परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" | अंश 195

परमेश्वर का अनुसरण करने वालों का जीवन और मृत्यु-चक्र

आओ, अब हम परमेश्वर के अनुयायियों के जीवन और मृत्यु के चक्र के विषय में बात करें। इसका संबंध तुम लोगों से है, इसलिये ध्यान दो। पहले विचार करो कि जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनको किन वर्गो में विभाजित किया जा सकता है। इसमें दो हैं: परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवकाई करने वाले लोग। पहले हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों के विषय में बात करेंगे, जिसमें बहुत कम लोग हैं। "परमेश्वर के चुने हुए लोग" से क्या अभिप्राय है? परमेश्वर ने जब सारी चीज़ों की रचना कर दी और मानवजाति अस्तित्व में आ गई तो परमेश्वर ने उन लोगों का एक समूह चुना जो उसका अनुसरण करते थे, और उन्हें "परमेश्वर के चुने हुए लोग" कहा। परमेश्वर के इन चुने हुए लोगों का एक विशेष दायरा और महत्ता है। वह दायरा यह है कि परमेश्वर जब भी कोई महत्वपूर्ण कार्य करता है तो उनको जरुर आना है—यह पहली बात है जो उन्हें विशेष बनाती है। और उनकी महत्ता या विशेषता क्या है? परमेश्वर द्वारा उन्हें चुने जाने का अर्थ है कि वे महान विशेषता रखने वाले लोग हैं। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर उन्हें सम्पूर्ण बनाना चाहता है और सिद्ध बनाना चाहता है, और उसका प्रबंधन का कार्य पूर्ण होने के पश्चात वह इन्हें जीत लेगा। क्या यह विशेषता महान नहीं है? इस प्रकार, इन चुने हुए लोगों का परमेश्वर के लिये विशेष महत्व है, क्योंकि ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर जीतने का इरादा रखता है। जबकि सेवकाई करने वाले—खैर, आओ हम परमेश्वर के पूर्व निर्धारित लक्ष्य या मंजिल से हट जाएं, और पहले उनके उद्भव के बारे में बात करें। "सेवकाई करने वाले" का शाब्दिक अर्थ है वह जो सेवा करता है। वे जो सेवकाई करने वाले हैं, वे चलायमान हैं, वे लम्बे समय तक ऐसा नहीं करते या हमेशा के लिये नहीं करते, बल्कि उन्हें भाड़े पर लिया जाता है अथवा अस्थाई रुप से नियुक्त किया जाता है। इनमें से अधिकांश का चुनाव अविश्वासियों में से होता है। जब यह आदेश दिया जाता है कि वे परमेश्वर के कार्य में सेवकाई करने वाले की भूमिका निभाएंगे तो वे पृथ्वी पर आते हैं। वे शायद अपने पुराने जीवन में पशु रहे होंगे, परन्तु वे अविश्वासियों में से भी एक रह चुके होंगे। सेवकाई करने वाले मूलत: ऐसे ही लोग हैं।

आओ, हम फिर से परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर आ जाएं। जब वे मरते हैं, तो परमेश्वर के चुने हुए लोग अविश्वासियों से और विश्वास के विभिन्न लोगों से बिल्कुल भिन्न किसी स्थान पर जाते हैं। यह वह स्थान होता है जहां उनके साथ स्वर्गदूत और परमेश्वर के दूतगण रहते हैं, और वह एक ऐसा स्थान होता है जिसका प्रशासन परमेश्वर स्वयं करता है। हालांकि, इस स्थान में, परमेश्वर के चुने लोग उस योग्य नहीं होते हैं कि परमेश्वर को स्वयं अपनी आखों से देख सकें, यह आत्मिक राज्य में किसी भी अन्य स्थान से अलग है; यह वह स्थान है जहां इस भाग के लोग मरने के बाद जाते हैं। जब वे मरते हैं तो उन्हें भी परमेश्वर के दूतों की कड़ी जांच का सामना करना पड़ता है। और किस बात की जांच की जाती है? परमेश्वर के दूत उस मार्ग की जांच करते हैं जो इन लोगों ने परमेश्वर के विश्वास में रहते हुए अपने जीवन भर अपनाया, कि उस समयकाल के दौरान, उन्होंने कभी परमेश्वर का विरोध तो नहीं किया या उसे कोसा तो नहीं, उन्होंने गंभीर पाप या दुष्टता तो नहीं की। यह जांच इस बात का निर्णय करती है कि क्या व्यक्ति जायेगा या रुकेगा। "जाना" किस बात को बताता है? और "रुकना" किस बात को बताता है? "जाना" बताता है कि क्या, अपने व्यवहार के आधार पर वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की श्रेणी में रहेंगे। "रुकना" बताता है कि वे उन लोगों की श्रेणी में रह सकते हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा अन्तिम दिनों के दौरान पूर्ण बनाया जाता है। जो रुकते हैं उनके लिये, परमेश्वर के पास विशेष प्रबंध है। उसके कार्यों की प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर ऐसे लोगों को भेजेगा कि वे प्रेरितों के रुप में कार्य करें या कलीसियाओं का जीर्णोद्धार करें या उनकी सुधि लें। परन्तु जो लोग इस कार्य को करने योग्य हैं वे पृथ्वी पर बार-बार उस तरह से जन्म नहीं लेते जिस तरह से अविश्वासी जन्म लेते हैं; बल्कि वे परमेश्वर के काम की आवश्यकता और उठाये गये कदमों के अनुसार वापस लौटते हैं और बार बार जन्म नहीं लेते। तो क्या उनका पुनर्जन्म कब होगा इस विषय में कोई नियम है? क्या वे प्रत्येक कुछ वर्षो में एक बार आते हैं? क्या वे ऐसी बारम्बारता में आते हैं? नहीं। यह किस पर आधारित है? यह परमेश्वर के कार्य पर आधारित है, काम से संबंधित उसके कदमों पर, उसकी आवश्यकताओं पर, और इसका कोई नियम नहीं है। वह एक ही नियम क्या है? वह यह है कि जब परमेश्वर अन्तिम दिनों में अपने कार्यों का अन्तिम चरण पूरा करता है, तो ये चुने हुए लोग मनुष्यों के मध्य आयेंगे। जब वे सब आएंगे तो यह उनका अन्तिम बार जन्म होगा। और ऐसा क्यों है? यह परमेश्वर के कार्यों के अन्तिम चरण में प्राप्त किये जाने वाले परिणामों पर आधारित है—क्योंकि कार्य के इस अंतिम चरण के दौरान, परमेश्वर इन चुने हुए लोगों को सम्पूर्ण रुप से पूर्ण करेगा। इसका क्या अर्थ है? यदि इस अन्तिम चरण में इन लोगों को पूर्णता दी जाती है और वे सिद्ध बनाये जाते हैं तब वे पहले की तरह फिर से जन्म नहीं लेंगे; मनुष्य होने की प्रक्रिया पूर्णतया समाप्त होगी और इसी प्रकार पुनर्जन्म की प्रक्रिया भी। ये उनसे संबंधित है जो ठहरे रहेंगे। तो जो ठहर नहीं सकते वे कहां जाते हैं? जो ठहर नहीं सकते उनके जाने के लिये कोई न कोई उचित स्थान है। पहले तो-जैसा अन्य लोगों के साथ होता है—उनके बुरे कार्यों के परिणाम स्वरुप जो त्रुटियां उन्होंने की, और जो पाप उनके द्वारा किये गये, वे भी दण्डित किए जाते हैं। दण्डित किये जा चुकने के पश्चात परमेश्वर उन्हें आविश्वासियों के मध्य भेजता है; परिस्थितियों के अनुसार, वह उनका प्रंबंध अविश्वासियों के मध्य करेगा, या फिर विभिन्न विश्वासियों के मध्य। कहने का अर्थ है कि उनके पास दो विकल्प हैं: एक है कि शायद दण्डित होने के बाद उन्हें एक विशेष धर्म के मध्य रहना पड़े और दूसरा है कि शायद उन्हें अविश्वासी बनना पड़े। यदि वे एक अविश्वासी व्यक्ति बनते हैं तो फिर उनके हाथ से सारे अवसर चले जाएंगे। यदि वे विश्वासि व्यक्ति बनते हैं—उदाहरण के लिये, यदि वे एक ईसाई बनते हैं—तो उनके पास अभी भी अवसर है कि वे परमेश्वर के चुने हुओं के बीच लौट आयें; इस संबंध में अनेक जटिलताएं हैं। संक्षेप में, यदि परमेश्वर का कोई चुना हुआ व्यक्ति ऐसा कोई काम करता है जो परमेश्वर को पसंद नहीं, तो वे अन्य लोगों के समान ही दण्डित किये जायेंगे। उदाहरण के लिये, पौलुस को ही लो, जिसके विषय में हमने विगत समय में बात की थी। पौलुस दण्डित किए जाने वालों का एक उदाहरण है। तुम सब समझ रहे हो न कि मैं किस विषय पर बात कर रहा हूं? क्या परमेश्वर के चुने हुए लोगों का सीमाक्षेत्र निश्चित है? (अधिकांशत: निश्चित है।) इसमें अधिकतर निश्चित है। परन्तु उसका एक छोटा भाग निश्चित नहीं है। ऐसा क्यों है? क्योंकि उन्होंने बुराई की है। यहां मैंने सबसे स्पष्ट परिलक्षित उदाहरण बताया है: बुराई करना। जब वे बुराई करते हैं, परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता, और जब उसे उनकी आवश्यकता नहीं रहती, तो वह उन्हें विभिन्न जातियों और प्रकार के लोगों के बीच फेंक देता है, जो उन्हें बिना किसी आशा के छोड़ देता है और वापस लौटना कठिन बना देता है। यह सब परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र से संबंधित है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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