परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 186

जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, तब उसने उन्हें सन्तुलित करने के लिए, पहाड़ों और झीलों की जीवित दशाओं को सन्तुलित करने के लिए, पौधों और सभी प्रकार के पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों की जीवित दशाओं को सन्तुलित करने के लिए सभी प्रकार की पद्धतियों और तरीकों का उपयोग किया—उसका लक्ष्य था सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उन नियमों के अंतर्गत जीने और बहुगुणित होने की अनुमति दे जिन्हें उसने स्थापित किया था। सभी प्राणी इन नियमों के बाहर नहीं जा सकते हैं और न वे उन्हें तोड़ सकते हैं। केवल इस प्रकार के मूल वातावरण के अंतर्गत ही मनुष्य पीढ़ी दर पीढ़ी सकुशल जीवित रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं। यदि कोई जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा स्थापित मात्रा या दायरे से बाहर चला जाता है, या यदि वह उसके शासन के अधीन उस वृद्धि दर, आवृत्ति, या संख्या से अधिक बढ़ जाता है, तो जीवित रहने के लिए मानवजाति का वातावरण विनाश के भिन्न भिन्न मात्राओं को सहेगा। और उसी समय, मानवजाति का जीवित रहना खतरे में पड़ जाएगा। यदि एक प्रकार का जीवित प्राणी संख्या में बहुत अधिक है, तो यह लोगों के भोजन को छीन लेगा, लोगों के जल के स्रोत को नष्ट कर देगा, और उनके निवास स्थान को बर्बाद कर देगा। उस तरह से, मनुष्य का प्रजनन या जीवित रहने की दशा तुरन्त प्रभावित होगी। उदाहरण के लिए, पानी सभी चीज़ों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यदि बहुत सारे जानवर हैं-यदि चूहों, चींटियों, टिड्डियों, और मेंढकों की संख्या बहुत अधिक है और उन्हें पानी पीने की आवश्यकता है-जब इतनी बड़ी संख्या में पशु हैं, तो जल की वह मात्रा जो वे पीते हैं वह भी बढ़ जाएगी। जब कि पीने के पानी के स्रोत और जलीय क्षेत्रों के इस स्थायी दायरे के अंतर्गत जल की वह मात्रा जिसे वे पीते हैं बढ़ती जाती है, तो लोगों के पीने का पानी और जल के स्रोत कम हो जाएंगे, और उन्हें जल की कमी होगी। यदि लोगों के पीने का पानी नष्ट, दूषित, या बर्बाद हो जाता है क्योंकि सभी प्रकार के जानवर संख्या में बढ़ गए हैं, तो जीवित रहने के लिए उस प्रकार के कठोर वातावरण के अधीन, मानवजाति का जीवित रहना गम्भीर रूप से खतरे में पड़ जाएगा। यदि एक प्रकार के या अनेक प्रकार के जीवित प्राणी हैं जो अपनी उपयुक्त संख्या से आगे बढ़ जाते हैं, तो हवा, तापमान, आर्द्रता, और यहाँ तक कि जीवित रहने के मानवजाति के आकाश के अंतर्गत हवा के तत्व भी भिन्न भिन्न मात्रा में ज़हरीले और नष्ट हो जाएंगे। उसी प्रकार, इन परिस्थितियों के अधीन, मनुष्य का जीवित रहना और उसकी नियति तब भी उस प्रकार के वातावरण के खतरे के वश में होगी। अतः, यदि लोग इन सन्तुलनों को खो देते हैं, तो वह हवा जिसमें वे सांस लेते हैं ख़राब हो जाएगी, वह जल जो वे पीते हैं दूषित हो जाएगा, और वे तापमान जिसकी उन्हें ज़रुरत है वह भी बदल जाएगा, और भिन्न भिन्न मात्रा से प्रभावित होगा। यदि ऐसा होता है, तो जीवित रहने के लिए मानवजाति के देशीय वातावरण बहुत बड़े प्रभावों और चुनौतियों के अधीन होंगे। इस परिस्थिति के अधीन जहाँ जीवित रहने के लिए मनुष्यों के मूल वातावरण को नष्ट कर दिया गया है, तो मानवजाति की नियति और भविष्य की सम्भावनाएं क्या होंगी? यह एक बहुत गम्भीर समस्या है! क्योंकि परमेश्वर जानता है कि सभी चीज़ें मनुष्य के लिए क्या हैं, हर एक प्रकार की वस्तु की भूमिका जिसे उसने बनाया है, इसका लोगों पर कैसा प्रभाव है, और यह मानवजाति के लिए कितना बड़ा लाभ लेकर आता है-परमेश्वर के हृदय में इन सब के लिए एक योजना है और वह सभी चीज़ों के हर एक पहलु का प्रबन्ध करता है जिसे उसने सृजा है, अतः मनुष्यों के लिए, हर एक चीज़ जो वह करता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है-यह सब ज़रुरी है। अतः चाहे तुम सभी चीज़ों के मध्य किसी पारिस्थितिक घटना को देखते हो, या सभी चीज़ों के मध्य कुछ प्राकृतिक नियमों को, तो तुम हर एक चीज़ की आवश्यकता के विषय में आगे से शंकालु नहीं होगे जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। तुम सभी चीज़ों के विषय में परमेश्वर के इन्तज़ामों पर और मानवजाति के लिए आपूर्ति करने हेतु उसके विभिन्न तरीकों पर मनमाने ढंग से फैसले लेने के लिए आगे से अज्ञानता के शब्दों का उपयोग नहीं करोगे। साथ ही तुम सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के नियमों पर मनमाने ढंग से निष्कर्ष नहीं निकालोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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