परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 147

शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए किस प्रकार से ज्ञान का उपयोग करता है

पहले हम ज्ञान के विषय में बात करेंगे। क्या प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान को सकारात्मक बात नहीं मानता? लोग, कम से कम ये तो सोचते ही हैं कि "ज्ञान" शब्द का लक्ष्यार्थ नकारात्मक की अपेक्षा सकारात्मक है। तो हम क्यों कह रहे हैं कि शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का उपयोग किया? क्या क्रमिक विकास का सिद्धांत ज्ञान का पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का नियम ज्ञान का भाग है, सही? (हां।) फिर शैतान ने ज्ञान को मनुष्य को भ्रष्ट करने में उपयोग में लाई जाने वाली साधन सूची में शामिल क्यों किया है? आपका इसमें क्या विचार है? क्या ज्ञान में लेश मात्र भी सच्चाई का अंश है? (नहीं।) तब ज्ञान का तत्व क्या है? (यह सत्य के विरूद्ध जाता है।) किस आधार पर मनुष्य ज्ञान का अध्ययन करता है? क्या यह क्रमिक विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या यह ज्ञान नहीं है मनुष्य ने जिसका अनुसंधान किया, इस का योगफल, नास्तिकता पर आधारित है? (हां।) इसलिए, क्या परमेश्वर का इस ज्ञान के साथ कोई सम्बन्ध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना के साथ जुड़ा हुआ है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा हुआ है? (नहीं।) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का कैसा उपयोग करता है? मैंने अभी यह कहा है कि इनमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना और सत्य से जुड़ा हुआ नहीं है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं: "हो सकता है इसका सच्चाई से कोई लेना-देना न हो, परन्तु यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि लोगों की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से क्या बनाया है? क्या कभी ज्ञान ने आपको यह सिखाया, कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथ में है? (हां।) यह किस प्रकार की बात है? (यह बकवास है।) ध्यान दें! यह बकवास है! विचार विमर्श के लिए ज्ञान एक जटिल विषय है। आप सरलता से यह कह सकते हैं कि ज्ञान का एक क्षेत्र ज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। यह ज्ञान का वह क्षेत्र है जो नास्तिकता के आधार पर और इस जानकारी की कमी के आधार पर है, कि परमेश्वर ने ही सब कुछ रचा है, सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो ऐसा नहीं मानते कि सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता है, वे नहीं मानते कि परमेश्वर ही हर चीज़ का प्रबंधन करता है। इसकी बजाय, वे ज्ञान के उस क्षेत्र में खोज करते हैं, अनुसंधान करते हैं उसका वैज्ञानिक उत्तर तलाश करते हैं। परन्तु यदि लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, इसके विपरीत शोध करते हैं, तो वे सही उत्तर नहीं पाएंगे, सही? ज्ञान आपको केवल जीवकोपार्जन ही देता है, यह केवल नौकरी देता है, वह केवल आमदनी देता है जिससे कि आप भूखे न मरें, पर वह परमेश्वर को जानने में आपकी सहायता कभी नहीं करेगा, यह कभी उस पर विश्वास करने में, उसकी आज्ञा मानने में आपकी मदद नहीं करेगा, और ज्ञान कभी भी आप को बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना ज्यादा आप ज्ञान का अध्ययन करोगे उतना ही आप परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर पर शोध करने, परमेश्वर को परखने और परमेश्वर के विरूद्ध जाने की इच्छा करेंगे। अतः अब आप क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखाता है? यह सब कुछ शैतान का तत्व ज्ञान है। क्या शैतान का तत्वज्ञान और जीवित रहने के नियम जो भ्रष्ट मनुष्यों में पाए जाते हैं क्या उनका कोई सम्बन्ध सत्य से है? (नहीं।) उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और वास्तव में वे सच के विपरीत हैं। लोग अक्सर कहते हैं, "जीवन गति है" यह कैसी बात है? (बकवास।) लोग यह भी कहते हैं "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, मनुष्य जब एक बार का भोजन चूक जाता है, तो भूख का अनुभव करता है" यह क्या है? (बकवास, शैतान के शब्द।) यह उससे भी बद्तर छलावा है और यह सुनने में घृणित है। तो ज्ञान एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में शायद हर कोई जानता है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन के तत्व ज्ञान और अपनी सोच का कितना रंग मिला दिया है, और जब शैतान यह करता है तब शैतान मनुष्य को उसकी सोच, तत्व ज्ञान, और दृष्टिकोण लेने की अनुमति देता है जिससे मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार सके, सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता और मनुष्य के भाग्य पर प्रभुत्व को नकार सके। तो जैसे-जैसे मनुष्य का अध्ययन प्रगति करता है उसका परमेश्वर के अस्तित्व में होने का एहसास धुंधला होता जाता है, जब वह और ज्ञान प्राप्त करता है, और मनुष्य यह भी सोच सकता कि परमेश्वर का अस्तित्व है ही नहीं, क्योंकि शैतान ने अपना दृष्टिकोण, अवधारणा और विचार मनुष्य के दिमाग में भर दिए हैं। जैसे ही शैतान ये विचार मनुष्य के दिमाग में भर देता है, तो क्या मनुष्य इसके द्वारा दूषित नहीं हो जाते? (हां।) अब मनुष्य का जीवन किस पर आधारित है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर आधारित है? नहीं; मनुष्य अपना जीवन शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोण और तत्व ज्ञान पर आधारित है जो कि इस ज्ञान में छिपा हुआ है। यह वह सिरा है जहां मनुष्य में शैतान के भ्रष्टाचार का सार घटित होता है। यही शैतान का लक्ष्य और विधि है जिससे वह मनुष्य को दूषित करने के लिए करता है।

पहले हम इस विषय के सबसे सामान्य पहलू पर बात करेंगे। जब आप कक्षा में चीनी भाषा का पाठ पढ़ रहे थे, क्या भाषा और लिखावट लोगों को भ्रष्ट करने लायक थी, वे नहीं हो सकती हैं। क्या शब्द लोगों को दूषित कर सकते हैं? (नहीं।) शब्द लोगों को दूषित नहीं कर सकते हैं। वे एक माध्यम हैं जो लोगों को बोलने की अनुमति देते हैं और एक उपकरण है जिससे लोग परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं। इसके अलावा भाषा और शब्द के ज़रिये अब परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है, वे साधन हैं, वे एक जरूरत हैं। एक और एक दो होते हैं, यह ज्ञान है, सही? दो और दो का गुणा चार होते हैं, यह ज्ञान है, सही? पर क्या यह आपको दूषित कर सकता है? यह एक सामान्य ज्ञान और नियम है इसलिए यह लोगों को दूषित नहीं कर सकता है। तो कैसा ज्ञान लोगों को दूषित करता है? वह ज्ञान जिसमें शैतान के दृष्टिकोण और विचार का मेल हो। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को मानवता में ज्ञान द्वारा प्रविष्ट करने के अवसर की ताक में रहता है। उदाहरण के लिए, एक निबंध में लिखित शब्दों में कुछ गलत है? (नहीं।) तो फिर समस्या कहां होगी? लेखक का दृष्टिकोण और नीयत जब वह लिख रहा था तथा उस निबंध में उसके विचारों का तत्व—ये आत्मिक बातें हैं—और लोगों को दूषित करने के योग्य हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप टेलीविज़न पर शो देख रहे हैं, किस प्रकार की बातें आपके दृष्टिकोण को बदल सकती हैं? प्रस्तुतकर्ता ने क्या कहा, क्या शब्द स्वयं दूषित करने योग्य हो सकते हैं? (नहीं।) कैसी बातें लोगों को दूषित करेंगी? यह शो के विचार और विषय-वस्तु होगी जो निर्देशक के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं या उन दृष्टिकोणों के द्वारा वे सूचनाएं जो लोगों तक पहुंची, जिन्होंने लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित किया, क्या यह सही है? (हां।) क्या आप समझ रहे हैं कि मैं अपनी इस चर्चा में क्या इशारा कर रहा हूं कि कैसे शैतान ज्ञान का उपयोग लोगों को दूषित करने के लिए करता है? (हां, हम जानते हैं।) आप गलत नहीं समझेंगे, सही? तो जब आप एक उपन्यास या निबंध दोबारा पढ़ते हैं, तो क्या आप मूल्यांकन कर सकते हैं कि निबंध में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को दूषित कर रहे हैं या मानवता की सेवा कर रहे हैं? (हम ऐसा थोड़ा सा ही कर सकते हैं।) यह वह है जहां एक धीमी गति से अध्ययन और अनुभव किया जाना चाहिए, यह कोई ऐसी बात नहीं है जो एकदम से समझी जाए। उदाहरण के लिए, जब ज्ञान के एक क्षेत्र में अध्ययन और शोध करते समय, उसे क्षेत्र को और लोगों को जो नकारना चाहिए उसे समझने में सहायक हो सकते हैं, और लोगों को क्या नकारना चाहिए। उदाहरण के लिए "विद्युत" को लीजिए, यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, सही? आप अनभिज्ञ रहोगे यदि आप यह नहीं जानते कि बिजली लोगों को झटका दे सकती है, सही? पर यदि एक बार आप ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ जाते हैं, तब आप बिजली की कोई चीज़ छूने में असावधानी नहीं बरतेंगे और आप विद्युत का उपयोग कैसे करें, यह भी जानेंगे। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब आप को स्पष्ट हुआ कि किस विषय में बात कर रहे हैं? ज्ञान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है? (हां, स्पष्ट हो गया।) यदि आप समझ गये तो फिर हम इस के विषय में आगे बात करना जारी नहीं रखेंगे क्योंकि दुनिया में ज्ञान के कई प्रकारों का अध्ययन किया गया है और आपको स्वयं उनका अंतर करने में अपना समय देना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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