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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

3. परमेश्वर मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को चिन्ह के रूप में ठहराता है

(उत्पत्ति 9:11-13) और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा। फिर परमेश्वर ने कहा, जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिए बाँधता हूँ, उसका यह चिन्ह है: मैंने बादल में अपना धनुष रखा है वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।

इसके आगे, आइए हम पवित्र शास्त्र के इस भाग पर एक नज़र डालें कि किस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को एक चिन्ह के रूप में ठहराया।

अधिकांश लोग जानते हैं कि इंद्रधनुष क्या है और उन्होंने इंद्रधनुष से जुड़ी कुछ कहानियों को सुना है। जहाँ तक बाइबल में इंद्रधनुष के बारे में उस कहानी की बात है, कुछ लोग इसका विश्वास करते हैं, कुछ दंतकथा के रूप में इससे व्यवहार करते हैं, जबकि अन्य लोग इस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते हैं। चाहे कुछ भी हो, सब कुछ जो इंद्रधनुष के सम्बन्ध में घटित हुआ था वह सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर ने किसी समय किया था, और ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना की प्रक्रिया के दौरान घटित हुई थीं। इन चीज़ें को बाइबल में हू-बहू लिखा गया है। ये लेख हमें यह नहीं बताते हैं कि उस समय परमेश्वर किस मनोदशा में था या इन वचनों के पीछे उसके क्या इरादे थे जिन्हें परमेश्वर ने कहा था। इसके अतिरिक्त, कोई भी समझ नहीं सकता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा था जब उसने उन्हें कहा था। फिर भी, इस समूचे हालात के लिहाज से परमेश्वर के मन की दशा को पाठ की पंक्तियों के बीच प्रकट किया गया है। यह ऐसा है मानो उस समय के उसके विचारों पन्नों से परमेश्वर के वचन के प्रत्येक शब्द एवं वाक्यांश के ज़रिये निकल पड़ते हैं।

परमेश्वर के विचार के विषय में लोगों को चिंतित होना चाहिए और ऐसे हैं जिन्हें जानने के लिए उन्हें सबसे अधिक कोशिश करनी चाहिए। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के विचार परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ से नज़दीकी से जुड़े हुए हैं, और मनुष्य के द्वारा जीवन में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ एक अनिवार्य कड़ी है। अतः परमेश्वर उस समय क्या सोच रहा था जब ये परिस्थितियाँ घटित हुई थीं?

मूल रूप से, परमेश्वर ने ऐसी मानवता की सृष्टि की थी जो उसकी दृष्टि में बहुत ही अच्छी और उसके बहुत ही निकट थी, किन्तु उसके विरुद्ध विद्रोह करने के पश्चात् जलप्रलय के द्वारा उनका विनाश कर दिया गया था। क्या इसने परमेश्वर को कष्ट पहुँचाया कि एक ऐसी मानवता तुरन्त ही इस तरह विलुप्त हो गई थी? हाँ वास्तव में इसने कष्ट पहुँचाया था! तो उसकी इस दर्द की अभिव्यक्ति क्या थी? बाइबल में इसे कैसे लिखा गया था? इसे बाइबल में इस रूप से लिखा गया: "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्ट न होंगे: और पृथ्वी के नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" यह साधारण वाक्य परमेश्वर के विचारों को प्रकट करता है। संसार के इस विनाश ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया। मनुष्य के शब्दों में, वह बहुत ही दुःखी था। हम कल्पना कर सकते हैं: जलप्रलय के द्वारा नाश किए जाने के बाद पृथ्वी जो किसी समय जीवन से भरी हुई थी वह कैसी दिखाई देती थी? वह पृथ्वी जो किसी समय मानवों से भरी हुई थी अब कैसी दिखती थी? कोई मानवीय निवास-स्थान नहीं, कोई जीवित प्राणी नहीं, हर जगह पानी ही पानी और जल की सतह पर सब कुछ अस्तव्यस्त था। जब परमेश्वर ने संसार को बनाया तो क्या उसका मूल इरादा ऐसा कोई दृश्य था? बिलकुल भी नहीं! परमेश्वर का मूल इरादा था कि समूची धरती के आर पार जीवन को देखे, कि उन मानवों को जिन्हें उसने बनाया था, उन्हें अपनी आराधना करते हुए देखे, सिर्फ नूह के लिए ही नहीं कि वह उसकी आराधना करनेवाला एकमात्र व्यक्ति हो या ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसकी बुलाहट का उत्तर दे सके ताकि जो कुछ उसे सौंपा गया था उसे पूर्ण करे। जब मानवता विलुप्त हो गई, तो परमेश्वर ने वह नहीं देखा जो उसने मूल रूप से इरादा किया था बल्कि पूर्णतः विपरीत देखा। उसका हृदय तकलीफ में कैसे नहीं हो सकता था? अतः जब वह अपने स्वभाव को प्रकट कर रहा था और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा था, तब परमेश्वर ने एक निर्णय लिया। उसने किस प्रकार का निर्णय लिया? मनुष्य के साथ एक वाचा के रूप में बादल में एक इंद्रधनुष बनाने के लिए (टिप्पणी: वह इंद्रधनुष जो हम देखते हैं), ऐसी प्रतिज्ञा कि परमेश्वर मानवजाति को जलप्रलय से दोबारा नाश नहीं करेगा। ठीक उसी समय, यह लोगों को यह बताने के लिए भी था कि परमेश्वर ने संसार को किसी समय जलप्रलय से नाश किया था, ताकि मानवजाति हमेशा याद रखे कि परमेश्वर ने ऐसा कार्य क्यों किया था।

क्या इस समय संसार का विनाश कुछ ऐसा था जो परमेश्वर चाहता था? यह निश्चित रूप वह नहीं था जो परमेश्वर चाहता था। संसार के विनाश के बाद हम शायद पृथ्वी के दयनीय दृश्य के एक छोटे से भाग की कल्पना कर सकते हैं, परन्तु हम उस सोच के करीब नहीं आ सकते हैं कि उस समय परमेश्वर की निगाहों में वह तस्वीर कैसी थी। हम कह सकते हैं कि, चाहे यह आज के लोग हों या उस समय के, कोई भी यह सोच या सराह नहीं सकता कि, परमेश्वर ने उस समय क्या महसूस किया जब उसने वो दृश्य, संसार की वो तस्वीर देखी जो जलप्रलय के द्वारा विनाश के बाद की थी। मनुष्य की अनाज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर इसे करने के लिए मजबूर था, परन्तु जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश से परमेश्वर के हृदय के द्वारा सहा गया वह दर्द एक वास्तविकता है जिसे कोई नाप एवं सराह नहीं सकता है। इसीलिए परमेश्वर ने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, जो लोगों को यह बताने के लिए थी कि वे स्मरण रखें कि परमेश्वर ने किसी समय ऐसा कुछ किया था, और उन्हें यह वचन देने के लिए था कि परमेश्वर कभी इस संसार का इस तरह से दोबारा नाश नहीं करेगा। इस वाचा में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं—हम देखते हैं कि परमेश्वर का हृदय पीड़ा में था जब उसने मानवता का नाश किया। मनुष्य की भाषा में, जब परमेश्वर ने मानवजाति का नाश किया और मानवजाति को विलुप्त होते हुए देखा, तो उसका हृदय रो रहा था और उससे लहू बह रहा था। क्या उसके वर्णन का यह सबसे उत्तम तरीका नहीं है? मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए इन शब्दों को मनुष्य के द्वारा उपयोग किया जाता है, परन्तु चूँकि मनुष्य की भाषा में बहुत कमी है, तो परमेश्वर के एहसासों एवं भावनाओं का वर्णन करने के लिए उनका उपयोग करना मुझे बुरा नहीं लगता है, और न ही यह बहुत ज़्यादा है। कम से कम यह तुम लोगों को उस समय परमेश्वर की मनोदशा क्या थी उसके विषय में एक बहुत ही स्पष्ट, एवं बहुत ही उपयुक्त समझ प्रदान करता है। जब तुम लोग इंद्रधनुष को दोबारा देखोगे तो अब तुम लोग क्या सोचोगे? कम से कम तुम लोग स्मरण करोगे कि किस प्रकार एक समय परमेश्वर जल-प्रलय के द्वारा संसार के विनाश पर दुःखी था। तुम लोग स्मरण करोगे कि, परमेश्वर ने इस संसार से नफ़रत की और इस मानवता को तुच्छ जाना था, फिर भी जब उसने उन मानव प्राणियों का विनाश किया जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था, तो उसका हृदय दुख रहा था, उसका हृदय उन्हें छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका हृदय नहीं चाह रहा था, उसके हृदय को इसे सहना कठिन महसूस हो रहा था। उसका सुकून सिर्फ नूह के परिवार के आठ लोगों में ही था। यह नूह का सहयोग था जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि करने के उसके अत्यधिक सावधानी से किए गए प्रयासों को सार्थक बनाया था। एक समय जब परमेश्वर कष्ट सह रहा था, तब यह एकमात्र चीज़ थी जो उसकी पीड़ा की क्षतिपूर्ति कर सकती थी। उस बिन्दु से, परमेश्वर ने मानवता की अपनी सारी अपेक्षाओं को नूह के परिवार के ऊपर डाल दिया था, यह आशा करते हुए कि वे उसकी आशीषों के अधीन जीवन बिताएँगे और उसके श्राप के अधीन नहीं, यह आशा करते हुए कि वे परमेश्वर को फिर कभी संसार को जलप्रलय से नाश करते हुए नहीं देखेंगे, और साथ ही यह भी आशा करते हुए भी कि उनका विनाश नहीं किया जाएगा।

यहाँ से हमको परमेश्वर के स्वभाव के किस भाग को समझना चाहिए? परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक निश्चित दायरे तक भ्रष्टता एवं अनाज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे बुलाया, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने इसे नहीं समझा या इसे नहीं सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आखिरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और केवल ऐसी चीज़ नहीं है कि वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्पर्श्गम्य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटी नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि कि वह कितना प्रेमी है। वह लोगों को अपने प्रेमीपन को दिखाने के लिए, या अपने प्रेमीपन एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलु मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना करने के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि क्या परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर का प्रेमीपन केवल खाली शब्द ही हैं? बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को गर्माहट देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यहाँ कितने लोग बैठे हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास परमेश्वर की सहनशीलता, धीरज एवं मनोहरता के विषय में अलग अलग अनुभव और उसके प्रति अलग अलग भावनाएँ हैं। परमेश्वर के ये अनुभव और उसकी ये भावनाएँ या स्वीकृतियाँ, संक्षेप में, ये सभी सकरात्मक चीज़ें परमेश्वर की ओर से हैं। अतः परमेश्वर के विषय में प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव एवं ज्ञान को मिलाने के द्वारा और इन्हें आज बाइबल के इन अंशों के हमारे पठन से जोड़ने के द्वारा, क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर की और अधिक वास्तविक एवं उचित समझ है?

इस कहानी को पढ़ने और परमेश्वर के कुछ स्वभाव को समझने के पश्चात् जिसे इस घटना के जरिए प्रकट किया गया है, तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में कौन सी किस्म की नई सराहना है? क्या इसने तुम लोगों को परमेश्वर एवं उसके हृदय की एक गहरी समझ प्रदान की है? क्या अब तुम लोग अलग महसूस करते हो जब तुम लोग दोबारा नूह की कहानी को देखते हो? तुम लोगों के विचारों के अनुसार, क्या बाइबल के इन वचनों के बारे में बातचीत करना अनावश्यक होता? अब हमने उन पर बातचीत कर ली है, क्या तुम लोग सोचते हो कि यह अनावश्यक था? यह आवश्यक था, सही है? हालाँकि जो हम पढ़ते हैं वह एक कहानी है, फिर भी यह उस कार्य का सच्चा लेख है जिसे परमेश्वर ने किसी समय किया था। मेरा लक्ष्य यह नहीं था कि तुम लोग इन कहानियों या इस पात्र के विवरणों को समझो, न ही यह इसलिए था कि तुम लोग जाकर इस पात्र का अध्ययन कर सको, और निश्चित रूप से इसलिए नहीं है कि तुम लोग वापस जाओ और फिर से बाइबल का अध्ययन करो। क्या तुम लोग समझ गए? अतः क्या इन कहानियों ने परमेश्वर के विषय में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता की है? इस कहानी ने परमेश्वर के विषय में तुम लोगों की समझ में क्या जोड़ दिया है? हमें बताओ, हौंग कौंग की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों। (हमने देखा था कि परमेश्वर का प्रेम कुछ ऐसा है जिसे हम में से कोई भ्रष्ट मानव धारण नहीं करता है।) हमें बताइए, कोरिया की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों। (मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव को लिए हुए है और उसकी महानता, पवित्रता, सर्वोच्चता एवं उसकी सहनशीलता को लिए हुए है। एक ऐसी कहानी के माध्यम से हम बेहतर ढंग से सराहना कर सकते हैं कि ये सब परमेश्वर के स्वभाव के भाग हैं, और यह इस योग्य है कि हम इसकी गहरी समझ प्राप्त करने की कोशिश करें।) (बातचीत के माध्यम से ठीक उसी समय, एक ओर, मैं परमेश्वर के धर्मी एवं पवित्र स्वभाव को देख सकता हूँ, और साथ ही मैं उस चिंता को भी देख सकता हूँ जो मानवजाति के लिए परमेश्वर के पास है, मानवजाति के प्रति परमेश्वर की दया को देख सकता हूँ, और यह कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है और हर चिन्तन एवं विचार जो उसके पास है वह सब मानवता के लिए उसके प्रेम एवं चिन्ता को प्रकट करता है।) (अतीत में हमारी समझ यह थी कि परमेश्वर ने संसार का विनाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किया था क्योंकि मानवजाति किसी निश्चित हद तक दुष्ट हो गई थी, और यह ऐसा था मानो परमेश्वर ने इस मानवता का विनाश किया क्योंकि उसने उनसे घृणा की थी। यह केवल उसके बाद हुआ जब परमेश्वर ने आज नूह की कहानी के बारे में बात की और कहा कि परमेश्वर के हृदय से लहू बह रहा था जिससे मैंने एहसास किया कि परमेश्वर असल में इस मानवता को छोड़ने में अनिच्छुक था। ऐसा केवल इसलिए था क्योंकि मानवजाति बहुत ही अनाज्ञाकारी थी कि परमेश्वर के पास उनका नाश करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। असल में, परमेश्वर का हृदय इस समय बहुत दुःखी था। इससे मैं परमेश्वर के स्वभाव में मानवजाति के लिए उसकी देखभाल एवं चिन्ता को देख सकता हूँ। यह कुछ ऐसा है जो मैं पहले नहीं जानता था। मैं ऐसा सोचता था कि मानवजाति बहुत ही दुष्ट थी, अतः परमेश्वर ने उनका विनाश कर दिया। मेरी समझ इतनी अधिक सतही थी।) बहुत अच्छा! तुम लोग आगे बढ़ सकते हो। (सुनने के बाद मैं बहुत प्रभावित हुआ था। मैंने अतीत में बाइबल पढ़ी है, किन्तु मैंने आज के समान कभी अनुभव नहीं किया जहाँ परमेश्वर ने सीधे तौर पर इन चीज़ों का विश्लेषण किया है जिससे हम उसे जान सकें। बाइबल को देखने के लिए परमेश्वर हमें इस तरह से अपने साथ ले चलता है जो मुझे यह जानने की अनुमति देता है कि मनुष्य की भ्रष्टता से पहले परमेश्वर का सार मानवजाति के लिए प्रेम एवं देखभाल था। मनुष्य के भ्रष्ट होने के समय से लेकर आज के अंतिम दिनों तक, भले ही परमेश्वर एक धर्मी स्वभाव को लिए हुए है, फिर भी उसका प्रेम एवं देखभाल अपरिवर्तनीय बना रहता है। यह दिखाता है कि परमेश्वर के प्रेम का सार, सृष्टि से लेकर अब तक, इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य भ्रष्ट है या नहीं, कभी बदलता नहीं।) (आज मैंने देखा कि उसके कार्य के समय या स्थान में हुए परिवर्तन की वजह से परमेश्वर का सार नहीं बदलेगा। मैंने यह भी देखा कि, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है यदि परमेश्वर संसार को बना रहा है या मनुष्य के भ्रष्ट होने के पश्चात् इसे नाश कर रहा है, क्योंकि जो कुछ भी वह करता है उसका अर्थ होता है और इसमें उसका स्वभाव शामिल होता है। इसलिए मैं ने देखा कि परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अथाह है, और साथ ही मैं ने, जैसा अन्य भाईयों एवं बहनों ने जिक्र किया था, मानवजाति के प्रति परमेश्वर की देखरेख एवं दया को भी देखा था जब परमेश्वर ने संसार का विनाश किया था।) (ये ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें मैं वास्तव में पहले से नहीं जानता था। आज सुनने के बाद, मैं महसूस करता हूँ कि परमेश्वर सचमुच में विश्वसनीय है, सचमुच में भरोसे के लायक है, विश्वास करने के योग्य है, और यह कि वह वास्तव में अस्तित्व में है। मैं ईमानदारी से अपने हृदय में सराहना कर सकता हूँ कि परमेश्वर का स्वभाव और प्रेम वास्तव में इतना ठोस है। आज सुनने के बाद यह वह भावना है जो मुझ में है।) बहुत बढ़िया! ऐसा लगता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है उसे तुम लोगों ने अपने हृदय पर ले लिया है।

क्या तुम लोगों ने बाइबल के सभी वचनों से एक विशेष तथ्य पर ध्यान दिया है, बाइबल की सभी कहानियों को मिलाकर जिस पर हमने आज बातचीत की थी? क्या परमेश्वर ने अपने स्वयं के विचारों को व्यक्त करने के लिए या मानवता के लिए अपने प्रेम एवं देखरेख का वर्णन करने के लिए कभी अपनी स्वयं की भाषा का उपयोग किया है? क्या उसका कोई लेख है जहाँ वह यह बताने के लिए साधारण भाषा का उपयोग करता है कि वह मानवजाति के लिए कितना चिन्तित है या उससे कितना प्रेम करता है? नहीं! क्या यह सही नहीं है? तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने बाइबल के अलावा किताबों या बाइबल को पढ़ा है। क्या तुम लोगों में से किसी ने ऐसे वचन देखें हैं? उत्तर निश्चित रूप से ना है! अर्थात्, बाइबल के लेखों में, परमेश्वर के वचनों या उसके कार्य के प्रमाणीकरण को मिलाकर, परमेश्वर ने मानवजाति के लिए अपनी भावनाओं का वर्णन करने के लिए या अपने प्रेम एवं देखभाल को व्यक्त करने के लिए किसी युग में या किसी समयावधि में अपने स्वयं के तरीकों का उपयोग कभी नहीं किया है, न ही कभी परमेश्वर ने अपने एहसासों एवं भावनाओं को सूचित करने के लिए भाषण या किसी प्रकार के कार्यों का उपयोग किया—क्या यह एक तथ्य नहीं है? मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मुझे इसका जिक्र क्यों करना पड़ा? ऐसा इसलिए है क्योंकि यह परमेश्वर के प्रेमीपन एवं उसके स्वभाव को भी शामिल करता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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