परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 130

एक ऐसा जीवन जो प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की तलाश करते हुए गुज़रा है मृत्यु का सामना होने पर उसे नुकसान होगा

सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं पूर्वनिर्धारण के कारण, एक अकेला आत्मा जिसने शून्य से आरम्भ किया था वह परिवार एवं माता पिता को प्राप्त करता है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का मौका प्राप्त करता है, मानव जीवन का अनुभव करने एवं इस संसार को देखने का मौका प्राप्त करता है; और साथ ही यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का भी अनुभव करने का मौका प्राप्त करता है, जिससे सृष्टिकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जान सके, और सबसे बढ़कर, सृष्टिकर्ता के अधिकार को जान सके एवं उसके अधीन हो सके। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ एवं क्षणिक अवसर को लपक नहीं पाते हैं। कोई व्यक्ति नियति के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को गवां देता है, अपने परिवार को खिलाने पिलाने की कोशिश करते हुए और धन-सम्पत्ति एवं हैसियत के बीच झूलते हुए अपना सारा समय बिता देता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें लोग संजोकर रखते हैं वह परिवार, पैसा एवं प्रसिद्धि है; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपनी नियति के विषय में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि इसे जांचना एवं समझना अति महत्वपूर्ण हैः मनुष्य जीवित क्यों है, उसे कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य व अर्थ क्या है। उनका सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वहसिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए शीघ्रता से गुज़र जाता है, तब तक जब तक कि उनकी युवा अवस्था चली नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते एवं उनकी त्वचा में झुर्रियां नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे देख नहीं लेते हैं कि प्रसिद्धि व सौभाय किसी का बुढ़ापा आने से रोक नहीं सकते, यह कि धन हृदय के खालीपन को भर नहीं सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी एवं मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि जो कुछ नियति ने संजोकर रखा हैं कोई उससे बच नहीं सकता है। जब उन्हें जीवन के अंतिम घटनाक्रम का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है केवल तभी वे सचमुच समझ पाते हैं कि चाहे कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाए, भले ही किसी को विशेषाधिकार प्राप्त हो व ऊंचे पद पर हो, कोई भी मृत्यु से नहीं बच सकता, प्रत्येक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा: एक अकेला आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है। जब किसी व्यक्ति के पास माता पिता होते हैं, तो वह सोचता है कि उसके माता पिता ही सब कुछ हैं; जब किसी व्यक्ति के पास सम्पत्ति होती है, तो वह सोचता है कि पैसा ही उसका मुख्य आधार है, यही उसके जीवन की सम्पत्ति है; जब लोगों के पास हैसियत होती है, तो वे उससे मज़बूती से चिपक जाते हैं और इसके लिए अपने जीवन को भी जोखिम में डाल देते हैं। जब लोग इस संसार को छोड़कर जाने लगते हैं केवल तभी वे यह सोचते हैं कि जिन चीज़ों का अनुसरण करते हुए उन्होंने अपने जीवन को बिताया है वे और कुछ नहीं बल्कि क्षणभंगुर बादल हैं, वे उनमें से किसी को भी थामे नहीं रह सकते हैं, वे उनमें से किसी को भी अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं, उनमें से कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता है, उनमें से कोई भी उस आत्मा की वापसी यात्रा में उस अकेले आत्मा का साथ एवं सांत्वना नहीं दे सकता है; और इतना ही नहीं, उनमें से कोई भी किसी व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकता, एवं मृत्यु से पार जाने की अनुमति नहीं दे सकता है। प्रसिद्धि एवं सौभाग्य जिन्हें कोई व्यक्ति इस भौतिक संसार में हासिल करता है, वे उसे अल्पकालीन संतुष्टि, थोड़े समय का आनन्द, एवं सुकून का एक झूठा एहसास प्रदान करते हैं, और उसे उसके मार्ग से भटका देते हैं। और इस प्रकार लोग, जब वे मानवता के इस विशाल समुद्र में हाथ पैर मारते हैं, शान्ति, आराम, एवं हृदय की निश्चलता की लालसा करते हैं, तो वे लहरों के नीचे बार बार डूबते जाते हैं। जब लोगों ने अभी तक उन प्रश्नों का पता नहीं लगाया है जिन्हें समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है—वे कहाँ से आते हैं, वे जीवित क्यों हैं, वे कहाँ जा रहे हैं, इत्यादि—वे प्रसिद्धि एवं सौभाग्य के द्वारा मोहित हो जाते हैं, गुमराह हो जाते हैं, उनके द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं और अंततः हमेशा के लिए खो जाते हैं। समय उड़ जाता हैः पलक झपकते ही वर्ष बीत जाते हैं, इससे पहले कि कोई इसका एहसास करता है, वह अपने जीवन के उत्तम वर्षों को अलविदा कह चुका होता है। जब कोई व्यक्ति जल्द ही संसार से जाने वाला होता है, तो वह आहिस्ता आहिस्ता इस एहसास की ओर पहुँचता है कि संसार में हर एक चीज़ दूर हो रही है, यह कि वह उन चीज़ों को थामे नहीं रह सकता है जो उसके अधिकार में थी; तब वह सचमुच में महसूस करता है कि अब उससे पास कुछ भी नहीं है, एक रोते हुए शिशु के समान जो अभी अभी इस संसार में आया है। इस मुकाम पर, कोई व्यक्ति इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है कि उसने जीवन में क्या किया है, जीवित रहने का मूल्य क्या है, इसका अर्थ क्या है, वह इस संसार में क्यों आया है; इस मुकाम पर, वह और भी अधिक जानना चाहता है कि वास्तव में मरने के बाद कोई जीवन है या नहीं, स्वर्ग वास्तव में है या नहीं, वास्तव में गुनाहों की सज़ा है या नहीं...। जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो वह और भी अधिक यह समझना चाहता है कि वास्तव में जीवन किस के विषय में है; जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो उसका हृदय और भी अधिक खाली महसूस होता है, जब कोई व्यक्ति मृत्यु के और नज़दीक आता है, तो वह और भी अधिक असहाय महसूस करता है; और इस प्रकार मृत्यु के विषय में उसका भय दिन ब दिन बढ़ता ही जाता है। जब मृत्यु नज़दीक आने लगती है तो मनुष्य इस तरह व्यवहार क्यों करता है, इसके दो कारण हैं: पहला, वे अपनी प्रसिद्धि एवं सम्पत्ति को खोने वाले हैं जिन पर उनका जीवन आधारित था, वे हर उस चीज़ को पीछे छोड़ने वाले हैं जो इस संसार में दृश्यमान है; और दूसरा, वे बिलकुल अकेले ही एक अनजाने संसार, एक रहस्मयी एवं अज्ञात आयाम का सामना करने वाले हैं जहाँ वे कदम रखने से भयभीत होते हैं, जहाँ उनके पास कोई प्रिय जन नहीं है और किसी भी प्रकार की सहायता नहीं है। इन दो कारणों से, हर एक व्यक्ति जो मृत्यु का सामना करता है वह बेचैनी महसूस करता है, अत्यंत भय एवं लाचारी के एहसास का अनुभव करता है जिनको उन्होंने पहले कभी नहीं जाना था। जब लोग वास्तव में इस मुकाम पर पहुंचते हैं केवल तभी वे महसूस करते हैं कि पहली बात जो उन्हें समझनी चाहिये, जब कोई इस पृथ्वी पर कदम रखता है, वह है कि मानव कहाँ से आया है, लोग जीवित क्यों हैं, मानव की नियति को कौन नियन्त्रित करता है, कौन मानव के अस्तित्व के लिए आपूर्ति करता है और किसके पास उसके अस्तित्व के ऊपर संप्रभुता है। ये जीवन में वास्तविक सम्पत्तियां हैं, मानव के जीवित बचे रहने के लिए आवश्यक आधार हैं, यह सीखना नहीं है कि किस प्रकार अपने परिवार की आपूर्ति करें या किस प्रकार प्रसिद्धि एवं धन-सम्पत्ति प्राप्त करें, यह सीखना नहीं है कि किस प्रकार भीड़ से अलग दिखें या किस प्रकार और भी अधिक समृद्ध जीवन बिताएं, और यह सीखना तो बिलकुल नहीं कि किस प्रकार दूसरों से आगे बढ़ें और उनके विरुद्ध सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करें। हालाँकि जीवित रहने के लिये विभिन्न कुशलताएं जिन पर महारत हासिल करने के लिए लोग अपना जीवन खर्च कर देते हैं वे भरपूर भौतिक सुख सुविधाएं दे सकते हैं, फिर भी वे किसी मनुष्य के हृदय में सच्ची शान्ति एवं सांत्वना नहीं ला सकते हैं, परन्तु इसके बदले वे लोगों को निरन्तर उनकी दिशा से भटका देते हैं, उन्हें अपने आप पर नियन्त्रण करने में कठिनाई होती है, वे जीवन का अर्थ सीखने के लिए हर अवसर को खो देते हैं; और किस प्रकार उचित रीति से मृत्यु का सामना करें इसके विषय में वे परेशानी की एक नकारात्मक एवं गुप्त भावना पैदा कर लेते हैं। इस प्रकार, लोगों की ज़िन्दगियां बर्बाद हो जाती हैं। सृष्टिकर्ता प्रत्येक से उचित रीति से व्यवहार करता है, हर एक को जीवन भर के अवसर प्रदान करता है कि वे उसकी संप्रभुता का अनुभव करें एवं उसे जानें, फिर भी, जब मृत्यु नज़दीक आती है, जब मृत्यु का संकट उसके ऊपर लटकने लगता है, केवल तभी वह उस रोशनी को देखना प्रारम्भ करता है—और तब बहुत देर हो जाती है।

लोग धन-दौलत एवं प्रसिद्धि का पीछा करते हुए अपनी ज़िन्दगियों को बिता देते हैं; वे इन तिनकों को मज़बूती से पकड़े रहते हैं, यह सोचते हुए कि वे उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है, मानों उन्हें प्राप्त करने के द्वारा वे निरन्तर जीवित रह सकते हैं, और अपने आपको मृत्यु से बचा सकते हैं। परन्तु जब वे मरने के करीब होते हैं केवल तभी उनको महसूस होता है कि ये चीज़ें उनसे कितनी दूर हैं, वे मृत्यु का सामना होने पर कितने कमज़ोर हैं, वे कितनी आसानी से बिखर सकते हैं, वे कितने अकेले एवं असहाय हैं, और सहायता के लिए कहीं नहीं जा सकते हैं। वे एहसास करते हैं कि जीवन धन दौलत एवं प्रसिद्धि से खरीदा नहीं जा सकता है, यह कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति कितना धनी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उस पुरुष एवं स्त्री का पद कितना ऊंचा है, क्योंकि मृत्यु का सामना होने पर सभी लोग समान रूप से कंगाल एवं महत्वहीन होते हैं। वे एहसास करते हैं कि धन-दौलत जीवन को खरीद नहीं सकती, प्रसिद्धि मृत्यु को मिटा नहीं सकती, यह कि न धन-दौलत और न ही प्रसिद्धि किसी व्यक्ति के जीवन को एक मिनट, या एक पल के लिए भी बढ़ा सकती है। जितना अधिक लोग इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे निरन्तर जीवित रहने की लालसा करते हैं; जितना अधिक लोग इस प्रकार से सोचते हैं, उतना ही अधिक वे मृत्यु के आगमन से भयभीत होते हैं। केवल इसी मुकाम पर वे सचमुच में एहसास करते हैं कि उनका जीवन उनसे सम्बन्धित नहीं है, उनके नियन्त्रण में नहीं है, और कोई यह नहीं कह सकता है कि वह जीवित रहेगा या मर जाएगा, यह सब उसके नियन्त्रण से बाहर होता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 158

शैतान के मामले में भी विशेष व्याख्या की आवश्यकता है जो मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक प्रवृत्तियों का लाभ उठाता है। इन सामाजिक...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 128

केवल वे ही सच्ची स्वतन्त्रता हासिल कर सकते हैं जो सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन हो जाते हैं क्योंकि लोग सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 101

परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ का प्रतीक है? क्या वह...