परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 60

अय्यूब को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा आशीषित किया जाता है, और फिर कभी शैतान के द्वारा उस पर आरोप नहीं लगाया गया

यहोवा परमेश्वर के कथनों के मध्य ऐसे शब्द हैं “तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।” वह क्या था जो अय्यूब ने कहा? यह वह था जिसके बारे में हमने पहले बातचीत की थी, साथ ही साथ यह वह था जो अय्यूब की पुस्तक के पन्नों के अनेक वचनों में है जिनमें अय्यूब को बोलते हुए दर्ज किया गया है। वचनों के इन सभी पन्नों में, अय्यूब के पास एक बार भी परमेश्वर के विषय में कोई शिकायत या ग़लतफहमी नहीं है। उसने सिर्फ परिणाम का इंतज़ार किया है। यह वह इंतज़ार है जो आज्ञाकारिता के विषय में उसकी मनोवृत्ति है, जिसके परिणामस्वरूप, और उन वचनों के परिणामस्वरूप जिन्हें उसने परमेश्वर से कहा था, अय्यूब को परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था। जब उसने परीक्षाओं को सहा और कठिनाईयों को झेला, तब परमेश्वर उसके साथ था, और हालाँकि परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा उसकी कठिनाईयां कम नहीं हुईं, फिर भी परमेश्वर ने वह देखा जिसे उसने देखने की इच्छा की थी, और वह सुना जिसे उसने सुनने की चाहत की थी। अय्यूब के प्रत्येक कार्य एवं शब्द परमेश्वर की दृष्टि एवं कानों तक पहुंचे; परमेश्वर ने सुना, और उसने देखा—और यह तथ्य है। परमेश्वर के विषय में अय्यूब का ज्ञान, और उस समय एवं उस समयावधि के दौरान उसके हृदय में परमेश्वर के विषय में उसके विचार वास्तव में उन लोगों के लिए उतने विशिष्ट नहीं थे जितना आज के समय के लोगों के लिए हैं, परन्तु उस समय के सन्दर्भ में, परमेश्वर ने तब भी वह सब कुछ पहचाना था जो उसने कहा था, क्योंकि उसके हृदय में उसका व्यवहार एवं विचार, और जो कुछ उसने अभिव्यक्त एवं प्रकट किया था, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के लिए पर्याप्त थे। उस समय के दौरान जब अय्यूब को परीक्षाओं के हवाले किया गया था, तब जो कुछ उसने अपने हृदय में सोचा था और जो कुछ करने का दृढ़ निश्चय किया था उसने परमेश्वर को एक परिणाम दिखाया था, एक ऐसा परिणाम जो परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, और उसके बाद परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षाओं को दूर किया, अय्यूब अपनी मुसीबतों से उबरा, और उसकी परीक्षाएं पूरी हो गई थीं और फिर कभी दुबारा उस पर नहीं आईं। क्योंकि अय्यूब को पहले से ही परीक्षाओं के अधीन किया गया था, और वह इन परीक्षाओं के दौरान दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहा, और उसने शैतान पर पूरी तरह से विजय प्राप्त किया, और परमेश्वर ने उसे आशीषें प्रदान कीं जिनका वह सही मायने में हकदार था। जैसा अय्यूब 42:10, 12 में दर्ज है, अय्यूब को फिर से आशीषित किया गया था, और उसे पहले के मुकाबले कहीं अधिक आशीषें प्राप्त हुईं थीं। इस समय शैतान पीछे हट गया था, और फिर कभी कुछ नहीं कहा या कुछ नहीं किया, और उसके बाद से शैतान के द्वारा अय्यूब के साथ फिर कभी हस्तक्षेप नहीं किया गया या उस पर आक्रमण नहीं किया गया, और शैतान ने अय्यूब के विषय में परमेश्वर की आशीषों के विरुद्ध आगे से कोई दोषारोपण नहीं किया।

अय्यूब ने अपना बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य बिताया

हालाँकि उस समय उसकी आशीषें केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊंटों, भौतिक सम्पत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थीं, फिर भी वे आशीषें जिन्हें परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थीं। उस समय क्या इस बात को दर्ज किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनन्त प्रतिज्ञाएं अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब के विषय में परमेश्वर कि आशीषों में, परमेश्वर ने उसकी आशीषों का जिक्र नहीं किया या उसे स्पर्श नहीं किया, और इसके बावजूद कि अय्यूब परमेश्वर के हृदय में क्या महत्व एवं स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपनी आशीषों के विषय में विवेकशील था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिन्दु तक नहीं पहुंची थी, और उस योजना ने उसके कार्य के अंतिम चरण में प्रवेश नहीं किया था, तब तक परमेश्वर ने अंत का कोई जिक्र नहीं किया था, उसने महज मनुष्य को भौतिक आशीषें ही प्रदान की थीं। इसका अर्थ है कि अय्यूब का बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य गुज़रा था, यही वह बात थी जिसने उसे दूसरों से अलग किया था—परन्तु उनके समान ही उसकी उम्र बढ़ने लगी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन भी आया जब उसने संसार को अलविदा कहा। इस प्रकार ऐसा लिखा हुआ है “अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया” (अय्यूब 42:17)। यहाँ इसका क्या अर्थ है “वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया?” जब परमेश्वर ने अंत की घोषणा की थी उसके पहले के युग में, परमेश्वर ने अय्यूब के लिए एक अपेक्षित जीवन को निर्धारित किया था, और जब वह उस आयु तक पहुंच गया था तब उसने अय्यूब को प्राकृतिक रूप से इस संसार से जाने की अनुमति दी। अय्यूब की दूसरी आशीष से लेकर उसकी मृत्यु तक, परमेश्वर ने उसके जीवन में और किसी कठिनाई को नहीं जोड़ा था। परमेश्वर के लिए अय्यूब की मृत्यु सामान्य थी, और आवश्यक भी, यह कुछ ऐसा था जो बहुत ही साधारण था, और न तो यह कोई न्याय था और न ही कोई दण्डाज्ञा। जब वह जीवित था, तब अय्यूब ने परमेश्वर की आराधना की एवं उसका भय माना; इस लिहाज से कि अपनी मृत्यु की ओर बढ़ते हुए उसका अंत किस प्रकार हुआ, परमेश्वर ने इसके विषय में कुछ नहीं कहा, और न ही कोई टिप्पणी की थी। परमेश्वर जो करता है और कहता है उसमें वह न्यायसंगत है, और उसके वचनों एवं कार्यों की विषयवस्तु एवं सिद्धान्त उसके कार्य के चरण और उस समय अवधि के अनुसार हैं जिसमें वह कार्य कर रहा है। परमेश्वर के हृदय में किसी ऐसे व्यक्ति का अंत किस प्रकार होगा जो अय्यूब के समान है? क्या परमेश्वर अपने हृदय में किसी निर्णय पर पहुंच चुका था? हाँ वास्तव में वह पहुंच चुका था! यह बस ऐसा ही था कि मनुष्य के द्वारा इसे जाना नहीं गया था; परमेश्वर मनुष्य को नहीं बताना चाहता था, न ही उसके पास मनुष्य को बताने का कोई इरादा था। और इस प्रकार, सतही तौर पर कहें, तो अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया, और अय्यूब का जीवन ऐसा ही था।

अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब के द्वारा उस मूल्य का जीवन बिताया गया

क्या अय्यूब ने एक मूल्यवान जीवन बिताया था? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा गया है कि उसने एक मूल्यवान जीवन बिताया था? मनुष्य के लिए इसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने मानवजाति का प्रतिनिधित्व किया था जिसे परमेश्वर शैतान एवं संसार के लोगों के सामने एक गूंजती हुई गवाही देने के लिए बचाना चाहता है। उसने उस कर्तव्य को निभाया जिसे परमेश्वर के एक जीवधारी के द्वारा निभाया जाना चाहिए था, और एक मिसाल कायम की, और उसने उन सभी लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में कार्य किया जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, और लोगों को अनुमति दी कि वे देखें कि परमेश्वर पर भरोसा रखने के द्वारा शैतान के ऊपर विजय प्राप्त करना पूरी तरह से सम्भव है। और परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने, और परमेश्वर के कार्यों की प्रशंसा करने, और परमेश्वर को सुकून एवं किसी चीज़ का आनन्द देने की उसकी योग्यता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने किस प्रकार परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजयी हुआ, और शैतान एवं संसार के लोगों के सामने परमेश्वर के लिए गूंजती हुए गवाही दी, मानवजाति के मध्य परमेश्वर की महिमा की, परमेश्वर के हृदय को राहत दी, और परमेश्वर के उत्सुक हृदय को ऐसे परिणाम को निहारने, एवं ऐसी आशा को देखने की अनुमति दी। उसकी गवाही ने किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर खड़े होने के लिए, और इस योग्य होने के लिए योग्यता की एक मिसाल कायम की ताकि परमेश्वर के बदले में, और मनुष्य के प्रबंधन के लिए परमेश्वर के कार्य में शैतान को लज्जित किया जाए। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को राहत पहुंचाया था, उसने परमेश्वर को महिमावान्वित होने की खुशी का पहले से ही स्वाद चखाया था, और उसने परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना के लिए एक बेहतरीन शुरुआत प्रदान की थी। इस बिन्दु के आगे से अय्यूब का नाम परमेश्वर की महिमा के लिए एक प्रतीक बन गया, और शैतान के ऊपर मानवजाति की विजय का एक चिन्ह बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जैसा जीवन जीया और शैतान के ऊपर उसकी असाधारण विजय को परमेश्वर के द्वारा हमेशा हृदय में संजोकर रखा जाएगा, और आनेवाली पीढ़ियों के द्वारा उसकी खराई, सीधाई, एवं परमेश्वर के भय का सम्मान एवं अनुसरण किया जाएगा। उसे एक बेदाग, चमकदार मोती, एवं इत्यादि के समान परमेश्वर के द्वारा हमेशा हृदय में संजोकर रखा जाएगा, और वह मनुष्य के द्वारा सहेजकर रखे जाने के भी योग्य है!

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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