परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII" | अंश 169

परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और वह इसका प्रभु है; वह इसके प्रति उत्तरदायी है और हर एक वचन एवं कार्य की निगरानी करते हुए वह इसके लिए आपूर्ति करता है। साथ ही वह मानवीय जीवन के हर एक क्षेत्र का निरिक्षण भी करता है। अतः परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की और हर एक चीज़ के महत्व एवं मूल्य को और साथ ही साथ उसकी कार्य प्रणाली, उसके स्वभाव, और जीवित बचे रहने के लिए उसके नियमों को वह अपने हाथ की हथेली के समान स्पष्ट रूप से जानता है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की; क्या तुम लोग सोचते हो कि उसे इन नियमों पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है जो संसार को संचालित करते है? (नहीं।) क्या परमेश्वर को अनुसंधान करने एवं इसे समझने के लिए मानवीय ज्ञान या विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत है? क्या मानवजाति के मध्य कोई ऐसा है जिसके पास वृहद् विद्वता और प्रचुर ज्ञान है कि सभी चीज़ों को समझे जैसे परमेश्वर समझता है? कोई नहीं है। सही है? क्या कोई खगोलशास्त्री या जीव विज्ञानी हैं जो सचमुच में समझते हैं कि किस प्रकार सभी चीज़ें जीवित रहती और बढ़ती हैं? (नहीं।) क्या वे वाकई में हर चीज़ के अस्तित्व के मूल्य को समझ सकते हैं? (वे नहीं समझ सकते हैं।) ऐसा क्यों है? सभी चीज़ों को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति कितना अधिक एवं कितनी गहराई से इस ज्ञान का अध्ययन करती है, या वे कितने लम्बे समय तक इसे सीखने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के रहस्य एवं उद्देश्य की थाह लेने में कभी भी सक्षम नहीं होंगे, क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) यहाँ तक चर्चा करने के बाद, क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम सब के पास इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के निहित अर्थ की एक आंशिक समझ है? (हाँ।) मैं जानता था कि जब मैंने इस विषय पर चर्चा की थी तब बहुत से लोग तुरन्त ही इसके विषय में सोचते कि परमेश्वर किस प्रकार सच्चाई है और किस प्रकार उसका वचन हमारे लिए आपूर्ति करता है, लेकिन वे सिर्फ इस स्तर पर ही इसके विषय में सोचते। कुछ लोग यहाँ तक महसूस करते कि परमेश्वर के द्वारा मानवीय जीवन की आपूर्ति को, और प्रतिदिन के भोजन एवं पेय पदार्थ एवं तमाम दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति को मनुष्य की आपूर्ति के रूप नहीं गिना जाता है। क्या कुछ लोग इस तरह से महसूस करते हैं? (हाँ।) क्या इस बात में परमेश्वर का अभिप्राय बिलकुल स्पष्ट नहीं है कि किस प्रकार उसने हर एक चीज़ की सृष्टि की है ताकि मनुष्य सामान्य रूप से अस्तित्व में रह सके और जीवन बिता सके? परमेश्वर उस वातावरण को कायम रखता है जिस में लोग रहते हैं और वह उन सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है जिनकी इस मानवजाति को आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, वह सभी चीज़ों का प्रबंध करता है और उनके ऊपर प्रभुत्व रखता है। यह सब कुछ मानवजाति को सामान्य रूप से जीने और सामान्य रूप से फलने फूलने की अनुमति देता है; यह इसी तरह से है कि परमेश्वर सभी चीज़ों और मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है। क्या लोगों को इन चीज़ों को पहचानने एवं समझने की आवश्यकता है? (हाँ।) शायद कुछ लोग कह सकते हैं, "यह विषय स्वयं सच्चे परमेश्वर के विषय में हमारे ज्ञान से बहुत दूर है, और हम इसे नहीं जानना चाहते हैं क्योंकि मनुष्य केवल रोटी से ही जीवित नहीं रह सकता है, किन्तु इसके बजाए परमेश्वर के वचन के द्वारा जीवित रहता है।" क्या यह सही है? (नहीं।) यहाँ क्या गलत है? क्या तुम लोगों के पास परमेश्वर के वचन की पूर्ण समझ हो सकती है यदि तुम सब केवल उन्हीं चीज़ों को जानते हो जिन्हें परमेश्वर ने कहा है? यदि तुम लोग केवल उसके कार्य एवं उसके न्याय और ताड़ना को ही स्वीकार करते हो, तो क्या तुम सब के पास परमेश्वर की पूर्ण समझ होगी? यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के अधिकार के एक छोटे से भाग को ही जानते हो; तो यह परमेश्वर की समझ को हासिल करने के लिए काफी है, सही है? (नहीं।) परमेश्वर के कार्य संसार की उसकी सृष्टि के साथ प्रारम्भ होते हैं और वे आज तक जारी हैं जहाँ उसके कार्य सभी समयों पर और हर क्षण प्रकट होते हैं। यदि लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मौजूद है सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने कुछ लोगों को चुना है जिनके ऊपर वह अपने कार्य को अंजाम देता है ताकि उन लोगों को बचाए, और यदि वे विश्वास करते हैं कि अन्य चीज़ें परमेश्वर, उसके अधिकार, उसके रुतबे, एवं उसके कार्य को शामिल नहीं करती हैं, तो क्या माना जा सकता है कि यह वाकई में परमेश्वर को जानना है? ऐसे लोग जिनके पास परमेश्वर का ऐसा तथाकथित ज्ञान है—जो एक पक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित है कि परमेश्वर बस लोगों के एक समूह तक ही सीमित है—वे अदूरदर्शी हैं। क्या यह परमेश्वर का असली ज्ञान है? ऐसे लोग जिनके पास परमेश्वर का इस प्रकार का ज्ञान है क्या वे उसके द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि का और उनके ऊपर उसके प्रभुत्व का इन्कार नहीं करते हैं? कुछ लोग इसे स्वीकार करने की इच्छा नहीं करते हैं, और शायद वे अपने आप में सोचते हैं: "मैं सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व को नहीं देखता हूँ, यह कुछ ऐसा है जो मुझ से बहुत दूर है और मैं इसे समझना नहीं चाहता हूँ। परमेश्वर जो कुछ चाहता है वह उसे करता है और इसका मुझ से कोई लेना देना नहीं है। मैं अपने आपको बस परमेश्वर की अगुवाई को स्वीकार करने से और उसके वचन से और परमेश्वर के द्वारा मुझे सार बनाया जाएगा और मुझे बचाया जाएगा इन बातों से ही जोड़ता हूँ। मैं केवल इन्हीं चीज़ों पर ध्यान दूंगा, लेकिन मैं किसी अन्य बात को समझने की कोशिश नहीं करूंगा या इसके बारे में बिल्कुल नहीं सोचूंगा। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी तब जो भी नियम उसने बनाए थे या उनकी एवं मानवजाति की आपूर्ति करने के लिए जो कुछ परमेश्वर करता है उसका मेरे साथ कोई लेना देना नहीं है।" यह किस प्रकार की बात है? क्या यह बिल्कुल शर्मनाक नहीं है? क्या तुम लोगों में से कोई है जो ऐसा सोचता है? मैं जानता हूँ कि अत्यधिक मात्रा में ऐसे लोग हैं जो इस रीति से सोचते हैं भले ही तुम लोग ऐसा नहीं कहोगे। इस प्रकार के नियमानुसार चलने वाले लोग शायद इस बात में अपने स्वयं के तथाकथित आत्मिक दृष्टिकोण का उपयोग कर सकते हैं कि वे किस प्रकार प्रत्येक चीज़ को देखते हैं। वे परमेश्वर को बाइबल तक सीमित करना चाहते हैं, उन वचनों तक सीमित करना चाहते हैं जिन्हें उसने कहा है, और परमेश्वर को बस लिखित वचनों तक ही सीमित करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के विषय में और अधिक जानने की इच्छा नहीं करते हैं और वे नहीं चाहते हैं कि परमेश्वर अन्य कार्यों को अंजाम देने में अधिक ध्यान दे। इस प्रकार की सोच बचकानी है और बहुत धार्मिक है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर को जान सकते हैं जो ऐसे दृष्टिकोणों को थामे हुए हैं? उन्हें परमेश्वर को जानने में कठिनाई होगी। आज मैंने इन दो कहानियों को बताया है और इन दो पहलुओं के विषय में बात की है। उनको अभी अभी सुनने के बाद और बस अभी अभी उनके सम्पर्क में आने के बाद, हो सकता है कि तुम लोग महसूस करो कि वे गंभीर हैं या थोड़े संक्षिप्त हैं और बूझने एवं समझने के लिए कठिन हैं। हो सकता है कि उन्हें परमेश्वर के कार्यों से और स्वयं परमेश्वर से जोड़ना और भी अधिक कठिन हो। फिर भी, परमेश्वर के सभी कार्य और वह सब जिसे उसने सभी चीज़ों के मध्य एवं सम्पूर्ण मानवजाति के मध्य किया है उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा तथा हर किसी के द्वारा स्पष्ट रूप से एवं सटीक रूप से पहचाना जाना चाहिए जो परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है। यह ज्ञान तुम्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व के विषय में पुष्टिकरण एवं उसमें विश्वास देगा। साथ ही यह तुम्हें परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सामर्थ्य, और किस प्रकार वह सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है इसके विषय में सटीक ज्ञान भी देगा। यह तुम्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को साफ साफ मन में ग्रहण करने और यह देखने की अनुमति देगा कि यह कपोल कल्पना नहीं है, और एक पौराणिक कथा नहीं है। यह तुम लोगों को यह देखने की अनुमति देता है कि यह अस्पष्ट नहीं है, और बस एक सिद्धान्त नहीं है, और यह कि परमेश्वर निश्चित तौर पर सिर्फ एक आत्मिक सहारा ही नहीं है, लेकिन वह सचमुच में मौजूद है। इसके अतिरिक्त यह तुम्हें अनुमति देता है कि उसे परमेश्वर के रूप में इस रीति से जानो कि उसने हमेशा से ही सभी चीज़ों के लिए और मानवजाति के लिए आपूर्ति की है; वह इसे अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सुर ताल के अनुसार करता है। अतः कहा जा सकता है कि यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीज़ों को सृजा है और उसने उन्हें नियम दिए हैं कि उसकी आज्ञा के द्वारा उनमें से हर एक अपने आवंटित कार्य को क्रियान्वित करता है, अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करता है, और उस भूमिका को निभाता है जिसे उनमें से हर एक को दिया गया था। सभी चीज़ें मानवजाति के लिए अपनी स्वयं की भूमिका को निभाते हैं, और इसे ऐसे स्थान में एवं ऐसे वातावरण में अंजाम देते हैं जहाँ लोग रहते हैं। यदि परमेश्वर इस प्रकार से चीज़ों को अंजाम नहीं देता और मानवजाति का वातावरण ऐसा न होता जैसा है, तो परमेश्वर में लोगों का विश्वास या उनके द्वारा उसका अनुसरण करना—इसमें से कुछ भी सम्भव नहीं होता; यह महज खोखली बात होती, क्या यह सही नहीं है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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