परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII" | अंश 166

क्या तुम लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के विषय में मुख्य बिन्दु को समझते हो? इस सम्बन्ध में, किसी व्यक्ति के पास अनुभव से बहुत सारे वचन हो सकते हैं, लेकिन कुछ मुख्य बिन्दु हैं जिनके विषय में मुझे तुम लोगों को बताना चाहिए। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समझने के लिए, किसी व्यक्ति को पहले परमेश्वर की भावनाओं को समझना होगा: वह किस से नफरत करता है, वह किससे घृणा करता है, और वह किससे प्यार करता है, वह किसको बर्दाश्त करता है, वह किसके प्रति दयालु है, और किस प्रकार का व्यक्ति उस दया को प्राप्त करता है। यह जानने हेतु एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को यह समझना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर कितना प्रेमी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसके पास लोगों के लिए कितनी दया एवं प्रेम है, परमेश्वर बर्दाश्त नहीं करता है कि कोई उसके रुतबे एवं पद स्थिति को ठेस पहुँचाए, न ही वह यह बर्दाश्त करता है कि कोई उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाए। यद्यपि परमेश्वर लोगों से प्यार करता है, वह उन्हें बर्बाद नहीं करता है। वह लोगों को अपना प्यार, अपनी दया एवं अपनी सहनशीलता देता है, लेकिन उसने नीच कार्य में कभी उनकी सहायता नहीं की है; उसके पास अपने सिद्धान्त एवं अपनी सीमाएँ हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने स्वयं में किस हद तक परमेश्वर के प्रेम का एहसास किया है, इसकी परवाह किए बगैर कि वह प्रेम कितना गहरा है, तुम्हें परमेश्वर से कभी ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए जैसा तुम किसी अन्य व्यक्ति से करोगे। जबकि यह सच है कि परमेश्वर लोगों से ऐसा बर्ताव करता है जैसे वे उसके करीब हों, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को किसी अन्य व्यक्ति के रुप में देखता है, मानो वह सृष्टि का मात्र कोई अन्य प्राणी हो, जैसे कोई मित्र या आराधना की कोई वस्तु, तो परमेश्वर उनसे अपने मुख को छिपा लेगा और उन्हें त्याग देगा। यह उसका स्वभाव है, और वह बर्दाश्त नहीं करता है कि इस मुद्दे पर कोई उससे लापरवाही के साथ बर्ताव करे। अतः परमेश्वर के वचन में उसके धर्मी स्वभाव के विषय में अकसर कहा गया हैः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने कितनी सड़कों पर यात्रा की है, तुमने कितना अधिक काम किया है या तुमने परमेश्वर के लिए कितना कुछ सहन किया है, क्योंकि जैसे ही तुम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को ठेस पहुँचाते हो, तो जो कुछ तुमने किया है उसके आधार पर वह तुममें से प्रत्येक को बदला देगा। क्या तुमने इसे देखा है? (हाँ, हमने देखा है।) तुमने इसे देखा है, सही है? इसका अर्थ यह है कि हो सकता है कि परमेश्वर लोगों को ऐसा देखे जैसे वे उसके करीब हैं, लेकिन लोगों को परमेश्वर से एक मित्र या एक रिश्तेदार के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए। परमेश्वर को अपने हमउम्र दोस्त के रूप में मत समझिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने उससे कितना अधिक प्रेम प्राप्त किया है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने तुम्हें कितनी अधिक सहनशीलता दी है, तुम्हें कभी भी परमेश्वर से मात्र एक मित्र के रूप में बर्ताव नहीं करना चाहिए। यह परमेश्वर का धर्मी स्वभाव है। तुम समझ गए, ठीक है? (हाँ।) क्या मुझे इसके विषय में और अधिक कहने की ज़रूरत है? क्या इस मुद्दे पर तुम लोगों के पास पहले से ही कोई समझ है? सामान्य रूप से कहें, तो यह वह अत्यंत आसान गलती है जिसे लोग इस बात की परवाह किए बगैर करते हैं कि वे सिद्धान्तों को समझते हैं या नहीं, या मानो उन्होंने इसके विषय में पहले कुछ नहीं सोचा है। जब लोग परमेश्वर को ठेस पहुँचाते हैं, तो ऐसा शायद किसी घटना, या किसी बात की वजह से नहीं होता है जिसे वे बोलते हैं, लेकिन इसके बजाए यह ऐसी मनोवृत्ति के कारण होता है जिसे वे थामे हुए हैं और ऐसी दशा के कारण होता है जिसमें वे हैं। यह एक बहुत ही भयावह बात है। कुछ लोगों का मानना है कि उनके पास परमेश्वर की समझ है, यह कि वे उसे जानते हैं, वे शायद ऐसी चीज़ों को भी कर सकते हैं जो परमेश्वर को प्रसन्न करेंगी। वे महसूस करना शुरू कर देते हैं कि वे परमेश्वर के तुल्य हैं और यह कि वे चतुराई से परमेश्वर के मित्र हो गए हैं। इस प्रकार की भावनाएँ खतरनाक रूप से गलत हैं। यदि तुम्हारे पास इसकी गहरी समझ नहीं है, यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझते हो, तब परमेश्वर को ठेस पहुँचाना और उसके धर्मी स्वभाव को ठेस पहुँचाना बहुत आसान होता है। अब तुम इसे समझ गए हो, सही है? (हाँ।) क्या परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अद्वितीय नहीं है? क्या यह मानवजाति के व्यक्तित्व के बराबर है? क्या यह मनुष्य के व्यक्तिगत गुणों के बराबर है? कभी नहीं, ठीक है? (हाँ।) अतः, तुम्हें नहीं भूलना चाहिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर लोगों से कैसा बर्ताव करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह लोगों के बारे में किस प्रकार सोचता है, परमेश्वर की पद स्थिति, अधिकार, और हैसियत कभी नहीं बदलती है। मानवजाति के लिए, परमेश्वर हमेशा से सब का परमेश्वर और सृष्टिकर्ता है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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