परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 212

अंतिम दिनों में, जो कार्य परमेश्वर को करना है, उसे करने और अपने वचनों की सेवकाई करने के लिए परमेश्वर ने देहधारण किया। वह मनुष्यों के मध्य अपने हृदय के अनुसार लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य के साथ कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से आया। सृष्टि से लेकर आज तक, केवल अन्तिम दिनों में ही वह इस तरह का कार्य करता है। मात्र अन्तिम दिनों के दौरान ही ऐसे विशाल स्तर का कार्य करने के लिए परमेश्वर ने देहधारण किया है। यद्यपि वह ऐसी कठिनाइयों को सहन करता है, जिन्हें सहन करना लोगों को मुश्किल मालूम देगा और भले ही एक महान परमेश्वर होते हुए भी उसमें एक साधारण मनुष्य बनने की विनम्रता है, फिर भी उसके कार्य के किसी भी पहलू को विलम्बित नहीं किया गया है और उसकी योजना किसी भी तरह से दुर्व्यवस्था का शिकार नहीं हुई है। वह अपनी वास्तविक योजना के अनुसार ही कार्य कर रहा है। इस देहधारण के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य लोगों को जीतना है और दूसरा उद्देश्य उन लोगों को पूर्ण बनाना है जिनसे वह प्रेम करता है। वह अपनी आँखों से उन लोगों को देखने की इच्छा रखता है, जिन लोगों को वह पूर्ण बनाता है, और वह यह भी खुद देखना चाहता है कि जिन लोगों को वह पूर्ण बनाता है, वे उसके लिए कैसे गवाही देते हैं। बस एक या दो व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। बल्कि, यह एक समूह है, जिसमें कुछ ही लोग शामिल हैं। इस समूह के लोग संसार के विभिन्न देशों और संसार की विभिन्न राष्ट्रीयताओं से आते हैं। इतना कार्य करने का उद्देश्य इस समूह के लोगों को प्राप्त करना है, उस गवाही को प्राप्त करना है, जो इस समूह के लोग उसके लिए देते हैं, और उस महिमा को प्राप्त करना, जो वह लोगों के इस समूह से हासिल करता है। वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता है, जिसका कोई महत्व नहीं होता है, और न ही वह ऐसा कोई कार्य करता है जिसका कोई मूल्य नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इतना अधिक कार्य करने में, परमेश्वर का उद्देश्य उन सभी लोगों को पूर्ण बनाना है, जिन्हें वह पूर्ण बनाने की अभिलाषा रखता है। इससे असंबद्ध जो उसके पास खाली समय है उसमें, वह उन लोगों को निकाल बाहर कर देगा, जो दुष्ट हैं। यह जान लो कि वह यह महान कार्य उन लोगों के कारण नहीं करता, जो दुष्ट हैं; इसके विपरीत, वह अपना सबकुछ छोटी-सी संख्या वाले उन लोगों के कारण देता है, जिन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना है। जो कार्य वह करता है, जो वचन वह बोलता है, जो रहस्य वह प्रकट करता है, और उसका न्याय और उसकी ताड़ना सबकुछ उस छोटी-सी संख्या वाले लोगों के लिए ही है। वह उन लोगों के कारण देह नहीं बना, जो दुष्ट हैं, उनके लिए तो बिलकुल भी नहीं जो उसमें बड़े क्रोध को भड़काते हैं। वह उन लोगों के कारण सत्य बोलता और प्रवेश की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है, वह उनके कारण ही देह बना और यह उनके कारण ही है, कि वह अपनी प्रतिज्ञाएँ और आशीषें उंडेलता है। मानवता में वह सत्य, प्रवेश और जीवन, जिसकी वह बात करता है, उन पर कार्य उन लोगों के लिए नहीं किया जाता है, जो दुष्ट हैं। वह उन लोगों से बात करने से बचना चाहता है, जो दुष्ट हैं और उन लोगों पर समस्त सत्य उंडेल देना चाहता है, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है। फिर भी उसका कार्य फिलहाल इस बात की माँग करता है कि वे जो दुष्ट हैं, उन्हें भी उसकी कुछ मूल्यवान चीज़ों का आनन्द उठाने की अनुमति दी जाए। वे जो सत्य का क्रियान्वन नहीं करते, जो परमेश्वर को तुष्ट नहीं करते, और जो उसके कार्य में बाधा डालते हैं, वे सभी दुष्ट हैं। उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता और परमेश्वर के द्वारा घृणा किए जाते हैं और अस्वीकृत किए जाते हैं। इसके विपरीत, वे लोग जो सत्य का अभ्यास करते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं और जो परमेश्वर के कार्य के लिए अपना सर्वस्व खपा देते हैं, ये वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना है। वे लोग जिन्हें परमेश्वर सम्पूर्ण करने की इच्छा रखता है, वे और कोई नहीं बल्कि इस समूह के लोग ही हैं, और जो कार्य परमेश्वर करता है, वह इन लोगों के लिए ही है। वह सत्य जिसकी बात वह करता है, वह सत्य उन लोगों की ओर ही दिष्ट है, जो इसे अभ्यास में लाने की इच्छा रखते हैं। वह उन लोगों से बात नहीं करता, जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते हैं। अंतर्दृष्टि की बढ़ोतरी और पहचानने की योग्यता का विकास, जिनकी बात वह करता है, वे उन लोगों की ओर लक्षित हैं जो सत्य को क्रियान्वित कर सकते हैं। जब वह उन लोगों की बात करता है, जिन्हें पूर्ण किया जाना है, तब वह इन लोगों की बात कर रहा होता है। पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की ओर दिष्ट होता है, जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। बुद्धिमान होना और मानवता रखने जैसी बातें उन लोगों की ओर दिष्ट होती हैं, जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक होते हैं। वे लोग जो सत्य को क्रियान्वित नहीं करते, वे अनेक सत्य के अनेक वचन सुन सकते हैं, परन्तु क्योंकि वे प्रकृति से बहुत दुष्ट हैं, और सत्य में उनकी रुचि नहीं है, इसलिए जो वे समझते हैं वह मात्र सिद्धान्त और शब्द हैं, खोखली परिकल्पनाएँ हैं, और इनका उनके जीवन प्रवेश के लिए कोई-भी महत्व नहीं है। उनमें से कोई भी परमेश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं है; वे सभी वे लोग हैं, जो परमेश्वर को देखते हैं, परन्तु उसे प्राप्त नहीं कर सकते और वे सभी परमेश्वर के द्वारा दण्डित घोषित किए गए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं

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