परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 213

विजय प्राप्त करने का मुख्य लक्ष्य मानवता को शुद्ध करना है, ताकि मनुष्य सत्य को धारण कर सके, क्योंकि मनुष्य सत्य को बहुत कम समझता है! ऐसे लोगों पर विजय पाने का कार्य करने का गहनतम अर्थ है। तुम सभी लोग अंधकार के प्रभाव में आ गए हो और तुम्हें गहरा नुकसान पहुँचा है। अत: इस कार्य का लक्ष्य तुम लोगों को मानव-प्रकृति को जानने और परिणामस्वरूप सत्य को जीने में सक्षम बनाना है। पूर्ण बनाया जाना ऐसी चीज़ है, जिसे सभी सृजित प्राणियों को स्वीकार करना चाहिए। यदि इस चरण के कार्य में केवल लोगों को पूर्ण बनाना ही शामिल होता, तो इसे इंग्लैंड या अमेरिका या इस्राएल में किया जा सकता था; इसे किसी भी देश के लोगों पर किया जा सकता था। परंतु विजय का कार्य चयनात्मक है। विजय के कार्य का पहला चरण अल्पकालिक है; इतना ही नहीं, इसे शैतान को अपमानित करने और संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। यह विजय का आरंभिक कार्य है। कहा जा सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करने वाले किसी भी प्राणी को पूर्ण बनाया जा सकता है, क्योंकि पूर्ण बनाया जाना ऐसा काम है, जिसे केवल एक दीर्घकालिक परिवर्तन के बाद ही हासिल किया जा सकता है। परंतु जीता जाना अलग बात है। जीत के लिए नमूना और आदर्श वह होना चाहिए, जो बहुत अधिक पीछे रह गया है और गहनतम अंधकार में जी रहा है; वे सर्वाधिक तुच्छ और परमेश्वर को स्वीकार करने के सर्वाधिक अनिच्छुक तथा परमेश्वर के सर्वाधिक अवज्ञाकारी भी होने चाहिए। ठीक इसी प्रकार का व्यक्ति जीते जाने की गवाही दे सकता है। विजय के कार्य का मुख्य लक्ष्य शैतान को हराना है, जबकि लोगों को पूर्ण बनाने का मुख्य लक्ष्य उन्हें प्राप्त करना है। विजय का यह कार्य यहाँ तुम जैसे लोगों पर इसलिए किया जा रहा है, ताकि तुम लोगों को जीते जाने के बाद गवाही देने में सक्षम बनाया जा सके। इसका लक्ष्य है विजय प्राप्त करने के बाद लोगों से गवाही दिलवाना। इन जीते गए लोगों का उपयोग शैतान को अपमानित करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए किया जाएगा। तो, विजय का मुख्य तरीका क्या है? ताड़ना, न्याय, शाप देना और प्रकटन—लोगों को जीतने के लिए धार्मिक स्वभाव का उपयोग करना, ताकि वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। लोगों को जीतने और उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए वचन की वास्तविकता और अधिकार का उपयोग करना—यही जीते जाने का अर्थ है। जो लोग पूर्ण बनाए जा चुके हैं, वे जीते जाने के बाद न केवल आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे न्याय के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने, अपने स्वभाव को बदलने और परमेश्वर को जानने में भी समर्थ होते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग का अनुभव करते हैं और सत्य से भर जाते हैं। वे सीखते हैं कि परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे किया जाए, वे परमेश्वर के लिए दुःख उठाने और अपनी स्वयं की इच्छाएँ रखने में समर्थ हो जाते हैं। पूर्ण किए गए लोग वे हैं, जिन्हें परमेश्वर के वचन का अनुभव होने के कारण सत्य की वास्तविक समझ होती है। जीते गए लोग वे हैं, जो सत्य को जानते हैं परंतु जिन्होंने सत्य के वास्तविक अर्थ को स्वीकार नहीं किया है। जीते जाने के बाद वे आज्ञापालन करते हैं, परंतु उनकी आज्ञाकारिता उनके द्वारा प्राप्त किए गए न्याय का परिणाम होती है। उन्हें कई सत्यों के वास्तविक अर्थ की बिलकुल भी समझ नहीं है। वे सत्य को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं, परंतु उन्होंने सत्य में प्रवेश नहीं किया है; वे सत्य को समझते हैं, परंतु उन्होंने सत्य का अनुभव नहीं किया है। पूर्ण बनाए जा रहे लोगों पर किए जा रहे कार्य में जीवन के पोषण के साथ-साथ ताड़ना और न्याय शामिल हैं। जो व्यक्ति सत्य में प्रवेश करने को महत्व देता है, वही पूर्ण बनाया जाने वाला व्यक्ति है। पूर्ण बनाए जाने वालों और जीते जाने वालों के मध्य अंतर इस बात में निहित है कि वे सत्य में प्रवेश करते हैं या नहीं। पूर्ण बनाए गए लोग वे हैं, जो सत्य को समझते हैं, सत्य में प्रवेश कर चुके हैं और सत्य को जी रहे हैं; पूर्ण न बनाए जा सकने वाले लोग वे हैं, जो सत्य को नहीं समझते और सत्य में प्रवेश नहीं करते, अर्थात् जो सत्य को जी नहीं रहे हैं। यदि ऐसे लोग अब पूरी तरह से आज्ञापालन करने में समर्थ हैं, तो वे जीते जाते हैं। यदि जीते गए लोग सत्य को नहीं खोजते—यदि वे सत्य का अनुसरण करते हैं परंतु सत्य को जीते नहीं, यदि वे सत्य को देखते और सुनते हैं किंतु सत्य के अनुसार जीने को महत्व नहीं देते—तो वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते। जिन लोगों को पूर्ण बनाया जाना है, वे पूर्णता के मार्ग के समानांतर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं। इसके माध्यम से वे परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हैं, और वे पूर्ण बना दिए जाते हैं। जो कोई भी विजय के कार्य का समापन होने से पूर्व अंत तक अनुसरण करता है, वह जीता गया होता है, परंतु उसे पूर्ण बनाया गया नहीं कहा जा सकता। "पूर्ण बनाए गए" उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में सक्षम होते हैं। यह उन लोगों को संदर्भित करता है, जो जीते जाने का कार्य समाप्त होने के बाद विपत्ति में अडिग रहते हैं और सत्य को जीते हैं। जीते जाने से पूर्ण बनाए जाने को कार्य के चरणों की भिन्नताएँ और लोगों द्वारा सत्य को समझने तथा सत्य में प्रवेश करने की मात्रा की भिन्नताएँ अलग करती हैं। जिन लोगों ने पूर्णता के मार्ग पर चलना आरंभ नहीं किया है, अर्थात् जो सत्य को धारण नहीं करते, वे फिर भी अंततः निकाल दिए जाएँगे। केवल वे लोग ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, जो सत्य को धारण करते हैं और उसे जीते हैं। अर्थात्, जो पतरस की छवि को जीते हैं, वे पूर्ण बनाए गए हैं, जबकि बाकी सब जीते गए हैं। जीते जा रहे सभी लोगों पर किए जा रहे कार्य में शाप देना, ताड़ना देना और कोप दर्शाना शामिल हैं, और जो कुछ उन पर पड़ता है, वह धार्मिकता और शाप है। ऐसे व्यक्ति पर कार्य करना बिना समारोह या विनम्रता के प्रकट करना—उनके भीतर के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना है, ताकि वे अपने आप इसे पहचान लें और पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएँ। एक बार जब मनुष्य पूरी तरह से आज्ञाकारी बन जाता है, तो विजय का कार्य समाप्त हो जाता है। यहाँ तक कि यदि अधिकतर लोग अभी भी सत्य को समझने की कोशिश नहीं करते, तो भी विजय का कार्य समाप्त हो जाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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