परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 49

हम अय्यूब के दैनिक जीवन में खराई, सीधाई, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूरी को देखते हैं

यदि हमें अय्यूब के बारे में बातचीत करनी है, तो हमें उसके विषय में उस आंकलन के साथ शुरुआत करना होगा जो परमेश्वर के मुख से कहा गया था: "उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।"

आओ हम सबसे पहले अय्यूब की खराई एवं सीधाई के विषय में सीखें।

तुम लोग "खराई" एवं "सीधाई" के शब्दों से क्या समझ रखते हो? क्या तुम लोग यह मानते हो कि अय्यूब में कोई दोष नहीं था, और वह आदरणीय था? हाँ वास्तव में, यह "खराई" एवं "सीधाई" की एक शाब्दिक अनुवाद एवं समझ होगी। वास्तविक जीवन अय्यूब की सच्ची समझ का अभिन्न भाग है—मात्र शब्द, किताबें, एवं सिद्धान्त कोई उत्तर प्रदान नहीं करेंगे। हम अय्यूब के पारिवारिक जीवन को देखते हुए, और उसके जीवन के दौरान उसका सामान्य आचरण कैसा था उसे देखते हुए शुरुआत करेंगे। यह हमें जीवन में उसके सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों, साथ ही साथ उसके व्यक्तित्व एवं अनुसरण (उद्यम) के विषय में भी बताएगा। अब, आओ हम अय्यूब 1:3 के अंतिम शब्दों को पढ़ें: "पूर्वी देशों के लोगों में वह सबसे बड़ा था।" जो कुछ ये शब्द कह रहे हैं वह यह है कि अय्यूब की हैसियत एवं प्रतिष्ठा बहुत ऊंची थी, और यद्यपि हमें यह नहीं बताया गया है कि वह पूर्वी देशों के लोगों में वह सबसे बड़ा अपनी बहुतायत की धन-सम्पत्ति के कारण था, या इसलिए क्योंकि वह खरा एवं सीधा था, और परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था कुल मिलाकर, हम यह जानते हैं कि अय्यूब की हैसियत एवं प्रतिष्ठा बहुत ही मूल्यवान थी। जैसा बाइबल में दर्ज है, अय्यूब के विषय में लोगों की पहली छवि यह थी कि अय्यूब सिद्ध था, यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था, और यह कि उसके पास अपार धन-सम्पत्ति एवं सम्मानीय हैसियत थी। एक साधारण मनुष्य जो ऐसे माहौल में और ऐसी परिस्थितियों के अधीन रहता है, उसके लिए अय्यूब का खान-पान, जीवन की गुणवत्ता, और उसके व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न पहलु अधिकांश लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र होगा; इस प्रकार हमें पवित्र शास्त्र से निरन्तर पढ़ना होगा: "उसके बेटे बारी-बारी से एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे। जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, 'कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्‍वर को छोड़ दिया हो।' इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था" (अय्यूब 1:4-5)। यह अंश हमें दो चीज़ें बताते हैं: पहला कि अय्यूब के पुत्र एवं पुत्रियां निरन्तर दावत, खाना एवं पीना करते थे; दूसरा कि अय्यूब बार बार होमबलि चढ़ाता था क्योंकि वह अकसर उन लोगों के लिए चिंतित रहता था, इस बात से भयभीत होता था कि वे पाप कर रहे थे, यह कि उन्होंने अपने हृदय में परमेश्वर को कोसा था। इसमें दो अलग अलग प्रकार के लोगों के जीवन का वर्णन किया गया है। पहला, अय्यूब के पुत्र एवं पुत्रियां, जो अपनी सम्पन्नता के कारण अकसर जेवनार करते थे, वे फिज़ूलखर्ची का जीवन जीते थे, वे अपने मन की संतुष्टि के लिए दाखरस पीते और भोज करते थे, उच्च जीवनशैली का आनन्द उठाते थे जो भौतिक सम्पत्ति के द्वारा आया था। ऐसा जीवन जीते हुए, यह अवश्य था कि वे अकसर पाप करेंगे और परमेश्वर को ठेस पहुंचाएंगे—फिर भी इसके परिणामस्वरूप वे अपने आपको शुद्ध नहीं करते थे या होमबलि नहीं चढ़ाते थे। तो तूने देखा कि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था, यह कि वे परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति कोई विचार नहीं करते थे, न ही वे परमेश्वर को ठेस पहुंचाने से डरते थे, और वे अपने हृदय में परमेश्वर को त्यागने से बिलकुल भी भयभीत नहीं होते थे। हाँ वास्तव में, हमारा ध्यान अय्यूब के बच्चों पर नहीं है, परन्तु हमारा ध्यान उस पर है जो अय्यूब ने किया था जब उसने ऐसी चीज़ों का सामना किया; यह दूसरा मामला है जिसका इस अंश में वर्णन किया गया है, और जिसमें अय्यूब का दैनिक जीवन और उसकी मानवता की हस्ती शामिल थी। जब बाइबल अय्यूब के पुत्र एवं पुत्रियों की जेवनार का जिक्र करती है, तो वहाँ अय्यूब का कोई जिक्र नहीं है; ऐसा कहा गया है कि केवल उसके पुत्र एवं पुत्रियां ही अकसर एक साथ मिलकर खाया और पीया करते थे। दूसरे शब्दों में, उसने जेवनारों का आयोजन नहीं किया था, न ही वह फिज़ूलखर्ची करने के लिए अपने पुत्र एवं पुत्रियों के साथ खाने-पीने में शामिल होता था। हालाँकि वह समृद्ध था, और उसके पास ढेर सारी सम्पत्तियां और सेवक थे, फिर भी अय्यूब का जीवन सुखविलास का नहीं था। उसे जीवन जीने के अपने श्रेष्ठतम माहौल के द्वारा बहकाया नहीं गया था, और उसने देह के सुख विलासों से अपने आपको ठूंस ठूंस कर नहीं भरा या अपनी सम्पत्ति के कारण होमबलि चढ़ाना नहीं भूला, और इससे वह अपने हृदय में धीरे धीरे परमेश्वर से दूर तो बिलकुल भी नहीं हुआ था। तो जाहिर है कि अय्यूब अपनी जीवनशैली में अनुशासित था, और वह लोभी या सुखवादी नहीं था, न ही उसने अपने लिए परमेश्वर की आशीषों के परिणामस्वरूप जीवन की गुणवत्ता को असामान्य रूप से लिया। इसके बजाए, वह नम्र एवं शालीन था, और परमेश्वर के सामने सतर्क एवं सचेत था, वह अकसर परमेश्वर के अनुग्रह एवं आशीषों पर विचार करता था, और वह परमेश्वर से लगातार भयभीत होता था। अपने प्रतिदिन के जीवन में, अय्यूब अकसर अपने पुत्र एवं पुत्रियों के लिए होमबलि चढ़ाने के लिए जल्दी उठा जाता था। दूसरे शब्दों में, न केवल अय्यूब स्वयं परमेश्वर का भय मानता था, बल्कि वह यह आशा भी करता था कि उसके बच्चे भी उसी प्रकार परमेश्वर का भय मानेंगे और परमेश्वर के विरूद्ध पाप नहीं करेंगे। अय्यूब की भौतिक सम्पत्ति का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था, न ही वह परमेश्वर के स्थान को बदल कर सकती थी; चाहे वह स्वयं के लिए हो या उसके बच्चों के लिए, अय्यूब के प्रतिदिन के सभी कार्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से जुड़े हुए थे। यहोवा परमेश्वर के लिए उसका भय उसके मुंह तक नहीं रुका था, परन्तु उसे कार्य रूप में परिणित किया गया था, और वह उसके दैनिक जीवन के प्रत्येक एवं हर एक भाग में प्रतिबिम्बित होता था। अय्यूब के द्वारा प्रदर्शित यह वास्तविक आचरण हमें दिखाता है कि वह ईमानदार था, और उसने उस मूल-तत्व को धारण किया था जो न्याय एवं उन चीज़ो से प्रेम करता था जो सकारात्मकता थे। यह कि अय्यूब अकसर जाता था और अपने बेटे एवं बेटियों को पवित्र करता था इसका अर्थ है कि वह अपने बच्चों के व्यवहार को स्वीकार या मंजूर नहीं करता था, इसके बजाए, वह अपने हृदय में उनके व्यवहार से उकता गया था, और उसने उनकी निन्दा की थी। उसने यह निष्कर्ष निकाला था कि उसके पुत्र एवं पुत्रियों का व्यवहार यहोवा परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करता था, और इस प्रकार उसने अकसर कहा था कि वे यहोवा परमेश्वर के सामने जाएं और अपने पापों का अंगीकार करें। अय्यूब के कार्य हमें उसकी मानवता का दूसरा पक्ष दिखाते हैं: एक जिसके अंतर्गत वह कभी उनके साथ नहीं चलता था जो अकसर पाप करते थे और परमेश्वर को ठेस पहुंचाते थे, परन्तु इसके बजाय वह उनसे दूर रहता था और उनसे परहेज करता था। भले ही ये लोग उसके पुत्र एवं पुत्रियां थे, फिर भी उसने अपने सिद्धान्तों को नहीं छोड़ा क्योंकि वे उसके स्वयं के सगे सम्बन्धी थे, न ही वह अपनी स्वयं की भावनाओं के कारण उनके पापों में लिप्त हुआ था। इसके बजाए, उसने उनसे पापों का अंगीकार करने और यहोवा परमेश्वर के धैर्य को हासिल करने का आग्रह किया था, और उसने उन्हें चिताया था कि वे अपने स्वयं के लोभी सुख विलासों के लिए परमेश्वर को न छोड़ें। अय्यूब दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता था उसके सिद्धान्त परमेश्वर के प्रति उसके भय और बुराई से दूर रहने के सिद्धान्तों से अलग नहीं हैं। वह उससे प्रेम करता था जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया जाता था, और उससे घृणा करता था जिससे परमेश्वर को नफरत थी, और वह उनसे प्रेम करता था जो अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते थे, और वह उनसे घृणा करता था जिन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध बुराई एवं पाप किया था। ऐसे प्रेम एवं ऐसी घृणा को उसके दैनिक जीवन में प्रदर्शित किया गया था, और यह अय्यूब की वही सीधाई थी जिसे परमेश्वर की आँखों के द्वारा देखा गया था। स्वाभाविक रुप से, अपने दैनिक जीवन में दूसरों के साथ अपने रिश्तों के सम्बन्ध में यह अय्यूब की सच्ची मानवता का प्रकटीकरण और उसे जीना भी है जिसे हमें अवश्य सीखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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