परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" | अंश 152

मनुष्य के पास ज्ञान और कुछ वैज्ञानिक सिद्धांत हैं, मनुष्य पारम्परिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक पारम्परिक संस्कृति का वारिस है। मनुष्य शैतान के द्वारा दी गई पारम्परिक संस्कृति को पालन करने के लिए बाध्य है, और इसके साथ ही उन सामाजिक रीति-रिवाज़ के साथ सामंजस्य बैठाकर कार्य करने के लिये बाध्य है जो शैतान ने मनुष्यों को उपलब्ध कराये हैं। शैतान से अभिन्न होने के बावजूद, जो कुछ शैतान हर समय करता है उसमें सहयोग देना, उसकी धूर्तता, हठ, दुर्भावना और बुराई को स्वीकारना—शैतान के इन स्वभावों को आत्मसात करने के बाद—क्या मनुष्यों के बीच में और संसार में रहते हुए मनुष्य खुश है या दुखी? (दुखी।) आप ऐसा क्यों कहेंगे? (वह इन बातों से बंधा हुआ है और उसका जीवन एक कड़वा संघर्ष है।) है न। हो सकता है आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा हो जो चश्मा लगाए हुए है और दिखने में बहुत बुद्धिमान लगता हो; वह कभी चिल्लाता न हो, हमेशा बोलने में निपुण, बुद्धि सम्पन्न हो, और इसके अलावा, क्योंकि वह बहुत आयु का है, हर तरह के हालत से होकर गुजरा होगा और बहुत अनुभवी भी होगा, हो सकता है कि वह किसी भी मामले में, चाहे छोटा हो या बड़ा, विस्तार और अधिकार से बोल सकता हो, और जो कहता हो उसका उसके पास मजबूत आधार हो, हर बात की प्रमाणिकता और तर्क के लिये उसके पास सिद्धांत भी हों; लोग उसका व्यवहार, व्यक्तित्व, उसका आचरण, उसकी निष्ठा और उसका चरित्र देखकर सोचते हों कि उस व्यक्ति में तो कोई दोष नहीं है। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रीतियों का विशेष ध्यान रखते हैं और कभी पुराने ढंग में नहीं देखे जाते; ऐसे व्यक्ति अग्रगण्य और आधुनिक शैली के होते हैं। ऐसा व्यक्ति वृद्ध होते हुये भी वक्त के साथ कदम मिलाकर चलता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। ऊपर से देखने पर ऐसे व्यक्ति में कोई दोष दिखाई नहीं देते, लेकिन अंदर से ऐसा व्यक्ति शैतान के द्वारा पूरी तरह से दूषित हो चुका होता है। ऊपर से कुछ भी गलत नहीं है, वह विनम्र है, सुसंस्कृत है, ज्ञानवान है और एक खास नैतिकता रखता है, वह निष्ठावान है और नौजवानों जितनी ही जानकारी रखता है। फिर भी, उसके स्वभाव और उसके तत्व के सम्बन्ध में, यह व्यक्ति शैतान का पूर्ण और जीवित नमूना है। वह शैतान का रूप और छवि है। यह शैतान के मनुष्य को दूषित करने का "फल" है। मैंने जो कहा हो सकता है कि वह आपके लिए दुखदायी हो, परन्तु यह सब सच है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जो विज्ञान वह समझता है और सामाजिक रीति में ठीक से व्यवस्थित होने के लिए वह जिस राह पर वह चलता है, बेशक ये शैतान के द्वारा दूषित करने वाले औजार हैं। यह बिल्कुल सच है। इसलिए मनुष्य एक दूषित स्वभाव में जीता है जो कि शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया गया है और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का तत्व क्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान मनुष्यों को जिस तरीके से दूषित करता है, उसमें ऊपरी सतह पर कोई दोष नहीं ढूंढ सकता, किसी के व्यवहार द्वारा कोई यह नहीं बता सकता कि उसमें कुछ कमी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य पर सामान्य तौर पर जाता है और सामान्य जीवन जीता है, वह सामान्य तौर से पुस्तकें और समाचार पत्र पढता है, सामान्य तौर पर अध्ययन करता और बोलता है, कुछ लोगों ने तो यहां तक सीख लिया है कि नैतिकता का मुखौटा कैसे पहनें, जिससे उनके अभिवादन नम्र हों, शिष्ट बनें, दूसरों को समझने वाले बनें, मित्रवत बनें, दूसरों के मददगार बनें, दानशील बनें, और दूसरों के साथ हड़बड़ी करने वाला बनने से बचें और दूसरों का फायदा उठाने से बचें। जबकि उनके मन का दूषित शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ पकड़ चुका है। यह तत्व बाहरी प्रयासों से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के तत्व के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझ नहीं सकता, इस के बावजूद कि परमेश्वर की पवित्रता का तत्व मनुष्य के लिए सार्वजनिक कर दिया गया है, मनुष्य इसे गम्भीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है कि शैतान ने पहले से ही मनुष्य के एहसास, विचार, दृष्टिकोण और चिंतन को विभिन्न साधनों से अपने कब्जे में कर लिया है। यह कब्जा और भ्रष्टता अस्थायी या प्रासंगिक नहीं है; यह हर जगह और हर समय विद्यमान है। इसलिए बहुत से लोग जो 3 या 4 साल से या 5 या 6 साल से परमेश्वर पर विश्वास करते चले आ रहे हैं, वे अभी भी उन विचारों और दृष्टिकोण को, जो शैतान ने उनमें बैठा दिए हैं, ऐसे पकड़े हुए हैं जैसे कि कोई खज़ाना हो। क्योंकि मनुष्य ने बुरे, अहंकारी और शैतान के द्रोही स्वभाव को स्वीकार कर लिया है, और इस तरह मनुष्य अक्सर आपसी रिश्तों के अंतर्द्वंद्व में फंस जाता है, तर्क-वितर्क और असामंजस्यता की स्थिति में उलझ जाता है, और यह सब परिणाम है शैतान के अहंकारी स्वभाव का। यदि शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक बातें दी होतीं—उदाहरण के लिए यदि मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारम्परिक संस्कृति के कंफ्यूशीवाद और ताओवाद को अच्छा माना जाता तो उन्हें स्वीकार करने के बाद उसी प्रकार की मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहना चाहिये था। जिन्होंने उन वादों को स्वीकार कर लिया था तो उनके बीच इतना विभाजन क्यों है? क्यों है ऐसा? यह इसलिए हुआ है क्योंकि ये बातें शैतान द्वारा दी गई हैं और शैतान लोगों में विभाजन उत्पन्न करता है। शैतान जो बातें देता है, वे धरातल पर कितनी भी प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण दिखाई पड़ें, पर कोई मतलब नहीं, वे मनुष्यों के जीवन में केवल घमण्ड़ और शैतान के बुरे स्वभाव की धूर्तता के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कुछ लोग जो अपने आप को छद्मरूप दे सकते हैं, ज्ञान का भंडार रखते हैं, जिनकी अच्छी परवरिश हुई है, उनके लिये अपने शैतानी स्वभाव को छुपा पाना बहुत कठिन होगा। कोई व्यक्ति अपने आपको कितना भी छिपाए, भले ही आप उसे संत समझें, या आप सोचें कि वह आदर्श व्यक्ति है, या आप सोचें कि वह फरिश्ता है, आप उसे कितना ही शुद्ध क्यों न मानें, उनका जीवन पर्दे के पीछे क्या होगा? उनके स्वभाव के प्रकाशन में आप किस तत्व को देखोगे? बिना किसी शक के आप शैतान का बुरा स्वभाव देखेंगे। क्या कोई ऐसा कह सकता है? (हां।) उदाहरण के लिए ऐसा कोई व्यक्ति जो आप के निकट है जिसे आप सोचते हैं कि वह अच्छा व्यक्ति है, या आपका विचार उसके लिए अच्छा व्यक्ति होने का है, जिसे आप एक आदर्श व्यक्ति मानते हैं। अपनी वर्तमान हैसियत में आपके उसके बारे में क्या विचार हैं? पहले, आप यह देखोगे कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वे ईमानदार हैं, क्या उन्हें लोगों से सच्चा प्यार है, क्या उनके वचन और काम लाभप्रद हैं और दूसरों की मदद करते हैं। (नहीं।) दिखावे की दयालुता, प्रेम या अच्छाई यहां प्रदर्शित होती है, आखिर यह है क्या? यह सब कुछ छलावा है, झूठ है। यह परदे के पीछे मुखौटे का एक गुप्त बुरा उद्देश्य है, उस व्यक्ति को प्रिय और पूजित बनाना है। क्या आप इसे स्पष्टता से देखते हैं? (हां।)

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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