परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 39

परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य से कभी छिपाया नहीं गया है—मनुष्य का हृदय परमेश्वर से भटक गया है

उत्पत्ति के समय से ही, परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य के साथ कदम से कदम मिलाता रहा है। इसे मनुष्य से कभी छिपाया नहीं गया है, बल्कि इसे मनुष्य के लिए पूरी तरह से सार्वजनिक किया गया है और सरल बनाया गया है। फिर भी, समय के बीतने के साथ ही, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से और भी अधिक दूर होता गया, और जब मनुष्य की भ्रष्टता और अधिक गहरी होती गई, तो मनुष्य एवं परमेश्वर दूर तथा और अधिक दूर होते गए। आहिस्ता आहिस्ता परन्तु निश्चित रूप से, मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि से ओझल हो गया। मनुष्य परमेश्वर को "देखने" में असमर्थ हो गया, जिससे उसके पास परमेश्वर का कोई "समाचार" नहीं रहा; इस प्रकार, वह नहीं जानता कि परमेश्वर अस्तित्व में है या नहीं, और यहाँ तक चला गया है कि परमेश्वर के अस्तित्व का पूरी तरह से इंकार करता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूपके विषय में मनुष्य की नासमझी इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से छिप गया है, बल्कि इसलिए है क्योंकि उसका हदय परमेश्वर से फिर गया है। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह इस बारे में अनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह उसे प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आया है और उसने हमेशा से परमेश्वर से परहेज किया है। इसके परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। अतः उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं और नहीं गया हैः इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे परमेश्वर पर प्रकट करने के बजाय कि वह उसे देखे, उसने इसे अपने आपके लिए रख लिया है। यह उस तथ्य के विरोध में है कि कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग यह शपथ भी खाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देते हैं, यह कि उन्हें दण्ड दिया जा सकता है यदि वे अपनी शपथ को तोड़ते हैं। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वह परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों को मानने के योग्य है, न ही इसका अर्थ यह है कि उसने अपनी नियति एवं सम्भावनाओं एवं अपना सब कुछ परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन कर दिया है। इस प्रकार, ऐसे शपथ के बावजूद जिन्हें तू परमेश्वर के लिए लेता है या उसके प्रति अपनी मनोवृत्ति के बावजूद, परमेश्वर की दृष्टि में तेरा हृदय उसके प्रति अभी भी अवरुद्ध है, क्योंकि तू केवल परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है किन्तु तू उसे इसका नियन्त्रण करने नहीं देता है। दूसरे शब्दों में, तूने अपना हृदय परमेश्वर को बिलकुल भी नहीं दिया है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए मनभावने शब्द बोलता है; इसी बीच, तूने अपने विभिन्न धूर्त इरादों को, और साथ ही अपने षडयन्त्रों, साजिशों, एवं योजनाओं को परमेश्वर से छिपाया है, और तू अपने भविष्य की सम्भावनाओं एवं नियति को अपने हाथों में कसकर पकड़े रहता है, और अत्यंत भयभीत होता है कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ले लिए जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर ने स्वयं के प्रति मनुष्य की ईमानदारी को कभी नहीं देखा है। हालाँकि वह मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, और वह देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करने की इच्छा करता है, और जो चीजें उसके हृदय के भीतर रखी हुई हैं वह उन्हें देख सकता है, फिर भी मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित नहीं है, उसने उसे परमेश्वर के नियन्त्रण में नहीं दिया है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के पास उसका अवलोकन करने का अधिकार है, परन्तु उसके पास उसका नियन्त्रण करने का अधिकार नहीं है। मनुष्य की आत्मनिष्ठ चेतनावस्था में, मनुष्य अपने आपको परमेश्वर की दया पर छोड़ने की इच्छा या इरादा नहीं करता है। मनुष्य ने न केवल अपने आपको परमेश्वर के लिए अवरुद्ध किया है, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जो अपने हृदयों को ढांपने के लिए उपायों के बारे में सोचते हैं, परमेश्वर के विषय में मिथ्या प्रभाव उत्पन्न करने और उसका भरोसा हासिल करने के लिए चिकनी चुपड़ी बातों एवं चापलूसी का उपयोग करते हैं, और परमेश्वर कि दृष्टि से अपने असली चेहरे को छिपाने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर को देखने की अनुमति न देने में उनका उद्देश्य है कि परमेश्वर को अनुमति न दिया जाए कि वह एहसास करे कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देना चाहते हैं, परन्तु उन्हें स्वयं के लिए ही रखना चाहते हैं। इसका गुप्त कारण यह है कि जो कुछ मनुष्य करता है और जो कुछ वह चाहता है उसकी योजना, उसकी गणना, और उसका निर्णय स्वयं मनुष्य के द्वारा ही किया जाता है; उसे परमेश्वर की भागीदारी एवं हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं है, और उसे परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं है। इस प्रकार, चाहे परमेश्वर की आज्ञाओं, एवं उसके महान आदेश के लिहाज से, या उन अपेक्षाओं के लिहाज से जिन्हें परमेश्वर मनुष्य से करता है, मनुष्य का निर्णय अपने स्वयं के इरादों एवं रुचियों पर, और उस समय की अपनी स्वयं की दशा एवं परिस्थितियों पर आधारित होता है। मनुष्य हमेशा न्याय करने और उस मार्ग को चुनने के लिए जिसे उसे लेना चाहिए अपने उस ज्ञान एवं अंतर्दृष्टि का उपयोग करता है जिन से वह परिचित है, और अपनी स्वयं कि बुद्धिमत्ता का उपयोग करता है, और परमेश्वर के हस्तक्षेप एवं नियन्त्रण की अनुमति नहीं देता है। यह मनुष्य का हृदय है जिसे परमेश्वर देखता है।

प्रारम्भ से लेकर आज के दिन तक, केवल मनुष्य ही परमेश्वर के साथ बातचीत करने में समर्थ रहा है। अर्थात्, परमेश्वर के समस्त जीवित प्राणियों एवं जीवधारियों के मध्य, और कोई नहीं केवल मनुष्य ही परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम रहा है। मनुष्य के पास कान हैं जो उसे इस योग्य बनाते हैं कि वह सुने, और उसके पास आंखें हैं जिससे वह देख सकता है, उसके पास भाषा है, और अपने स्वयं के विचार हैं, और स्वतन्त्र इच्छा है। उसके पास वह सब कुछ है जिनकी आवश्यकता होती है जिससे वह परमेश्वर को बोलते हुए सुने, और परमेश्वर की इच्छा को समझे, और परमेश्वर के महान आदेश को स्वीकार करे, और इस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को अपनी सारी इच्छाएं प्रदान करता है, और मनुष्य को ऐसा साथी बनाना चाहता है जो उसके मन के मुताबिक हो तथा जो उसके साथ चल सके। जब से उसने प्रबंध करना प्रारम्भ किया है, परमेश्वर मनुष्य के लिए इंतजार करता रहा है कि वह अपना हृदय उसे दे, कि वह परमेश्वर को उसे शुद्ध एवं सुसज्जित करने की अनुमति दे, कि उसे परमेश्वर के लिए संतोषप्रद बनाए और परमेश्वर के द्वारा उससे प्रेम किया जाए, कि वह परमेश्वर का आदर करे और बुराई से दूर रहे। परमेश्वर ने हमेशा से ही इस परिणाम की ओर देखा है और इसका इंतजार किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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