परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" | अंश 193

एक जीवधारी की मृत्यु-भौतिक जीवन का अंत—ये दर्शाता है कि एक जीवधारी भौतिक संसार से आत्मिक संसार में चला गया है, जबकि एक भौतिक जीवन के जन्म का तात्पर्य ये है कि एक जीवधारी आत्मिक संसार से भौतिक संसार में आया है और उसने अपनी भूमिका ग्रहण कर ली है और उसे निभाना आरम्भ कर दिया है। चाहे एक जीवधारी का आगमन हो अथवा गमन, दोनों आत्मिक जगत के कार्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। जब कोई भौतिक संसार में आता है तो परमेश्वर द्वारा आत्मिक जगत में उस परिवार के लिये, जिसमें उसे जाना है उस युग में जिसमें वे आते हैं उस पहर में जिसमें वे आते हैं, और वो भूमिका जो उन्हें निभानी है, उचित प्रबंध और व्याख्याएं पहले ही तैयार की जा चुकी होती हैं। और इसलिए इस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन—जो काम वह करता है, और जो मार्ग वो चुनता है—आत्मिक संसार की व्यवस्थाओं के अनुसार चलता है, जिसमें लेशमात्र की भी त्रुटि नहीं होती है। जिस समय पर भौतिक जीवन समाप्त होता, और जिस तरह और जिस स्थान पर समाप्त होता है, आत्मिक जगत के सामने वह स्पष्ट और प्रत्यक्ष होता है। परमेश्वर भौतिक संसार पर राज्य करता है, और वह आत्मिक जगत पर राज्य करता है, और वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के साधारण चक्र में देरी नहीं करेगा, न ही वह आत्मा के जीवन और मृत्यु चक्र के प्रबंधन में किसी प्रकार की गलती कर सकता है। आत्मिक जगत में आधिकारिक पदों पर आसीन प्रत्येक दूत अपने कार्यों को पूरा करता है, और परमेश्वर के निर्देशों और नियमों के अनुसार जो उसे करना चाहिये उसे करता है। और इसलिये मनुष्यों के संसार में, कोई भी भौतिक घटना व्यवस्थित रूप में घटित होती, और उसमें कोई गडबडी नहीं होती। यह सब कुछ इसलिये है कि सब वस्तुओं के विषय में परमेश्वर के नियम सुचारु हैं, और इसके साथ ही क्योंकि परमेश्वर का आधिपत्य प्रत्येक वस्तु पर है, और जिन चीज़ों पर उसका आधिपत्य है उसमें भौतिक संसार सम्मिलित है जिसमें मनुष्य रहता है और इसके अतिरिक्त, मनुष्य के पीछे का वह अदृश्य आत्मिक जगत भी। और इसलिये, यदि मनुष्य एक अच्छा जीवन चाहता है, और एक अच्छे वातावरण में रहना चाहता है, सम्पूर्ण दृश्य भौतिक जगत के अलावा, जो उसे दिया गया है, मनुष्य को आत्मिक संसार भी दिया जाना चाहिए, जिसे कोई भी देख नहीं सकता, जो मनुष्यों की ओर से प्रत्येक जीवधारी का संचालन करता है और जो सुचारु है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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