परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 163

यहाँ पर छः प्राथमिक माध्यम हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

पहला नियन्त्रण एवं जोर जबरदस्ती है। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियन्त्रित करने के लिए शैतान हर सभंव कार्य करेगा। "जोर जबरदस्ती" का अर्थ क्या है? (इसका अर्थ है विवशता।) वह तुम्हें धमकाता है और तुम्हें बाध्य करता है कि उस पर ध्यान दो, यदि तुम बात नहीं मानते हो तो तुम्हें उन परिणामों के विषय में सोचने के लिए मजबूर करता है। तुम भयभीत होते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते हो, अतः तब तुम्हारे पास उसके प्रभाव के अधीन आने के सिवाए कोई विकल्प नहीं होता है।

दूसरा है धोखा देना और छल कपट करना। "धोखा देने और छल कपट करने" के साथ क्या जुड़ा होता है? शैतान कुछ कहानियों एवं झूठी बातों को बनाता है, तुम्हें छल कपट में फँसाता है कि उन पर विश्वास करें। वह तुम्हें कभी नहीं बताता है कि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, किन्तु न ही वह सीधे तौर पर यह कहता है कि तुम्हें परमेश्वर के द्वारा सृजा नहीं गया था। यह "परमेश्वर" शब्द का उपयोग बिलकुल भी नहीं करता है, परन्तु इसके बजाए एक विकल्प के रूप में किसी और चीज़ का इस्तेमाल करता है, तुम्हें धोखा देने के लिए इस चीज़ का उपयोग करता है ताकि तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में मूल रूप से कोई विचार न हो, और वह तुम्हें यह जानने की अनुमति नहीं देता है कि परमेश्वर वास्तव में कौन है। निश्चित रूप से यह छल कपट, न केवल सिर्फ इसे, बल्कि कई पहलुओं को शामिल करता है।

तीसरा है ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना। क्या ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाया जाता है? (हाँ।) किस बात के विषय में ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना? क्या ज़बरदस्ती सिद्धान्तों को मनवाना मनुष्य के स्वयं के चुनाव के द्वारा होता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? (नहीं।) यदि तुम इससे सहमत नहीं होते हो तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुम्हारी अनभिज्ञता में वह तुम्हारे भीतर उँडेलता है, शैतान की सोच, जीवन के उसके नियमों और उसके बुरे सार को तुम्हारे भीतर डालता है।

चौथा है धमकियाँ एवं प्रलोभन। अर्थात्, शैतान विभिन्न माध्यमों को काम में लाता है ताकि तुम उसे स्वीकार करो, उसका अनुसरण करो, उसकी सेवा में कार्य करो; वह किसी भी ज़रूरी माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। वह कई बार तुम पर छोटी छोटी कृपा करता है परन्तु अभी भी तुम्हें पाप करने के लिए लुभाता है। यदि तुम उसका अनुसरण न करो, तो वह तुम्हें कष्ट भुगतने के लिए मजबूर करेगा और तुम्हें दण्ड देगा और वह तुम पर आक्रमण करने और तुम्हें जाल में फँसाने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करेगा।

पाँचवा है धोखा एवं लकवा। "धोखा एवं लकवा" वह है जिससे शैतान कुछ मधुर सुनाई देने वाले कथनों एवं विचारों को गढ़ता है जो लोगों की धारणाओं के साथ होती हैं ताकि ऐसा दिखाई दे मानो वह लोगों के शरीरों का ध्यान रख रहा है या उनके जीवन एवं भविष्य के बारे में सोच रहा है, जबकि वास्तव में यह बस तुम्हें बेवकूफ़ बनाने के लिए है। तब वह तुम्हें लकवाग्रस्त कर देता है ताकि तुम यह न जानो कि क्या सही है और क्या ग़लत है, ताकि तुम अनजाने में ही उसके मार्ग का अनुसरण करो और फलस्वरूप उसके नियन्त्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है शरीर एवं मस्तिष्क विनाश। शैतान मनुष्य की किस चीज़ का विनाश करता है? (उनका मस्तिष्क, और उनका पूरा अस्तित्व।) शैतान तुम्हारे मस्तिष्क का नाश करता है, विरोध करने के लिए तुम्हें शक्तिहीन बना देता है, इसका अर्थ है कि स्वयं के बजाए बिलकुल धीरे धीरे तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। वह हर दिन इन चीज़ों को तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रभावित एवं तुम्हारा पोषण करने के लिए प्रतिदिन इन विचारों एवं संस्कृतियों का उपयोग करता है, बिलकुल धीरे धीरे तुम्हारी इच्छा शक्ति को बर्बाद करता है, तुम्हें मजबूर करता है कि आगे से एक अच्छा इंसान बनने की इच्छा न करो, तुम्हें मजबूर करता है कि आगे से उसके लिए निरन्तर खड़े रहने की इच्छा न करो जिसे तुम धार्मिकता कहते हो। अनजाने में, आगे से तुम्हारे पास और कोई इच्छा शक्ति नहीं होती है कि तुम लहर के खिलाफ ऊपर धारा में तैरो, परन्तु इसके बजाए तुम उसके साथ नीचे की ओर बहते हो। "विनाश" का अर्थ है कि शैतान लोगों को इतना अधिक कष्ट देता है कि वे न तो मनुष्य के समान बनते हैं और न ही प्रेत के समान, तब वह उन्हें फाड़ खाने के लिए उस अवसर को पकड़ लेता है।

इन में से प्रत्येक माध्यम जिसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है वह विरोध करने के लिए मनुष्य को निर्बल कर देता है; उनमें से कोई भी लोगों के लिए घातक हो सकता है और विरोध करने के लिए उन्हें कोई मौका बिलकुल भी नहीं देता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी कार्य जो शैतान करता है और कोई भी माध्यम जो वह काम में लाता है उससे वह तुम्हें पतित कर सकता है, तुम्हें शैतान के नियन्त्रण के अधीन ला सकता है और तुम्हें दुष्टता के दलदल में धँसा सकता है ताकि तुम बचकर निकल न सको। ये वे माध्यम हैं जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए काम में लाता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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