परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 115

(योना 3) तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा: "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्‍ट होने से बच जाएँ।" जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

नीनवे के लोगों के हृदयों में सच्चे पश्चाताप से उन्होंने परमेश्वर की दया को प्राप्त किया और उस ने उनके अंत को बदल दिया

क्या वहां परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके क्रोध के बीच कोई परस्पर विरोध था? नहीं, बिलकुल भी नहीं! यह इसलिए है क्योंकि उस विशेष समय पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। इसका कारण क्या हो सकता है? यह वह है जिसे बाईबिल में दिया गया है: "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फ़िर गया," और "अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।"

यह "कुमार्ग" कुछ मुटठीभर बुरे कार्यों की और संकेत नहीं करता है, परन्तु लोगों के व्यवहार के पीछे पाए जाने वाले बुरे स्रोत की और संकेत करता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाना" इसका अर्थ है कि जिन पर सन्देह है वे कभी भी इन कार्यों को दोबारा नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे पुन: इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; वह तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और उनके कार्यों का सिद्धान्त सब बदल चुका है; वे अपने हृदय में आनन्द और प्रसन्नता को लाने के लिए पुनः उन तरीकों और सिद्धान्तों का उपयोग कभी नहीं करेंगे। "हाथों के उपद्रव को त्याग देना" में "त्याग देना" का अर्थ है नीचे रख देना या छोड़ देना, बीते कल से पूर्ण रूप से नाता तोड़ देना और उस ओर कभी न फिरना। जब नीनवे के लोगों ने अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग दिया, तो इसने उनके सच्चे पश्चाताप को प्रमाणित और साथ ही साथ प्रदर्शित भी किया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप और साथ ही साथ उनके हृदय का भी अवलोकन करता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के हृदयों में बिना किसी सन्देह के सच्चे पश्चाताप को देखा और साथ ही यह अवलोकन भी किया कि वे अपने कुमार्ग से फिर गए थे और हाथों के उपद्रव को त्याग दिया था, तो उसने अपना मन बदल लिया। कहने का तात्पर्य है कि इन लोगों के चालचलन, व्यवहार और कार्य करने के विभिन्न तरीकों ने, साथ ही साथ उनके हृदय के सच्चे अंगीकार और पापों के पश्चाताप ने, परमेश्वर को प्रेरित किया कि वह अपने मन को बदल दे, अपने इरादों को बदल दे, अपने निर्णय को वापस ले ले, और उन्हें दण्ड न दे या नष्ट न करे। इस प्रकार, नीनवे के लोगों ने एक अलग अंत को प्राप्त किया। उन्होंने अपने जीवन को छुड़ाया और उसी समय परमेश्वर की दया और करुणा को जीत लिया, इस बिन्दु पर परमेश्वर ने भी अपने क्रोध को वापस ले लिया।

परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता दुर्लभ नहीं है—मनुष्य का सच्चा पश्चाताप दुर्लभ है

इसके बावजूद कि परमेश्वर नीनवे के लोगों से कितना क्रोधित था, ज्यों ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, त्यों ही उसका हृदय धीरे-धीरे कोमल होता गया, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने उनके लिए घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—अपने पापों के निमित्त उनके अंगीकार और पश्चाताप के कुछ समय पहले—परमेश्वर तब भी उन से क्रोधित था। जब एक बार वे पश्चाताप के कार्यों की एक श्रृंखला से होकर गुज़र गए, तो नीनवे के लोगों के निमित्त परमेश्वर का क्रोध धीरे धीरे उनके लिए दया और सहनशीलता में रूपान्तरित हो गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दोनों पहलुओं के प्रकाशन को एक साथ मिलने के विषय में कोई विरोधाभास नहीं है। किसी व्यक्ति को विरोधाभास की इस कमी को कैसे समझना और जानना चाहिए? चूंकि नीनवे के लोगों ने पश्चाताप किया तो परमेश्वर ने सफलतापूर्वक इन दोनों ध्रुवीय-विपरीत हस्तियों को प्रकट और प्रकाशित किया, जिसने लोगों को परमेश्वर की हस्ती की यथार्थता और उसके उल्लंघन न किए जा सकनेवाले गुण को देखने की अनुमति दी। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपनी मनोवृत्ति का उपयोग किया: ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बर्दाश्त नहीं करता है, या वह उन पर दया करना नहीं चाहता है; यह ऐसा है कि वे कभी कभार ही परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप करते हैं, और ऐसा कभी कभार ही होता है कि लोग सचमुच में अपने कुमार्ग से फिरते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्यागते हैं। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित हो जाता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सचमुच में पश्चाताप करने में समर्थ होगा, और वह मनुष्य के सच्चे पश्चाताप को देखना चाहता है, ऐसी दशा में तब वह उदारता से मनुष्य को अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा चालचलन परमेश्वर के क्रोध को उनके ऊपर लाता है, जबकि परमेश्वर की दया और करुणा को उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो परमेश्वर को ध्यान से सुनते हैं और सचमुच में उसके सम्मुख सच्चा पश्चाताप करते हैं, और इसे उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो अपने कुमार्ग से फिर जाते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग कर देते हैं। नीनवे के लोगों के उपचार में परमेश्वर की मनोवृत्ति को बिलकुल साफ साफ प्रकाशित किया गया है: परमेश्वर की दया और सहनशीलता को प्राप्त करना बिलकुल भी कठिन नहीं है; वह एक व्यक्ति से सच्चे पश्चाताप की अपेक्षा करता है। जब तक लोग अपने कुमार्गों से परे रहते हैं और अपने हाथों से उपद्रव करना त्याग देते हैं, परमेश्वर उनके प्रति अपने हृदय और अपनी मनोवृत्ति को बदलेगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 154

शैतान ज्ञान को एक चारे के तौर पर इस्तेमाल करता है। ध्यान से सुनें: यह बस एक प्रकार का चारा है। लोगों को लुभाया जाता है कि "कठिन अध्ययन करें...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 119

पांच प्रकार के लोग फिलहाल के लिए, मैं परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के विषय में हमारी सभा को यहीं छोडूंगा। आगे मैं परमेश्वर के अनुयायियों को...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 106

(उत्पत्ति 19:1-11) साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिये उठा, और मुँह...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 137

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के एप्स डाउनलोड करने के लिए आपका स्वागत है। परमेश्वर को अपने अद्वितीय स्वामी के रूप में स्वीकार करना...