परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII" | अंश 170

हमने इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के सम्बन्ध में बहुत सारे विषयों एवं सार पर बातचीत की है, परन्तु क्या तुम लोग अपने हृदय के भीतर जानते हो कि परमेश्वर तुम लोगों को अपने वचन की आपूर्ति करने और तुम लोगों पर अपनी ताड़ना एवं न्याय के कार्य को क्रियान्वित करने के अलावा मानवजाति को कौन कौन सी चीज़ें देता है? कुछ लोग कह सकते हैं, "परमेश्वर मुझे अनुग्रह एवं आशीष देता है, और मुझे हर संभावित तरीके से अनुशासन, राहत, और देखरेख और सुरक्षा देता है।" अन्य लोग कहेंगे, "परमेश्वर मुझे प्रतिदिन भोजन एवं जल देता है," जबकि कुछ अन्य लोग यहाँ तक कह सकते हैं, "परमेश्वर मुझे सब कुछ देता है।" इन चीज़ों के सम्बन्ध में लोग अपने दैनिक जीवन के दौरान इनके साथ सम्पर्क में आ सकते हैं, तुम सभी लोगों के पास कुछ उत्तर हो सकते हैं जो तुम लोगों के शारीरिक जीवन से सम्बन्धित हैं। परमेश्वर प्रत्येक और हर एक इंसान को बहुत सारी चीज़ें देता है, यद्यपि जिसकी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं वह सिर्फ लोगों की दैनिक आवश्यकताओं के दायरे तक सीमित नहीं है, किन्तु यह तुम लोगों में से हर एक को दूर तक देखने की अनुमति देता है। बृहद् दृष्टिकोण से, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है, तो वह सभी चीज़ों के जीवन को कायम कैसे रखता है? जिससे सभी चीज़ें लगातार अस्तित्व में बनी रहें, तो उनके अस्तित्व को कायम रखने और उनके अस्तित्व के नियमों को कायम रखने के लिए परमेश्वर सभी चीज़ों के साथ क्या करता है? यही वह मुख्य बिन्दु है जिसके विषय में हम आज चर्चा कर रहे हैं। ... मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग उस शीर्षक को और उन चीज़ों को जिसके विषय में मैं बात करने जा रहा हूँ परमेश्वर के कार्यों से जोड़ सकते हो, और उन्हें किसी ज्ञान या किसी मानवीय संस्कृति या अनुसन्धान से बाँध नहीं सकते हो। मैं सिर्फ परमेश्वर और स्वयं परमेश्वर के बारे में बात कर रहा हूँ। तुम लोगों के लिए मेरी यही सलाह है। क्या तुम लोग समझ गए? (हाँ।)

परमेश्वर ने मानवजाति को बहुत सारी चीज़ें दी हैं। लोग जो कुछ देख सकते हैं उसके विषय में बात करके मैं शुरूआत करने जा रहा हूँ, अर्थात्, जो वे महसूस कर सकते हैं। ये वो चीज़ें हैं जिन्हें लोग अपने भीतर समझ सकते हैं और स्वीकार कर सकते हैं। अतः परमेश्वर ने मानवजाति को क्या प्रदान किया है इस पर चर्चा करने के लिए आइए पहले भौतिक संसार के साथ शुरूआत करें।

(1) वायु

पहले, परमेश्वर ने वायु को बनाया ताकि मनुष्य साँस ले सके। क्या यह "वायु" प्रतिदिन के जीवन की वायु नहीं है जिसके साथ मनुष्य लगातार सम्पर्क में रहते हैं? क्या यह वायु ऐसी चीज़ नहीं है जिसके ऊपर मानवजाति हर पल निर्भर रहती है, यहाँ तक कि उस समय भी जब वे सोते हैं? वह वायु जिसे परमेश्वर ने सृजा है वह मानवजाति के स्मरणार्थ बहुत ही महत्वपूर्ण हैः यह उनकी प्रत्येक श्वास एवं स्वयं उनके जीवन के लिए अति आवश्यक तत्व है। यह तत्व, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है किन्तु देखा नहीं जा सकता है, सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर की प्रथम भेंट थी। वायु को बनाने के बाद, क्या परमेश्वर ने बस दुकान बन्द कर दी थी? ये इसके पहलू हैं जो लोगों के लिए अकल्पनीय हैं। वायु को बनाने के बाद, वायु की मात्रा एवं उसे वास्तविक घनत्व को मानवजाति के लिए उनके जीवित रहने हेतु विशेष रूप से प्रदान किया जाना था। घनत्व के सम्बन्ध में, उसमें पहले आक्सीजन का तत्व होता है। यह भौतिकी का एक प्रश्न है। जब परमेश्वर ने वायु को बनाया तो वह क्या सोच रहा था? परमेश्वर ने वायु को क्यों बनाया था, और उसका तर्क क्या था? मनुष्यों को वायु की आवश्यकता होती है, और उन्हें श्वास लेने की आवश्यकता होती है। किसी भी चीज़ से पहले, वायु के घनत्व को मनुष्य के फेफड़ों के अनुकूल होना चाहिए। क्या कोई वायु के घनत्व को जानता है? यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे लोगों को जानने की आवश्यकता है; इसे जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। बस एक सामान्य विचार होना की अच्छा है—हमें वायु के घनत्व के सम्बन्ध में एक सटीक संख्या की आवश्यकता नहीं है। पहले, परमेश्वर ने एक घनत्व के साथ वायु को बनाया जो साँस लेने हेतु मानवीय फेफड़ों के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो जाए—वह मानवीय श्वसन के अनुकूल हो गया। अर्थात्, जब साँस अन्दर लेते हैं, तो वायु उस घनत्व की होती है जो शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाती है। वायु के घनत्व के पीछे यह युक्ति थी। प्राथमिक रूप से, वायु के तत्व मनुष्यों को नुकसान पहुँचाने के लिए विषैले नहीं हैं और उससे फेफड़ों एवं शरीर को नुकसान नहीं पहुँचेगा। परमेश्वर को इस सब के बारे में विचार करना था। परमेश्वर को विचार करना था कि वह वायु जो मनुष्य साँस ले रहा है उसे आसानी से भीतर एवं बाहर जाना चाहिए, और यह कि, भीतर श्वास लेने के बाद, वायु का अंतर्वस्तु एवं मात्रा ऐसा होना चाहिए कि जिससे लहू और साथ ही साथ फेफड़ों एवं शरीर की बेकार हवा सही रीति से चयापचय हो जाए, और साथ ही उस हवा में कोई ज़हरीले अंग नहीं होने चाहिए। इन दो मानकों के सम्बन्ध में, मैं तुम लोगों को ज्ञान के कुछ गुच्छों को नहीं खिलाना चाहता हूँ, किन्तु इसके बजाए तुम लोगों को जानकारी देना चाहता हूँ कि परमेश्वर के मस्तिष्क में एक विशेष वैचारिक प्रक्रिया थी जब उसने हर एक चीज़को बनाया था—सबसे बेहतरीन। जहाँ तक वायु में धूल की मात्रा की बात थी, धूल की मात्रा, पृथ्वी की रेत एवं मिट्टी, साथ ही साथ वह धूल है जो आकाश से नीचे आता है, परमेश्वर के पास इन चीज़ों के लिए भी योजना थी—इन चीज़ों को स्पष्ट करने या इनका समाधान करने का एक तरीका था। हालांकि, वातावरण में कुछ धूल मौजूद है, लेकिन परमेश्वर ने इसे बनाया ताकि वह मनुष्य के शरीर एवं श्वसन को नुकसान नहीं पहुँचाए, और इस तरह कि धूल के कण ऐसे आकार के हों जो शरीर के लिए नुकसानदेह न हों। क्या परमेश्वर के द्वारा वायु की सृष्टि रहस्यमयी नहीं है? (हाँ।) क्या यह मुँह से हवा फूँकने के समान ही सरल था? (नहीं।) यहाँ तक कि उसके द्वारा सरल चीज़ों की सृष्टि में भी, परमेश्वर का रहस्य, उसका मस्तिष्क, उसके विचार और उसकी बुद्धिमत्ता सब कुछ दृष्टिगोचर होते हैं। क्या परमेश्वर वास्तविक है? (हाँ।) दूसरे शब्दों में, यहाँ तक कि कुछ सरल चीज़ों की सृष्टि में भी, परमेश्वर मनुष्य जाति के बारे में सोच रहा था। पहली बात, वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेते हैं वह साफ है, तत्व विषैले नहीं हैं और मनुष्य के श्वास लेने के लिए उपयुक्त हैं और मनुष्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, और उसके घनत्व को मनुष्यों के श्वास लेने के लिए मापकर समायोजित किया गया है। यह वायु, जिससे मनुष्य अन्दर एवं बाहर श्वास लेते हैं, उनके शरीर और उनकी देह के लिए जरूरी है। अतः मनुष्य आसानी से बिना किसी रूकावट या चिंता के साँस ले सकते हैं। वे सामान्य रूप से साँस ले सकते हैं। वायु वह है जिसे परमेश्वर ने आदि में सृजा था और जो मनुष्य के श्वास लेने के लिए अति महत्वपूर्ण है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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