परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 107

हालाँकि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य से छिपा हुआ और अज्ञात है, फिर भी यह किसी अपराध को नहीं सहता है

समस्त मूर्ख और अबोध मानवता के प्रति परमेश्वर का उपचार मुख्य रूप से दया और सहनशीलता पर आधारित है। दूसरी ओर, उसका क्रोध समय और चीज़ों के अति विशाल पैमाने में छिपा हुआ है; मनुष्य इससे अनजान है। परिणामस्वरूप, यह मनुष्य के लिए कठिन है कि वह परमेश्वर को उसका क्रोध प्रदर्शित करते हुए देखे, और साथ ही उसके क्रोध को समझना भी कठिन है। जैसा कहा जा चुका है, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को हल्के में लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के अंतिम कार्य और सहनशीलता के कदम और मनुष्य की क्षमा का सामना करता है—अर्थात्, जब परमेश्वर की दया का अंतिम उदाहरण और उसकी अंतिम चेतावनी उनके पास पहुँचती है—यदि वे तब भी परमेश्वर का विरोध करने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और पश्चाताप करने, अपने मार्गों को सुधारने या उसकी दया को स्वीकार करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं, तो परमेश्वर आगे से उनको अपनी सहनशीलता और धैर्य प्रदान नहीं करेगा। इसके विपरीत, यह वह समय है जब परमेश्वर अपनी दया को वापस ले लेगा। इसके पश्चात्, वह बस अपने क्रोध को प्रकट करेगा। वह अलग अलग तरीकों से अपने क्रोध को प्रकट कर सकता है, बिलकुल वैसे ही जैसे वह लोगों को दण्ड देने और नष्ट करने के लिए अलग अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।

सदोम नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल करना मानवता और किसी जीव को सम्पूर्ण रीति से विनाश करने के लिए उसकी शीघ्रतम पद्धति है। सदोम के लोगों को जलाना उनकी शरीरिक देहों को नष्ट करने से कहीं अधिक था; इसने पूरी तरह से उनके आत्माओं, उनके प्राणों और उनके शरीरों को नष्ट कर दिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि इस नगर के भीतर के लोग भौतिक संसार और मनुष्य के लिए अदृश्य संसार में अस्तित्व में नहीं रहेंगे। यह एक तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध को दर्शाता और प्रकट करता है। इस तरह का प्रकाशन और प्रदर्शन परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक तत्व का एक पहलू है, बिलकुल वैसे ही जैसे यह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आवश्यक तत्व भी है। जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तो वह दया या करुणा प्रकट करना बन्द कर देता है, न ही वह कोई सहनशीलता या धैर्य प्रदर्शित करता है; तब कोई ऐसा व्यक्ति, वस्तु या कारण नहीं है जो उसे निरन्तर धीरज धरने, फिर से दया करने, और एक बार फिर से अपनी सहनशीलता को प्रकट करने के लिए रज़ामंद कर सकता है। इन चीज़ों के बदले में, बिना एक पल के संकोच के, परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को प्रकट करेगा, जो कुछ वह चाहता है उसे करेगा, और वह इन चीज़ों को अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुरूप शीघ्रता से और साफ सुथरे तरीके से करेगा। यह वह तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को प्रकट करता है, जिसे मनुष्य को ठेस नहीं पहुंचना चाहिए, और साथ ही यह उसके धर्मी स्वभाव के एक पहलू का प्रकटीकरण भी है। जब लोग परमेश्वर को मनुष्य के प्रति चिंता करते और प्रेम दिखाते हुए देखते हैं, तो वे उसके क्रोध का पता लगाने में, उसके प्रताप का एहसास करने में या गुनाह के प्रति उसकी असहनशीलता का एहसास करने में असमर्थ होते हैं। इन चीज़ों ने हमेशा से यह विश्वास करने में लोगों की अगुवाई की है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव केवल दया, सहनशीलता और प्रेम है। फिर भी, जब कोई परमेश्वर को किसी नगर का विनाश करते हुए या मानवता को तुच्छ जानते हुए देखता है, तो मनुष्य के विनाश में उसका क्रोध और उसका प्रताप लोगों को उसके धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष की झलक देखने की अनुमति देता है। यह गुनाह के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता है। परमेश्वर का स्वभाव जो किसी गुनाह को सहन नहीं करता है वह किसी भी सृजे गए प्राणी की कल्पना से परे है, और न सृजे गए प्राणियों में से, कोई भी उसके साथ दखलंदाज़ी करने या उसको प्रभावित करने में सक्षम नहीं है; और उससे भी बढ़कर, इसका भेष धारण या इसका अनुकरण नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर के स्वभाव का यह पहलू ऐसा है जिसे मानवता को बहुत अच्छे से जानना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का स्वभाव है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के स्वभाव को धारण करता है। परमेश्वर इस प्रकार के धर्मी स्वभाव को धारण करता है क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहीपन और शैतान के बुरे कार्यों से घृणा करता है—मानवजाति को भ्रष्ट करना और निगल जाना—इसलिए क्योंकि वह अपने विरुद्ध पाप के सारे कार्यों से घृणा करता है और अपने पवित्र और बेदाग हस्ती के कारण। यह इसी लिए है क्योंकि वह किसी भी सृजे गए प्राणी या न सृजे गए प्राणी को उसका खुलकर विरोध करने या उससे मुकाबला करने की अनुमति नहीं देगा। यहाँ तक कि एक व्यक्ति भी जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई थी या किसी आवश्यकता की पूर्ति की थी वह सिर्फ उसके स्वभाव को क्रोधित करता है और उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धान्त का उल्लंधन करता है, और वह थोड़ी सी भी दया या संकोच के बगैर अपने धर्मी स्वभाव को जारी और प्रकट करेगा—ऐसा स्वभाव जो गुनाह को बर्दाश्त नहीं करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर का स्वभाव अपमान सहता नहीं

I

मानवता को पहले जानना चाहिए स्वभाव को जो सिर्फ है परमेश्वर के पास। यानि कि, कोई गुनाह न सहना। न कोई दे सके दखल, न प्रभावित कर सके। ये सबकी कल्पना से परे है, न प्रतिरूपित हो सके, न नकल की जा सके। परमेश्वर किसी को भी नहीं सहेगा जो उसका खुलकर विरोध करे, चाहे हों वे सृजे हुये प्राणी या न हों, चाहे हों चुनिन्दा या दया के पात्र हों। एक बार वे उसके स्वभाव को जब क्रोधित करें, या तोड़े उसके धैर्य के सिद्धान्त को, परमेश्वर प्रकट करेगा अपना स्वभाव, जो धार्मिक है, और जो सहे न कोई अपमान।

II

परमेश्वर का है ये स्वभाव उसके पवित्र और निर्मल सार की वजह से। वो नफरत करता है पापों से जो विरोध करे। वो नफरत करता है नाफ़रमानी से, और शैतान के बुराई द्वारा मानव को भ्रष्ट करने से। वो तिरस्कार करता है दुष्टता और अंधेरे का। परमेश्वर किसी को भी नहीं सहेगा जो उसका खुलकर विरोध करे, चाहे हों वे सृजे हुये प्राणी या न हों, चाहे हों चुनिन्दा या दया के पात्र हों। एक बार वे उसके स्वभाव को जब क्रोधित करें, या तोड़े उसके धैर्य के सिद्धान्त को, परमेश्वर प्रकट करेगा अपना स्वभाव, जो धार्मिक है, और जो सहे न कोई अपमान। परमेश्वर किसी को भी नहीं सहेगा जो उसका खुलकर विरोध करे, चाहे हों वे सृजे हुये प्राणी या न हों, चाहे हों चुनिन्दा या दया के पात्र हों। एक बार वे उसके स्वभाव को जब क्रोधित करें, या तोड़े उसके धैर्य के सिद्धान्त को, परमेश्वर प्रकट करेगा अपना स्वभाव, जो धार्मिक है, और जो सहे न कोई अपमान।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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