परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" | अंश 199

परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विभिन्न व्यवहार

लोग परमेश्वर के प्रति कैसा बर्ताव करते हैं, यह उनका भविष्य निर्धारित करता है और यह निर्धारित करता है कि परमेश्वर कैसे उनके साथ पेश आएगा और व्यवहार करेगा। यहां पर मैं कुछ उदाहरण देने जा रहा हूँ कि कैसे लोग परमेश्वर से पेश आते हैं। आइये, कुछ सुनते हैं कि उनका ढंग और रवैया जिससे वे परमेश्वर के प्रति पेश आते हैं वे सही हैं या नहीं। आइये, हम इन सात प्रकार के लोगों के आचरण पर विचार करें:

क. एक प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जिनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति निश्चित रूप से बेतुका होता है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर एक बोधिसत्व या मानव बुद्धि के पवित्र प्राणी जैसा है, और चाहता है कि जब वे मिलें तो लोग तीन बार उसके सामने झुकें और खाने के बाद उसके सामने अगरबत्ती जलाएं। और इस तरह जब, उनके हृदय में, वे परमेश्वर के प्रति उसके अनुग्रह के लिए धन्यवादी हैं, और परमेश्वर के प्रति आभारी हैं, तो अक्सर उनके अंदर इस तरह का संवेग आता है। वे ऐसी कामना करते हैं कि जिस परमेश्वर में वे आज विश्वास करते हैं, उस पवित्र सत्ता की तरह जिसके लिए वे मन में लालसा रखते हैं, वह अपने प्रति उनके उस व्यवहार को स्वीकार करे जिसमें वे तीन बार उसके सामने झुकते हैं जब वे मिलते हैं, और खाने के बाद अगरबत्ती जलाते हैं।

ख. कुछ लोग परमेश्वर को जीवित बुद्धा के रूप में देखते हैं जो सबकी परेशानियों को हटाने और उनको बचाने में सक्षम है; वे परमेश्वर को जीवित बुद्धा के रूप में देखते हैं जो उन्हें दुःख के सागर में से दूर ले जाने में सक्षम है। इन लोगों का विश्वास बुद्धा के रूप में परमेश्वर की आराधना करने में है। हालाँकि वे अगरबत्ती नहीं जलाते, प्रणाम नहीं करते, या भेंट नहीं देते, लेकिन उनके हृदय में उनका परमेश्वर एक बुद्धा है और केवल यह चाहता है कि वे बहुत दयालु और धर्मार्थ हों, कि वे किसी प्राणी को नहीं मारें, न दूसरों को गाली दें, ऐसा जीवन जियें जो ईमानदार दिखे, और कुछ भी गलत नहीं करें—केवल यही बातें। उनके हृदय में यही परमेश्वर है।

ग. कुछ लोग परमेश्वर की आराधना किसी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में करते हैं। उदहारण के लिए, यह महान व्यक्ति चाहे किसी भी साधन से बोलना पसंद करता हो, किसी भी अंदाज़ में बोलता हो, किसी भी शब्द और शब्दाबली का उपयोग करता हो, उसका लहजा, उसके हाथ का संकेत, उसके विचार और कार्य—वे उन सब की नकल करते हैं, और यह सब ऐसी बातें हैं जो उन्हें पूरी तरह से परमेश्वर में अपने विश्वास को पैदा करने के लिए उत्पन्न करना ज़रूरी है।

घ. कुछ लोग परमेश्वर को एक सम्राट के रूप में देखते हैं, वे सोचते हैं कि वह सबसे ऊँचा है, और कोई भी उसका अपमान करने की हिम्मत नहीं करता—और यदि वे ऐसा करते हैं तो उन्हें दण्डित किया जायेगा। वे ऐसे सम्राट की आराधना करते हैं क्योंकि उनके हृदय में सम्राट के लिए एक निश्चित जगह है। सम्राटों के विचार, तौर तरीके, अधिकार और स्वभाव—यहाँ तक कि उनकी रूचि और व्यक्तिगत जीवन—यह सब कुछ ऐसा बन जाता है जिसे इन लोगों को समझना जरुरी है, ऐसे मुद्दे और मामले हैं जो उनसे सम्बंधित हैं, और इसलिये वे परमेश्वर की आराधना एक सम्राट के रूप में करते हैं। इस तरह का विश्वास बेहूदा है।

च. कुछ लोगों का परमेश्वर के अस्तित्व में एक गहरा और अटूट खास विश्वास होता है। क्योंकि उनका परमेश्वर के बारे में ज्ञान छिछला होता है और उन्हें परमेश्वर के वचन का ज्यादा अनुभव नहीं होता, वे उसकी आराधना एक प्रतिमा के रूप में करते हैं। यह प्रतिमा उनके हृदय में एक ईश्वर है, यह कुछ ऐसा है जिससे उन्हें डरना चाहिए और उसके सामने झुकना चाहिए, और जिसका उन्हें अनुसरण और अनुकरण करना चाहिए। वे परमेश्वर को प्रतिमा की तरह देखते हैं, उन्हें जिसका जीवनभर अनुसरण करना है। वे उस लहजे की नकल करते हैं जिसमें ईश्वर बोलता है, और बाहरी रूप में वे उनकी नकल करते हैं जिन्हें परमेश्वर पसंद करता है। वे अक्सर ऐसे काम करते हैं जो भोले-भाले, शुद्ध, और ईमानदार दिखते हैं, और यहाँ तक कि वे एक ऐसे साथी के रूप में इस मूर्ति का अनुसरण करते हैं जिसका वे कभी हिस्सा नहीं बन सकते। यह उनके विश्वास का रूप है।

छ. कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े और उपदेश सुने होने बावजूद, अपने हृदय में महसूस करते हैं कि उनका परमेश्वर के प्रति पेश आने का एकमात्र सिद्धांत यह है कि उन्हें हमेशा चापलूस और खुशामद करने वाला होना चाहिए, या ईश्वर की प्रशंसा और सराहना इसी तरीके से करनी चाहिए जो वास्तविक न हो। वे विश्वास करते हैं कि ऐसा परमेश्वर ही परमेश्वर है जो चाहता है कि वे इसी तरह से पेश आएं, और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे कभी भी उसके क्रोध को भड़का सकते हैं, या उसके प्रति पाप करते हैं, और इस तरह पाप करने के परिणामस्वरुप ईश्वर उन्हें दण्डित करेगा। उनके हृदय में ईश्वर ऐसा है।

ज. और अब ऐसे लोगों की बहुतायत है जो परमेश्वर में आत्मिक सहारा प्राप्त करते हैं। क्योंकि वे इस जगत में रहते हैं, वे बिना शांति या आनंद के हैं, और उन्हें कहीं शांति प्राप्त नहीं होती है। परमेश्वर को प्राप्त करने के बाद, जब वे उसके वचनों को देख और सुन लेते हैं, अंदर ही अंदर उनका हृदय आनंदित और मगन हो जाता है। और ऐसा क्यों होता है? उन्हें लगता है कि उन्होंने आखिर में वह प्राप्त कर लिया है जो उनके लिए आनंद लायेगा, कि उन्होंने आखिरकार वह ईश्वर प्राप्त कर लिया है जो उन्हें आत्मिक सहारा देगा। ऐसा इसलिए क्योंकि, परमेश्वर को स्वीकार करने और अनुकरण करने के बाद, वे खुश हैं, उनके जीवन में संतुष्टि आ जाती है, वे अब उन अविश्वासियों के समान नहीं हैं, जो जीवन में जानवरों की तरह नींद में चलते हैं, और अब वे महसूस करने लगते हैं कि उनके पास जीवन में आगे देखने के लिए कुछ है। इस प्रकार, उन्हें लगता है कि यह ईश्वर उनकी आत्मिक जरूरतें पूरी कर सकता है और मन और आत्मा दोनों में एक बड़ा आनंद ला सकता है। बिना इसका अहसास किए, वे ऐसे ईश्वर को छोड़ नहीं पाते जो उन्हें आत्मिक सहारा देता है, जो उनके आत्मा और पूरे परिवार में आनंद लाता है। वे मानते हैं कि ईश्वर में विश्वास को उनके जीवन में आत्मिक सहारा लाने से ज्यादा कुछ और करने की जरुरत नहीं है।

क्या परमेश्वर के प्रति इस प्रकार का मनोभाव रखने वाले लोग तुम्हारे बीच में हैं? (हां, हैं।) यदि उनके ईश्वर को मानने में, किसी के हृदय में इस प्रकार का रवैया है, क्या वे सही मायने में परमेश्वर के सम्मुख आने के योग्य हैं? यदि किसी के हृदय में इसमें से एक भी प्रकार का रवैया है, तो क्या वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं? क्या वे परमेश्वर स्वयं अद्वितीय में विश्वास रखते हैं? चूंकि तुम स्वयं अद्वितीय परमेश्वर में विश्वास नहीं करते तो तुम किसमें विश्वास करते हो? यदि तुम जिसमें विश्वास करते हो वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर नहीं है, तो यह संभव है कि तुम किसी प्रतिमा में विश्वास करते हो, या एक महान आदमी में, या एक बोधिसत्व में, कि तुम अपने हृदय में बुद्ध की आराधना करते हो। और इसके अलावा, यह भी संभव है कि तुम किसी साधारण व्यक्ति में विश्वास करते हो। संक्षेप में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न विश्वास और रवैये के कारण, लोग परमेश्वर को अपने संज्ञान के अनुसार हृदय में जगह देते हैं, वे परमेश्वर के ऊपर अपनी कल्पनाएँ थोप देते हैं, वे परमेश्वर के बारे में अपना रवैया और कल्पनायें स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के साथ साथ रखते हैं, और उनका उत्सव मनाने के लिए उन्हें पकडे रहते हैं। जब लोग परमेश्वर के प्रति इस प्रकार का अनुचित दृष्टिकोण रखते हैं तो इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि उन्होंने स्वयं सच्चे परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया है और झूठे ईश्वर की आराधना करते हैं, इसका मतलब है कि ठीक उसी समय जब वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं, और उसका विरोध करते हैं, और यह कि वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व से इंकार करते हैं। यदि लोग इस प्रकार का विश्वास रखेंगे, उनके लिए क्या परिणाम होंगे? इस प्रकार के विश्वास के साथ, क्या वे कभी परमेश्वर की अपेक्षा को पूरा करने के निकट आ पाएंगे? इसके विपरीत, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के कारण, ये लोग परमेश्वर के पथ से दूर होते जाएंगे, वे जिस दिशा की खोज में लगे हैं वह उससे ठीक विपरीत है जिस दिशा की अपेक्षा परमेश्वर उनसे करता है। क्या कभी तुमने वो कहानी सुनी है "रथ को उत्तर की ओर चलाकर दक्षिण की ओर जाना?" यह ठीक उत्तर की ओर रथ चला कर दक्षिण की ओर जाने का मामला हो सकता है। यदि लोग परमेश्वर में इस ऊंटपटांग तरह से विश्वास करेंगे तो तुम जितनी मेहनत करोगे, तुम परमेश्वर से उतना ही दूर होते जाओगे। और इसलिए मैं तुम्हें यह चेताता हूँ: इससे पहले कि तुम आगे बढ़ो, तुम्हें पहले यह जरुर देखना चाहिये कि तुम सही दिशा में जा रहे हो कि नहीं? अपने प्रयासों को लक्षित करो, और खुद से यह अवश्य पूछो, "क्या यह ईश्वर जिस पर मैं विश्वास रखता हूँ वह सभी चीज़ों पर राज्य करता है? जिस ईश्वर में मैं विश्वास रखता हूँ क्या वह मात्र कोई ऐसा है जो मुझे आत्मिक सहारा देता है? क्या वह मेरा आदर्श है? जिस ईश्वर में मैं भरोसा करता हूँ उसे मुझसे क्या अपेक्षा है? क्या ईश्वर वह सब कुछ जो मैं करता हूँ उसे स्वीकृत करता है? परमेश्वर को जानने के लिये जो मैं करता और खोजता हूं, क्या वे सब परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुकूल हैं? जिस पथ पर मैं चलता हूँ क्या वह परमेश्वर के द्वारा मान्य और स्वीकृत है? क्या परमेश्वर मेरे विश्वास से संतुष्ट है?" तुम्हें अक्सर और बार बार यह सवाल अपने आप से पूछते रहने चाहिए। यदि तुम परमेश्वर को जानने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हारे पास एक स्पष्ट विवेकशीलता और स्पष्ट उद्देश्य जरुर होना चाहिए, तभी तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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