परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 180

तो, पहले भाग से शुरु करते हैं। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन किया, तो उसने पहाड़ों, मैदानों, रेगिस्तानों, पहाड़ियों, नदियों और झीलों के लिए सीमाएँ खींचीं। पृथ्वी पर पर्वत, मैदान, मरूस्थल, और पहाड़ियों के साथ ही जल के विभिन्न स्रोत हैं। क्या ये विभिन्न प्रकार के भूभाग नहीं हैं? परमेश्वर ने विभिन्न प्रकार के इन भूभागों के बीच सीमाएँ खींची थी। जब हम सीमाओं के निर्माण की बात करते हैं, तो इसका अर्थ है कि पर्वतों की अपनी सीमा-रेखाएँ हैं, मैदानों की अपनी स्वयं की सीमा-रेखाएँ हैं, मरुस्थलों की कुछ सीमाएँ हैं, पहाड़ों का अपना एक निश्चित क्षेत्र है। साथ ही जल के स्रोतों, जैसे नदियों और झीलों की भी एक निश्चित संख्या है। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की तब उसने हर चीज़ को पूरी स्पष्टता से विभाजित किया। परमेश्वर ने पहले ही निर्धारित कर दिया है कि एक पहाड़ की त्रिज्या कितने किलोमीटर की होनी चाहिए, इसका दायरा क्या है। साथ ही उसने यह भी निर्धारित कर दिया कि एक मैदान की त्रिज्या कितने किलोमीटर की होनी चाहिए, और इसका दायरा क्या है। सभी चीज़ों की रचना करते समय उसने मरुस्थल के दायरे और साथ ही पहाड़ियों के विस्तार और उनके परिमाण और वे किनके द्वारा घिरे हुए हैं, उन सारी चीजों को निर्धारित कर दिया था। उसने नदियों और झीलों के दायरे को निर्धारित कर दिया था जब वह उनकी रचना कर रहा था—उन सभी की अपनी सीमाएँ हैं। जब हम "सीमाओं" की बात करते हैं तो इसका क्या अर्थ है? हमने अभी इस बारे में बात की थी कि कैसे सभी चीज़ों के लिए व्यवस्था स्थापित कर परमेश्वर उनपर शासन करता है। यानी, पहाड़ों के विस्तार और दायरे पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के कारण बढ़ेंगे या घटेंगे नहीं। वे स्थिर और अपरिवर्तनीय हैं और उनकी यह अपरिवर्तनीयता परमेश्वर द्वारा निर्धारित है। जहाँ तक मैदानी क्षेत्रों की बात है, उनका दायरा कितना है, वे किन चीजों से सीमाबद्ध हैं—इसे परमेश्वर द्वारा तय किया गया है। उनकी अपनी सीमाएँ हैं, और मैदान के बीचोंबीच अचानक किसी पहाड़ी का उभर आना संभव नहीं है। मैदान अचानक पर्वत में परिवर्तित नहीं होगा—ऐसा होना असंभव है। जिन नियमों और सीमाओं की अभी हम बात कर रहे थे, उनका अर्थ यही है। जहाँ तक मरुस्थल की बात है, हम यहाँ मरुस्थल या किसी अन्य भूभाग या भौगोलिक स्थिति की विशिष्ट भूमिकाओं का जिक्र नहीं करेंगे, केवल उनकी सीमाओं की चर्चा करेंगे। परमेश्वर के शासन के अधीन, मरुस्थल का भी दायरा नहीं बढ़ेगा। क्योंकि परमेश्वर ने इसे इसका नियम और दायरा दिया हुआ है। इसका क्षेत्रफल कितना बड़ा है और इसकी भूमिका क्या है, वह किन चीजों से घिरा हुआ है, और इसकी जगह—इसे पहले से ही परमेश्वर द्वारा तय कर दिया गया है। वह अपने दायरे से आगे नहीं बढ़ेगा, न अपनी जगह बदलेगा, और न ही मनमाने ढंग से अपना क्षेत्रफल बढ़ाएगा। हालांकि, सभी नदियों और झीलों के प्रवाह सुव्यवस्थित और निरन्तर बने हुए हैं, वे कभी अपने दायरे या अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करेंगे। वे सभी एक सुव्यवस्थित तरीके से अपनी एक स्वाभाविक निर्धारित दिशा में बहती हैं। अतः परमेश्वर के शासन के नियमों के अंतर्गत, कोई भी नदी या झील अपने से सूख नहीं जाएगी, या अपनी दिशा या अपने बहाव की मात्रा को पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के साथ बदल नहीं देगी। यह सब परमेश्वर के नियंत्रण में है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के मध्य सृजित सभी चीज़ों के अपने निर्धारित स्थान, क्षेत्र और दायरे हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की रचना की, तब उनकी सीमाओं को तय कर दिया गया था और उन्हें स्वेच्छा से पलटा, नवीनीकृत किया, या बदला नहीं जा सकता। "स्वेच्छा से" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि वे मौसम, तापमान, या पृथ्वी के घूमने के कारण बेतरतीब ढंग से अपना स्थान नहीं बदलेंगे, अपना विस्तार नहीं करेंगे, या अपने मूल स्वरूप में परिवर्तन नहीं लाएँगे। उदाहरण के लिए, किसी पर्वत की एक निश्चित ऊँचाई है, इसके आधार का एक निश्चित क्षेत्रफल है, समुद्रतल से इसकी ऊँचाई निश्चित है, और यहाँ निश्चित मात्रा में वनस्पतियाँ हैं। इस सब की योजना और गणना परमेश्वर द्वारा की गई है और इसे मनमाने ढंग से बदला नहीं जाएगा। जहाँ तक मैदानों की बात है, अधिकांश मनुष्य मैदानों में निवास करते हैं, और मौसम में हुआ कोई परिवर्तन उनके क्षेत्र या उनके अस्तित्व की मूल्यवत्ता को प्रभावित नहीं करेगा। यहाँ तक कि इन विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण में समाविष्ट हर चीज़ जिसे परमेश्वर द्वारा रचा गया था, उसे भी स्वेच्छा से बदला नहीं जाएगा। उदाहरण के लिए, मरुस्थल की संरचना, भूमिगत खनिज सम्पदाओं के प्रकार, मरुस्थल में पाई जाने वाली रेत की मात्रा, उसका रंग, उसकी मोटाई—ये स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे। ऐसा क्यों है कि वे स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे? यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन के कारण है। परमेश्वर अपने द्वारा सृजित इन सभी विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण के भीतर, सारी चीजों का प्रबंधन, एक योजनाबद्ध और सुव्यवस्थित तरीके से कर रहा है। अतः परमेश्वर द्वारा सृजे जाने के पश्चात कई हज़ार वर्षों से, दसियों हज़ार वर्षों से ये सभी भौगोलिक पर्यावरण अभी भी अस्तित्व में हैं और अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं। हालांकि ऐसे समय आते हैं जब ज्वालामुखी फटते हैं, भूकंप आते हैं, और बड़े पैमाने पर भूमि की जगह बदल जाती है, फिर भी परमेश्वर किसी भी प्रकार के भू-भाग को अपने मूल कार्य को छोड़ने की अनुमति बिलकुल नहीं देगा। केवल परमेश्वर के इस प्रबंधन, उसके शासन और इन नियमों पर उसके नियंत्रण के कारण ये सारी चीजें—जिन्हें मानवजाति देखती और जिनका आनन्द लेती है—सुव्यवस्थित तरीके से पृथ्वी पर बरकरार रहने में सक्षम हैं। अतः परमेश्वर पृथ्वी पर मौजूद इन सभी अलग-अलग भूभागों का प्रबंधन इस तरह क्यों करता है? उसका उद्देश्य है कि विभिन्न भौगोलिक वातावरणों में जो प्राणी रहते हैं उन सभी के पास एक स्थायी वातावरण हो, और वे उस स्थायी वातावरण में निरन्तर जीवित रहने और वंश की वृद्धि करने में सक्षम हों। ये सभी चीज़ें—चल या अचल, वे जो अपने नथुनों से सांस लेते हैं और वे जो सांस नहीं लेते—मानवजाति के जीवित रहने के लिए एक अद्वितीय वातावरण का निर्माण करती हैं। केवल इस प्रकार का वातावरण ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्यों का पालन-पोषण करने में सक्षम है, और केवल इस प्रकार का वातावरण ही मनुष्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी निरंतर शांतिपूर्वक जीवित रहने की अनुमति दे सकता है।

मैंने जिस विषय पर अभी-अभी बात की है वह काफी बड़ा है, तो यह शायद तुम्हारे जीवन से थोड़ा अलग-थलग लग सकता है, लेकिन मुझे विश्वास है कि तुम सब इसे समझ सकते हो, है न? कहने का तात्पर्य यह है कि सभी चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व के नियम बहुत महत्वपूर्ण हैं—सचमुच बहुत महत्वपूर्ण! इन नियमों के अंतर्गत सभी प्राणियों के विकास की पूर्वशर्त क्या है? यह परमेश्वर के नियम के कारण है। यह उसके नियम के कारण है कि सभी चीज़ें उसके नियम के अंतर्गत अपने कार्यों को अंजाम देती हैं। उदाहरण के लिए, पहाड़ जंगलों का पोषण करते हैं, फिर जंगल उसके बदले में अपने भीतर रहने वाले विभिन्न पक्षियों और पशुओं का पोषण और संरक्षण करते हैं। मैदान एक समतल भूमि है जिसे मनुष्यों के लिए फ़सल उगाने के लिए और साथ ही विभिन्न पशु-पक्षियों के लिए तैयार किया गया है। वे मानवजाति के अधिकांश लोगों को समतल भूमि पर रहने की अनुमति देते हैं और लोगों के जीवन को सहूलियत प्रदान करते हैं। और मैदानों में घास के मैदान भी शामिल हैं—घास के मैदान की विशाल पट्टियाँ। घास के मैदान पृथ्वी की सतह को ढकने वाली वनस्पतियाँ हैं। वे मिट्टी का संरक्षण करते हैं और मैदानों में रहने वाले मवेशी, भेड़ और घोड़ों का पालन-पोषण करते हैं। मरुस्थल भी अपना कार्य करता है। यह मनुष्यों के रहने की जगह नहीं है; इसकी भूमिका नम जलवायु को शुष्क बनाना है। नदियों और झीलों का बहाव लोगों को सरल ढंग से पेयजल उपलब्ध कराता है। जहाँ कहीं वे बहेंगी, वहाँ लोगों के पास पीने के लिए जल होगा, और सभी चीज़ों की पानी की आवश्यकताएँ सरलता से पूरी होंगी। ये वे सीमाएँ हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा विभिन्न भूभागों के लिए बनाया गया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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