परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 164

अब परमेश्वर के सार के विषय में तुम लोगों की बोधात्मक समझ को अब भी इसे सीखने के लिए, इसकी पुष्टि करने के लिए, इसका एहसास करने के लिए एवं इसका अनुभव करने के लिए एक लम्बी समय अवधि की आवश्यकता है, उस दिन तक जब तुम लोग अपने हृदय के केन्द्रीय भाग से परमेश्वर की पवित्रता को जान लोगे कि वह परमेश्वर का दोषरहित सार है, एवं परमेश्वर का निःस्वार्थ प्रेम है, जो सभी चीज़ों के विषय में वह निःस्वार्थ प्रेम है जिसे परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है, और तुम लोग यह जान पाओगे कि परमेश्वर की पवित्रता बेदाग एवं निष्कलंक है। परमेश्वर के ये सार मात्र ऐसे वचन नहीं हैं जिसे वह अपनी पहचान का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, परन्तु इसके बजाए परमेश्वर हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के साथ खामोशी से एवं ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या नियम सम्बन्धित है और यह निश्चित रूप से एक किस्म का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है, परन्तु इसके बजाए परमेश्वर के स्वयं के कार्यों का सच्चा प्रकाशन है और यह जो कुछ परमेश्वर के पास है एवं जो वह है उसका प्रकाशित सार है। मनुष्य को इस सार को जानना एवं इसे समझना चाहिए, चूँकि हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है और हर वचन जिसे वह कहता है उसका हर एक व्यक्ति के लिए बड़ा मूल्य एवं बड़ा महत्व होता है। जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में इन शब्दों "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के असली अर्थ का एहसास कर सकते हो। तुम आगे से कल्पना नहीं करोगे कि तुम अन्य मार्गों पर चलने का चुनाव कर सकते हो, और तुम आगे से हर एक चीज़ के प्रति विश्वासघात करने की इच्छा नहीं करोगे जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका मतलब है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के आर पार उज्जवल, एवं सही मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो, केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक जीवन को जी सकते हो, सच्चाई को धारण कर सकते हो, सच्चाई को जान सकते हो, और केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सच्चाई से जीवन प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और शैतान की हानि एवं नियन्त्रण से छुटकारा दे सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति एवं कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम आगे से कष्ट न सहो: इसे परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है, केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वह तुम्हारे लिए सभी हालातों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजा गया या न सृजा गया प्राणी हासिल नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई सृजा गया या न सृजा गया प्राणी परमेश्वर के इस प्रकार के सार को धारण नहीं कर सकता है, किसी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की योग्यता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है। कदाचित् तुम लोगों को लगे कि ये वचन जो मैंने कहे हैं वे सिद्धान्त में वास्तव में थोड़ी सहायता कर सकते हैं। परन्तु यदि तुम सत्य को खोज करते हो, यदि तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो इसके बाद तुम्हारे अनुभव में ये वचन न केवल तुम्हारी नियति को बदल देंगे, बल्कि इससे अधिक जीवन के आर पार तुम्हें सही मार्ग पर ले आएँगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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