परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 132

अय्यूब के जीवन के उद्यमों एवं उपलब्धियों ने उसे शान्तिपूर्वक मृत्यु का सामना करने की अनुमति दी

पवित्र शास्त्र में अय्यूब के विषय में ऐसा लिखा हुआ हैः "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। इसका अर्थ है कि जब अय्यूब की मृत्यु हुई, उसे कोई पछतावा नहीं था और उसने किसी तकलीफ का एहसास नहीं किया, परन्तु प्राकृतिक रुप से इस संसार से चला गया। जैसा हर कोई जानता है, अय्यूब ऐसा इंसान था जो परमेश्वर से डरता था और बुराई से दूर रहता था जब वह जीवित था; परमेश्वर ने उसके धार्मिकता के कार्यों की सराहना की थी, लोगों ने उन्हें स्मरण रखा, और उसका जीवन किसी भी इंसान से बढ़कर अहमियत एवं महत्व रखता था। अय्यूब ने परमेश्वर की आशीषों का आनन्द लिया और उसे पृथ्वी पर उसके द्वारा धर्मी कहा गया, और साथ ही परमेश्वर के द्वारा उसे परखा गया और शैतान के द्वारा उसकी परीक्षा भी ली गई; वह परमेश्वर का गवाह बना रहा और वह धर्मी पुरुष कहलाने के योग्य था। परमेश्वर के द्वारा परखे जाने के बाद कई दशकों के दौरान, उसने ऐसा जीवन बिताया जो पहले से कहीं अधिक बहुमूल्य, अर्थपूर्ण, स्थिर, एवं शान्तिपूर्ण था। उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर ने उसे परखा था; उसकी धार्मिकता के कार्यों के कारण, परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और सीधे उससे बात की। अतः, उसके परखे जाने के बाद के वर्षों के दौरान अय्यूब ने जीवन के मूल्यों को और अधिक ठोस तरीके से समझाऔर उसकी सराहना की थी, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की और अधिक गहरी समझ प्राप्त की थी, और किस प्रकार सृष्टिकर्ता अपनी आशीषों को देता एवं वापस लेता है इसके विषय में और अधिक सटीक एवं निश्चित ज्ञान हासिल किया था। बाईबिल में दर्ज है कि यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आशीषें प्रदान की थीं, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए एवं शान्ति से मृत्यु का सामना करने के लिए उसने अय्यूब को और भी बेहतर स्थिति में रखा था। इसलिएअय्यूब, जब वृद्ध हुआ और मृत्यु का सामना किया, तो वह निश्चित रूप से अपनी सम्पत्ति के विषय में चिंतित नहीं हुआ होगा। उसे कोई चिन्ता न थी, कुछ पछतावा नहीं था, और वास्तव में वह मृत्यु से भयभीत नहीं था; क्योंकि उसने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर का भय मानते हुए, बुराई से दूर रहते हुए बिताया था, और अपने स्वयं के अन्त के बारे में चिन्ता करने का कोई कारण नहीं था। आज कितने लोग हैं जो अय्यूब के सभी मार्गों के अनुसार कार्य कर सकते हैं जब उसने अपनी मृत्यु का सामना किया था? कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के सरल बाह्य व्यवहार को बनाए रखने रखने के योग्य क्यों नहीं है? केवल एक ही कारण हैः अय्यूब ने अपना जीवन परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति विश्वास, पहचान, एवं समर्पण के आत्मनिष्ठ उद्यम (अनुसरण) में बिताया था, और यह इस विश्वास, पहचान एवं समर्पण के साथ था कि उसने अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को उत्तीर्ण किया था, औरअपने जीवन के अंतिम घटनाक्रम का अभिनन्दन किया था। इसके बावजूद कि अय्यूब ने जो कुछ अनुभव किया, जीवन में उसकेउद्यम (अनुसरण) एवं लक्ष्य खुशगवार थे, न कि कष्टपूर्ण। अय्यूब आनन्दित था न केवल उन आशीषों या सराहनाओं के कारण जिन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा उसे प्रदान किया गया था, किन्तु अधिक महत्वपूर्ण रूप से, अपने उद्यमों (अनुसरण) एवं जीवन के लक्ष्यों के कारण, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के क्रमिक ज्ञान एवं सही समझ के कारण जिन्हें उसने परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के माध्यम से अर्जित किया था, और इससे अतिरिक्त, उसके अद्भुत कार्यों के कारण जिन्हें अय्यूब ने सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के प्रति एक अधीनस्थ व्यक्ति के रूप में अपने समय के दौरान व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया था, और मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच सह-अस्तित्व, जान-पहचान, एवं परस्पर समझ के सरगर्म एवं अविस्मरणीय अनुभवों एवं यादों के कारण; उस राहत एवं प्रसन्नता के कारण जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को जानने से आई थी; उस परम आदर के कारण जो यह देखने से बाद उभरा कि वह कितना महान, अद्भुत, प्रेमी एवं विश्वासयोग्य है। वह कारण कि अय्यूब बिना किसी कष्ट के अपनी मृत्यु का सामना करने के योग्य हो पाया वह यह था क्योंकि वह जानता था कि, मरने पर, वह सृष्टिकर्ता के पास वापस लौट जाएगा। और जीवन में यही उसका उद्यम एवं उपलब्धि थी जिसने उसे शान्ति से मृत्यु का सामना करने, सृष्टिकर्ता के द्वारा उसके जीवन को वापस लेने की सम्भावना का स्थिर हृदय के साथ सामना करने, और इसके अतिरिक्त, शुद्ध एवं चिंतामुक्त होकर, सृष्टिकर्ता के सामने खड़े होने की अनुमति दी थी। क्या आजकल लोग उस प्रकार की प्रसन्नता को हासिल कर सकते हैं जो अय्यूब के पास थी? क्या तुम सब स्वयं ऐसा करने के स्थिति में हो? जबकि लोग आजकल ऐसा करने की स्थिति में होते हैं, फिर भी वे अय्यूब के समान खुशी से जीवन बिताने में असमर्थ क्यों हैं? वे मृत्यु के भय के कष्ट से बच निकलने में असमर्थ क्यों हैं? मृत्यु का सामना करते समय, कुछ पसीने से भीग जाते हैं; कुछ कांपते, मूर्छित होते, तथा स्वर्ग एवं मनुष्य के विरुद्ध समान रूप से तीखे शब्दों से हमला करते हैं, और यहाँ तक कि रोते एवं विलाप करते हैं। ये किसी भी तरह से अचानक होनेवाली प्रतिक्रियाएं नहीं हैं जो तब घटित होती हैं जब मृत्यु नज़दीक आ जाती है। लोग मुख्यत: ऐसे शर्मनाक तरीकों से व्यवहार करते हैं क्योंकि, अपने हृदय की गहराई में वे मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उनके पास परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों के विषय में स्पष्ट ज्ञान एवं समझ नहीं है, और सही मायने में वे उनके अधीन तो बिलकुल भी नहीं होते हैं; क्योंकि लोगों को स्वयं ही हर चीज़ का इंतज़ाम एवं शासन करने, अपनी नियति, अपने जीवन एवं मृत्यु का नियन्त्रण करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग कभी मृत्यु के भय से बचने में समर्थ नहीं होते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

Only Those Who Revere God Are Happy

I

There lived a righteous man named Job, who always feared God and always shunned evil, his deeds praised by God, remembered by man. Job’s life had meaning, Job’s life had worth. Job was blessed by God, but he also was tested by Satan and tried by God. As he stood witness for God he feared, he deserved to be called a righteous man. Regardless of what Job had been through, his life was happy, there was no pain. Job was happy not only because he was blessed or commended by God, but also because of his pursuit, ’cause he pursued the reverence of God. Job was happy.

II

In the few decades after Job was tried, his life was more grounded and meaningful. He pursued belief and recognition and also submission to God’s sovereignty. All important junctures in Job’s life were marked by these pursuits and goals. With them he lived out his last years in peace, and greeted the end with happiness. Regardless of what Job had been through, his life was happy, there was no pain. Job was happy not only because he was blessed or commended by God, but also because of his pursuit, ’cause he pursued the reverence of God. Job was happy.

III

In seeking to fear God and to shun evil, Job had come to know God’s sovereignty. And in his experience of it, he realized how wondrous the Creator’s deeds were. Job was happy because of his association with God, his acquaintance with God, and the understanding between him and God. Job was happy. Job was happy not only because he was blessed or commended by God, but also because of his pursuit, ’cause he pursued the reverence of God. Job was happy. Job was happy because of the comfort and joy that came from knowing the Creator’s will, because of his fear after seeing how great, wondrous, lovable, and faithful God is. Job was happy.

from Follow the Lamb and Sing New Songs

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