परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 165

मैं तुम लोगों से किसी चीज़ के विषय में बात करना चाहता हूँ जिसे तुम लोगों ने किया था जिसने आज हमारी सभा के आरम्भ में मुझे आश्चर्य में डाल दिया था। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ उस वक्त कृतज्ञता के एहसास को आश्रय दे रहे थे, या धन्यवादी महसूस कर रहे थे, और इस प्रकार जो कुछ तुम लोगों के मन में था तुम सब उसे शारीरिक रूप से व्यक्त करना चाहते थे। यह निन्दा से परे है, और न तो सही और न ही गलत है। परन्तु वह क्या है जो मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ? जो कुछ तुम लोगों ने किया था वह गलत नहीं है और मैं किसी भी प्रकार से तुम लोगों की निन्दा नहीं करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग कुछ समझो। यह क्या है? पहले मैं तुम लोगों से उसके विषय में पूछना चाहूँगा जिसे तुम लोगों ने अभी अभी किया था। क्या यह आराधना करने के लिए दण्डवत् (साष्टांग प्रणाम) करना था या घुटने टेकना था? क्या कोई मुझे बता सकता है? (हम विश्वास करते हैं कि यह दण्डवत् करना था। हम इस प्रकार से दण्डवत् करते हैं।) तुम लोग विश्वास करते हो कि यह दण्डवत् करना था, अतः फिर दण्डवत् का क्या अर्थ है? (आराधना।) अतः फिर आराधना करने के लिए घुटने टेकना क्या है? मैंने तुरन्त ही तुम लोगों से इसका जिक्र नहीं किया उसका कारण यह था क्योंकि संगति के लिए आज हमारा विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है और मैं तुम लोगों के मिजाज़ को प्रभावित नहीं करना चाहता था। क्या तुम लोग अपनी सामान्य सभाओं में दण्डवत् करते हो? (नहीं।) जब तुम लोग अपनी प्रार्थनाएँ करते हो तब क्या तुम लोग दण्डवत् करते हो? (हाँ।) हर बार जब तुम लोग प्रार्थना करते हो तब क्या तुम लोग दण्डवत् करते हो, जब परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं? (हाँ।) यह बहुत ही अद्भुत है। परन्तु वह क्या है जो मैं चाहता हूँ कि आज तुम लोग समझो? ऐसे दो प्रकार के लोग हैं जिनके घुटने टेकने के व्यवहार को परमेश्वर स्वीकार करता है। हमें बाइबल से या आध्यात्मिक चरित्रों के व्यवहार से परामर्श लेने की आवश्यकता नहीं है, और मैं अभी और यहीं पर तुम लोगों को कुछ सच्चाई बताना चाहता हूँ। पहला, दण्डवत् और आराधना करने के लिए घुटने टेकना एक ही चीज़ नहीं है। परमेश्वर उन लोगों के घुटने टेकने के व्यवहार को क्यों स्वीकार करता है जो स्वयं दण्डवत् करते हैं? यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने पास बुलाता है और ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर के महान आदेश को स्वीकार करने के लिए कहता है, अतः वह परमेश्वर के लिए स्वयं दण्डवत् करता है। यह पहले प्रकार का व्यक्ति है। दूसरे प्रकार का व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जो आराधना करने के लिए घुटने टेकता है जो परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता है। सिर्फ दो ही प्रकार के ऐसे लोग हैं। अतः तुम लोग किस प्रकार के लोगों से सम्बन्धित हो? क्या तुम लोग कह सकते हो? यह एक तथ्यात्मक सच्चाई है, हालाँकि यह तुम लोगों की भावनाओं को थोड़ी चोट पहुँचा सकती है। प्रार्थना के दौरान लोगों के घुटने टेकने के व्यवहार के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है—यह उचित है और यह ऐसा है जैसा इसे होना चाहिए, क्योंकि जब लोग प्रार्थना करते हैं तो अधिकांशतः किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर के लिए अपने हृदय को खोलते हैं और उसके आमने सामने आते हैं। यह परमेश्वर के साथ दिल से दिल तक पहुँचने वाला वार्तालाप एवं संवाद है। परन्तु जब मैं संगति में तुम लोगों के साथ मिलता हूँ, तो मैंने तुम लोगों से नहीं कहा कि तुम लोग स्वयं दण्डवत् करो। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया है उसके लिए तुम लोगों की निन्दा करना मेरा अभिप्राय यह नहीं था। तुम लोग जानते हो कि मैं बस इसे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना चाहता हूँ ताकि तुम लोग इस सिद्धान्त को समझो, क्या तुम लोग नहीं समझते हो? (हम जानते हैं।) ताकि तुम लोग इसे लगातार न करते रहो। क्या तब लोगों के पास परमेश्वर के मुख के सामने दण्डवत् करने एवं घुटने टेकने का कोई अवसर होता है? हमेशा एक अवसर होगा। जल्दी या देर से ही सही ऐसा दिन आएगा, परन्तु वह समय अभी नहीं है। क्या तुम लोगों ने देखा? (हाँ।) क्या इसने तुम लोगों को उदास कर दिया है? (नहीं।) यह अच्छा है। हो सकता है कि ये वचन तुम लोगों को प्रेरित करेंगे या प्रेरणा देंगे जिससे तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच की वर्तमान दुर्दशा को और अब उनके बीच में किस प्रकार का सम्बन्ध अस्तित्व में है उसको जान सकते हो। हालाँकि हमने हाल ही में काफी बातचीत एवं संवाद किया है, फिर भी परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ अभी बिलकुल पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर को समझने का प्रयास करने के लिए मनुष्य को अभी भी इस मार्ग पर बहुत दूर तक जाना है। मेरा इरादा यह नहीं है कि तुम लोगों से इस कार्य को शीघ्रता से करवाऊँ, या इस प्रकार की आकांक्षाओं या भावनाओं को व्यक्त करने के लिए तुम लोगों से जल्दबाज़ी करवाऊँ। आज जो कुछ तुम लोगों ने किया था वह शायद तुम लोगों की सच्ची भावनाओं को प्रकट एवं व्यक्त करता है, और मैंने इसका एहसास किया है। अतः जब तुम लोग इसे कर रहे थे, तब मैं बस खड़ा होना और तुम लोगों को अपनी शुभ कामनाएँ देना चाहता था, क्योंकि मैं तुम लोगों के भले की कामना करता हूँ। अतः मेरे हर वचन और हर कार्य में मैं तुम लोगों की सहायता करने के लिए, एवं तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए अपना भरसक प्रयास करता हूँ, ताकि तुम लोगों के पास सभी चीज़ों की सही समझ एवं सही दृष्टिकोण हो सके। तुम इसे समझ सकते हो? सही है? (हाँ।) यह बहुत अच्छा है। हालाँकि मनुष्य के पास परमेश्वर के विभिन्न स्वभाव, अर्थात् जो उसके पास है एवं जो वह है और वह कार्य जो परमेश्वर करता है उनके पहलुओं की कुछ समझ है, फिर भी इस समझ का अधिकांश भाग किसी पृष्ठ के शब्दों को पढ़ने, या सिद्धान्त में उन्हें समझने, या सिर्फ उनके बारे में सोचने की अपेक्षा ज़्यादा दूर नहीं जाता है। जिस बात की लोगों में अत्यंत घटी है वह सच्ची समझ एवं सच्चा दृष्टिकोण है जो वास्तविक अनुभव से आते हैं। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करता है, फिर भी एक लम्बा मार्ग है जिस पर चलना है इससे पहले कि मनुष्य के दिलों को अन्ततः जागृत किया जाए। मैं किसी को ऐसा महसूस करते हुए नहीं देखना चाहता हूँ मानो परमेश्वर ने उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया हो, यह कि परमेश्वर उन्हें त्याग दिया हो या उनसे मुँह फेर लिया हो। मैं सिर्फ हर एक व्यक्ति को बिना किसी सन्देह के, एवं बिना किसी बोझ को उठाए हुए, सत्य की खोज करने के लिए और परमेश्वर की समझ की खोज करने के लिए अटल इच्छा के साथ दृढ़ता से आगे बढ़ते रहने के मार्ग पर देखना चाहूँगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुमने क्या गलतियाँ की हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम कितनी दूर तक भटक गए हो या तुमने कितने अधिक अपराध किए हैं, परमेश्वर को समझने हेतु अपने अनुसरण में इन चीज़ों को अपने साथ ढोने के लिए बोझ या अतिरिक्त सामान बनने मत दो: निरन्तर आगे की ओर बढ़ते जाओ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कब घटित होता है, परमेश्वर का हृदय जो मनुष्य का उद्धार है वह कभी नहीं बदलता है: यह परमेश्वर के सार का सबसे अधिक मूल्यवान हिस्सा है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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