परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 88

छठवें दिन, सृष्टिकर्ता ने कहा, और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक अपने आप को प्रगट करने लगे

स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर न होते हुए, सब वस्तुओं को बनाने के लिए सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठवें दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शाम थी, तथा एक और असाधारण दिन था। तब, इस नए दिन की शाम के लिए सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को उसने उत्पन्न, और पैदा करना चाहा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की आवाज़ है...

"फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों,' और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है" (उत्पत्ति 1:24-25)। इन में कौन कौन से जीवित प्राणी शामिल हैं? पवित्र शास्त्र कहता हैः पालतु जानवर, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के जाति जाति के जंगली पशु। कहने का तात्पर्य है कि, उस दिन वहाँ पृथ्वी के सब प्रकार के जीवित प्राणी ही नहीं थे, परन्तु उन सभों को प्रजाति के अनुसार वर्गीकृत किया गया था, और, उसी प्रकार, "परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।"

पिछले पाँच दिनों के दौरान, उसी लय में होकर, छ्ठे दिन सृष्टिकर्ता ने अपने इच्छित प्राणियों के जन्म का आदेश दिया, और हर एक अपनी अपनी प्रजाति के अनुसार पृथ्वी पर प्रकट हुआ। जब सृष्टिकर्ता ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, उसके कोई भी वचन व्यर्थ में नहीं बोले गए, और इस प्रकार, छ्ठे दिन, हर प्राणी, जिसको उसने बनाने की इच्छा की थी, समय पर प्रकट हो गए। जैसे ही सृष्टिकर्ता ने कहा "पृथ्वी से एक-एक जाति के प्राणी, उत्पन्न हों," पृथ्वी तुरन्त जीवन से भर गई, और पृथ्वी के ऊपर अचानक ही हर प्रकार के प्राणियों की श्वास प्रकट हुई...। हरे भरे घास के जंगली मैदानों में, हृष्ट पुष्ट गाएँ, अपनी पूछों को इधर उधर हिलाते हुए, एक के बाद एक प्रगट होने लगीं, मिमियाती हुई भेड़ें झुण्डों में इकट्ठे होने लगीं, और हिनहिनाते हुए घोड़े सरपट दौड़ने लगे...। एक पल में ही, शांत घास के मैदानों की विशालता में जीवन अंगड़ाई लेने लगा...। पशुओं के इन विभिन्न झुण्डों का प्रकटीकरण निश्चल घास के मैदान का एक सुन्दर दृश्य था, और अपने साथ असीमित जीवन शक्ति लेकर आया था...। वे घास के मैदानों के साथी, और घास के मैदानों के स्वामी होंगे, और प्रत्येक एक दूसरे पर निर्भर होगा; वे भी इन घास के मैदानों के संरक्षक और रखवाले होंगे, जो उनका स्थायी निवास होगा, जो उन्हें उनकी सारी ज़रूरतों को प्रदान करेगा, और उनके अस्तित्व के लिए अनंत पोषण का स्रोत होगा...

उसी दिन जब ये विभिन्न मवेशी सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा अस्तित्व में आए थे, ढेर सारे कीड़े मकौड़े भी एक के बाद एक प्रगट हुए। भले ही वे सभी जीवधारियों में सबसे छोटे थे, परन्तु उनकी जीवन शक्ति अभी भी सृष्टिकर्ता की अद्भुत सृष्टि थी, और वे बहुत देरी से नहीं आए थे...। कुछ ने अपने पंखों को फड़फड़ाया, जबकि कुछ अन्य धीर धीरे रेंगने लगे; कुछ उछलने और कूदने लगे, और कुछ अन्य लड़खड़ाने लगे, कुछ आगे बढ़कर खोल में घुस गए, जबकि अन्य जल्दी से पीछे लौट गए; कुछ दूसरी ओर चले गए, कुछ अन्य ऊँची और नीची छलांग लगाने लगे...। वे सभी अपने लिए घर ढूँढ़ने के प्रयास में व्यस्त हो गएः कुछ ने घास में घुसकर अपना रास्ता बनाया, कुछ ने भूमि खोदकर छेद बनाना शुरू कर दिया, कुछ उड़कर पेड़ों पर चढ़ गए, और जंगल में छिप गए...। यद्यपि वे आकार में छोटे थे, परन्तु वे खाली पेट की तकलीफ को सहना नहीं चाहते थे, और अपने घरों को बनाने के बाद, वे अपना पोषण करने के लिए भोजन की तलाश में चल पड़े। कुछ घास के कोमल तिनकों को खाने के लिए उस पर चढ़ गए, कुछ ने धूल से अपना मुँह भर लिया और अपना पेट भरा, और स्वाद और आनंद के साथ खाने लगे (उनके लिए, धूल भी एक स्वादिष्ट भोजन था); कुछ जंगल में छिप गए, परन्तु आराम करने के लिए नहीं रूके, क्योंकि चमकीले गहरे हरे पत्तों के भीतर के रस ने रसीला भोजन प्रदान किया...। सन्तुष्ट होने के बाद भी कीड़े मकौड़ों ने अपनी गतिविधियों को समाप्त नहीं किया, भले ही वे आकार में छोटे थे, फिर भी वे भरपूर ऊर्जा और असीमित उत्साह से भरे हुए थे, और उसी प्रकार सभी जीवधारी भी, वे सबसे अधिक सक्रिय, और सबसे अधिक परिश्रमी थे। वे कभी आलसी न हुए, और न कभी आराम से पड़े रहे। एक बार संतृप्त होने के बाद, उन्होंने फिर से अपने भविष्य के लिए परिश्रम करना प्रारम्भ कर दिया, अपने आने वाले कल के लिए अपने आपको व्यस्त रखा, और जीवित बने रहने के लिए तेज़ी से आगे बढ़ते गए...। उन्होंने मधुरता से विभिन्न प्रकार की धुनों और सुरों को गुनगुनाकर अपने आपको आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया। उन्होंने घास, वृक्षों, और ज़मीन के हर इन्च में आनंद का समावेश किया, और हर दिन और हर वर्ष को अद्वितीय बना दिया...। अपनी भाषा और अपने तरीकों से, उन्होंने भूमि के सभी प्राणियों तक जानकारी पहुँचायी। और अपने स्वयं के विशेष जीवन पथक्रम का उपयोग करते हुए, उन्होंने सब वस्तुओं को जिनके ऊपर उन्होंने निशान छोड़े थे चिन्हित किया...। उनका मिट्टी, घास, और जंगलों के साथ घनिष्ठ संबंध था, और वे मिट्टी, घास, और वनों में शक्ति और जीवन चेतना लेकर आए, और सभी प्राणियों को सृष्टिकर्ता का प्रोत्साहन और अभिनंदन पहुँचाया...

सृष्टिकर्ता की निगाहें सब वस्तुओं पर पड़ीं जिन्हें उसने बनाया था, और इस पल उसकी निगाहें जंगलों और पर्वतों पर आकर ठहर गईं, और उसका मस्तिष्क मोड़ ले रहा था। जैसे ही उसके वचन घने जंगलों, और पहाड़ों के ऊपर बोले गए, इस प्रकार के पशु प्रगट हुए जो पहले कभी नहीं आए थेः वे "जंगली जानवर" थे जो परमेश्वर के वचन के द्वारा बोले गए थे। लम्बे समय से प्रतीक्षारत, उन्होंने अपने अनोखे चेहरे के साथ अपने अपने सिरों को हिलाया और हर एक ने अपनी अपनी पूंछ को लहराया। कुछ के पास रोंएदार लबादे थे, कुछ हथियारों से लैस थे, कुछ के खुले हुए ज़हरीले दाँत थे, कुछ के पास घातक मुस्कान थी, कुछ लम्बी गर्दन वाले थे, कुछ के पास छोटी पूँछ थी, कुछ के पास ख़तरनाक आँखें थीं, कुछ डर के साथ देखते थे, कुछ घास खाने के लिए झुके हुए थे, कुछ के पूरे मुँह में ख़ून लगा हुआ था, कुछ दो पाँव से उछलते थे, कुछ चार खुरों से धीरे धीरे चलते थे, कुछ पेड़ों के ऊपर से दूर तक देखते थे, कुछ जंगलों में इन्तज़ार में लेटे हुए थे, कुछ आराम करने के लिए गुफाओं की खोज में थे, कुछ मैदानों में दौड़ते और उछलते थे, कुछ शिकार के लिए जंगलों में गश्त लगा रहे थे...; कुछ गरज रहे थे, कुछ हुँकार भर रहे थे, कुछ भौंक रहे थे, कुछ रो रहे थे...; कुछ ऊँचे सुर, कुछ नीची सुर वाले, कुछ खुले गले वाले, कुछ साफ साफ और मधुरस्वर वाले थे...; कुछ भयानक थे, कुछ सुन्दर थे, कुछ बड़े अजीब से थे, और कुछ प्यारे-से थे, कुछ डरावने थे, कुछ बहुत ही आकर्षक थे...। एक के बाद एक वे आने लगे। देखिए कि वे गर्व से कितने फूले हुए थे, उन्मुक्त-जीव थे, एक दूसरे से बिलकुल उदासीन थे, एक दूसरे को एक झलक देखने की भी परवाह नहीं करते थे...। प्रत्येक उस विशेष जीवन को जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और अपनी बर्बरता, और क्रूरता को धारण किए हुए, जंगलों और पहाड़ियों के ऊपर प्रगट हो गए। सबसे घृणित, पूरी तरह ढीठ—किसने उन्हें पहाड़ियों और जंगलों का सच्चा स्वामी बना दिया था? उस घड़ी से जब से सृष्टिकर्ता ने उनके आविर्भाव को स्वीकृति दी थी, उन्होंने जंगलों पर "दावा किया," और पहाड़ों पर भी "दावा किया," क्योंकि सृष्टिकर्ता ने पहले से ही उनकी सीमाओं को ठहरा दिया था और उनके अस्तित्व के पैमाने को निश्चित कर दिया था। केवल वे ही जंगलों और पहाड़ों के सच्चे स्वामी थे, इसलिए वे इतने प्रचण्ड और ढीठ थे। उन्हें पूरी तरह "जंगली जानवर" इसी लिए कहा जाता था क्योंकि, सभी प्राणियों में, वे ही थे जो इतने जंगली, क्रूर, और वश में न आने योग्य थे। उन्हें पालतू नहीं बनाया जा सकता था, इस प्रकार उनका पालन पोषण नहीं किया जा सकता था और वे मानवजाति के साथ एकता से नहीं रह सकते थे या मानवजाति के बदले परिश्रम नहीं कर सकते थे। यह इसलिए था क्योंकि उनका पालन पोषण नहीं किया जा सकता था, वे मानवजाति के लिए काम नहीं कर सकते थे, और यह कि उन्हें मानवजाति से दूर रहकर जीवन बिताना था, और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे, और यह इसलिए था क्योंकि वे मानवजाति से दूरी पर जीवन बिताते थे। और मनुष्य उनके पास नहीं आ सकते थे, वे उन ज़िम्मेदारियों को निभा सकते थे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दी गई थी: अर्थात् पर्वतों और जंगलों की सुरक्षा करना। उनके जंगलीपन ने पर्वतों की सुरक्षा की और जंगलों की हिफाज़त की, और उनके अस्तित्व और बढो‌तरी के लिए सबसे बेहतरीन सुरक्षा और आश्वासन था। उसी समय, उनकी बर्बरता ने सब वस्तुओं के मध्य सन्तुलन को कायम और सुनिश्चित किया। उनका आगमन पर्वतों और जंगलों के लिए सहयोग और टिके रहने के लिए सहारा लेकर आया; उनके आगमन ने शांत तथा रिक्त पर्वतों और जंगलों में शक्ति और जीवन चेतना का संचार किया। उसके बाद से, पर्वत और जंगल उनके स्थायी निवास बन गए, और वे अपने घरों से कभी वंचित नहीं रहेंगे, क्योंकि पर्वत और पहाड़ उनके लिए प्रगट हुए और अस्तित्व में आए थे, और जंगली जानवर अपने कर्तव्य को पूरा करेंगे, और उनकी हिफाज़त करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस प्रकार, जंगली जानवर भी सृष्टिकर्ता के प्रोत्साहन के द्वारा दृढ़ता से रहना चाहते थे ताकि अपने सीमा क्षेत्र को थामे रह सकें, और सब वस्तुओं के सन्तुलन को कायम रखने के लिए अपने जंगली स्वभाव का निरन्तर उपयोग कर सकें जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा स्थापित किया गया था, और सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ को प्रकट कर सकें!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 120

दीर्घ-और सूक्ष्म-दृष्टिकोण से परमेश्वर के अधिकार को समझना परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। यह स्वयं परमेश्वर की पहचान की विलक्षण अभिव्यक्ति...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII" | अंश 166

क्या तुम लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के विषय में मुख्य बिन्दु को समझते हो? इस सम्बन्ध में, किसी व्यक्ति के पास अनुभव से बहुत सारे...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17

मनुष्य की नियति परमेश्वर के प्रति उसकी मनोवृत्ति के द्वारा निर्धारित होती है परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और जैसे लोग अलग अलग स्थितियों...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 33

परमेश्वर परवाह नहीं करता है यदि मनुष्य मूर्ख है—वह केवल यह मांग करता है कि मनुष्य सच्चा हो उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को...