परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 135

कोई भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है

तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रियता से या निष्क्रियता से उसकी संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार अपने जीवन के पथक्रम में संघर्ष करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितने टेढ़े-मेढ़े पथों पर चलता है, क्योंकि अंत में वह नियति की परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा जिसे सृष्टिकर्ता ने उस पुरुष या स्त्री के लिए चिन्हित किया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह रीति है जिसके तहत उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण एवं शासन करता है। यह वही अजेयता है, एवं यह नियन्त्रण एवं शासन का वही रूप है, जो उन नियमों के लिए ज़िम्मेदार है जो सभी प्राणियों के जीवन को नियन्त्रित करते हैं, जो मनुष्यों को अनुमति देते हैं कि वे बिना किसी हस्तक्षेप के बार बार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाएं, जो इस संसार को लगातार घुमाते रहते हैं और दिन ब दिन एवं साल दर साल आगे बढ़ते रहते हैं। तुमने इन सभी तथ्यों को देखा है और तुम उन्हें समझते हो, चाहे सतही तौर पर या गहराई से; तुम्हारी समझ की गहराई सत्य के विषय में तुम्हारे अनुभव एवं ज्ञान के ऊपर, और परमेश्वर के विषय में तुम्हारे ज्ञान पर निर्भर होती है। तुम सत्य की वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुमने परमेश्वर के वचन का कितना अनुभव किया है, तुम परमेश्वर की हस्ती एवं उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—यह परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों के विषय में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करता है। क्या परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ाम इस बात पर निर्भर हैं कि मानव प्राणी उसके अधीन होते हैं या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है उसे इस बात के द्वारा निर्धारित किया जाता है कि मानवता उसके अधीन होती है या नहीं? परिस्थितियों की परवाह किए बगैर परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में है; परमेश्वर सभी परिस्थितियों में अपने विचारों एवं अपनी इच्छाओं की अनुरूपता में प्रत्येक मानव की नियति एवं सभी प्राणियों का नियन्त्रण एवं इंतज़ाम करता है। मनुष्यों के बदलने के कारण यह नहीं बदलेगा, और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र है, और समय, अंतरिक्ष, एवं भूगोल में परिवर्तनों के द्वारा इसे बदला नहीं जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार ही उसकी हस्ती है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने एवं स्वीकार करने के योग्य है या नहीं, और चाहे मनुष्य इसके अधीन होने के योग्य है या नहीं, यह मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को ज़रा सा भी नहीं बदलता है। दूसरे शब्दों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति क्या मनोवृत्ति अपनाता है, क्योंकि यह साधारण तौर पर इस तथ्य को बदल नहीं सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति एवं सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है। भले ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं हो, फिर भी वह अब भी तुम्हारी नियति को निर्धारित करता है; भले ही तुम उसकी संप्रभुता को नहीं जान सकते हो, फिर भी उसका अधिकार अब भी अस्तित्व में है। परमेश्वर का अधिकार और मानव की नियति के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र हैं, वे मनुष्य की इच्छा एवं चुनावों की अनुरूपता में बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। स्वर्ग और पृथ्वी भले ही टल जाएँ, उसका अधिकार कभी नहीं टलता, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसके अधिकार को लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, एवं अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं किया जाता है। सभी समयों पर परमेश्वर अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी सामर्थ्य को दिखाता है, और हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को लगातार करता रहता है; सभी समयों पर वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, जैसा उसने हमेशा से किया था। इसे कोई बदल नहीं सकता है। यह एक तथ्य है; यह अति प्राचीन काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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