परमेश्वर के दैनिक वचन | "मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य" | अंश 208

यदि लोग वास्तव में मानव जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकते हैं, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को अपने दिल में एक खजाने के रूप में थामे नहीं रहेंगे। वे अब और अपने माता-पिता की सेवा करना नहीं चाहेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य के भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के अपने मांस और रक्त की तरह हैं। क्या देह का गंतव्य, उसका भविष्य, जीवित रहते हुए परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मौत के बाद परमेश्वर से आत्मा के मिल पाने की खातिर होगा? क्या कल देह का अंत विपत्तियों की तरह भयावह भट्ठी में होगा, या यह आग की जलन में होगा? क्या इस तरह के प्रश्न जो इससे सम्बंधित हैं कि क्या मनुष्य का देह दुर्भाग्य को या पीड़ा को सहन कर पाएगा, सबसे बड़ी खबर नहीं जिससे अभी इस धारा में रहा कोई भी जो एक दिमाग रखता है और जो अपनी सही मनःस्थिति में है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ, पीड़ा को सहन करने का मतलब आशीर्वाद पाने से है, पीड़ा का अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक होते हैं। दुर्भाग्य का मतलब है दृढ़ता से खड़ा नहीं रह पाना या धोखा खाना; या इसका मतलब है कि किसी को दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ मिलेंगी और आपदाओं के बीच अपने जीवन को गँवा देगा, और यह कि आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है)। मनुष्य ठोस विवेक से लैस हैं, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे अपेक्षाकृत भ्रमित हैं और आँख बंद करके चीज़ों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इसकी पूरी तरह से समझ होनी चाहिए कि वे किस में प्रवेश करें, और उन्हें विशेष रूप से तय करना चाहिए कि विपत्ति के दौरान किस में प्रवेश करें (यानी, भट्ठी में शुद्धिकरण के दौरान), और उन्हें आग के परीक्षण में किस-किस से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं, सेवा न करो। इस पर दुखी होने का, इतनी चिंता करने और अपने दिमागों को परेशान करने का, क्या मतलब है? यह देह तेरा अपना नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर के हाथों में है जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है (मूलतः इसका मतलब यह था कि यह देह शैतान का था। क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, यह केवल उसी तरह कहा जा सकता है। क्योंकि यह इस तरह कहने में अधिक प्रेरक है—यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में हैं।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरा है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इस पर परेशान होकर क्यों अपने दिमाग ख़राब करें? क्यों पागलों की तरह परेशान हों परमेश्वर से आग्रह करने में, अपने उस बदबूदार देह के लिए आसक्त होकर, जो लंबे समय से निन्दित और शापित है, साथ ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन किया गया है? क्यों परेशान हों हमेशा अपने दिल के करीब शैतान के सहयोगियों को थाम कर? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के सही गंतव्य को बर्बाद कर सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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