परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 47

अय्यूब अपने जन्म के दिन को कोसता है क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके द्वारा परमेश्वर को तकलीफ हो

मैं अकसर कहता हूँ कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, और लोग मनुष्यों के बाहरी रुप-रंग को देखते हैं। क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के हृदय के भीतर देखता है, वह उनकी हस्ती (मूल-तत्व) को समझता है, जबकि लोग उनके बाहरी रूप-रंग के आधार पर अन्य मनुष्यों की हस्ती को परिभाषित करते हैं। जब अय्यूब ने अपना मुंह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा, तो इस कार्य ने सभी आत्मिक लोगों को बहुत अधिक चकित कर दिया, जिनमें उसके तीन मित्र भी शामिल थे। मनुष्य परमेश्वर से आया था, और उसे जीवन एवं शरीर के लिए धन्यवादित होना चाहिए, साथ ही साथ अपने जन्म के दिन के लिए भी धन्यवादित होना चाहिए, जिसे परमेश्वर के द्वारा उसे प्रदान किया गया है, और उसे उन्हें कोसना नहीं चाहिए। यह अधिकांश लोगों के लिए समझने योग्य एवं बोधगम्य है। किसी के लिए भी जो परमेश्वर का अनुसरण करता है, यह समझ पवित्र और अनुल्लंघनीय है, यह ऐसा सत्य है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता है। दूसरी ओर, अय्यूब ने नियमों को तोड़ दियाः उसने अपने जन्म के दिन को कोसा। यह एक ऐसा कार्य है जिसके विषय में अधिकांश लोग यह समझते हैं कि यह प्रतिबन्धित क्षेत्र में प्रवेश करने के समान है। न केवल वह लोगों की समझ एवं सहानुभूति का हकदार नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की क्षमा का भी हकदार नहीं है। ठीक उसी समय, और भी अधिक लोग अय्यूब की धार्मिकता के प्रति सन्देहास्पद हो गए थे, क्योंकि ऐसा दिखाई देता है कि उसके प्रति परमेश्वर की कृपा ने अय्यूब को अपने आपमें में ही आनन्दित बना दिया था, और इसने उसे इतना निर्भीक एवं लापरवाह बना दिया था कि उसने न केवल अपने जीवनकाल के दौरान उसे आशीष देने के लिए और उसकी देखभाल करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि उसने अपने जन्म के दिन को भी धिक्कारा कि उसका नाश कर दिया जाए। यदि यह परमेश्वर का विरोध नहीं है, तो यह क्या है? ऐसे उथलेपन ने अय्यूब के इस कार्य की निन्दा करने के लिए लोगों को सबूत प्रदान किया है, परन्तु कौन जान सकता है कि उस समय अय्यूब सचमुच में क्या सोच रहा था? और कौन उस कारण को जान सकता है कि अय्यूब ने क्यों उस तरह से व्यवहार किया था? केवल परमेश्वर एवं स्वयं अय्यूब ही यहाँ भीतर की उस कहानी को और उन कारणों को जानते हैं।

जब शैतान ने अय्यूब की हड्डियों में पीड़ा पहुंचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, तो अय्यूब बच निकलने के उपायों या प्रतिरोध करने की सामर्थ के बिना उसके चंगुल में फंस गया। उसकी देह एवं उसके प्राण (मन) ने अत्याधिक पीड़ा को सहन किया, और इस पीड़ा ने उसे शरीर में जीवित रहने की निरर्थकता, निर्बलता, एवं शक्तिहीनता का गहराई से परिचय कराया था। ठीक उसी समय, उसने एक गहरी समझ को भी हासिल किया कि परमेश्वर एक ऐसे मस्तिष्क का क्यों है कि वह मानवजाति की परवाह एवं देखभाल करता है। अय्यूब ने शैतान के चंगुल में यह एहसास किया कि मनुष्य जो मांस और लहू का बना हुआ है वह वास्तव में बहुत ही निर्बल एवं कमज़ोर है। जब वह अपने घुटनों पर आया और परमेश्वर से प्रार्थना की, तो उसने ऐसा महसूस किया मानो परमेश्वर अपने मुख को ढांप रहा था, और छिप रहा था, क्योंकि परमेश्वर ने पूरी तरह से उसे शैतान के हाथ में दे दिया था। ठीक उसी समय, परमेश्वर भी उसके लिए रोया, और इसके अतिरिक्त, वह उसके लिए व्यथित भी था; परमेश्वर उसके दर्द से तड़प उठा था, और उसकी पीड़ा से पीड़ित हुआ था। अय्यूब ने परमेश्वर की पीड़ा को महसूस किया था, साथ ही साथ इस बात को भी कि यह परमेश्वर के लिए कितना असहनीय था। अय्यूब परमेश्वर को और अधिक पीड़ा नहीं पहुंचाना चाहता था, न ही वह यह चाहता था कि परमेश्वर उसके लिए विलाप करे, वह यह देखना तो बिलकुल भी नहीं चाहता था कि परमेश्वर को उसके द्वारा पीड़ा पहुंचे। इस घड़ी, अय्यूब केवल अपनी देह को स्वयं से उतारना चाहता था, वह आगे से उस पीड़ा को सहना नहीं चाहता था जिसे उसकी देह के द्वारा उस पर लाया गया था, क्योंकि यह परमेश्वर को अपनी पीड़ा के द्वारा पीड़ित होने से रोकेगा—फिर भी वह नहीं कर सका, और उसे न केवल देह के उस दर्द को सहना पड़ा, बल्कि साथ ही उस पीड़ा को भी सहना पड़ा कि वह नहीं चाहता था कि परमेश्वर को चिंतित करे। इन दो पीड़ाओं ने—एक देह से, और एक आत्मा से—अय्यूब को दिल को चीरने वाला, अंतड़ियों को मरोड़ने वाला दर्द पहुंचाया था, और उसे यह एहसास कराया कि मनुष्य की सीमाएं किस प्रकार किसी को परेशान एवं असहाय कर सकती हैं जो मांस और लहू से बना है। इन परिस्थितियों के अंतर्गत, परमेश्वर के लिए उसकी लालसा और भी अधिक प्रचण्ड हो गई थी, और शैतान के लिए उसकी घृणा और भी अधिक तीव्र हो गई थी। इस समय, परमेश्वर को उसके लिए आंसू बहाकर रोते हुए या दर्द सहते हुए देखने की अपेक्षा अय्यूब ने यह अधिक पसंद किया होता कि मनुष्यों के इस संसार में उसका जन्म कभी न हुआ होता, भला होता कि वह अस्तित्व में नहीं आता। उसने अपनी देह से अत्यंत घृणा करना शुरू कर दिया था, और वह बीमार होने एवं अपने आप से, और जन्म के दिन से, और यहाँ तक कि उनसब से उकताने लगा था जो उससे जुड़े हुए थे। उसने यह इच्छा नहीं की थी कि उसके जन्म के दिन का और अधिक जिक्र किया जाए या उससे कोई मतलब रखा जाए, और इस प्रकार उसने अपना मुंह खोला और अपने जन्म के दिन को कोसा: "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, 'बेटे का गर्भ रहा।' वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो" (अय्यूब 3:3-4)। अय्यूब के शब्दों में स्वयं के लिए उसकी घृणा है, "वह दिन जल जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ, और वह रात भी जिसमें कहा गया, बेटे का गर्भ रहा," साथ ही साथ उनमें स्वयं के लिए उसकी निन्दा और परमेश्वर को दर्द पहुंचाने के लिए ऋणी होने का एहसास भी है, "वह दिन अन्धियारा हो जाए! ऊपर से ईश्‍वर उसकी सुधि न ले, और न उसमें प्रकाश हो।" ये दो अंश महानतम प्रकटीकरण हैं कि अय्यूब ने तब कैसा महसूस किया था, और सब पर उसकी खराई एवं सीधाई को प्रदर्शित करते हैं। ठीक उसी समय, बिलकुल वैसे ही जैसे अय्यूब ने इच्छा की थी, उसके विश्वास को एवं परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता को, साथ ही साथ परमेश्वर के प्रति उसके भय को सचमुच में ऊंचा उठाया गया था। हाँ वास्तव में, यह ऊंचाई बिलकुल वह प्रभाव है जिसकी परमेश्वर ने अपेक्षा की थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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