परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 101

परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीज़ों के मध्य, तुमने किस में परमेश्वर के अधिकार को देखा है? तुमने उसे कैसे देखा है? मनुष्यों के द्वारा अनुभव किए गए चार ऋतुओं के सन्दर्भ में, क्या कोई बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, शीत ऋतु के मध्य आपस में परिवर्तन के नियमों को बदल सकता है? बसंत ऋतु में वृक्ष फूलते और फलते हैं; ग्रीष्म ऋतु में वे पत्तों से भर जाते हैं; शरद ऋतु में वे फल उत्पन्न करते हैं, और शीत ऋतु में पत्ते झड़ते हैं। क्या कोई इन नियमों को पलट सकता है? क्या यह परमेश्वर के एक पहलू को प्रतिबिम्बित करता है? परमेश्वर ने कहा, "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी है? वह किस वजह से अस्तित्व में बना हुआ है? यह वास्तव में परमेश्वर के वचन के कारण, और परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में बना हुआ है। जिस वायु को परमेश्वर ने बनाया था क्या अब भी अस्तित्व में बनी हुई है? क्या वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेता है परमेश्वर से आयी है? क्या कोई उन चीज़ों को अलग कर सकता है जो परमेश्वर से आते हैं? क्या कोई उनकी हस्ती और कार्य को पलट सकता है? क्या कोई परमेश्वर के द्वारा नियुक्त रात और दिन को, और परमेश्वर के आदेशानुसार रात व दिन के नियम को भ्रमित कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कुछ कर सकता है? भले ही तुम रात में न सोओ, और रात को दिन के समान लो, तौभी यह विचार करना एक दुःस्वप्न है; कि तुम्हारी दिनचर्या बदल सकती है, वरन तुम रात और दिन के बीच हुए आपस के परिवर्तन के नियम को बदलने में असमर्थ हो—और इस प्रमाणित सच्चाई को किसी भी व्यक्ति के द्वारा पलटा नहीं जा सकता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या कोई बैल के समान शेर का उपयोग कर भूमि पर हल जोतने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक हाथी को एक गधे में बदलने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक मुर्गी को एक बाज के समान आकाश में हवा में लहराने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक भेड़िऐ को एक भेड़ के समान घास खिलाने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई जल की मछली को सूखी भूमि पर रहने के योग्य बनाने में सक्षम हो सकता है? और क्यों नहीं? क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पानी में रहने की आज्ञा दी है, और इस प्रकार वे पानी में रहते हैं। वे भूमि पर जीवित रहने में सक्षम नहीं हैं, और मर जाएँगीं; वे परमेश्वर की आज्ञाओं की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीज़ों के पास उनके अस्तित्व के लिए नियम और सीमा है, और उनमें हर एक के पास उनका स्वयं का अंतःज्ञान है। इन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया है, और किसी मनुष्य के द्वारा उन्हें पलटा और उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर जंगल में ही रहेगा, और बैल के समान, जो मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के लिए काम करता है, कभी भी पालतु और विश्वासयोग्य नहीं हो सकता है। यद्यपि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं, और दोनों के पास चार पैर हैं, और ऐसे जीव हैं जो साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें दो प्रकार से बाँटा गया है, उनमें से प्रत्येक के पास उनका अपना सहज ज्ञान है, और इस प्रकार उन्हें कभी भी आपस में बदला नहीं जाएगा। यद्यपि मुर्गी के पास दो पैर है, और बाज के समान पंख भी हैं, फिर भी वह कभी हवा में उड़ नहीं पाएगी वह कम से कम एक पेड़ पर उड़ सकती है—और यह उसके सहज ज्ञान के द्वारा निर्धारित किया गया है। ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है, पर यह सब कुछ परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं के कारण हुआ है।

आज के मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को "प्रगतिशील" कहा जा सकता है, और मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को "प्रभावशील" कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि वह हमेशा की तरह बढ़ रहा है, परन्तु एक अति महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ हैः मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान, और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुका है, चन्द्रमा पर चल चुका है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, और बहुत ही ऊँची जीवन शैली में जीवन बिताता है, फिर भी, मानवजाति एक साँस लेते हुए जीव को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिन के द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र-यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति ने कितनी ही ऊँचाईयों को क्यों न छू लिया हो, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती है, और वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, और अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाओं को ठहरा दिया है; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, और बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक दूसरे की सरहदों पर अतिक्रमण नहीं सकते हैं, और तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहता है, और वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि किसी कार्य को कैसे करें, और जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के ऊपर निर्भर है, और मनुष्य के ऊपर निर्भर नहीं है; और न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है, परन्तु इसके बजाए उसे परमेश्वर के विचारों, और परमेश्वर की बुद्धि, और परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है, और यह प्रमाणित तथ्य है जिस का इनकार मनुष्य नहीं कर सकता है। स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ें, विश्व, और सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य है—वे सभी परमेश्वर की आधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार, और सृष्टि की उत्पत्ति के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं, और परिवर्तित होते हैं। कोई व्यक्ति या तत्व उनके नियमों को नहीं बदल सकता, या उनके स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वे कार्य करते हैं उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए, और परमेश्वर के अधिकार के कारण नाश हो जाते हैं। यही है परमेश्वर का अधिकार। अब जबकि इतना सब कुछ कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर की हैसियत का प्रतीक है? क्या किसी सृजे गए प्राणी या न सृजे गए प्राणी द्वारा परमेश्वर के अधिकार को धारण किया जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु, या तत्व द्वारा उसका अनुकरण, रूप धारण, या परिवर्तन किया जा सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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