमेश्वर के लालन पालन एवं कोमलता देखते हैं जो उसके वचनों का पालन करते हैं और उसकी आज्ञाओं का अनुसरण करते हैं। और साथ ही हम उस कीमत को भी देखते हैं जिसे उसने लोगों को हासिल करने के लिए चुकाया है, और उस देखभाल एवं विचार को देखते हैं जो उसने इन लोगों को हासिल करने में लगाया है। इसके अतिरिक्त, वह अंश, जिसमें ये वचन "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," है यह हमें परमेश्वर, और सिर्फ परमेश्वर के द्वारा सहे गए उस कड़वाहट एवं दर्द का, और पर्दों के पीछे उसकी प्रबन्धकीय योजना का सामर्थी एहसास कराती है। यह विचारों को उद्वेलित करने वाला एक अंश है, और एक ऐसा अंश है जो उनके लिए विशेष महत्व रखता है, और उन पर दूरगामी प्रभाव डालता है जो बाद में आए थे।

मनुष्य अपनी ईमानदारी और आज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर की आशीषें प्राप्त करता है

क्या परमेश्वर के द्वारा अब्राहम को दी गई आशीष महान थी जिसके विषय में हम यहाँ पढ़ते हैं? यह कितनी महान थी? यहाँ पर एक मुख्य वाक्य हैः "और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी," जो यह दिखाता है कि अब्राहम ने ऐसी आशीषों को प्राप्त किया था जिन्हें किसी और को नहीं दिया गया जो पहले आए थे या बाद में। चूँकि परमेश्वर के द्वारा माँगा गया था, इसलिए जब अब्राहम ने अपने पुत्र—अपने एकलौते प्रिय पुत्र—को परमेश्वर को लौटा दिया (टिप्पणी: यहाँ पर हम "बलिदान" शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते हैं; हमें यह कहना चाहिए कि उसने अपने पुत्र को परमेश्वर को वापस किया), तब परमेश्वर ने न केवल अब्राहम को इसहाक का बलिदान करने की अनुमति नहीं दी, बल्कि उसने उसे आशीषित भी किया। उसने अब्राहम को किस प्रतिज्ञा से आशीषित किया था? उसके वंश को बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा से आशीषित किया था। और उन्हें कितनी मात्रा में बहुगुणित करने की प्रतिज्ञा की गई थी? बाइबल हमें निम्नलिखित लेख प्रदान करती है: "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा: और पृथ्वी की सारी जातियाँ तेरे वंश के कारण अपने को धन्य मानेंगी।" वह सन्दर्भ क्या था जिसके अंतर्गत परमेश्वर ने इन वचनों को कहा था? कहने का तात्पर्य है, अब्राहम ने परमेश्वर की आशीषों को कैसे प्राप्त किया था? उसने उन्हें प्राप्त किया ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर पवित्र शास्त्र में कहता है: "क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" अर्थात्, क्योंकि अब्राहम ने परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण किया था, क्योंकि उसने वह सब कुछ किया जो परमेश्वर ने कहा, मांगा और आदेश दिया था, जरा सी भी शिकायत के बगैर इस लिए परमेश्वर ने उस से ऐसी प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाक्य है जो उस समय परमेश्वर के विचारों को स्पर्श करता है। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? शायद तुम लोगों ने परमेश्वर के इन वचनों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है कि "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" उनका मतलब है कि, जब परमेश्वर ने इन वचनों को कहा, तब वह अपनी ही शपथ खा रहा था। जब लोग कसम खाते हैं तो वे किसकी शपथ खाते हैं? वे स्वर्ग की शपथ खाते हैं, कहने का अभिप्राय है, वे ख़ुदा के लिए कसम खाते हैं और परमेश्वर की शपथ खाते हैं। हो सकता है कि लोगों के पास उस घटना की ज़्यादा समझ नहीं है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई थी, परन्तु तुम लोग इस बात को समझने के योग्य होगे जब मैं तुम लोगों को सही व्याख्या प्रदान करूंगा। ऐसे मनुष्य से सामना होने पर जो सिर्फ उसके वचनों को सुन सकता है लेकिन उसके हदय को नहीं समझ सकता है उसने एक बार फिर से परमेश्वर को अकेला और खोया हुआ महसूस कराया। निराशा में—और, ऐसा कहा जा सकता है, अवचेतन रूप से—परमेश्वर ने कुछ ऐसा किया जो बहुत ही स्वाभाविक था: परमेश्वर ने अपना हाथ अपने हृदय पर रखा और अब्राहम से स्वयं ही प्रतिज्ञा के फल के विषय में कहा, और इससे मनुष्य ने परमेश्वर को यह कहते हुए सुना "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ।" परमेश्वर के कार्यां के माध्यम से, तू स्वयं के विषय में सोच सकता है। जब तू अपना हाथ अपने हृदय पर रखता है और स्वयं से कहता है, तो क्या तेरे पास जो कुछ तू कह रहा है उसके विषय में कोई स्पष्ट विचार होता है? क्या तेरी मनोवृत्ति सच्ची है? क्या तू सच्चाई से, और अपने हृदय से बात करता है? इस प्रकार, हम यहाँ देखते हैं कि जब परमेश्वर ने अब्राहम से कहा, तब वह सच्चा एवं ईमानदार था। उसी समय अब्राहम से बात करते और उसे आशीष देते समय, परमेश्वर स्वयं से भी बोल रहा था। वह अपने आप से कह रहा थाः मैं अब्राहम को आशीष दूंगा, और उसके वंश को आकाश के तारों के समान अनगिनित करूंगा, और समुद्र के किनारे की रेत के समान असंख्य कर दूंगा, क्योंकि उसने मेरे वचनों को माना है और यह वही है जिसे मैंने चुना है। जब परमेश्वर ने कहा "मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ," तो परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अब्राहम में इस्राएल के चुने हुए लोगों को उत्पन्न करेगा, जिसके बाद वह शीघ्रता से अपने कार्य के साथ इन लोगों की अगुवाई करेगा। अर्थात्, परमेश्वर अब्राहम के वंशजों से परमेश्वर के प्रबन्धन के कार्य का बोझ उठवाएगा, और परमेश्वर का कार्य और वह जिसे परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था वे अब्राहम के साथ प्रारम्भ होंगे, और वे अब्राहम की सन्तानों में निरन्तर आगे बढेंगे, इस प्रकार वे मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर की इच्छा को साकार करेंगे। तुम लोग क्या कहते हो, क्या यह एक आशीषित बात नहीं है? मनुष्य के लिए, इससे बड़ी और कोई आशीष नहीं है; ऐसा कहा जा सकता है कि यह अत्यंत ही आशीषित बात है। अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीष उसके वंश के बहुगुणित होने के लिए नहीं थी, परन्तु अब्राहम के वंशजों में उसके प्रबंधन, उसके आदेश, और उसके कार्य की उपलब्धि के लिए थी। इसका अर्थ है कि अब्राहम के द्वारा हासिल की गई आशीषें अस्थायी नहीं थीं, परन्तु लगातार जारी रहीं जैसे परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना बढ़ती गई। जब परमेश्वर ने कहा, और जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब उसने पहले ही एक दृढ़ निश्चय कर लिया था। क्या इस दृढ़ निश्चय की प्रक्रिया सही थी? क्या यह वास्तविक थी? परमेश्वर ने दृढ़ निश्चय किया था कि, उस समय के बाद से, उसकी कोशिशें, वह कीमत जो उसने चुकाई थी, उसका स्वरूप, उसकी हर चीज़, और यहाँ तक कि उसका जीवन भी अब्राहम को और अब्राहम के वंशजों को दे दिया जाएगा। परमेश्वर ने यह भी दृढ़ निश्चय किया कि, इस समूह के लोगों से प्रारम्भ करके, वह अपने कार्यों को प्रदर्शित करेगा, और मनुष्य को अनुमति देगा कि वह उसकी बुद्धि, अधिकार और सामर्थ को देखे।

ऐसे लोग जो परमेश्वर को जानते हैं और जो उसकी गवाही देने के योग्य हैं उन्हें हासिल करना परमेश्वर की अपरिवर्तनीय इच्छा है

जब वह स्वयं से कह रहा था ठीक उसी समय, परमेश्वर ने अब्राहम से भी कहा था, परन्तु उन आशीषों को सुनने के अलावा जिन्हें परमेश्वर ने उसे दिया था, क्या उस समय अब्राहम परमेश्वर के सभी वचनों में उसकी वास्तविक इच्छाओं को समझने में सक्षम था? वह नहीं था! और इस प्रकार, उस समय, जब परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई, तब भी उसका हृदय सूना सूना और दुख से भरा हुआ था। वहाँ पर अब भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो यह समझने या बूझने के योग्य हो कि उसने क्या इरादा किया था एवं क्या योजना बनाई थी। उस समय, कोई भी व्यक्ति—जिसमें अब्राहम भी शामिल है—परमेश्वर से आत्मविश्वास से बात करने के योग्य नहीं था, और कोई भी उस कार्य को करने में उसके साथ सहयोग करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं था जिसे उसे अवश्य करना था। सतही तौर पर देखें, तो परमेश्वर ने अब्राहम को हासिल किया, और ऐसे व्यक्ति को हासिल किया था जो उसके वचनों का पालन कर सकता था। परन्तु वास्तव में, परमेश्वर के विषय में इस व्यक्ति का ज्ञान बमुश्किल शून्य से अधिक था। भले ही परमेश्वर ने अब्राहम को आशीषित किया था, फिर भी परमेश्वर का हृदय अभी भी संतुष्ट नहीं था। इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर संतुष्ट नहीं था? इसका अर्थ है कि उसका प्रबंधन बस अभी प्रारम्भ ही हुआ था, इसका अर्थ है कि ऐसे लोग जिन्हें वह हासिल करना चाहता था, ऐसे लोग जिन्हें वह देखने की लालसा करता था, ऐसे लोग जिन्हें उसने प्रेम किया था, वे अभी भी उससे दूर थे; उसे समय की आवश्यकता थी, उसे इंतज़ार करने की आवश्यकता थी, और उसे धैर्य रखने की आवश्यकता थी। क्योंकि उस समय पर, स्वयं परमेश्वर को छोड़कर, कोई भी नहीं जानता था कि उसे किस बात की आवश्यकता थी, या उसने क्या हासिल करने की इच्छा की थी, या उसने किस बात की लालसा की थी। और इस प्रकार, ठीक उसी समय अत्याधिक उत्साहित महसूस करते हुए, परमेश्वर ने हृदय में भारी बोझ का भी एहसास किया था। फिर भी उसने अपने कदमों को नहीं रोका, और लगातार अपने उस अगले कदम की योजना बनाता रहा जिसे उसे अवश्य करना था।

अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर ने अब्राहम को महान आशीषें प्रदान की थीं सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने परमेश्वर के वचन को सुना था। हालाँकि, सतही तौर पर, यह सामान्य दिखाई देता है, और एक सहज मामला प्रतीत होता है, इस में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं: परमेश्वर विशेष तौर पर मनुष्य की आज्ञाकारिता को सहेजकर रखता है, और अपने विषय में मनुष्य की समझ और अपने प्रति मनुष्य की ईमानदारी उसे अच्छी लगती है। परमेश्वर को यह ईमानदारी कितनी अच्छी लगती है? तुम लोग नहीं समझ सकते हो कि उसे कितना अच्छा लगता है, और शायद ऐसा कोई भी नहीं है जो इसे समझ सके। परमेश्वर ने अब्राहम को एक पुत्र दिया, और जब वह पुत्र बड़ा हो गया, परमेश्वर ने अब्राहम से अपने पुत्र को बलिदान करने के लिए कहा। अब्राहम ने अक्षरशः परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया, उसने परमेश्वर के वचन का पालन किया, और उसकी ईमानदारी ने परमेश्वर को द्रवित किया और उसकी ईमानदारी को परमेश्वर के द्वारा संजोकर रखा गया था। परमेश्वर ने इसे कितना संजोकर रखा? और उसने क्यों इसे संजोकर रखा था? एक समय पर जब किसी ने भी परमेश्वर के वचनों को नहीं बूझा था या उसके हृदय को नहीं समझा था, तब अब्राहम ने कुछ ऐसा किया जिस ने स्वर्ग को हिला दिया और पृथ्वी को कंपा दिया, तथा इस से परमेश्वर को अभूतपूर्व संतुष्टि का एहसास हुआ, और परमेश्वर के लिए ऐसे व्यक्ति को हासिल करने के आनन्द को लेकर आया जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने के योग्य था। यह संतुष्टि एवं आनन्द उस प्राणी से आया जिसे परमेश्वर के हाथ से रचा गया था, और जब से मनुष्य की सृष्टि की गई थी, यह पहला "बलिदान" था जिसे मनुष्य ने परमेश्वर को अर्पित किया था और जिसको परमेश्वर के द्वारा अत्यंत सहेजकर रखा गया था। इस बलिदान का इंतज़ार करते हुए परमेश्वर ने बहुत ही कठिन समय गुज़ारा था, और उसने इसे मनुष्य की ओर से दिए गए प्रथम महत्वपूर्ण भेंट के रूप में लिया, जिसे उसने सृजा था। इसने परमेश्वर को उसके प्रयासों और उस कीमत के प्रथम फल को दिखाया जिसे उसने चुकाया था, और इससे वह मानवजाति में आशा देख सका। इसके बाद, परमेश्वर के पास ऐसे लोगों के समूह के लिए और भी अधिक लालसा थी जो उसका साथ दें, उसके साथ ईमानदारी से व्यवहार करें, ईमानदारी के साथ उसकी परवाह करें। परमेश्वर ने यहाँ तक आशा की थी कि अब्राहम निरन्तर जीवित रहता, क्योंकि वह चाहता था कि ऐसा हृदय उसके साथ संगति करे उसके साथ रहे जैसे वह उसके प्रबंधन में निरन्तर बना रहा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या चाहता था, यह सिर्फ एक इच्छा थी, सिर्फ एक विचार था—क्योंकि अब्राहम मात्र एक मनुष्य था जो उसकी आज्ञाओं का पालन करने के योग्य था, और उसके पास परमेश्वर की थोड़ी सी भी समझ या ज्ञान नहीं था। वह ऐसा व्यक्ति था जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से पूरी तरह रहित थाः परमेश्वर को जानना, परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य होना, और परमेश्वर के साथ एक मन होना। और इस लिए, वह परमेश्वर के साथ नहीं चल सका। अब्राहम के द्वारा इसहाक के बलिदान में, परमेश्वर ने उस में ईमानदारी एवं आज्ञाकारिता को देखा था, और यह देखा था कि उसने परमेश्वर के द्वारा अपनी परीक्षा का स्थिरता से सामना किया था। भले ही परमेश्वर ने उसकी आज्ञाकारिता एवं ईमानदारी को स्वीकार किया था, किन्तु वह अब भी परमेश्वर का विश्वासपात्र बनने में अयोग्य था, ऐसा व्यक्ति बनने में अयोग्य था जो परमेश्वर को जानता था, और परमेश्वर को समझता था, और उसे परमेश्वर के स्वभाव के विषय में सूचित किया गया था; वह परमेश्वर के साथ एक मन होने और परमेश्वर की इच्छा पर चलने से बहुत दूर था। और इस प्रकार, परमेश्वर अपने हृदय में अभी भी अकेला एवं चिंतित था। परमेश्वर जितना अधिक अकेला एवं चिंतित होता गया, उतना ही अधिक उसे आवश्यकता थी कि वह जितना जल्दी हो सके अपने प्रबंधन के साथ निरन्तर आगे बढ़े, और अपनी प्रबंधकीय योजना को पूरा करने के लिए और जितना जल्दी हो सके उसकी इच्छा को प्राप्त करने के लिए लोगों के ऐसे समूह को हासिल करने और चुनने के योग्य हो जाए। यह परमेश्वर की हार्दिक अभिलाषा थी, और यह शुरुआत से लेकर आज तक अपरिवर्तनीय बनी हुई है। जब से उसने आदि में मनुष्य की सृष्टि की थी, तब से परमेश्वर ने विजयी लोगों के समूह की लालसा की है, ऐसा समूह जो उसके साथ चलेगा और जो उसके स्वभाव को समझने, बूझने और जानने के योग्य है। परमेश्वर की इच्छा कभी नहीं बदली है। इसके बावजूद कि उसे अब भी कितना लम्बा इंतज़ार करना है, इसके बावजूद कि आगे का मार्ग कितना कठिन है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे उद्देश्य कितने दूर हैं जिनकी वह लालसा करता है, परमेश्वर ने मनुष्य के लिए अपनी अपेक्षाओं को कभी पलटा नहीं है या हिम्मत नहीं हारा है। अब मैंने यह कह दिया है, तो क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा की कुछ बातों का एहसास कर सकते हो? शायद जो कुछ तुम लोगों ने एहसास किया है वह बहुत गहरा नहीं है—परन्तु वह धीरे-धीरे आएगा!

फुटनोट:

क. मूल पाठ पढ़ता है "कार्य"

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?