परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 141

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा ही मानवजाति के जीवन की अगुवाई की है। चाहे मानवजाति को आशीष देना हो, उन्हें व्यवस्था एवं अपनी आज्ञाओं को देना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियमों का अनुबंध करना हो, क्या आप सब जानते हैं कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का इच्छित लक्ष्य क्या है? पहला, क्या आप लोग निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह मानवजाति की भलाई के लिए है? (हाँ, हम कह सकते हैं।) आप सब सोच सकते हैं कि यह वाक्य अपेक्षाकृत व्यापक एवं खोखला है, किन्तु विशेष रूप से कहें, तो जो कुछ परमेश्वर करता है वह एक सामान्य जीवन जीने के प्रति मनुष्य की अगुवाई एवं मार्गदर्शन के लिए है। चाहे यह ऐसा है जिससे मनुष्य उसके नियमों को माने या उसकी व्यवस्था का पालन करे, तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का लक्ष्य है कि वह शैतान की आराधना न करे, और शैतान के द्वारा आहत न हो; यही मूलभूत बात है, और यह वही है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाओं एवं नियमों को लिया था और ऐसे प्रावधान किए थे जो प्रत्येक बोधगम्य पहलु को समेटता था। ये प्रावधान बहुत ही सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानवजाति को संजोता, पोषण करता और बहुत प्रेम करता है। क्या स्थिति ऐसी ही नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के कोई गुप्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह लक्ष्य सही एवं सकारात्मक है? (हाँ।) यह सकारात्मक है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर ने कौन कौन से प्रावधान किए हैं, उसके कार्य के दौरान उन सब का प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे मार्ग की अगुवाई करते हैं। अतः क्या परमेश्वर के मन में कोई आत्म-सेवी विचार चल रहे हैं? जहाँ मनुष्य की बात आती है तो क्या परमेश्वर के किसी प्रकार के अतिरिक्त उद्देश्य हैं, या क्या वह किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? बिलकुल भी नहीं। परमेश्वर जैसा कहता है वैसा करता है, और वह अपने हृदय में भी इसी तरह से सोचता है। इसमें कोई मिलावटी उद्देश्य नहीं है, कोई आत्म-सेवी विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता है, बल्कि निश्चित तौर पर बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के पूरी तरह से सब कुछ मनुष्य के लिए करता है। यद्यपि उसके पास मनुष्य के लिए योजनाएं एवं इरादे हैं, फिर भी वह खुद के लिए कुछ नहीं करता है। वह जो कुछ भी करता है उसे विशुद्ध रूप से मानवजाति के लिए, मानवजाति को बचाने के लिए, और मानवजाति को गुमराह होने से बचाने के लिए करता है। अतः क्या यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? (हाँ।) क्या आप इस बहुमूल्य हृदय का सूक्ष्म संकेत भी शैतान में देख सकते हैं? (नहीं।) क्या आप इसे देख सकते हैं? देख सकते हैं? आप शैतान में इसका एक भी संकेत नहीं देख सकते हैं। हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे प्राकृतिक रूप से प्रगट किया जाता है। जिस तरह से परमेश्वर कार्य करता है, उसे देखकर क्या लगता है, वह किस प्रकार कार्य करता है? क्या परमेश्वर जादू मन्त्र के सोने के छल्ले के समान इन व्यवस्थाओं एवं अपने वचनों को लेता है और प्रत्येक व्यक्ति के सिर पर कसकर बांध देता है, और इन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है।) (वह समझाता है और प्रोत्साहन देता है।) यह दूसरी बात हुई। कोई अन्य? क्या वह धमकाता है? क्या वह आपसे गोल मोल बात करता है? (नहीं।) जब आप सत्य को नहीं समझते हैं, तो परमेश्वर आपका मार्गदर्शन कैसे करे? (वह ज्योति चमकाता है।) ठीक है, वह आप पर एक ज्योति चमकाता है, आपको स्पष्ट रूप से बताता है कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, और आपको क्या करना चाहिए। अतः इन तरीकों से जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, आपको क्या महसूस होता है कि आपका परमेश्वर के साथ किस प्रकार का रिश्ता है? क्या वे आपको महसूस कराते हैं कि परमेश्वर आपकी समझ से परे है? (नहीं।) तो वे आपको कैसा महसूस कराते हैं? परमेश्वर विशेष रूप से आपके बहुत करीब है, आपके बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर आपकी अगुवाई करता है, जब वह आपको प्रदान करता है, आपकी सहायता करता है और आपको सहारा देता है, तो आप परमेश्वर के मिलनसार स्वभाव, एवं उसकी प्रतिष्ठा को महसूस करते हैं, और आप महसूस करते हैं कि वह कितना प्यारा है, और कितना स्नेही है। किन्तु जब परमेश्वर आपकी भ्रष्टता के लिए आपकी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए आपका न्याय करता है एवं आपको अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का उपयोग करता है? क्या वह शब्दों से आपकी भर्त्सना करता है? (हाँ।) क्या वह वातावरण एवं लोगों, मामलों, एवं चीज़ों के माध्यम से आपको अनुशासित करता है? (हाँ।) तो यह अनुशासन किस स्तर तक पंहुचता है? (उस स्तर तक जिसे मनुष्य सह सकता है।) क्या अनुशासन करने का उसका स्तर वहाँ तक पहुंचता है जहाँ शैतान मनुष्य को नुकसान पहुंचाता है? (नहीं।) परमेश्वर सौम्यता, प्रेम, कोमलता एवं सावधानी से कार्य करता है, ऐसा तरीका जो विशेष रूप से नपा-तुला और उचित है। उसका तरीका आप में तीव्र भावनाओं को उत्पन्न नहीं करता है, यह कहते हुए कि, "परमेश्वर इसे करने के लिए मुझे अनुमति नहीं देगा" या "इसे करने के लिए परमेश्वर को मुझे अनुमति देनी चाहिए" परमेश्वर आपको कभी भी उस किस्म की तीव्र मानसिकता या तीव्र भावनाएं नहीं देता है जो चीज़ों को असहनीय बना देती हैं। क्या स्थिति ऐसी ही नहीं है? (हाँ।) यहाँ तक कि जब आप न्याय एवं ताड़ना के विषय में परमेश्वर के वचनों को ग्रहण करते हैं, तब आप कैसा महसूस करते हैं? जब आप परमेश्वर के अधिकार एवं सामर्थ को महसूस करते हैं, तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या आप परमेश्वर की अनुलंघनीय ईश्वरीयता को महसूस करते हैं? (हाँ।) क्या आप इन समयों में परमेश्वर से दूरी महसूस करते हैं? क्या आपको परमेश्वर से भय महसूस होता है? (नहीं।) इसके बजाए, आप परमेश्वर के लिए भययुक्त सम्मान महसूस करते हैं। क्या लोग परमेश्वर के कार्य के कारण इन सब चीज़ों को महसूस करते हैं? (हाँ।) तो क्या उनके पास ये भावनाएं होती यदि शैतान मनुष्य पर काम करता? (नहीं।) परमेश्वर मनुष्य की निरन्तर आपूर्ति के लिए, एवं मनुष्य को सहारा देने के लिए अपने वचनों, अपनी सच्चाई एवं अपने जीवन का उपयोग करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य निराश होता है, तब परमेश्वर निश्चित तौर पर कठोरता से बात नहीं करता है, यह कहते हुए कि, "निराश मत हो। तुम निराश क्यों हो? तुम किसके लिए कमज़ोर हो? ऐसा क्या है जिसके विषय में तुम कमज़ोर हो? तुम कितने कमज़ोर हो, तुम मर भी सकते हो। तुम हमेशा इतने निराश रहते हो, जीने से क्या मतलब है? मर जाओ!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) पर क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) परमेश्वर के इस रीति से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार-तत्व, परमेश्वर की पवित्रता का सार-तत्व। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, और उसके द्वारा मनुष्य को संजोकर रखने और उसका पोषण करने को एक या दो वाक्य में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मनुष्य के डींग हांकने के द्वारा घटित होती है बल्कि यह ऐसी चीज़ है जिसे परमेश्वर वास्तविक तौर पर अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार-तत्व का प्रकाशन है। क्या ये सभी तरीके जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है वे मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता को देखने की अनुमति दे सकते हैं? इन सभी तरीकों में जिसके अंतर्गत परमेश्वर कार्य करता है, जिसमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिसमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर हासिल करना चाहता है, जिसमें विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिसमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, जिसे वह मनुष्य को समझाना चाहता है—क्या आपने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई दुष्टता या धूर्तता देखी है? (नहीं।) आप कोई दुष्टता नहीं देख सकते हैं, क्या आप देख सकते हैं? (नहीं।) अतः जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, साथ ही साथ परमेश्वर का सारा सार-तत्व जिसे वह प्रगट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या आपने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अब तक जिसके विषय में हमने बात की है, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते है? (हाँ।) वह सब कुछ जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, जिसमें परमेश्वर के वचन शामिल हैं, वे विभिन्न तरीके जिनके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को बताता है, वह जिसे परमेश्वर मनुष्य को स्मरण कराता है, वह जिसकी वह सलाह देता है एवं उत्साहित करता है, यह सब एक सार-तत्व से उत्पन्न होता है: यह सब परमेश्वर की पवित्रता से उत्पन्न होता है। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर नहीं होता, तो कोई मनुष्य उस कार्य को करने के लिए उसका स्थान नहीं ले सकता जिसे वह करता है। यदि परमेश्वर इन लोगों को लेता और पूरी तरह से इन्हें शैतान को सौंप देता, तो क्या आप सब ने कभी सोचा है कि आप में से वे लोग जो यहाँ पर उपस्थित हैं वे किस प्रकार की परिस्थिति में होते? क्या आप सब यहाँ सही सलामत और सुरक्षित बैठे होते? (नहीं।) तो आप किस के समान होते? क्या आप भी कहते: "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ"? क्या आप लोग ऐसे ही अकड़ते, ऐसे ही निर्लज्ज हो जाते और परमेश्वर के सामने बिना किसी शर्म के घमण्ड करते, और ऐसे ही गोल मोल बात करते? (हाँ।) हाँ, आप लोग करते। आप सब सौ प्रतिशत करते! आप लोग बिलकुल करते! मनुष्य के प्रति शैतान की मनोवृत्ति उन्हें यह देखने की अनुमति देती है कि शैतान का स्वभाव परमेश्वर से पूर्णतः अलग है। उसका सार-तत्व परमेश्वर से पूरी तरह से अलग है। शैतान का कौन सा सार-तत्व परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है? (उसकी दुष्टता।) शैतान का दुष्ट स्वभाव परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। अधिकांश लोग यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि परमेश्वर की यह अभिव्यक्ति परमेश्वर की पवित्रता के सार-तत्व को दर्शाती है? वह इसलिए क्योंकि वे शैतान के प्रभुत्व के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के अंतर्गत, और शैतान के समकालीन घेरे के भीतर रहते हैं। वे नहीं जानते हैं पवित्रता क्या है, या यह नहीं जानते हैं कि पवित्रता को कैसे परिभाषित करें। परमेश्वर की पवित्रता का एहसास कर लेने के बावजूद, आप किसी निश्चय के साथ परमेश्वर की पवित्रता के रूप में इसे परिभाषित नहीं कर सकते हैं। यह परमेश्वर की पवित्रता के विषय में मनुष्य की पहचान की असमानता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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