परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" | अंश 153

जो विधियां शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग में लाता है क्या वह मनुष्यता लाती हैं? क्या इसके विषय में कुछ भी सकारात्मक है? (नहीं।) पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता है? (नहीं।) देखिये, इस संसार में चाहे कोई बड़ा व्यक्ति हो, या कोई समाचार पत्र हो, या कोई रेडियो स्टेशन हो, वे सब यही कहते हैं कि यह या वह अच्छा या बुरा है, क्या वह सटीक है? (नहीं।) क्या वह सही है? (नहीं।) क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनका आकलन उचित है? (नहीं।) क्या इसमें कोई सच्चाई है? (नहीं।) क्या यह संसार या मानवता, सकारात्मक और नकारात्मक बातों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करते हैं? (नहीं।) लोगों में वह योग्यता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया और विज्ञान के विषय में इतना जाना, तो क्या उनकी योग्यताएं इतनी महान नहीं हैं? वे सकारात्मक और नकारात्मक बातों में अंतर क्यों नहीं कर पाते? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों में सच्चाई नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) प्रत्येक वस्तु जो शैतान मानवता के लिए लाता है उसमें बुराई और भ्रष्टाचार है, और उसमें सच, जीवन और सन्मार्ग का अभाव होता है। मनुष्य के लिये बुराई और भ्रष्टाचार लाने वाले शैतान क्या प्रेम हो सकता है? क्या आप कह सकते हैं कि मनुष्य के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं: "आप गलत हैं, इस सारे संसार में बहुत से लोग हैं जो गरीब और बेघर लोगों की मदद करते हैं, क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? कई धर्मार्थ संगठन भी हैं जो भले कार्य करते हैं, क्या उनके सब काम लोगों के भले के लिए नहीं हैं?" तो फिर इसके विषय में हम क्या कहें? शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिए बहुत-सी अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या यह मनुष्य का दूषित होना अस्पष्ट धारणा है? नहीं यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यवहारिक बातें भी करता है जिनमें बहुत-सी बुरी बातों को ऐसा प्रस्तुत करता है जैसे अच्छी बात हो, और तो और, शैतान धोखेबाजी के कार्य भी, अपने निहित भाव और उद्देश्य के लिए करता है। दूषित लोग और शैतान एक जैसे हैं, वे भी इस संसार में हैं और समाज में एक दृष्टिकोण या सिद्धांत को बढ़ावा देते हैं। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक युग में वे एक सिद्धांत को बढ़ावा देते और मनुष्यों के भीतर कुछ विचार संस्थापित करते हैं। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में जड़ पकड़ लेते हैं, और तब मनुष्य उन विचारों और सिद्धांतों के साथ जीना प्रारम्भ कर देते हैं; क्या वे अज्ञानतावश शैतान नहीं बन जाते हैं? क्या लोग शैतान के साथ एकाकार नहीं हो गये हैं? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तब अंत में उनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति क्या होता है, क्या वही आचरण नहीं हो जाता जो शैतान का परमेश्वर के प्रति है? कोई भी इसे मानने का साहस नहीं कर सकता, सही है न? यह बहुत भयानक है। मनुष्य शैतान हैं, और उनका स्वभाव ठीक शैतान के स्वभाव जैसा ही है। मैं क्यों कहता हूं कि शैतान का स्वभाव बुरा है? जो शैतान ने किया और जो बातें शैतान ने प्रकाशित की हैं, उनके आधार पर इसका निर्धारण और विश्लेषण किया गया है; यह कहना गलत नहीं होगा कि शैतान दुष्ट है| अगर मैं कहूं शैतान बुरा है, तो आप क्या सोचेंगे? आप सोचेंगे, "सही बात है, शैतान बुरा है।" फिर मैं आप से पूछूंगाः "शैतान का कौनसा पहलू बुरा है?" यदि आप कहें: "शैतान का परमेश्वर का विरोध करना बुरा है," आप अभी भी सफाई के साथ नहीं बोल रहे होंगे। अब हमने इस प्रकार से सुनिश्चित वर्णन किया; क्या आपको शैतान की बुराई के सार के विशिष्ट अंशों की समझ है? (हां।) अब जबकि आप को शैतान के बुरे स्वभाव की समझ आ गई है, तो अपने स्वयं के बारे में आप कितना समझते हैं? क्या ये बातें जुड़ी हुई हैं? (हां।) क्या यह जुड़ना आपको दुख देता है? (नहीं।) क्या यह आपके लिए सहायक है? (हां।) जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में संगति करता हूं तो क्या यह भी आवश्यक है कि मैं शैतान की बुराई के तत्व के बारे में भी संगति करूं? आपकी क्या राय है? (हां यह आवश्यक है।) क्यों? (शैतान की बुराई परमेश्वर की पवित्रता को ऊंचे पर स्थापित करती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक तौर पर सही है कि बिना शैतान की बुराई के, लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जान पाएंगे; यह सही है। फिर भी यदि आप कहते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अस्तित्व तभी है जब सामने शैतान की बुराई होती है। क्या यह सही है? यह तर्क गलत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित तत्व है; यद्यपि परमेश्वर इसे प्रगट करता या कार्य करता है, यह अंतर्निहित तत्व उसमें विद्यमान है और यह स्वभाविक रूप से प्रकट होता है, यह परमेश्वर में अंतर्भूत है और सदा से अस्तित्व में है, परन्तु मनुष्य उसे देख नहीं सकता। मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव में और दूषित तत्व में रहता है, और मनुष्य पवित्रता को या परमेश्वर की पवित्रता के विशिष्ट अंश को नहीं जानता है। क्या यह सही है? तो फिर क्या आप सोचते हैं कि हमें पहले शैतान के बुरे तत्व के बारे में संगति करनी आवश्यक है? (हां, आवश्यक है।) देखिये, हमने परमेश्वर की विशिष्टताओं के कई पहलुओं पर संगति की है और हमने शैतान के तत्व की चर्चा भी नहीं की, सही? कुछ लोग अपना शक कुछ इस प्रकार जाहिर कर सकते हैं, "आप केवल परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, आप हर समय शैतान लोगों को दूषित करता है, और शैतान का स्वभाव बुराई है, ऐसा क्यों कह रहे हैं?" क्या आपने इस संदेह का समाधान कर लिया है? (हां।) कैसे आपने इस संदेह का समाधान किया? (परमेश्वर की संगति के द्वारा, अंतर कर लिया कि बुराई क्या है।) जब लोग बुराई पर विचार करते हैं और जब उनके पास उसकी एक सटीक परिभाषा होती है, जब लोग बुराई के विशिष्ट अंश और प्रकाशन को देख सकते हैं, बुराई के स्रोत और तत्व को देखते हैं—जब परमेश्वर की पवित्रता की अभी चर्चा होती है—तब लोग स्पष्ट रूप से जान पाएंगे और इसे परमेश्वर की सच्ची पवित्रता के रूप में पहचान पाएंगे। यदि मैं शैतान की बुराई की चर्चा नहीं करता, तो कुछ लोग गलतफहमी में यह विश्वास करेंगे कि लोग जो कुछ समाज में या लोगों के बीच में करते हैं—या इस संसार में करते हैं—वे पवित्रता से सम्बन्धित हो सकता है। क्या यह दृष्टिकोण गलत नहीं है? (हां।)

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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