परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 97

सृष्टिकर्ता का अधिकार अपरिवर्तनीय है और उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है

1. परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को उपयोग करता है

(उत्पत्ति 1:3-5) जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

(उत्पत्ति 1:6-7) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

(उत्पत्ति 1:9-11) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

(उत्पत्ति 1:14-15) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

(उत्पत्ति 1:20-21) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

(उत्पत्ति 1:24-25) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

2. परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग किया

(उत्पत्ति 9:11-13) "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

3. परमेश्वर की आशीषें

(उत्पत्ति 17:4-6) देख, मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूलपिता हो जाएगा। इसलिये अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा, परन्तु तेरा नाम अब्राहम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे जातियों के समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। मैं तुझे अत्यन्त फलवन्त करूँगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूँगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।

(उत्पत्ति 18:18-19) अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।

(उत्पत्ति 22:16-18) यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूँ कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्‍चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्‍चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा; और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी: क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।

(अय्यूब 42:12) यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छ: हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

तुम सब ने पवित्र शास्त्र के इन तीन अंशों में क्या देखा है? क्या तुम लोगों ने देखा कि यहाँ एक सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है? उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए मेघधनुष का इस्तेमाल किया, जिसमें उसने बादलों में एक मेघधनुष रखा जिससे मनुष्य को बता सके कि वह संसार को नाश करने के लिए फिर से जलप्रलय का इस्तेमाल कभी नहीं करेगा। क्या जिस मेघधनुष को लोग आज देखते हैं वही है जिसे परमेश्वर के मुँह द्वारा कहा गया था? क्या उसका स्वभाव और अर्थ बदल चुका है? बिना किसी सन्देह के, यह नहीं बदला है। परमेश्वर ने अपने कार्य को करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है, और वह वाचा जिसे उसने मनुष्य के साथ ठहराया था वह आज तक जारी है, और वह समय जब इस वाचा को बदल दिया जाएगा, वास्तव में, सिर्फ परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, "बादल में अपना धनुष रखा है," परमेश्वर आज तक इस वाचा के साथ स्थिर बना रहा है। तुम इस में क्या देखते हो? यद्यपि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ है, फिर भी वह अपने कार्यों में बहुत अधिक कठोर और सैद्धांतिक है, और अपने वचनों के प्रति सच्चा बना रहता है। उसकी कड़ाई, और उसके कार्यों के सिद्धांत सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन न किए जाने की क्षमता को और सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता को दर्शाता है। यद्यपि उसके पास सर्वोच्च अधिकार है, और सब कुछ उसके प्रभुत्व के अधीन है, और यद्यपि उसके पास सभी चीज़ों पर शासन करने का अधिकार है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को नुकसान नहीं पहुँचाया है और न ही बिखराया है, और जब भी वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो यह कड़ाई से उसके अपने सिद्धांतों के मेल में होता है, और जो कुछ उसके मुँह से निकलता है उसका ठीक ठीक अनुसरण करता है, और अपनी योजना के क्रम और उद्देश्य का अनुसरण करता है। ऐसा कहने की कोई आवश्यकता नहीं है, सभी चीज़ों पर परमेश्वर के द्वारा शासन किया जाता है साथ ही उन सिद्धांतों का भी पालन किया जाता है जिनके द्वारा परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है, उसके अधिकार के प्रबन्धों से कोई मनुष्य या चीज़ बच नहीं सकती है, और न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर की निगाहों में, जिन्हें आशीषित किया जाता है वे उसके अधिकार द्वारा लाए गए अच्छे सौभाग्य को प्राप्त करते हैं, और जो शापित हैं वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अपने दण्ड को सहते हैं। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के अधीन, कोई मनुष्य या चीज़ उसके अधिकार के इस्तेमाल से बच नहीं सकती है, और न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसके अधिकार का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी कारक में परिवर्तन की वजह से सृष्टिकर्ता के अधिकार को बदला नहीं जा सकता है, और उसी प्रकार वे सिद्धांत जिनके द्वारा उसके अधिकार को दिखाया जाता है किसी भी वजह से परिवर्तित नहीं होते हैं। स्वर्ग और पृथ्वी बड़े उथल पुथल से होकर गुज़र सकते हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सभी चीज़ें विलुप्त हो सकती हैं, परन्तु सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी अदृश्य नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और उल्लंघन न किए जा सकनेवाले अधिकार की हस्ती है, और यह सृष्टिकर्ता की वही अद्वितीयता है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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