परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 91

परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग किया

(उत्पत्ति 9:11-13) "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

जब उसने सभी चीज़ों को बनाया उसके पश्चात्, सृष्टिकर्ता का अधिकार दृढ़ हो गया और एक बार फिर "मेघधनुष की वाचा" में दिखाई दिया

सृष्टिकर्ता का अधिकार हमेशा सभी जीवधारियों पर प्रकट और इस्तेमाल होता है, और वह न केवल सब वस्तुओं की नियति पर शासन करता है, बल्कि मानवजाति पर भी शासन करता है, एक विशेष जीवधारी जिसे उसने स्वयं अपने हाथों से बनाया था, और जिसकी एक अलग जीवन संरचना है और जीवन के एक अलग रूप में अस्तित्व में बना रहता है। सब वस्तुओं को बनाने के बाद, सृष्टिकर्ता अपने अधिकार और सामर्थ को प्रकट करने से नहीं रूका; उसके लिए, वह अधिकार जिस के तहत वह सभी चीज़ों और सम्पूर्ण मानवजाति की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता था, वह केवल तब औपचारिक रूप से शुरू हुआ जब मानवजाति ने सच में उसके हाथों से जन्म लिया था। वह मानवजाति का प्रबन्ध, और उन पर शासन करना चाहता था, वह मानवजाति को बचाना चाहता था, मानवजाति को सचमुच में पाना चाहता था, वह ऐसी मानवजाति को पाना चाहता था जो सभी चीज़ों पर राज्य कर सके, और वह ऐसी एक मानवजाति बनाना चाहता था जो उसके अधिकार की आधीनता में रह सके, और उसके अधिकार को जान सके, और उसके अधिकार का पालन कर सके। इस प्रकार, परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल करके अपने अधिकार को मनुष्य के बीच में अधिकारिक रूप से प्रकट करना प्रारम्भ किया, और अपने वचनों को पूर्ण करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करना प्रारम्भ किया। वास्तव में, इस प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर का अधिकार सभी स्थानों में दिखाई देने लगा; मैं ने बस यूँ ही कुछ विशेष, जाने माने उदाहरणों को लिया है जिस से तुम सब परमेश्वर की अद्वितीयता को समझ और जान सको, और परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार को समझ और जान सको।

उत्पत्ति 9:11-13 के अंश और उपर्युक्त अंशों में परमेश्वर द्वारा संसार की सृष्टि के लेखे के संबंध में एक समानता है, फिर भी उनमें एक अन्तर भी है। समानता क्या है? समानता परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल हुए वचनों में निहित है ताकि वह उन कामों को कर सके जिसकी उसने इच्छा की थी, और अन्तर यह है कि यह अंश मनुष्य के साथ परमेश्वर का वार्तालाप है, जिसमें वह मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधता है, और मनुष्य से उसके बारे में कहता है जो वाचा में समाहित है। मनुष्य के साथ हुए उसके संवाद के दौरान परमेश्वर के अधिकार का यह उद्यम पूरा हुआ, कहने का तात्पर्य है कि, मानवजाति की सृष्टि से पहले, परमेश्वर का वचन निर्देश, और आदेश थे, जिन्हें उन जीवधारियों के लिए जारी किया गया था जिन्हें वह बनाना चाहता था। परन्तु अब यहाँ कोई परमेश्वर के वचनों को सुननेवाला था, और इस प्रकार उसके वचन मनुष्यों के साथ एक संवाद, और साथ ही मनुष्य के लिए एक प्रोत्साहन एवं चेतावनी भी थे, और इसके अतिरिक्त सभी चीज़ों को सौंपी गई आज्ञाएँ थीं जिन में उसका अधिकार था।

इस अंश में परमेश्वर की कौन सी गतिविधि दर्ज है? इस में वह वाचा दर्ज है जिसे परमेश्वर ने जल प्रलय से संसार के विनाश के बाद मनुष्य के साथ बाँधा था, यह वाचा मनुष्य को बताती है कि परमेश्वर ऐसी तबाही को फिर से संसार पर नहीं डालेगा, और अंत में, परमेश्वर ने इसके लिए एक चिन्ह ठहराया—और यह चिन्ह क्या था? पवित्र शास्त्र में ऐसा कहा गया है कि "मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।" ये सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यजाति को बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने इन शब्दों को कहा, एक मेघधनुष मनुष्य की आँखों के सामने प्रगट हो गया, जहाँ वो आज तक मौजूद है। हर किसी ने ऐसे मेघधनुष को देखा है, और जब तुम उसे देखते हो, तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसे प्रगट होता है? विज्ञान इसे साबित करने में, या उसके स्रोत को ढूँढ़ने में, या उसके उद्गम स्थान को पहचानने में नाकाम है। यह इसलिए है क्योंकि मेघधनुष उस वाचा का चिन्ह है जो सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच में बांधी गयी थी; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, यह मनुष्य के द्वारा नहीं बनाया गया था, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। अपने वचनों को कहने के बाद यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता है। मनुष्य और अपनी प्रतिज्ञा के साथ अपनी वाचा में बने रहने के लिए सृष्टिकर्ता ने अपनी स्वयं की विशिष्ट पद्धति का उपयोग किया, और इस प्रकार उसने वाचा के चिन्ह के रूप में मेघधनुष का उपयोग किया जिसे उसने एक स्वर्गीय आदेश और व्यवस्था ठहराया है जो हमेशा अपरिवर्तनीय बना रहेगा, भले ही वह सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजे गए मानवजाति के संबंध में। फिर भी, ऐसा कहना ही होगा, कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था, सभी चीज़ों की सृष्टि के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और सच्चा प्रकटीकरण है, और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ असीमित है; उसके द्वारा मेघधनुष को एक चिन्ह के रूप में इस्तेमाल करना सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरन्तरता और विस्तार है। अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए यह परमेश्वर द्वारा किया गया एक और कार्य था, और अपने वचनों को इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर ने मनुष्य के साथ जो वाचा बाँधी थी यह उसका एक चिन्ह था। जो उसने प्रकट करने का दृढ़ निश्चय किया था उसने उसे मनुष्य को बताया, और यह भी कि वह किस रीति से पूर्ण और प्राप्त होगा, और इस तरह से परमेश्वर के मुख के वचनों से वह विषय पूरा हो गया। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ है, और आज इन वचनों के बोले जाने के कई हज़ारों साल बाद भी मनुष्य परमेश्वर के मुख से बोले गए मेघधनुष को देख सकता है। क्योंकि परमेश्वर के द्वारा वे वचन बोले गए थे, यह मेघधनुष बिना किसी बदलाव और परिवर्तन के आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बना हुआ है। इस मेघधनुष को कोई भी हटा नहीं सकता है, कोई भी इसके नियमों को बदल नहीं सकता है, और यह सिर्फ परमेश्वर के वचनों के लिए ही अस्तित्व में बना हुआ है। यह बिलकुल सही अर्थ में परमेश्वर का अधिकार है। "परमेश्वर अपने वचन के समान ही भला है, और उसका वचन पूरा होगा, और जो कुछ पूरा हो गया है वह सर्वदा बना रहेगा।" ऐसे वचन यहाँ पर साफ साफ प्रकट किए गए हैं, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ का स्पष्ट चिन्ह और गुण हैं। ऐसा चिन्ह और गुण सृजे गए प्राणियों में से किसी के भी पास नहीं हैं और न ही देखे गए हैं, और न ही इसे न-सृजे गए प्राणियों में से किसी के भी पास देखा गया है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर से संबंधित है, और केवल सृष्टिकर्ता के द्वारा धारण किए गए पहचान और हस्ती को अन्य जीवधारियों से पृथक करता है। इसके अलावा परमेश्वर को छोड़, सृजे गए या न सृजे गए प्राणियों में से कोई भी, परमेश्वर के ठहराये चिन्ह से आगे नहीं बढ़ सकता है।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के साथ वाचा बाँधना एक अति महत्वपूर्ण कार्य था, और एक ऐसा कार्य था जिसका उपयोग वह मनुष्य तक एक सच पहुँचाने और मनुष्य को अपनी इच्छा बताने के लिए करना चाहता था, और आखिर में उसने एक अद्वितीय पद्धति का इस्तेमाल करते हुए, मनुष्य के साथ वाचा बाँधने के लिए एक विशिष्ट चिन्ह का उपयोग किया, जो मनुष्य के साथ बांधी गयी वाचा का एक चिन्ह था। अतः क्या इस वाचा का ठहराया जाना एक बड़ी घटना थी? और वह घटना कितनी बड़ी थी? वास्तव में यही वह बात है जो इस वाचा को विशेष बनाती हैः यह एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच, या एक समूह और दूसरे समूह के बीच, या एक देश और दूसरे देश के बीच ठहराई गई वाचा नहीं है, परन्तु सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण मानवजाति के बीच ठहराई गई वाचा है, और यह तब तक प्रमाणित बनी रहेगी जब तक सृष्टिकर्ता सब वस्तुओं का उन्मूलन न कर दे। इस वाचा का प्रतिपादन करनेवाला सृष्टिकर्ता है, और इसको बनाए रखनेवाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानवजाति के साथ ठहराई गई "मेघधनुष की वाचा" की सम्पूर्णता सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य हुए संवाद के अनुसार पूर्ण और प्राप्त हुई थी, और आज तक ऊपर आकाश में अस्तित्व में बनी हुई है। सृजे गए जीवधारी समर्पण करने, और आज्ञा मानने, और विश्वास करने, और प्रशंसा करने, और गवाही देने, और सृष्टिकर्ता के अधिकार की स्तुति करने के सिवाए और क्या कर सकते हैं? और कोई नहीं किन्तु अद्वितीय परमेश्वर के पास ही ऐसी वाचा को ठहराने का अधिकार है। मेघधनुष का प्रकटीकरण बार बार मानवजाति के लिए घोषणा करता है और उसके ध्यान को सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य बांधी गयी वाचा की ओर खींचता है। सृष्टिकर्ता और मानवजाति के मध्य ठहराई गयी वाचा के निरन्तर प्रकटीकरण में, मेघधनुष या वाचा को प्रगट नहीं किया जाता, वरन सृष्टिकर्ता का अधिकार प्रगट किया जाता है। समय समय पर मेघधनुष का प्रकटीकरण छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के भयंकर और अद्भुत कार्यों को दर्शाता है, और उसी समय यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का अति आवश्यक प्रतिबिम्ब है, और कभी नहीं बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक और पहलू का प्रकटीकरण नहीं है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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