परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" | अंश 151

परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में परेशानी उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौन सा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौन सा कदम लोगों को स्वच्छ बनाने, उनसे धार्मिकता करवाने और इस तरह से जीवन बिताने के अभिप्राय से नहीं है जो ऐसी छवि का निर्माण करता है जिससे प्रेम किया जा सके? शैतान, हालाँकि, ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को सारे ब्रह्माण्ड में निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर अपना स्वयं का कार्य भी करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, तब भी इसका अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया है; परमेश्वर ने वास्तव में उसे मात्र अपना पूरा अधिकार नहीं दिया, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता है और सदैव परमेश्वर की पकड़ में है। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने क्रिया-कलापों को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों के ऊपर नियंत्रण प्रयोग करने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़-कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो शैतान परेशान करता है। अंत के दिनो में, वह अपने उत्पीड़न को समाप्त कर देगा; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिस प्रकार के व्यक्ति को पूर्ण बनाना चाहता है वह पूर्ण बना दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अमापनीय और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को पूर्ण बनाएगा, और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और उसका कार्य करना असंभव हो जायेगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगें को पूर्णतः प्राप्त कर लेगा। शैतान तब भी इसे अब मानने से मना करता है; वह लगातार स्वयं को परमेश्वर के विरोध में खड़ा करता है, परंतु परमेवश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। उसने कहा है, मैं शैतान की सभी अँधेरी शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अँधेरे प्रभावों के ऊपर विजेता बनूँगा। यही वह कार्य है जो अब देह में अवश्य किया जाना चाहिए, और यही देहधारण का अभिप्राय है। यह अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के चरण को पूर्ण करने, शैतान से जुड़ी सभी चीज़ों को मिटाने के लिए है। परमेश्वर की शैतान पर विजय एक निश्चित प्रवृत्ति है! वास्तव में शैतान बहुत पहले असफल हो चुका है। जब बड़े लाल ड्रेगन के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा, अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया, और यह कार्य गति पकड़ने लगा, तो शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण शैतान को पराजित करने के अभिप्राय से था। शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देह बन गया और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, और उसने देखा कि कोई भी शक्ति कार्य को रोक नहीं सकी। इसलिए, जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया तथा कोई और कार्य करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप किया और परेशानियाँ डाली; हालाँकि, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन गया है, और कि अपने कार्य में, परमेश्वर ने मानवजाति के लिए प्रकटन और न्याय के रूप में काम में लाने के लिए, और परिणामस्वरूप मानवजाति को जीतने और शैतान को पराजित करने के लिए उसकी विद्रोहशीलता का उपयोग किया है। परमेश्वर उसकी अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, मैंने पहले निम्नलिखित कहा है: मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है। अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा। जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो शैतान पीछे से छुप कर उसका पीछा करता है, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर चोट किसने की! एक बार जब उसे पहले ही कुचला और चूर—चूर कर दिया गया होगा, केवल तभी उसे सत्य का ज्ञान होगा; उस समय तक उसे पहले से ही आग की झील में जला दिया गया होगा। तब क्या वह पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास आनंद लेने के लिए और कोई योजनाएँ नहीं हैं!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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