परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" | अंश 152

मनुष्य के बीच परमेश्वर के कार्य को मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता है, क्योंकि मनुष्य इस कार्य का उद्देश्य है, और परमेश्वर के द्वारा रचा गया एकमात्र ऐसा प्राणी है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य का जीवन एवं मनुष्य की सम्पूर्ण क्रियाएं परमेश्वर से अविभाज्य हैं, और उन सब को परमेश्वर के हाथों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, और यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से स्वाधीन होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है। कोई भी इसका इंकार नहीं कर सकता है, क्योंकि यह एक तथ्य है। वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह मानवजाति के लाभ के लिए है, और शैतान के षडयन्त्रों की ओर निर्देशित होता है। वह सब कुछ जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है वह परमेश्वर की ओर से ही आता है, और परमेश्वर ही मनुष्य के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, मनुष्य परमेश्वर से अलग होने में असमर्थ है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के पास मनुष्य से अलग होने का कभी कोई इरादा नहीं था। वह कार्य जो परमेश्वर करता है वह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए है, और उसके विचार हमेशा उदार होते हैं। तो मनुष्य के लिए, परमेश्वर का कार्य एवं परमेश्वर के विचार (अर्थात्, परमेश्वर की इच्छा) दोनों ही ऐसे "दर्शन" हैं जिन्हें मनुष्य के द्वारा पहचाना जाना चाहिए। ऐसे दर्शन परमेश्वर के प्रबंधन भी हैं, और यह ऐसा कार्य है जिसे मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसी बीच, वे अपेक्षाएं जिन्हें परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है उन्हें मनुष्य के "रीति व्यवहार" कहा जाता है। दर्शन स्वयं परमेश्वर के कार्य हैं, या मानवजाति के लिए उसकी इच्छा है या उसके कार्य के उद्देश्य एवं महत्व हैं। दर्शनों को प्रबंधन का एक हिस्सा भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह प्रबंधन परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य की ओर निर्देशित होता है, जिसका अभिप्राय है कि यह वह कार्य है जिसे परमेश्वर मनुष्य के मध्य करता है। यह कार्य वह प्रमाण एवं वह मार्ग है जिसके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर को जान पाता है, और यह मनुष्य के लिए परम आवश्यक है। परमेश्वर के कार्य के ज्ञान पर ध्यान देने के बजाए, यदि लोग केवल परमेश्वर में विश्वास के सिद्धान्तों पर ही ध्यान देते हैं, या तुच्छ महत्वहीन ब्योरों पर ध्यान देते हैं, तो वे साधारण तौर पर परमेश्वर को नहीं जान पाएंगे, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं होंगे। परमेश्वर के विषय में मनुष्य के ज्ञान के लिए परमेश्वर का कार्य अत्याधिक सहायक है, और इसे दर्शन कहते हैं। ये दर्शन परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर की इच्छा, और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य एवं महत्व हैं; वे सब मनुष्य के लाभ के लिए हैं। रीति व्यवहार उस ओर संकेत करता है जिसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, यह कि इसे उन प्राणियों द्वारा किया जाना चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। यह मनुष्य का कर्तव्य भी है। जिसे मनुष्य को करना चाहिए वह कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा बिलकुल प्रारम्भ से ही समझा गया था, किन्तु ये वे अपेक्षाएं हैं जिन्हें परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है। जब परमेश्वर कार्य करता है तो ये अपेक्षाएं क्रमशः और गहरी तथा और उन्नत होती जाती हैं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के दौरान, मनुष्य को व्यवस्था का पालन करना पड़ा, और अनुग्रह के युग के दौरान, मनुष्य को क्रूस उठाना पड़ा था। राज्य का युग भिन्न हैः मनुष्य से की गई अपेक्षाएं व्यवस्था के युग एवं अनुग्रह के युग के दौरान की गई अपेक्षाओं की तुलना में कहीं अधिक ऊँची हैं। जैसे जैसे दर्शन और अधिक उन्नत हो जाते हैं, मनुष्य से की गई अपेक्षाएं भी और अधिक उन्नत होती जाती हैं, तथा वे हमेशा के लिए स्पष्ट एवं और अधिक वास्तविक होती जाती हैं। इसी प्रकार, दर्शन भी वृहद रूप से वास्तविक हो जाते हैं। ये अनेक वास्तविक दर्शन न केवल परमेश्वर के प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता के लिए सहायक हैं, बल्कि इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान के लिए भी सहायक हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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