परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 156

मनुष्य को भ्रष्ट करने हेतु विज्ञान के उपयोग में, मनुष्य की जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान के नाम का उपयोग करता है, विज्ञान का अनुसंधान करने और रहस्यों की छान बीन के लिए मनुष्य की इच्छा को संतुष्ट करता है। साथ ही विज्ञान के नाम में, मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता को निरन्तर बढ़ाने के लिए शैतान उसकी भौतिक आवश्यकताओं और उसकी माँगों को संतुष्ट करता है। इसलिए शैतान, इस नाम में, मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान के तरीके का इस्तेमाल करता है। क्या यह सिर्फ मनुष्य की सोच है या मनुष्य के मन में है जिसे शैतान विज्ञान के इस तरीके का इस्तेमाल करके भ्रष्ट करता है? हमारे आस पास के लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें हम देख सकते हैं और जिनके सम्पर्क में हम आ सकते हैं, और ऐसा क्या है जिसे भ्रष्ट करने के लिए शैतान विज्ञान का उपयोग करता है? (प्राकृतिक वातावरण।) तुम सब सही हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों को इसके द्वारा भारी नुकसान पहुँचाया गया है, और तुम भी इसके द्वारा बहुत अधिक प्रभावित हुए हो। मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करने, और मनुष्य को धोखा देने के लिए विज्ञान की सब प्रकार की विभिन्न खोजों एवं निष्कर्षों का उपयोग करने के अलावा, साथ ही शैतान जीवन जीने के इस वातावरण के मनमाने विनाश एवं दोहन को क्रियान्वित करने के लिए विज्ञान को एक माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल करता है जिसे परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था। वह इसे इस बहाने के अंतर्गत करता है कि यदि मनुष्य वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रियान्वित करता है, तो मनुष्य का जीवन जीने का वातावरण और बेहतर होगा तथा मनुष्य के जीवन जीने के स्तर निरन्तर बढ़ेंगे, और इसके अतिरिक्त उस वैज्ञानिक विकास को मनुष्य की दैनिक रूप से बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताओं और नित्य ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए किया जाता है ताकि उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए। यदि कारण ये नहीं हैं, तो वह पूछता है कि विज्ञान का विकास करके तुम वास्तव में क्या कर रहे हो। यह विज्ञान के विषय में शैतान के विकास का सैद्धान्तिक आधार है। फिर भी विज्ञान के पास मानवजाति के लिए कौन कौन से नतीजे हैं? हमारा तात्कालिक वातावरण किन चीज़ों से मिलकर बना हुआ है? क्या उस वायु को जिसमें मानवजाति सांस लेती है दूषित नहीं किया गया है? क्या वह जल जिसे हम पीते हैं अभी भी सचमुच में शुद्ध है? (नहीं।) अतः उस भोजन के विषय में क्या कहें जिसे हम खाते हैं, क्या इसका अधिकांश भाग प्राकृतिक है? (नहीं।) अतः फिर यह क्या है? इसे उर्वरक का उपयोग करके उगाया जाता है और अनुवांशिक संशोधन का उपयोग करके इसकी खेती की जाती है, और साथ ही चीज़ों की अनुवांशिक किस्मों में परिवर्तन (म्यूटेशनस) भी हैं जिन्हें विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करके उत्पन्न किया जाता है, ताकि यहाँ तक कि वे सब्जियाँ और फल जिन्हें हम खाते हैं वे अब आगे से प्राकृतिक नहीं रहे। अब यह लोगों के लिए आसान नहीं है कि खाने के लिए असंशोधित (प्राकृतिक) खाद्य पदार्थों को पा सकें। पहले से ही शैतान के तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रक्रिया से होकर गुज़ारे जाने के बाद, यहाँ तक कि अंडे भी पहले के समान स्वादिष्ट नहीं रह गए हैं। बड़ी तस्वीर को देखने पर, समूचे वातावरण को नष्ट और प्रदूषित कर दिया गया है; पहाड़ें, झीलें, जंगल, नदियाँ, महासागर, एवं हर वह चीज़ जो भूमि के ऊपर एवं नीचे है उन सब को तथाकथित वैज्ञानिक उपलब्धियों के द्वारा बर्बाद कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में, सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र, एवं जीवन जीने का सम्पूर्ण वातावरण जिसे परमेश्वर के द्वारा मानवजाति को प्रदान किया गया था उसे उस तथाकथित विज्ञान के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है। हालाँकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने उसे प्राप्त किया है जिसकी अपेक्षा उन्होंने जीवन की गुणवत्ता के सन्दर्भ में की थी जिसे वे खोजते थे, और अपनी काम वासनाओं एवं अपने शरीर दोनों को संतुष्ट करते हैं, फिर भी वह वातावरण जिस में मनुष्य रहता है उसे मुख्य तौर पर उन विभिन्न "उपलब्धियों" के द्वारा प्रदूषित एवं बर्बाद कर दिया गया है जिन्हें विज्ञान के द्वारा लाया गया था। यहाँ तक कि बाहर या हमारे घरों में भी अब आगे से हमें शुद्ध हवा में एक सांस लेने का भी अधिकार नहीं है। तुम मुझे बताओ, क्या यह मानवजाति का दुःख है? क्या अभी भी कोई खुशी है कि उसे मनुष्य के लिए बोला जाए कि वह जीवन जीने के ऐसे परिक्षेत्र में रहता है? मनुष्य जीवन जीने के इस परिक्षेत्र में रहता है और, बिलकुल शुरुआत से ही, जीवन जीने के इस वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए सृजा गया था। वह जल जिसे लोग पीते हैं, वह वायु जिसमें लोग सांस लेते हैं, वह भोजन जिसे लोग खाते हैं, पौधे, पेड़, और महासागर—जीवन जीने के इस समस्त वातावरण को परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया था; यह प्राकृतिक है, और प्राकृतिक नियम के अनुसार संचालित होता है जिसे परमेश्वर के द्वारा स्थापित किया गया था। यदि कोई विज्ञान नहीं होता, और लोग उसका आनन्द उठा सकते जिसे परमेश्वर के मार्ग के अनुसार मनुष्य को प्रदान किया गया था, तो वे खुश होते और उसके अति प्राचीन (मूल) रूप में हर चीज़ का आनन्द उठा सकते थे। फिर भी, अब यह सब कुछ शैतान के द्वारा नष्ट और बर्बाद कर दिया गया है; मनुष्य का जीवन जीने का मूल परिक्षेत्र अब आगे से अपने अति प्राचीन (मूल) रूप में नहीं है। परन्तु कोई भी यह पहचानने के योग्य नहीं है कि किसने इस प्रकार के परिणाम को उत्पन्न किया है या यह कैसे हुआ है, और इसके अतिरिक्त और भी अधिक लोग शैतान के द्वारा उनमें डाले गए उन विचारों का उपयोग करने के द्वारा, और सांसारिक आँखों से विज्ञान को देखने के द्वारा विज्ञान को समझते हैं और नज़दीक आते हैं। क्या यह अत्यंत घृणास्पद एवं दयनीय नहीं है? शैतान के साथ अब उस परिक्षेत्र को जिसमें मानवजाति अस्तित्व में है और उसके जीवन जीने के वातावरण को लेने और उन्हें इस स्थिति तक भ्रष्ट करने, और मानवजाति के साथ निरन्तर इस रीति से विकसित होने के बाद, क्या परमेश्वर के हाथ से इस मानवजाति को पृथ्वी पर से मिटाने की कोई आवश्यकता है जो अत्यंत भ्रष्ट हो चुकी है और जो उसके प्रतिकूल हो गई है? क्या परमेश्वर के हाथ से मानवजाति को नष्ट करने की कोई आवश्यकता है? (नहीं।) यदि मानवजाति निरन्तर इस रीति से विकसित होती रहती, तो वह कौन सी दिशा लेगी? (बर्बादी।) मानवजाति को किस प्रकार बर्बाद किया जाएगा? प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए मनुष्य के लोभी खोज के साथ, वे निरन्तर वैज्ञानिक अन्वेषण एवं गहरे अनुसंधान को क्रियान्वित करते रहते हैं, तो वे लगातार अपनी स्वयं की भौतिक आवश्यकताओं एवं काम वासना को संतुष्ट करते रहते हैं; फिर मनुष्य के लिए इसके क्या नतीजे हैं? सबसे पहले अब आगे से कोई पर्यावरणीय संतुलन नहीं रहा और, इसके साथ ही साथ, इस प्रकार के वातावरण के द्वारा समस्त मानवजाति के शरीरों को दूषित एवं क्षतिग्रस्त कर दिया गया है, और विभिन्न संक्रमित रोग, विपदाएँ, एवं धुंध हर जगह फैल गई है। यह ऐसी स्थति है जिस पर अब मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है, क्या यह सही नहीं है? अब तुम लोग इसे समझते हो, यदि मानवजाति परमेश्वर का अनुसरण नहीं करती है, परन्तु इस रीति से हमेशा शैतान का अनुसरण करती रहती है—अपने आपको लगातार समृद्ध करने के लिए ज्ञान का उपयोग करती है, बिना रुके मानवीय जीवन के भविष्य की खोज करने के लिए विज्ञान का उपयोग करती है, निरन्तर जीवन बिताते रहने के लिए इस प्रकार की पद्धति का उपयोग करती है—तो क्या तुम लोग पहचानने में समर्थ हो कि मानवजाति का स्वाभाविक अन्त क्या होगा? स्वाभाविक अंतिम परिणाम क्या होगा? (बर्बादी।) यह बर्बादी होगीः एक समय में एक कदम बढ़ाकर बर्बादी की ओर पहुँचना! एक समय में एक कदम के लिए दृष्टिकोण! अब ऐसा दिखाई देता है मानो विज्ञान एक प्रकार का जादुई पेय हो या धीमे धीमे कार्य करनेवाला ज़हर हो जिसे शैतान ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, ताकि जब तुम लोग चीज़ों को परखने की कोशिश करो तो तुम लोग इसे कोहरेदार धुंध में करो; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितने कठोर दिखाई देते हो, क्योंकि तुम लोग चीज़ों को साफ साफ नहीं देख सकते हो, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग कितनी कठोर कोशिश करते हो, क्योंकि तुम लोग उन्हें समझ नहीं सकते हो। फिर भी शैतान अभी भी विज्ञान के नाम का उपयोग करता है कि तुम्हारी भूख को बढ़ाए और एक कदम के बाद दूसरे कदम को रखते हुए नाक की सीध में अथाह कुण्ड की ओर एवं मृत्यु की ओर तुम्हारी अगुवाई करे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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