परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 45

अय्यूब के द्वारा परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का एक और प्रगटिकरण परमेश्वर के नाम को सभी चीजों में अत्यधिक महिमा देता है

अय्यूब ने शैतान के प्रकोपों का दुःख उठाया था, फिर भी उसने यहोवा परमेश्वर के नाम को नहीं छोड़ा। उसकी पत्नी वह इंसान थी जिसने पहले कदम बढ़ाया और शैतान का किरदार अदा किया जिसे अय्यूब पर हमले के द्वारा देखा जा सकता है। मूल पाठ इस प्रकार से इसका वर्णन करता है: तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, "क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा" (अय्यूब 2:9)। ये वे शब्द हैं जिन्हें मनुष्य के भेष में शैतान के द्वारा कहा गया था। वे एक आक्रमण, एवं एक आरोप, साथ ही साथ प्रलोभन, परीक्षा, एवं कलंक भी थे। अय्यूब की देह पर आक्रमण करने में असफल होने पर, तब शैतान ने सीधे तौर पर उसकी खराई पर हमला किया था, वह इसका उपयोग करना चाहता था ताकि अय्यूब को मजबूर करे कि वह अपनी ईमानदारी को छोड़ दे, परमेश्वर को त्याग दे, और जीना छोड़ दे। इस प्रकार शैतान भी अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग करना चाहता था: यदि अय्यूब यहोवा के नाम को छोड़ देता, तो उसे इस पीड़ा को सहने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपने आपको शारीरिक पीड़ा से मुक्त करा सकता था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने यह कहने के द्वारा उसे झिड़का, "तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" (अय्यूब 2:10)। अय्यूब काफी समय से इन वचनों को जानता था, परन्तु इस समय उनके विषय में अय्यूब के ज्ञान की सच्चाई साबित हो गई थी।

जब उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर को श्राप देने और मर जाने की सलाह दी, तो उसका अभिप्राय था: तेरा परमेश्वर तुझ से ऐसा ही बर्ताव करता है, इसलिए उसे कोसता क्यों नहीं है? अभी भी जीवित रहकर तू क्या कर रहा है? तेरा परमेश्वर तेरे प्रति इतना पक्षपाती है, फिर भी तू कहता है कि यहोवा का नाम धन्य है। जब तू उसके नाम को धन्य कहता है तो वह कैसे तेरे ऊपर विपत्ति ला सकता है? जल्दी कर और उसके नाम को त्याग दे, और अब से उसका अनुसरण मत करना। इस तरह से तेरी परेशानियाँ समाप्त हो जाएंगी। इस घड़ी, वहाँ ऐसी गवाही उत्पन्न हुई जिसे परमेश्वर अय्यूब में देखना चाहता था। कोई साधारण मनुष्य ऐसी गवाही नहीं रख सकता था, न ही हम इसके विषय में बाइबल की किसी अन्य कहानियों में पढ़ते हैं—परन्तु अय्यूब के द्वारा इन शब्दों को कहने के बहुत पहले ही परमेश्वर ने इसे देख लिया था। परमेश्वर ने महज अय्यूब को अनुमति देने के लिए इस अवसर का उपयोग करने की इच्छा की थी ताकि वह सब को यह साबित करे कि परमेश्वर सही था। अपनी पत्नी की सलाह का सामना करने पर, अय्यूब ने न केवल अपनी ईमानदारी को नहीं छोड़ा या परमेश्वर को नहीं त्यागा, बल्कि उसने अपनी पत्नी से यह भी कहा: "क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?" क्या इन शब्दों में बहुत वज़न है? यहाँ, केवल एक ही तथ्य है जो इन शब्दों के वज़न को साबित करने में समर्थ है। इन शब्दों का वज़न यह है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा उसके हृदय में मंजूर किया गया है, ये वे शब्द हैं जिनकी इच्छा परमेश्वर के द्वारा की गई थी, ये वे शब्द हैं जिन्हें परमेश्वर सुनना चाहता था, और ये वे परिणाम हैं जिन्हें परमेश्वर ने देखने की लालसा की थी; साथ ही ये शब्द अय्यूब की गवाही का सार-तत्व भी हैं। इसमें, अय्यूब की खराई, सीधाई, परमेश्वर का भय, और बुराई से दूर रहने को प्रमाणित किया गया है। अय्यूब की बहुमूल्यता इसमें निहित है कि जब उसकी परीक्षा ली गई, और तब भी जब उसका पूरा शरीर दुखदायी घावों से भरा हुआ था, जब उसने अत्याधिक पीड़ा को सहा, और जब उसकी पत्नी एवं सगे-सम्बन्धियों ने उसे सलाह दी, फिर भी उसने इन शब्दों को कहा था। इसे दूसरी तरह से कहें, तो उसने अपने हृदय में विश्वास किया था कि, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परीक्षाएं कैसी भी हों, क्लेश या पीड़ा कितनी भी दर्दनाक क्यों न हों, भले ही मृत्यु उसके ऊपर आ जाए, वह कभी भी परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग को नहीं ठुकराएगा। तो तूने देखा कि परमेश्वर उसके हृदय में अति महत्वपूर्ण स्थान रखता था, और उसके हृदय में केवल परमेश्वर ही था। यह इसके कारण ही था कि हम पवित्र शास्त्र में उसके विषय में इस प्रकार पढ़ते हैं: इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया। उसने न केवल अपने होंठों से पाप नहीं किया, बल्कि उसने अपने हृदय में परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत नहीं की। उसने परमेश्वर के बारे में कष्टदायक शब्दों को नहीं कहा, न ही उसने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया। न केवल उसके मुँह ने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा, बल्कि उसने अपने हृदय में भी परमेश्वर के नाम को धन्य कहा; उसका मुँह एवं हृदय एक ही था। यही वह सच्चा अय्यूब था जिसे परमेश्वर के द्वारा देखा गया था, और यही वह प्रमुख कारण था कि क्यों परमेश्वर ने अय्यूब को हृदय में संजोकर रखा था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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